Thursday, June 24, 2010

सच मेरे यार हैं - कहानी भाग १

टिकिट, टिकिट, टिकिट... और कोई बगैर टिकिट... जल्दी-जल्दी करो... चेकिंग स्टाफ चढ़ेगा आगे से...बे कोई रियायत ना करै हैं ... हाँ भाई... दिल्ली वाले.... जे गठरी किसकी है? इसका टिकिट लगेगा...

कंडक्टर ने शोर मचा-मचा कर नाक में दम कर दिया था। तीन घंटे भी किसी सवारी को चैन से बैठने नहीं दिया बस में। तुम सुनतीं तो कहतीं कि मैंने ज़रूर उठकर उसको एक थप्पड़ जड़ा होगा। यही तो, मैंने कुछ नहीं किया। बहुत बदल गया हूँ मैं। वैसे भी जब तुम्हारे बारे में सोच रहा होता हूँ, तब मेरे आसपास का कुछ भी मुझे बुरा नहीं लगता है। कोई सुने तो आश्चर्य करेगा दूर क्यों जाती हो, अभी की ही बात करो न! अब दिल्ली जा तो रहा हूँ संजय को मिलने और सोच रहा हूँ तुम्हारे बारे में। मुझे बिलकुल आश्चर्य नहीं होता है। जब भी दिल्ली का ज़िक्र आता है, मेरी आँखों के सामने बस तुम्हारा चेहरा रह जाता है। मेरे लिए दिल्ली और तुम बस एक ही हो। सारे रास्ते मेरे चेहरे पर जो मुस्कान ठहरी हुई है, वह तुम्हारे नाम की है। कौन कहता है कि एक स्त्री और पुरुष में सिर्फ विशुद्ध मैत्री नहीं रह सकती है। हम दोनों में तो हमेशा ही रही है।

कोई-कोई विद्वान् कहते हैं कि दोस्ती भी दर-असल एक व्यवसाय जैसी ही होती है। जिस पक्ष को उससे लाभ मिलता है, वह उसे बढ़ाना चाहता है और जिसकी हानि हो वह उस सम्बन्ध को तोड़ना चाहता है। आखिर में वही दोस्ती टिकती है जिसमें या तो दोनों पक्षों का लाभ हो या फिर दोनों ही लाभ-हानि से ऊपर हों। क्या हमारे सम्बन्ध में ऐसा तत्व रहा है? तुम तो हमेशा ही मेरी उपेक्षा करती थीं। नहीं, हमेशा नहीं। जटिल है यह रिश्ता। फिर से सोचता हूँ। तुम अक्सर मेरी उपेक्षा करती थीं। लेकिन जब तुम किसी भी मुश्किल में होती थीं तब तुम्हें एक ही दोस्त याद आता था, मैं। और मैं, मैं तो शुरू से ही पागल हूँ। तुम्हारी हर बात मुझे अकारण ही अच्छी लगती थी। तुम्हारा साथ, तुम्हारी मुस्कान, तुम्हारा गुस्सा, सब कुछ। तुमने कितने काम सिर्फ इसलिए किये कि मुझे सता सको। लेकिन बात कभी बन न सकी।

याद है जब तुमने अपने दिल्ली तबादले की बात पर विमर्श करने के लिए मुझे अपने दफ्तर के बाहर बुलाया था। शाम का खाना भी हमने साथ ही खाया था। बारिश की रात में हम दोनों भीगते हुए टाउन हाल तक आये थे। उस समय तक तुम काफी खुश दिखने लगी थीं। टैक्सी के इंतज़ार में हम दोनों टाउन हाल के बाहर खुले आकाश के नीचे खड़े थे। तुम्हें घर जाने में देर हो गयी थी। बात करते-करते तुम शायद मुझे चिढाने के लिए वह किस्सा दसवीं बार सुनाने लगीं जब बस में मिला एक अनजान खूबसूरत नौजवान तुम्हारी हाथ की रेखाएं देखकर तुम्हारे बारे में बहुत से अच्छी-अच्छी बातें बताने लगा था। तुमने अपना हाथ मेरी तरफ बढाते हुए कहा था, "मैंने सुना है तुम बहुत अच्छा हाथ देखते हो, ज़रा कुछ बताओ न!" मैं उस दिन काफी उलझन में था। जल्दी घर पहुंचना ज़रूरी था। मगर रात में तुम्हें अकेला छोड़कर नहीं जा सकता था। जैसी नाज़ुक तुम थीं, देर तक बारिश में खड़े रहने पर तुम्हारे भीग कर बीमार पड़ जाने का डर भी था। तुम्हारी बात सुनते-सुनते ही मैंने बस इतना ही कहा था, "टैक्सी नहीं दिखती है तो आगे चलकर बस ही ले लेते हैं।"


