Tuesday, December 29, 2009

ये बदनुमा धब्बे

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मेरे शुभचिंतक
जुटे हैं दिलोजान से
मिटाने
बदनुमा धब्बों को
मेरे चेहरे से
शुभचिंतक जो ठहरे
लहूलुहान हूँ मैं
कुछ भी
देख नहीं सकता
समझा नहीं पाता हूँ
किसी को कि
ये धब्बे
मेरी आँखें हैं!

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Friday, December 25, 2009

लेन देन - एक कविता

(अनुराग शर्मा)

दीवारें मजदूरों की दर-खिड़की सारी सेठ ले गए।
सर बाजू सरदारों के निर्धन को खाली पेट दे गए।।

साम-दाम और दंड चलाके सौदागर जी भेद ले गए।
माल भर लिया गोदामों में रखवालों को गेट दे गए।।

मेरी मिल में काम मिलेगा कहके मेरा वोट ले गए।
गन्ना लेकर सस्ते में अब चीनी महंगे रेट दे गए।।

ठूँस-ठास के मन न भरा तो थैले में भरपेट ले गए।
चाट-चाट के चमकाने को अपनी जूठी प्लेट दे गए।।

अंत महीने बचा रुपय्या जनसेवा के हेत ले गए।
रक्त-सनी जिह्वा से बाबा शान्ति का उपदेश दे गए।।

चिकनी-चुपड़ी बातें करके हमसे सारा देश ले गए।
हाथी घोड़े प्यादे खाकर मंत्री जी चेक मेट दे गए।।

[आपको बड़े दिन, क्वांज़ा, हनूका, और नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!]

Sunday, December 20, 2009

रजतमय धरती हुई [इस्पात नगरी से - २२]

पिछले हफ्ते से ही तापक्रम शून्य से नीचे चला गया था. रात भर हिमपात होता रहा. कल सुबह जब सोकर उठे तो आसपास सब कुछ रजतमय हो रहा था. बर्फ गिरती है तो सब कुछ अविश्वसनीय रूप से इतना सुन्दर हो जाता है कि शब्दों में व्यक्त करना कठिन है. चांदनी रातों की सुन्दरता तो मानो गूंगे का गुड़ ही हो. शब्दों का चतुर चितेरा नहीं हूँ इसलिए कुछ चित्र रख रहा हूँ. देखिये और आनंद लीजिये:


मेरे आँगन का एक पत्रहीन वृक्ष


घर के सामने का मार्ग


रात में बाहर छूटी कार


हमारे पड़ोस का वाइल्ड वुड नामक पारिवारिक मनोरंजन क्षेत्र


एक करीबी मुख्य मार्ग

[सभी चित्र अनुराग शर्मा द्वारा. बड़ा चित्र देखने के लिए चित्र को क्लिक करे.
Winter in Pittsburgh: All photos by Anurag Sharma]

Saturday, December 19, 2009

कार के प्रकार [इस्पात नगरी से - २१]


पिट्सबर्ग की एक विंटेज कार

                                      मर्सिसीज़ की पिद्दी सी स्मार्ट कार पिट्सबर्ग में


विश्व की पहली बिजली की कार १९६७ में पिट्सबर्ग की कंपनी वेस्टिंगहाउस ने बनाई थी


अलुमिनम कंपनी अल्कोआ द्वारा पिट्सबर्ग में अलुमिनम से बनाई गई कार


विश्व की प्राचीनतम जीप बैंटम ००७ पिट्सबर्ग में ही बनी थी


द्वितीय विश्व युद्ध के लिए बना उभयचर वाहन पिट्सबर्ग की मोनोंगाहेला नदी में


बोनस चित्र: पिट्सबर्ग की सड़क किनारे एक होंडा रूकस

अमेरिका के तिपहिया वाहनों के लिए इंतज़ार कीजिये अगली कड़ी तक.

[सभी चित्र अनुराग शर्मा द्वारा. बड़ा चित्र देखने के लिए चित्र को क्लिक करे.]
[Photo Courtesy: Anurag Sharma]

Tuesday, December 15, 2009

किशोर चौधरी के नाम...

प्रिय किशोर,

हम सभी को रोचक सपने आते रहे हैं, कभी-कभार कुछ याद भी रह जाता है और अक्सर सब भूल ही जाते हैं. कभी-कभी तो भूल जाने की प्रक्रिया याद रखने से पहले ही हो जाती है. मगर आपने उसे याद रखा और इतनी कुशलता से हम तक पहुंचाया. इस सपने में बहुत से सन्देश हैं जिन पर कभी व्यक्तिगत रूप से बात करेंगे.

सबसे पहले तो अपने पैर के आईठाण को निकलवाइये. मेरे ख्याल से तो कोई चर्मरोग विशेषज्ञ उसे कुछ मिनटों में ही निकाल सकता है. डॉ अनुराग आर्य बेहतर बता सकते हैं.

