Saturday, November 29, 2008

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी


स्थिति बहुत दुखद है। सारे देश का आक्रोश फूटा पड़ रहा है। जिन निर्दोषों की जान गयी उनके बारे में तो कहना ही क्या, मगर बाकी घरों में भी गम का माहौल है। सैनकों ने जल्दबाजी करने के बजाय जिस धैर्य और गंभीरता से अपना सारा ध्यान ज़्यादा-से-ज़्यादा जानें बचाने पर रखा वह ध्यान देने योग्य बात रही है। आश्चर्य नहीं कि पंजाब से आतंकवाद का निर्मूलन करने वाले सुपरकॉप के पी एस गिल ने भी बचाव और प्रत्याक्रमण के धीमे परन्तु सजग और दृढ़ तरीके की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

जहाँ सारा देश स्थिति के आंकलन और आगे इस तरह की परिस्थिति से बचने के उपायों के बारे में सोच रहा है वहीं शर्म की बात यह है कि देश के कुछ उर्दू अखबार बुरी तरह से लगकर इस घटना में भी हिन्दू-मुसलमान ही ढूंढ रहे हैं। बी बी सी की एक रिपोर्ट के मुताबिक उर्दू अखबारों की ख़बरों के कई नमूने साफ़-साफ़ बता रहे हैं कि उर्दू पत्रकारिता में किस तरह के लोग घुसे हुए हैं। एक अखबार सवाल करता है, "भला कोई मुसलमान हेमंत करकरे को क्यों मारेगा?" जबकि दूसरा शक करता है, "कहीं यह मालेगांव की जांच से ध्यान हटाने की साजिश तो नहीं?" एक और अखबार ज़्यादा लिखता नहीं है मगर एक आतंकवादी का चित्र छापकर उसकी कलाई में लाल बंद जैसी चीज़ पर घेरा लगाकर दिखाता है। शायद उन सम्पादक जी को बम और हथियार नहीं दिख रहे हैं इसलिए खुर्दबीन लगाकर आतंकी के हाथ में कलावा ढूंढ रहे हैं। लानत है ऐसे लोगों पर जो इस संकट की घड़ी में भी सिर्फ़ यही खोजने पर लगे हैं कि झूठ कैसे बोला जाए और बार बार झूठ बोलकर जनता का ध्यान असली मुद्दों से कैसे भटकाया जाए।

आम जनता में डर भले ही न हो मगर इस बात की चिंता तो है ही कि जम्मू-कश्मीर के शेष भारत जैसा सुरक्षित बनने के बजाय कहीं बाकी देश भी कश्मीर जैसा न हो जाय। यह भी इत्तेफाक की बात है जिस प्रधानमंत्री के कार्यकाल में जम्मू-कश्मीर में क़ानून-व्यवस्था हाथ से फिसली और वहाँ आतंकवाद पनपा, उसकी मृत्यु भी उसी आतंकवाद की वजह से कोई बड़ी ख़बर न बन सकी।

चिंता स्वाभाविक तो है मगर मेरी नज़र में किसी भी भय का कारण नहीं है। भारत के हजारों साल के इतिहास में हम इससे भी कहीं अधिक भयानक समय से गुज़रे हैं मगर भारत के वीरों ने हर कठिन समय का डटकर मुकाबला किया है। कितने देश, संस्कृतियाँ मिट गयीं, कितनी नयी महाशक्तियां बनीं-मिटीं मगर हम थे, हैं और रहेंगे - एक महान संस्कृति, एक महान राष्ट्र। हर बुरे वक़्त के बाद हम पहले से बेहतर ही हुए हैं। मुझे इकबाल की कही हुई पंक्तियाँ याद आ रही हैं,

कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन, दौरे ज़मां हमारा।।

यह सच है कि राष्ट्र इस घटना के लिए तैयार नहीं था। निश्चित ही कई चूकें हुई हैं जो कि आतंकवादी विस्फोटकों का इतना ज़खीरा इकठ्ठा कर सके और मिलकर दस ठिकानों पर आक्रमण कर पाये। निरीह-निर्दोष जानें भी गयीं। मगर हमें पूरा भरोसा रखना चाहिए कि हम इस घटना से भी कुछ नया ही सीखेंगे और यह देश दोबारा ऐसा नहीं होने देगा।

जान देने वाले सभी वीरों को नमन! ईश्वर उनके परिवारों को इस कठिन समय को सहने की शक्ति दे!