और तुमने अचानक ही अपना बढाया हुआ हाथ एक झटके से पीछे खींचकर गुस्से में कहा, "हाँ जा रही हूँ। और इस शहर से भी जा रही हूँ यह तबादला लेकर। यही चाहते हो न? मैं कुछ कह रही हूँ और तुम कुछ और..." और कुछ कदम आगे ही बने बस स्टॉप पर अभी रुकी बस में गंतव्य जाने बिना ही चढ़ गयी थीं। एकबारगी दिल किया था कि अभी हाथ पकड़कर उतार लूं। मगर फिर यही लगा कि तुम झगडा कर के भीड़ के सामने कोई दृश्य न उत्पन्न कर दो। मैं भी बहुत परिपक्व कहाँ था तब। बस के आँख से ओझल हो जाने तक वहां खडा देखता रहा। शायद बाद में भी काफी देर तक खडा रहा था। फिर मरे हुए क़दमों से घर वापस आया तो रूममेट से पता लगा कि सीमा पर तैनात बड़े भैया का संदेशा लेकर उनके जिस दोस्त को आना था वह आकर, काफी देर तक इंतज़ार करके चला भी गया था।

वह दिन और आज का दिन, हम लोग फिर कभी नहीं मिले। सुना था कि तुम दिल्ली में खुश थीं। कभी पीछे जाकर देखता था तो समझ नहीं पाता था कि हमारा यह रिश्ता इतना एकतरफा क्यों था। कभी सोचता था कि मुझसे झगडा करने के बाद तुम अपनी परेशानियां किसके साथ बांटती होगी। कभी सोचता तो यह भी ध्यान आता था कि मेरी तुम्हारी दोस्ती तो बहुत पुरानी भी नहीं थी। हम सिर्फ दो साल के ही परिचित थे। ज़ाहिर है कि मेरे बिना भी तुम्हारा संसार काफी विस्तृत रहा होगा। मुझसे पहले भी तुम्हारे मित्र रहे होंगे और मेरे बाद भी। तुम्हारा दिल्ली का पता और फोन नंबर आदि सब कुछ दोस्तों ने बातों-बातों में उपलब्ध करा दिया था। कभी दिल में आता था कि पूछूं, आखिर इतना गुस्सा क्यों हो गयी थीं उस दिन मुझसे। उभयनिष्ठ संपर्कों द्वारा तुम्हारी खबर मिलती रहती थी। एक दिन सुना कि तुम्हारे माता-पिता ने अच्छा सा रिश्ता ढूंढकर वहीं तुम्हारी शादी भी कर दी थी और अब तुम अपनी घर गृहस्थी में मगन हो।

जैसे तुम खोयीं वैसे ही संजय भी ज़िंदगी के मेले में कहीं मेरे हाथ से छूट गया था। तुम उसे नहीं जानतीं इसलिये बता रहा हूं कि वह तो मेरा तुम से भी पुराना दोस्त था। छठी कक्षा से बीएससी तक हम दोनों साथ पढ़े थे। बीएससी प्रथम वर्ष करते हुए उसे आईआईटी में प्रवेश मिल गया था और वह कानपुर चला गया था जबकि मैंने बीएससी पूरी करके तुम्हारे साथ नौकरी शुरू कर दी। ठीक है बाबा, साथ नहीं, एक ही विभाग में परन्तु शहर के दूसरे सिरे पर। मेरे लिये नौकरी करना बहुत ज़रूरी था।