आपके पिताजी के बारे में जानकार दुःख हुआ. परिजनों का जाना - विशेषकर माता या पिता का - ऐसा विषय है जिस पर कोई कितना कुछ भी कहे या लिखे, उस क्षति की पूर्ति नहीं हो सकती है. जीवन फिर भी चलता है. भविष्य के लिए नहीं बल्कि भूत के सपनों को साकार करने के लिए. पुरखों की आशा को, उनके जीवन की ज्योति को अगली पीढ़ियों के सहारे पुष्ट करने के लिए. ज़रा सोचिये कि आपकी माताजी को उनकी कमी कितनी गहराई से महसूस होती होगी. उनके दर्द को समझकर जो भी सहायता कर सकते हैं करिए.

प्रियजनों का जाना बहुत दुखद है. इसके कारण हममें से बहुत लोग अस्थायी रूप से अवसादग्रस्त हो जाते हैं. इसका इलाज़ संभव है. चिकित्सा के साथ-साथ दिनचर्या में परिवर्तन भी लाभप्रद है. अगर आसानी से संभव हो तो आकाशवाणी की अपनी शिफ्ट दिन की कराने का प्रयास करो. संभव हो तो आधे घंटे का व्यायाम अपनी दिनचर्या में जोड़ लो. मित्रों से मिलते रहो, खासकर जीवट वाले मित्रों से.

सबको खुश रख पाना संभव नहीं है. इसका प्रयास भी आसान नहीं है. बहुत दम चाहिए. कोशिश यह करो कि अपनी और से सब ठीक हो आगे प्रभु की (और उनकी) मर्जी.

नाराज़ होकर ब्लॉग छोड़ने (और उसका ऐलान करने) की बात मुझे कभी समझ नहीं आयी. फिर भी इतना ही कहूंगा कि स्वतंत्र समाज में सबको अपनी मर्जी से चलने का हक है जब तक कि उनका कृत्य उन्हें और अन्य लोगों और परिवेश को कोई हानि न पहुंचाए.

शुभाकांक्षी
अनुराग.

पुनश्च: अगर में यह न बताऊँ कि तुम्हारा आज का लिखा मन को छू गया है तो यह पत्र अधूरा ही रह जाएगा. ऐसे ही लिखते रहो. बहुत लोगों को तुम्हारे लिखे का इंतज़ार रहता है.

[किशोर चौधरी एक समर्थ ब्लोगर हैं. उनकी पोस्ट "दोस्तों ब्लॉग छोड़ कर मत जाओ, कौन लिखेगा कि वक्त ऐसा क्यों है?" पर टिप्पणी लिखने बैठा तो पूरी पोस्ट ही बन गयी. टिप्पणी बक्से की अपनी शब्द सीमा है, इसलिए पोस्ट बनाकर यहाँ रख रहा हूँ. बहुत लम्बे समय से सपनों के बारे में एक श्रंखला लिखने की सोच रहा था, किशोर की पोस्ट ने मुझे एक बार फिर उसके बारे में याद दिलाया है. जल्दी ही शुरू करूंगा.]

Friday, December 11, 2009

हनूका पर्व [इस्पात नगरी से - २०]

 भारत की तरह ही अमेरिका भी पारिवारिक और लोकतांत्रिक मूल्यों वाला और विविध संस्कृतियों की स्वतन्त्रता का सम्मान करने वाला देश है. सच पूछिए तो मुझे इन दोनों देशों के चरित्र में समानताएं अधिक दिखती हैं और अंतर न्यून. जिस प्रकार भारत में बहुत से धर्म, त्यौहार और उल्लास चहुँ और दिखता है वैसा ही यहाँ भी. प्रेतों के उत्सव हेलोवीन और धन्यवाद दिवस का ज़िक्र मैंने अपनी पिछली पोस्टों में किया था. यह समय क्रिसमस और नव-वर्ष का है. क्रिसमस के साथ ही दो अन्य प्रमुख पर्व इसी समय मनाये जाते हैं. क्वांज़ा नाम का त्यौहार मूलतः अफ्रीकी मूल के समुदाय द्वारा मनाया जाता है, जबकि हनूका या हनुक्कः का पर्व एक यहूदी परम्परा है.

दीवाली की तरह ही हनूका भी एक ज्योति पर्व है जो आठ दिन तक चलता है. इस साल यह ग्यारह दिसंबर, यानी आज से शुरू हो रहा है और विश्व भर में लगभग डेढ़ करोड़ यहूदियों द्वारा मनाया जाएगा. हिब्रू के शब्द हनुका का अर्थ है समर्पण. इसमें मनोरा नाम के आठ बत्तियों के चिराग को जलाकर प्रकाश फैलाया जाता है.

इन्हें भी पढ़ें:
लोक संगीत का आनंद लीजिये:  एक अलग सा राजस्थानी लोकगीत
गिरिजेश की प्रेरणा से लिखी यह उलटबांसी पढ़िए: भय - एक कविता



मासचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल में वर्षांत पर्व-काल का एक पोस्टर
[चित्र सौजन्य: अनुराग शर्मा. Hanukkah poster. Photo by Anurag Sharma]


Wednesday, December 9, 2009

भय - एक कविता

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बच रहा था आप सबसे

कल तलक सहमा हुआ

अब बड़ा महफूज़ हूँ मैं

कब्र में आने के बाद


मौत का अब डर भी यारों

हो गया काफूर है

ज़िंदगी की बात ही क्या

ज़िंदगी जाने के बाद

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