आवाज़
पॉडकास्ट कवि सम्मेलन - नवम्बर २००८

Wednesday, November 26, 2008

गोली का बदला गोली


जब आतंकवादी किसी भीड़ भरी ट्रेन या बस में चुपचाप कोई सूटकेस बम छोड़कर गायब हो जाते थे तब बात और थी। बुर्के में धरना प्रदर्शन कर रही महिलाओं के पीछे बुर्के में ही छिपे हुए जब अचानक वे अपनी ऐ-के-४७ निकालकर निरीह जानें लेने लगते थे तब भी बात और थी। बात तब भी और थी जब देश के दुश्मन कश्मीर के पंडितों को उनके घरों से खींचकर और पंजाब में गैर-सिखों को बसों से खींचकर गोली से उड़ा रहे थे। उत्तर-पूर्व या झारखंड के घने जंगलों में छिपे हुए आतंकवादी जब सेना या अर्ध-सैनिक बालों की किसी गाडी को घेरकर हमला करते थे या चुपचाप बारूदी सुरंग बिछाकर गायब हो जाते थे वह बात भी और थी।

चित्र सौजन्य: राइटर्स (Reuters)
मगर आज जब इन हैवानों की हिम्मत इतनी बढ़ गयी है कि वे मुम्बई जैसे शहर में खुलेआम इतनी जगहों पर न सिर्फ़ एक साथ सुनियोजित हमले कर रहे थे बल्कि आतंक-निरोधी दस्ते के प्रमुख सहित कई पुलिस-कर्मियों का खून कर सके, यह सचमुच बहुत ही दुखद, निराशाजनक और खून खौला देने वाली घटना है।

इन हालिया घटनाओं से यह साफ़ है कि पिछले वर्षों में आतंक का जाल हमारे अनुमानों से कहीं बड़ा, घना, ताक़तवर और जालिम हुआ है। समय-समय पर पुराने तस्करों के साथ-साथ कल के टिकियाचोट्टों को भी पैसे के लालच में इन गतिविधियों में शामिल किया जाता रहा है। कुछ गैर-जिम्मेदार नेताओं की भड़काऊ और घटिया बयानबाजी इन आतंकवादियों को जितना बल मिला है उतना ही अदालत के सामने सबूत रखने के मामले में प्रशासन की लापरवाही बरतने से भी। सताया हुआ होने का ड्रामा करने वाले छिछले धार्मिक नेता और तथाकथित सामाजिक अभिनेता और उनके साथ ही हम में से ही कुछ लोगों द्वारा इस वहशीपन को धर्म की दीवारों में बांटना भी दहशतगर्दों के दुस्साहस को बढावा ही देता है।

पुलिस और प्रशासन को तो अधिक चुस्ती और मुस्तैदी की ज़रूरत है ही, आम जनता को भी आत्म-रक्षा और जन-सहायता के प्रशिक्षण की बड़ी मात्रा में ज़रूरत है। बेहतर हो कि सरकार और समाज सेवी संस्थायें इस तरह का कोई सार्थक कार्यक्रम देश भर के विद्यालयों में शुरू करें और यदि सम्भव हो तो उसे सभी कार्यालयों और घरों तक भी पहुंचाया जाए।

समय आ गया है जब हम सब एकजुट होकर इन पशुओं को और इनके पालने वालों को चुन-चुनकर उनके कर्मों का फल दिलाकर पीडितों के प्रति न्याय करने में सहायक बनें। इसके लिए इनकी पहचान और पकडा जाना तो ज़रूरी है ही, पक्के सबूत भी बहुत ज़रूरी हैं ताकि इस बार ये लोग हमेशा की तरह "अपराध साबित नहीं हुआ" की ढाल लेकर अपनी गतिविधियों को चला न सकें।

प्रभु पीडितों की आत्मा को शान्ति दे!

[चित्र सौजन्य: राइटर्स (Reuters), सीमा गुप्ता एवं ताऊ रामपुरिया]

Saturday, November 22, 2008

ज़माने की बातें - कविता

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जो करते थे सारे
ज़माने की बातें

वो करते हैं अब
दिल दुखाने की बातें

मेरे साथ होते जो
थकते नहीं थे

वो करते कभी अब
न आने की बातें

है सब कुछ हमारा
था जिनका यह दावा

वो करते हैं सब कुछ
छिपाने की बातें

ग़मे दिल को अपने
मना लूंगा आख़िर

मैं कैसे भुलाऊँ
ज़माने की बातें।

Thursday, November 20, 2008

लिखने को बहुत कुछ है

कभी-कभी यूँ भी होता है कि कहने को बहुत कुछ होता है मगर इतनी सारी बातों में यह समझ नहीं आता कि क्या कह दिया जाए और क्या रह दिया जाए. कुछ ऐसा ही आजकल मेरे आसपास हो रहा है. मौसम तेज़ी से बदल रहा है. कल तक तरह-तरह के रंगों से सुशोभित पेड़ ठूंठ से नज़र आने लगे हैं. सुबह घर से जल्दी निकलो तो बर्फ की चादर से ढँकी घास का रंग सफ़ेद दिखता है. आज रात में तीन इंच बर्फ जमने की संभावना है.