संजय दिल का बहुत साफ़ था। थोड़ा अंतर्मुखी था इसलिए सबको पसंद नहीं आता था, मगर था हीरा। न जाने कितनी अच्छी आदतें मैंने उससे ही सीखी हैं। मुझे अभी भी याद है जब भारत ने अपना पहला उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा था तो हम सब कितने नाराज़ थे कि एक निर्धन देश की सरकार किसानों की ओर ध्यान देने के बजाय वैज्ञानिक खेल खेल रही है। सिर्फ संजय था जिसने गर्व से सीना फुलाकर कहा था, महान देश को महान काम भी करने होंगे, हमारे अपने उपग्रह हों तो खेती, जंगल, किसान, बाढ़, शिक्षा सभी की स्थिति सुधरेगी। इसी तरह बाद में कम्प्युटर आने पर बेरोजगारी की आशंका से डराते छात्र संघियों को उसने शान्ति से कहा था, "देखना, एक दिन यही कम्प्युटर हम भारतीयों को दुनिया भर में रोज़गार दिलाएंगे।" स्कूल-कॉलेज में हिंसा आम थी मगर मैंने उसे कभी किसी से लड़ते हुए नहीं देखा । वह अपनी बात बड़ी शान्ति से कहता था। कभी-कभी नहीं भी कहता था। चुपचाप उठकर चला जाता था। विशेषकर जब यार दोस्त लडकियों पर टीका टिप्पणी कर रहे होते थे।

पिछ्ले कई साल से हमें एक दूसरे के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। भला हो फेसबुक तकनीक का कि मैने उसे देखा। वैसे तो संजय सक्सेना नाम उस पीढ़ी में बहुत ही प्रचलित था मगर फिर भी फेसबुक पर उसके चित्र और व्यक्तिगत जानकारी से यह स्पष्ट था कि मेरा खोया हुआ मित्र मुझे मिल गया था। मैंने उसे सन्देश भेजा, और फिर फोन पर बात भी हुई। मैंने उसके अगले जन्म दिन पर मिलने का वायदा किया। आज उसका जन्म दिन है। और मेरा भी।

[क्रमशः]

Tuesday, June 22, 2010

ग्राहक मेरा देवता [इस्पात नगरी से - 25]

जब मैं पहली बार अमेरिका आया तो नयी जगह पर सब कुछ नया सा लगा। मेरे एक सहकर्मी बॉब ने मुझे बहुत सहायता की। उनकी सहायता से ही मैंने पहला अपार्टमेन्ट ढूँढा और उन्होंने ही अपनी कार से मुझे एक स्टोर से दूसरे स्टोर तक ले जाकर सारा ज़रूरी सामान और फर्नीचर खरीदने में मदद की। हम लोग हर शाम को दफ्तर से सीधे बाज़ार जाते और जितना सामान उनकी कार में फिट हो जाता ले आते थे।

एक दिन मैं उनके साथ जाकर परदे और चादरें आदि लेकर आया। बहुत सारे पैकेट थे। घर आकर जब समान देखना शुरू किया तो पाया कि बेडशीट का एक पैकेट नहीं था। जब रसीद चेक की तो पाया कि भुगतान में वह पैकेट भी जोड़ा गया था मगर किसी तरह मेरे पास नहीं आया। मुझे ध्यान आया कि सेल्सगर्ल मेरा भुगतान कराने के बीच में कई बार फ़ोन भी अटेंड कर रही थी। हो न हो उसी में उसका ध्यान बंटा होगा और वह भूल कर बैठी होगी। मैंने रसीद पर छपे फ़ोन नंबर से स्टोर को फ़ोन किया। सारी बात बताई तो स्टोर प्रतिनिधि ने स्टोर में आकर अपना छूटा हुआ पैकेट ले जाने को कहा। अगले दिन मैं फ़िर से बॉब के साथ वहाँ गया। स्टोर प्रतिनिधि ने मेरा पैकेट देने के बजाय मुझे स्टोर में जाकर वैसी ही दूसरी बेडशीट लाने को कहा। मैं ले आया तो उसने क्षमा मांगते हुए उसे पैक करके मुझे दे दिया।

मैं अमरीकी व्यवसायी की इस ग्राहक-सेवा से अति-प्रसन्न हुआ और हम दोनों राजी खुशी वापस आ गए। भारत में अगर किसी कमी की वजह से भी बदलना पड़ता तो भी वह कभी आसान अनुभव नहीं था, गलती से दूकान में ही छूट गए सामान का तो कहना ही क्या।

मगर बात यहाँ पर ख़त्म नहीं हुई। करीब सात-आठ महीने बाद बॉब ने एक नयी कार ख़रीदी और अपनी पुरानी कार को ट्रेड-इन किया। जब उसने पुरानी कार देने से पहले उसके ट्रंक में से अपना सामान निकाला तो पाया कि मेरा खोया हुआ बेडशीट का पैकेट उसमें पडा था। मतलब यह कि स्टोर ने पहली बार में ही हमें पूरा सामान दिया था।

ग्राहक के कथन का आदर और दूसरों पर विश्वास यहाँ एक आम बात है। बहुत से राज्यों में इसके लिए विशेष क़ानून भी हैं। मसलन मेरे राज्य में अगर आपको नयी ख़रीदी हुई कार किसी भी कारण से पसंद नहीं आती है तो आप पहले हफ्ते में उसे "बिना किसी सवाल के" वापस कर सकते हैं।

एक बार मेरी पत्नी का बटुआ कहीं गिर गया। अगले दिन किसी का फ़ोन आया और उन्होंने बुलाकर सब सामान चेक कराकर बटुआ हमारे सुपुर्द कर दिया। जब हमने यह बात एक भारतीय बुजुर्ग को बताई तो उन्होंने अपना किस्सा सुनाया। जब वे पहली बार अमेरिका आए तो एअरपोर्ट आकर उन्होंने टेलीफोन बूथ से कुछ फ़ोन किए और फ़िर अपने मेजबान मित्र के साथ उनके घर चले गए। जाते ही सो गए अगले दिन कहीं जाकर उन्हें याद आया कि उन्होंने अपना बटुआ फ़ोन-बूथ पर ही छोड़ दिया था। उन्होंने तो सोचा कि अब तो गया। मित्र के अनुग्रह पर वे वापस हवाई अड्डे आए और बटुआ वहीं वैसे का वैसा ही रखा हुआ पाया।

ईमानदारी यहाँ के आम जीवन का हिस्सा है। आम तौर पर लोग किसी दूसरे के सामान, संपत्ति आदि पर कब्ज़ा करने के बारे में नहीं सोचते हैं। भारत में अक्सर दुकानों पर "ग्राहक मेरा देवता है" जैसे कथन लिखे हुए दिख जाते हैं मगर ग्राहक की सेवा उतनी अच्छी तरह नहीं की जाती है। ग्राहक को रसीद देना हो या क्रेडिट कार्ड के द्वारा भुगतान लेना हो, सामान बदलना हो या वापस करना हो - आज भी ग्राहक को ही परेशान होना पड़ता है। काश हम ग्राहक-सेवा का संदेश दिखावे के कागज़ पर लिखने के बजाय आचरण में लाते।

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इस्पात नगरी से - पिछली कड़ियाँ
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[यह लेख दो वर्ष पहले सृजनगाथा में प्रकाशित हो चुका है।]

Monday, June 21, 2010

१९ जून, दास प्रथा और कार्ल मार्क्स [इस्पात नगरी से - २४]

आज वर्ष का सबसे बड़ा दिन है। जून का महीना चल रहा है। पूर्वोत्तर अमेरिका में गर्मी के दिन बड़े सुहावने होते हैं। जो पेड़ सर्दियों में ठूंठ से नज़र आते थे आजकल हरियाली की प्रतिमूर्ति नज़र आते हैं। हर तरफ फूल खिले हुए हैं। चहकती चिडियों के मधुर स्वर के बीच में किसी बाज़ को चोंच मार-मारकर धकेलते हुए क्रंदन करके हुए माता कौवे का करुण स्वर कान में पड़ता है तो प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य के पीछे छिपी कुई क्रूरता का कठोर चेहरा अनायास ही सामने आ जाता है।