पिछले हफ्ते की बेरोजगारी की दर पिछले सोलह साल में सर्वाधिक थी. लोग मंदी की मार के मारे हुए हैं. शेयर बाज़ार तो कलाबाजियां खाता जा रहा है. सिटीबैंक का शेयर आज पाँच डॉलर से नीचे चला गया. बहुत पैसा डूब गया. मगर ऐसा भी नहीं कि सब कुछ ख़राब ही हो रहा हो. हर स्टोर में सेल लगी हुई है. सेल तो वैसे हर साल ही लगती है मगर इस साल तो हर कोई किसी तरह करके भी अपना माल बेचने का भरसक प्रयत्न कर रहा है. और उसके लिए वे ग्राहक को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. बहुत सी दुकानों को डर है कि अगर इस सीज़न में पैसा नहीं बना सके तो शायद अगले सीज़न तक धंधे से बाहर ही न हों. पेट्रोल की कीमतों में गिरावट भी जारी है. कुछ स्थानों में प्रति-गैलन पेट्रोल भी दो डॉलर से कम आ गया.

दफ्तर के बाहर के बड़े से सजावटी फव्वारे को जब लकडी के फट्टों से ढंका जाने लगा तो यही सोचा कि शायद बर्फ से बचने के लिए ऐसा किया जा रहा हो. मगर जब उस पर बाकायदा सेट तैयार होने लगा तो ध्यान आया कि यहाँ भी त्योहारों का मौसम आ चुका है. बाज़ार में सड़क-किनारे लगे पेड़ों को बिजली की झालरों से सजाया जाने लगा है. जगह-जगह ईसा मसीह के जन्म के दृश्य की झांकिया बननी शुरू हो गयी हैं. दफ्तर के बाहर के फव्वारे के ऊपर हर साल एक बहुत बड़ी झांकी लगती है.शुक्रवार को शहर की सालाना "लाईट अप नाईट" है जो कि आधिकारिक रूप से त्यौहार के मौसम का आरम्भ मानी जा सकती है.

ऐसा भी नहीं है कि सब लोग त्यौहार की खुशी में शरीक ही हों. कुछ लोग तो गिरती बर्फ में शून्य से नीचे के तापक्रम में खड़े होकर काम मांगते दिख जाते हैं ताकि अपने बच्चों के लिए क्रिसमस के उपहार खरीद सकें. मगर कुछ लोग अकारण भी नाखुश रहने की कला जानते हैं. पिछली बार कुछ दलों ने इस बात पर हल्ला मचाया था कि कुछ दुकानों ने "शुभ क्रिसमस" के चिह्न क्यों लगाए थे. यह दल चाहते थे कि दुकानें सिर्फ़ एक "सीजंस ग्रीटिंग" जैसा धर्म-निरपेक्ष नारा ही लिखें.

समाज सेवी संस्थायें भी काम पर निकल पडी हैं ताकि बालगृह और अनाथालय आदि में रह रहे बच्चों तक उपहार और बेघरबार लोगों तक ऊनी कपड़े आदि पहुंचाए जा सकें. कुल मिलाकर यह समय विरोधाभास का भी है और संतुष्टि का भी. कोई उपहार पाकर संतुष्ट है और कोई उपहार देकर!

चित्र सौजन्य: अनुराग शर्मा
ओमनी विलियम पेन होटल में लाईट अप नाईट का दृश्य

चित्र सौजन्य: अनुराग शर्मा
मेरे कार्यालय के बाहर यीशु के जन्म का दृश्य

दोनों चित्र: अनुराग शर्मा द्वारा ::  Photos by Anurag Sharma
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Sunday, November 16, 2008

सबसे पुरानी जीवित जीप - युद्ध की विरासत

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी सेना ने एक ऐसे विश्वसनीय मोटर वाहन की ज़रूरत महसूस की जो कि उस समय उपलब्ध वाहनों से अधिक शक्तिशाली हो और साथ ही आल-वील ड्राइव भी हो. वाहन का चलता-फिरता प्रारूप प्रस्तुत करने के लिए ४९ दिन का समय बहुत कम था और अधिकाँश बड़ी कंपनियां इतने कम समय में ऐसा क्रांतिकारी डिजाइन सामने लाने लायक नहीं थीं. ऐसे समय पर सन १९४० में पिट्सबर्ग के बाहर बटलर में स्थित एक छोटी सी कंपनी अमेरिकन बैंटम ने एक ऐसा वाहन बनाया जो कि बाद में पौराणिक (legendary के लिए यदि आपके पास कोई बेहतर हिन्दी/उर्दू शब्द है तो कृपया मुझे ज़रूर बताएं) हो गया और आज सारी दुनिया में जीप के नाम से जाना जाता है . चूंकि अमेरिकन बैंटम एक छोटी सी कंपनी थी और सेना को डर था कि वह उनकी मांग को पूरा नहीं कर सकेगी इसलिए उन्होंने क्रम से दो और कम्पनियों को बैंटम वाहन का प्रारूप दिखाया और उन्हें भी वही वाहन समान संख्या में बनाने को कहा. इस तरह दुनिया की पहली जीप को विल्लीज़ और फोर्ड ने भी बनाया.