जून मास अपने आप में विशिष्ट है। इस महीने में हमें सबसे अधिक धूप प्राप्त होती है। आर्श्चय नहीं कि वर्ष का सबसे बड़ा दिन भी इसी महीने में पड़ता है। गर्मियों की छुट्टियां हो गयी हैं। बच्चे बड़े उत्साहित हैं। यहाँ पिट्सबर्ग में तीन-नदी समारोह की तय्यारी शुरू हो गयी है। अमेरिका में उत्सवों की भारत जैसी प्राचीन परम्परा तो है नहीं। कुछ गिने-चुने ही समारोह होते हैं। हाँ, धीरे-धीरे कुछ नए त्यौहार भी जुड़ रहे हैं। पितृ दिवस (Father’s day) भी ऐसा ही एक पर्व है जो हमने कल ही १०० वीं बार मनाया। सोनोरा नाम की महिला ने १९ जून १९१० को अपने पिता के जन्मदिन पर उनके सम्मान में पहली बार पितृ दिवस का प्रस्ताव रखा। सन १९२६ में न्यूयार्क नगर में राष्ट्रीय पितृ दिवस समिति बनी और १९७२ में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने पितृ दिवस को जून मास के तीसरे रविवार को मनाने का ऐलान किया। तब से पितृ-सम्मान की यह परम्परा अनवरत चल रही है।
जूनटींथ ध्वज

रोचक बात यह है कि पितृ दिवस १९ जून को मनाया जाने वाला पहला पर्व नहीं है। एक और पर्व है जो इस दिन हर साल बड़ी गर्मजोशी से मनाया जाता है। जून्नीस या जूनटीन्थ (Juneteenth) नाम से मनाये जाने वाले इस पर्व का इतिहास बहुत गौरवपूर्ण है। जूनटीन्थ दरअसल जून और नाइनटीन्थ का ही मिला हुआ रूप है अर्थात यह १९ जून का ही दूसरा नाम है। मगर इसकी तहें इतिहास के उन काले पन्नों में छिपी हैं जहां इंसानों के साथ पशुओं जैसा बर्बर व्यवहार किया जाता था और पशुओं की तरह उनका भी क्रय-विक्रय होता था। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ दास प्रथा की।

१९ जून १८६५ को इसी घर के छज्जे से दास प्रथा के अंत और मानव-समानता की घोषणा की गयी थी
सन १८६३ में अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने गुलाम प्रथा को मिटा देने का वचन दिया था। १९ जून १८६५ में जब जनरल गोर्डन ग्रेंगर के नेतृत्व में २००० अमेरिकी सैनिक उस समय के विद्रोही राज्य टैक्सस के गैलवेस्टन नगर में पहुंचे तब टैक्सस राज्य के दासों को पहली बार अपनी स्वतन्त्रता के आदेश का पता लगा। पहले अविश्वास, फिर आर्श्चय के बाद गुलामों में उल्लास की लहर ऐसी दौडी कि तब से यह उत्सव हर वर्ष मनाया जाने लगा। कुछ ही वर्षों में यह परम्परा आस-पास के अन्य राज्यों में भी फ़ैल गयी और इसने धीरे-धीरे राष्ट्रीय समारोह का रूप धारण कर लिया। समय के साथ इस उत्सव का रूप भी बदला है और आजकल इस अवसर पर खेल-कूद, नाच-गाना और पिकनिक आदि प्रमुख हो गए हैं।

आज जब पहली बार एक अश्वेत राष्ट्रपति का पदार्पण श्वेत भवन (White house) में हुआ है, पहले जूनटीन्थ को देखा हुआ सम्पूर्ण समानता का स्वप्न सच होता हुआ दिखाई देता है। आज जब अब्राहम लिंकन जैसे महान नेताओं के अथक प्रयासों से दास प्रथा सभ्य-समाज से पूर्णतयः समाप्त हो चुकी है, यह देखना रोचक है कि तथाकथित साम्यवाद का जन्मदाता कार्ल मार्क्स अपने मित्र पैवेल वसील्येविच अनंकोव (Pavel Vasilyevich Annenkov) को १८४६ में लिखे पत्र में दास प्रथा को ज़रूरी बता रहा है:

"दास प्रथा एक अत्यधिक महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि है. दास प्रथा के बिना तो विश्व का सबसे प्रगतिशील देश अमेरिका पुरातनपंथी हो जाएगा. दास प्रथा को मिटाना विश्व के नक़्शे से अमेरिका को हटाने जैसा होगा. अगर नक़्शे से आधुनिक अमेरिका को हटा दो तो आधुनिक सभ्यता और व्यापार नष्ट हो जायेंगे और दुनिया में अराजकता छा जायेगी. एक आर्थिक गतिविधि के रूप में दास प्रथा अनादिकाल से सारी दुनिया में रही है."

कैसी विडम्बना है कि कार्ल मार्क्स की कब्र एक देश-विहीन शरणार्थी के रूप में इंग्लैण्ड में है जहां से उन दिनों साम्राज्यवाद, रंगभेद और दासप्रथा का दानव सारी दुनिया में कहर बरपा रहा था.

इस्पात नगरी से - पिछली कड़ियाँ

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इस्पात नगरी से - पिछली कड़ियाँ
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(इस पोस्ट के सभी चित्र - इंटरनेट से उठाईगीरीकृत)

Sunday, June 20, 2010

एक शाम बार में - कहानी

एलन
आजकल हर रोज़ रात को सोते समय सुबह होने का इंतज़ार रहता है। जाने कितने दिनों के बाद जीवन फिर से रुचिकर लग रहा है. और यह सब हुआ है मेगन के कारण। मेगन से मिलने के बाद ज़िन्दगी की खूबसूरती पर फिर से यक़ीन आया है। वरना जेन से शादी होने से लेकर तलाक़ तक मेरी ज़िन्दगी तो मानो नरक ही बन गयी थी। विश्वास नहीं होता है कि मैंने उसे अपना जीवनसाथी बनाने की बेवक़ूफी की थी। उसकी सुन्दरता में अन्धा हो गया था मैं।

मेगन
उम्रदराज़ है, मोटा है, गंजा है और नाटा भी। चश्मिश है, फिर भी आकर्षक है। चतुर, धनी और मज़ाकिया तो है ही, मुझ पर मरता भी है। हस्बैंड मैटीरियल है। बेशक मुझे पसन्द है।

एलन
बहुत प्रसन्न हूँ। आजकल मज़े लेकर खाना खाता हूँ। बढ़िया गहरी नीन्द सोता हूँ। सारा दिन किसी नौजवान सी ताज़गी रहती है। मेगन रूपसी न सही सहृदय तो है। पिछ्ले कुछ दिनों से अपनी तरफ से फोन भी करने लगी है। और आज शाम तो मेरे साथ डिनर पर आ रही है।

मेगन
पिछले कुछ दिनों में ही मेरे जीवन में कितना बड़ा बदलाव आ गया है? हम दोनों कितना निकट आ गये हैं। और आज हम डिनर भी साथ ही करेंगे। अगर आज वह मुझे सगाई की अंगूठी भेंट करता है तो मैं एक समझदार लड़की की तरह बिना नानुकर किये स्वीकार कर लूंगी।

एलन
आज की शाम को तो बस एक डिसास्टर कहना ही ठीक रहेगा। शहर का सबसे महंगा होटल। मेगन ने तो ऐसी जगह शायद पहली बार देखी थी। कितनी खुश थी वहाँ आकर। पता नहीं कैसे इतनी सुन्दर शाम खराब हो गयी?

मेगन
वैसे तो वह इतना पढा लिखा और सभ्य है। उसको इतना भी नहीं पता कि एक लडकी को सामने बिठाकर खाने पर इंतज़ार करते हुए बार-बार फोन पर लग जाना या उठकर बाथरूम की ओर चल पडना असभ्यता है।

एलन
पता नहीं कौन बदतमीज़ था जो बार-बार फोन करता रहा। न कुछ बोलता था और न ही कोई सन्देश छोडा। वैसे मैं उठाता भी नहीं लेकिन माँ जिस नर्सिंग होम में गयी है वहाँ से फोन कालर आइडी के बिना ही आता है। और फिर बडी इमारतों में कभी-कभी सिग्नल भी कम हो जाता है। यही सब सोचकर... खैर छोडो भी। लेकिन मेगन तो ऐसी नकचढी नहीं लगती थी। मगर जिस तरह बिना बताये खाना छोडकर चली गयी... और अब फोन भी नहीं उठा रही है। इस सब का क्या अर्थ है?