आज सारी दुनिया में जीप नाम एक तरह से स्पोर्ट्स यूटिलिटी वाहनों (SUVs) का पर्याय सा बन गया है. कई कंपनियों को स्थानांतरित होकर जीप ब्रांड नेम अंततः क्राइसलर की अमानत है. अमेरिकी वाहन उद्योग की पतली हालत के बारे में तो आप सुन ही रहे होंगे. फोर्ड और जनरल मोटर्स के साथ-साथ क्राइसलर पर भी अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है इसलिए यह कहना सम्भव नहीं है कि जीप का ऐतिहासिक नाम और कितने दिन अपने अस्तित्व को बचा सकेगा.

चित्र सौजन्य: अनुराग शर्माचित्र सौजन्य: अनुराग शर्मा

सबसे पहली सत्तर कारों के लॉट में से सिर्फ़ एक जीप जीवित बची है. बैंटम ००७ के नाम से जानी गयी यह जीप विश्व की सबसे पुरानी जीवित जीप है. आज वह जीप पिट्सबर्ग के हाइन्ज़ इतिहास केन्द्र में अपने मूल रूप में रखी हुई है. ऊपर के चित्र उसी जीप के हैं जो मैंने अपने सेलफोन से लिए हैं. प्रकाश कम होने की वजह से चित्र कम प्रकाशित हैं मगर जीप फ़िर भी भली-भांति दृष्टव्य है.

Thursday, November 13, 2008

चीनी दमन और तिब्बती अहिंसा

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महामहिम दलाई लामा की अगुयाई में अगले हफ्ते से हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला नगर में निर्वासित तिब्बतियों के एक-सप्ताह तक चलने वाले एक सम्मेलन का आयोजन हो रहा है. हमेशा की तरह कम्युनिस्ट चीन ने पहले से ही बयानबाजी करके भारत पर राजनैतिक दवाब डालना शुरू कर दिया है. एक तरफ़ चीन ने भारत को याद दिलाया कि वह इस सम्मेलन को भारत भूमि पर हो रहा एक चीन विरोधी कार्यक्रम मानेगा वहीं दूसरी ओर चीन ने कहा कि भारत की बताई उत्तरी सीमा को उसने कभी नहीं माना है खासकर पूर्वोत्तर में.

दशकों से निर्वासन में जी रहे हमारे उत्तरी पड़ोसी देश के नागरिकों की देश वापस लौटने की आस अभी भी ज्वलंत है. भले ही उनके प्रदर्शन हमारे अपने भारतीयों के प्रदर्शनों की तरह हिंसक न हों मगर उनका जज्बा फ़िर भी प्रशंसनीय है.

मुझे तिब्बतियों से पूर्ण सहानुभूति है और मुझे अहिंसा में उनके दृढ़ विश्वास के प्रति पूर्ण आदर भी है. मगर अहिंसा की उनकी परिभाषा से थोडा सा मतभेद है. मेरा दिल उनके लिए यह सोचकर द्रवित होता है कि तानाशाहों की नज़र में उनकी अहिंसा सिर्फ़ कमजोरी है. मुझे बार-बार यह लगता है कि अहिंसा के इस रूप को अपनाकर वे एक तरह से तिब्बत में पीछे छूटे तिब्बतियों पर चीन के दमन को अनजाने में सहारा ही दे रहे हैं.

अहिंसा के विचार का उदय और विकास शायद भारत में ही सबसे पहले हुआ. गीता जैसे रणांगन के मध्य से कहे गए ग्रन्थ में भी अहिंसा को प्रमुखता दिया जाना यह दर्शाता है कि अहिंसा की धारणा हमारे समाज में कितनी दृढ़ है. परन्तु हमारी संस्कृति में अहिंसा कमजोरी नहीं है बल्कि वीरता है. और गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन की मोह के वश आयी छद्म-अहिंसा की अवधारणा को तोड़ते हुए उसे थोपे गए युद्ध में अपने ही परिजनों और गुरुजनों का मुकाबला करने के लिए कहा था.
दूसरे अध्याय में भगवान् कहते हैं:

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥२- ३८॥

सुख-दुख, लाभ-हानि, जय और पराजय को समान मानकर युद्ध करते हुए पाप नहीं लगता. आख़िर सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान मानने वाला किसी से युद्ध करेगा ही क्यों? युद्ध के लिए निकलने वाला पक्ष किसी न किसी तरह के त्वरित या दीर्घकालीन सुख या लाभ की इच्छा तो ज़रूर ही रखेगा. और इसके साथ विजयाकान्क्षा होना तो प्रयाण के लिए अवश्यम्भावी है. अन्यथा युद्ध की आवश्यकता ही नहीं रह जाती है. तब गीता में श्री कृष्ण बिना पाप वाले किस युद्ध की बात करते हैं? यह युद्ध है अन्याय का मुकाबला करने वाला, धर्म की रक्षा के लिए आततायियों से लड़ा जाने वाला युद्ध. आज या कल तिब्बतियों को निर्दय चीनी तानाशाहों के ख़िलाफ़ निष्पाप युद्ध लड़ना ही पडेगा जिससे बामियान के बुद्ध के संहारक तालेबान समेत दुनिया भर के तानाशाहों को आज भी हथियार बेचने वाला चीन बहुत समय तक तिब्बत की बौद्ध संस्कृति का दमन न कर सके.

दलाई लामा - चित्र सौजन्य: अनुराग शर्मा
चित्र: अनुराग शर्मा
तिब्बत संबन्धी कुछ लिंक
तिब्बत के मित्र
दलाई लामा



Tuesday, November 11, 2008

जीवन - कविता

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सुरीला तेरे जैसा या
कंटीला मेरे जैसा है
जाने यह जीवन कैसा है?

कभी गऊ सा सीधा सादा
कभी मरखना भैंसा है
जाने यह जीवन कैसा है?

जी पाते न मर पाते
कुछ साँप छछूंदर जैसा है
जाने यह जीवन कैसा है?

मानव का मोल रहा क्या है
अब सबका सब कुछ पैसा है
जाने यह जीवन कैसा है?

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Sunday, November 9, 2008

गांधी, आइंस्टाइन और फिल्में

हमारे एक मित्र हैं। मेरे अधिकाँश मित्रों की तरह यह भी उम्र, अनुभव, ज्ञान सभी में मुझसे बड़े हैं। उन्होंने सारी दुनिया घूमी है। गांधी जी के भक्त है। मगर अंधभक्ति के सख्त ख़िलाफ़ हैं। जब उन्होंने सुना कि आइन्स्टीन ने ऐसा कुछ कहा था कि भविष्य की पीढियों को यह विश्वास करना कठिन होगा कि महात्मा गांधी जैसा व्यक्ति सचमुच हुआ था तो उन्हें अजीब सा लगा। सोचने लगे कि यह बड़े लोग भी कुछ भी कह देते हैं।

बात आयी गयी हो गयी और वे फ़िर से अपने काम में व्यस्त हो गए। काम के सिलसिले में एक बार उन्हें तुर्की जाना पडा। वहाँ एक पार्टी में एक अजनबी से परिचय हुआ। [बातचीत अंग्रेजी में हुई थी - मैं आगे उसका अविचल हिन्दी अनुवाद लिखने की कोशिश करता हूँ।]

नव-परिचित ने उनकी राष्ट्रीयता जाननी चाही तो उन्होंने गर्व से कहा "भारत।" उनकी आशा के विपरीत अजनबी ने कभी इस देश का नाम नहीं सुना था। उन्होंने जहाँ तक सम्भव था भारत के सभी पर्याय बताये। फिर ताजमहल और गंगा के बारे में बताया और उसके बाद मुग़ल वंश से लेकर कोहिनूर तक सभी नाम ले डाले मगर अजनबी को समझ नहीं आया कि वे किस देश के वासी हैं।

फ़िर उन्होंने कहा "गांधी" तो अजनबी ने पूछा, "गांधी, फ़िल्म?"

"हाँ, वही गांधी, वही भारत।" उन्होंने खुश होकर कहा।

कुछ देर में अजनबी की समझ में आ गया कि वे उस देश के वासी हैं जिसका वर्णन गांधी फ़िल्म में है। उसके बाद अजनबी ने पूछा, "फ़िल्म का गांधी सचमुच में तो कभी नहीं हो सकता? है न?"

तब मेरे मित्र को आइंस्टाइन जी याद आ गए।

साथ तुम्हारा - कविता

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साथ तुम्हारा होता तो
यह बोझिल रस्ता हँसत़े हँसते
कट ही जाता

हार तुम्हारी बाहों का
मेरी ग्रीवा जो पडता तो
दुख थोडा तो घट ही जाता

हँसता रहता कभी न रोता
साहस सहज न खोता
पास तुम्हें हरदम जो पाता

कभी जिसे अपना सरबस था सौंपा तुमने
आज वही मै पछतावे में झुलस रहा हूँ
तुम मिलते तो क्षमादान तो पा ही जाता

यह बोझिल रस्ता हँसत़े हँसते
कट ही जाता।

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Thursday, November 6, 2008

आलस्य

छह बोले तो सात है, सात कहें तो आठ
कभी समय पर चले नहीं, ऐसे अपने ठाठ


ऐसे अपने ठाठ, कभी मजबूरी होवे
तो भी राम भरोसे लंबी तान के सोवें


सोते से जो कोई मूरख कभी जगा दे
पछतायेंगे उसके तो दादे परदादे

दादे तो अपने भी समझा समझा हारे
ख़ुद ही हार गए हमसे आख़िर बेचारे

(अनुराग शर्मा)

Wednesday, November 5, 2008

बधाई ओबामा, जय प्रजातंत्र!

ओबामा ने अमेरिका के इतिहास में पहला अश्वेत राष्ट्रपति बनकर एक अनोखा इतिहास रचा है - इसके लिए उन्हें और अमेरिकी जनता के साथ-साथ स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों में विश्वास रखे वाला हर व्यक्ति बधाई का पात्र है.

यह केवल प्रजातंत्र में ही सम्भव हो सकता है कि आप किसी भी धर्म, समुदाय, जाती, दल या विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हुए भी दमन के भय के बिना दूसरी विचारधाराओं से स्वस्थ प्रतियोगिता कर सकते हैं.

जिस तरह पानी के कितने भी तेज़ दवाब में रहने पर भी लकडी का तिनका अंततः तैरकर ऊपर आ ही जाता है उसी प्रकार जनता द्वारा अपने प्रतिनिधि का चुनाव एक ऐसी विचारधारा है जो कि कितने भी अत्याचारों के बावजूद ऊपर आकर ही रहेगी. काश धर्म, सेना या प्रजातंत्र विरोधी विभिन्न वाद या सिद्धांत यथा राजतंत्र, साम्यवाद आदि के नाम पर निरीह जनता को गोलियों से भूनने वाले तानाशाह इस तथ्य को समय रहते समझ पायें.

भारत उपमहाद्वीप का ही उदाहरण लें तो पायेंगे कि यहाँ हमारा प्रजातंत्र चीन और बर्मा की दमनकारी साम्यवादी तानाशाही, पाकिस्तान व बांग्लादेश के आंतरायिक क्रूर सैनिक शासनों और नेपाल व भूटान के राजतन्त्रों से घिरा हुआ था. मगर भारत में जनतंत्र के सफल प्रयोग ने नेपाल, भूटान आदि में इस नए परिवर्तन को प्रेरित किया.

खैर, प्रजातंत्र से इतर तंत्रों पर फ़िर कभी बात करेंगे. अभी सिर्फ़ इतना ही कि मैं बहुत प्रसन्न हूँ.

कहानी लिखने का मेरा प्रयास "सब कुछ ढह गया" को मैं सफल मानूंगा क्योंकि आप सब ने उसे इतना पसंद किया. सुझावों और संदेशों के लिए आप सब का आभारी हूँ. धन्यवाद!


Sunday, November 2, 2008

सब कुछ ढह गया - 3

तीन खंडों की यह कहानी इस अंक में समाप्य है। पिछले खंड पढने के लिए नीचे के लिंक्स पर क्लिक करें
खंड १
खंड २

साथ बैठे नौजवान मजदूर ने एक बीड़ी सुलगाकर उसकी तरफ़ बढ़ाई तो वह न नहीं कर सका। बीडी से शायद उसके शरीर और आवाज़ का कम्पन कुछ कम हुआ। इस लड़के ने बताया कि वह बालीगंज के पास ही जा रहे हैं। काम करीब हफ्ते भर चलेगा। उसके चेहरे पर खुशी की एक लहर सी दौड़ गयी। बालीगंज उसकी झुग्गी के एकदम पास था। उसने शुक्र मनाया कि शाम को वह जल्दी घर पहुँच सकेगा और पत्नी का हाथ भी बँटा सकेगा। कल से अगर वह घर से सीधा काम पर चला जाय तो रोज़ का बस का किराया भी बच जायेगा और बेमतलब ठण्ड में जमेगा भी नहीं।

उसने महसूस किया कि अब धूप में कुछ गरमी आने लगी थी। कोहरा भी छंट गया था। ट्रक बालीगंज में दाखिल हो चुका था। रास्ते जाने-पहचाने लग रहे थे। ला-बेला चौक, गांधी चौराहा, सब कुछ तो उसका रोज़ का देखा हुआ था।

ट्रक उजाड़ महल के मैदान में जाकर रुक गया। ट्रक के पास ही एक पुलिस की गाडी भी खड़ी थी। न जाने क्यों आज रास्ते में भी पुलिस की गाडियां खूब दिख रही थीं। उजाड़ महल दरअसल कंक्रीट के एक ढाँचे का नाम था। चार-पाँच साल पहले किसी सेठ ने यहाँ अपनी कोठी बनवानी शुरू की थी। एक रात सात-आठ मजदूर एक अधबनी छत के गिरने से दबकर मर गए थे। तब से वह कोठी वैसी ही पडी थी। बाद में सेठ ने वह ज़मीन किसी को बेच दी थी। नए मालिक ने एकाध बार वहाँ काम शुरू कराना चाहा भी मगर हर बार कुछ न कुछ लफडा ही हुआ। एक बार पुलिस भी आयी और उसके बाद वहाँ कोई काम नहीं हुआ।

कालांतर में उसके आसपास कई झुग्गी झोपडियां उग आयी थीं। वह भी ऐसी ही एक झुग्गी में रहता था। झुग्गी की बात याद आते ही उसे याद आया कि कल तो तौकीर भाई भी आयेगा झुग्गी का किराया लेने। तौकीर भाई बहुत ही जालिम आदमी है। उससे पंगा लेकर कोई भी चैन से नहीं रह सकता। आम आदमी की तो बात ही क्या, इलाके में कोई नया थानेदार भी आता है तो पहले उसकी भट्टी पर ही आता है हाजरी बजाने।

ठेकेदार ट्रक से नीचे उतरकर एक पुलिसवाले से बात करने लगा। दोनों एक दूसरे को कुछ समझा रहे थे। थोड़ी देर बाद ठेकेदार ट्रक के पीछे आया और सभी मजदूरों को नीचे उतरकर एक तरफ़ खडा होने की हिदायत देकर फ़िर से उसी पुलिसवाले के पास चला गया। सोचने लगा कि वह दोपहर में ठेकेदार से पूछकर खाना खाने घर चला जायेगा, मुन्ना का हालचाल भी देख लेगा। घर के इतने पास काम करने का कुछ तो फायदा होना ही चाहिए।

"मेरे पीछे-पीछे आओ एक-एक कुदाल लेकर" ठेकेदार की बात से उसकी तंद्रा भंग हुई।

उसने भी एक कुदाल उठाई और बाकी मजदूरों के पीछे चलने लगा। यह क्या, ठेकेदार तो उसकी बस्ती की तरफ़ ही जा रहा था। उसने देखा कि पुलिस वाले कुछ ट्रकों में पुरानी साइकिलें, बर्तन, खटियाँ, और बहुत सा दूसरा सामान भर रहे थे। तमाम औरतें बच्चे जमा थे। बहुत शोर हो रहा था। एकाध छोटे झुंड पुलिस से उलझते हुए भी दिख रहे थे। वह जानना चाह रहा था कि यह सब क्या हो रहा है। उसके मन में अजीब सी बेचैनी होने लगी थी।

ठेकेदार के आगे-आगे पुलिस का दीवान चल रहा था। दीवान उसकी बस्ती में घुस गया। वहाँ पहले से ही कई सिपाही मौजूद थे। दीवान ने उसके पड़ोसी नत्थू के घर की तरफ़ इशारा करके ठेकेदार से कहा, "यहाँ!"

"फ़टाफ़ट लग जाओ काम पर..." ठेकेदार बोला।

उसे अभी तक सब कुछ एक रहस्य सा लग रहा था। उसने देखा कि नत्थू के घर का सारा सामान बाहर पडा था। लेकिन वहाँ पर कोई व्यक्ति नहीं था। नत्थू तो सवेरे ही फेरी लगाने निकल पड़ता है मगर उसकी घरवाली कहाँ है? नत्थू के घर से उड़कर जब उसकी नज़र आगे बढ़ी तो अपने घर पर जाकर टिकी। वहाँ कुछ भीड़ सी लगी हुई थी। उसने देखा कि उसके घर का सामान भी बाहर पडा था। उसकी पत्नी मुन्ना को गोद में लिए हुए बाहर गली में खड़ी थी। नत्थू की घरवाली और कुछ और महिलायें भी वहीं थीं।

तभी ठेकेदार के बाकी शब्द उसके कान में पड़े, "...ये पूरी लाइन आज शाम तक तोड़नी है, हफ्ते भर में यह पूरा कचरा साफ़ हो जाना चाहिए।"

अब बात उसकी समझ में आने लगी थी। हे भगवान्! यह सारी कवायद उस जैसे गरीबों की झुग्गियां उजाड़ने के लिए है ताकि सेठ अपने महल बना सकें। नहीं, वह अपनी बस्ती नहीं टूटने देगा। अगर यह बस्ती टूट गयी तो उसकी पत्नी कहाँ रहेगी, बीमार मुन्ना का क्या होगा? अपनी कुदाल फैंककर वह अपने घर की तरफ़ भागा।

"यह सब कैसे हुआ?" उसने पत्नी से पूछा। पत्नी बौराई सी उसे फटी आंखों से देखती रही। उस के मुंह से कोई बोल न फूटा। मुन्ना भी उसकी गोद में मूर्तिवत सा पडा रहा। शायद बहुत गहरी नींद में था।

नत्थू की घरवाली ने सुबकते हुए किसी तरह कहा, "तुम्हारे जाते ही खून की उल्टी हुई और एक घंटे में ही सब निबट गया। हमने तुरन्त ही रज्जो के बाबूजी को भेजा तुम्हारा पता लगाने। बाप के बिना हम औरतें तो अन्तिम संस्कार नहीं कर सकती हैं न।"

[समाप्त]

Saturday, November 1, 2008

सब कुछ ढह गया - 2

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कंडक्टर को पास आता देखकर उसने अंटी में से सारी रेजगारी निकाल ली। कई बार गिना। टिकट के पैसे बिल्कुल बराबर, यह भी अजब इत्तफाक था। उसके हाथ में जो सिक्के थे बस वही उसके घर का सम्पूर्ण धन था। पत्नी का अन्तिम गहना, उसकी पाजेब की जोड़ी बेचने के बाद जितने भी पैसे मिले थे उसमें से अब बस यही सिक्के बचे थे। कंडक्टर ने एक हाथ में टिकट थमाया और उसने दूसरे हाथ से सिक्के उसकी हथेली में रख दिए। कंडक्टर ने सिक्के देखे, विद्रूप से मुंह बनाया और सिक्के शीशा-टूटी खिड़की से बाहर फैंकते हुए बोला, "अब तो भिखारी भी टिकट खरीदने लगे हैं।"

अपनी संपत्ति की आख़िरी निशानी उन सिक्कों को इस बेकद्री से बस की खिड़की के बाहर कोहरे के सफ़ेद समुद्र में खोते हुए देखकर उसका सर भन्ना गया। दिल में आया कि इस कंडक्टर को भी उसी खिड़की से बाहर फेंककर अपने सिक्के वापस मंगवाए मगर मुंह से उतना ही निकला, "बाहर काहे फेंक दिए जी?"

"तुझे टिकट मिल गया न? अब चुपचाप बैठा रह, अपना स्टाप आने तक।" कंडक्टर गुर्राकर अगली सवारी को टिकट पकड़ाने चल दिया।

वह सोचने लगा कि कब तक वह अकारण ही जानवरों की तरह दुत्कारा जाता रहेगा। यह कंडक्टर तो कोई सेठ नहीं है और न ही पढा-लिखा बाबू है। यह तो शायद उसके जैसा ही है। अगर यह भी उसे इंसान नहीं समझ सकता तो फ़िर बड़े आदमियों से क्या उम्मीद की जा सकती है।

आखिरकार बस उसके ठिये तक पहुँच गयी। वह बस से उतरकर सेठ की गद्दी की तरफ़ चलने लगा। कोहरे की बूँदें उसके कुरते पर मोतियों की तरह चिपकने लगीं। पास में ही एक चाय के खोखे के आस पास कुछ लोग खड़े अखबार पढ़ रहे थे। उसे पता था कि अंटी खाली है। फ़िर भी उसका हाथ वहाँ चला गया। कुछ क्षणों के लिए उसके कदम भी ठिठके मगर सच्चाई से समझौता करना तो अब उसकी आदत सी ही हो गयी थी, सो गद्दी की तरफ़ चल पडा। मन ही मन मनाता जा रहा था कि कुछ न कुछ काम उसके लिए बच ही गया हो।

"लो आ गए अपने बाप की बरात में से!" सेठ का बेटा उसे देखकर साथ खड़े मुंशी से बोला। कल का लड़का, लेकिन कभी किसी मजदूर से सीधे मुंह बात नहीं करता है। फ़िर उसकी तरफ़ मुखातिब होकर बोला, "अबे ये आने का टाइम है क्या?"

"जी बाउजी, कोई काम है?" उसने सकुचाते हुए पूछा।

"किस्मत वाला है रे तू, हफ्ते भर का काम है तेरे लिए..." मुंशी ने आशा के विपरीत कहा, "ठेकेदार आता ही होगा बाहर, ट्रक में साथ में चला जइयो।"

ट्रक आने में ज़्यादा देर नहीं लगी। ठेकेदार ने अन्दर आकर सेठ के मुंशी के हाथ में कुछ रुपये पकडाए और मुंशी ने लगभग धकियाते हुए उसे आगे कर दिया।

"चल आजा फ़टाफ़ट" ठेकेदार ने ड्राइवर के बगल में बैठते हुए कहा।

वह ट्रक के पीछे जाकर ऊपर चढ़ गया। कुछ मजदूर वहाँ पहले से ही मौजूद थे। कुदाली वगैरह औजार भी एक कोने में पड़े थे। ट्रक खुला था और ठण्ड भी थी। सूरज चढ़ने लगा था मगर धूप भी उसकी तरह ही बेदम थी।

उसने साथ बैठे आदमी को जय राम जी की कही और पूछा, "कहाँ जा रहे हैं?"

"जाने बालीगंज की तरफ़ है जाने कहाँ!" साथी ने कुछ अटपटा सा जवाब दिया।

[क्रमशः]