मेगन
मैं तो इतनी सरल हूं कि अपने आप शायद इस बात को भी नहीं समझ पाती। भगवान भला करे उन बुज़ुर्ग महिला का जो दूर एक टेबल पर बैठकर यह तमाशा देख रही थीं और एक बार जब वह फोन लेकर दूर गया तब अपने आप ही मेरी सहायता के लिये आगे आयीं और चुपचाप एक सन्देश दे गयीं।

जेन
मुझे घर से निकालकर जवान छोकरियों के साथ ऐश कर रहा है। मेरी ज़िन्दगी में आग लगाकर वह चूहा कभी खुश नहीं रह सकता है। मैं जब भी मुंह खोलूंगी, उसके लिये बद्दुआ ही निकलेगी। अगर वह मजनू मेरा फोन पहचान लेता तो एक बार भी उठाता क्या? मैने भी उस छिपकली से कह दिया, "आय ओवरहर्ड हिम। एक साथ कई लैलाओं से गेम खेलता यह लंगूर तुम्हारे लायक नहीं है।"

(अनुराग शर्मा)

Saturday, June 19, 2010

जन्म दिवस की शुभ कामनाएं





19 जून - इन सब का अपना विशेष दिन - शुभ कामनाएं

पितृ दिवस की शुभकामनाएं


(इस पोस्ट के सभी चित्र - इंटरनेट से उठाईगीरीकृत)

माओवादी इंसान नहीं, जानवर से भी बदतर!

शीर्षक पढ़कर शायद आप कहें कि सिर्फ माओवादी या दुसरे आतंकवादी ही क्यों, इंसान को इंसान न समझने वाले, दूसरों के जीवन को दो कौड़ी से कम आंककर सारी दुनिया को मानव रक्त से लाल करने का सपना देख रहा हर वहशी जानवर से बदतर है। मगर ज़रा ठहरिये, यह शीर्षक मेरा नहीं है, यह लिया गया है "डायरी ऑव एन इंडियन" वाले अनिल रघुराज की एक ताज़ा पोस्ट से।

मैं अनिल रघुराज को जानता नहीं मगर हाल ही में मैंने उनका ब्लॉग अर्थकाम देखा था। पूंजीवाद और अर्थतंत्र में मुझे ख़ास रूचि नहीं है तो भी भूतपूर्व बैंकर होने के नाते इन चीज़ों पर नज़र पड़ जाती है। मैं पूंजी निवेश पर आधारित उस ब्लॉग की शैली से प्रभावित हुए बिना न रह सका। इतना प्रभावित हुआ कि मैंने उसे "ज़रा हट के" वाली ब्लॉगलिस्ट में जोड़ा। पहले कभी उनकी एक कहानी भी पढी थी मगर वह सोवियत रूसी प्रचार पत्रिकाओं की उपदेशात्मक, सारहीन, बनावटी और इश्तिहारी कहानियों की याद दिलाती थी इसलिए उस पर उतना ध्यान नहीं गया।

उस पोस्ट पर एक दुखद चित्र लगाया गया है जिसमें सैनिक वर्दी में दो पुरुष निर्विकार भाव से एक महिला की लाश को लेकर जा रहे हैं। उस चित्र को देखना भी दुखद है। अगर यह चित्र चीन, उत्तर कोरिया आदि का होता तो शायद किसी को आश्चर्य नहीं होता क्योंकि तानाशाहों के यहाँ तो जनता हमेशा ही सूली पर टंगी होती है परन्तु भारत के बारे में ऐसा कुछ सुनना, देखना दर्दनाक होने के साथ शर्मनाक भी है। ब्लॉग के अनुसार यह चित्र पश्चिम बंगाल का है। पश्चिम बंगाल जहाँ अत्याधुनिक चीनी हथियार और मिलिशिया से सशस्त्र एक कम्युनिस्ट दल, दशकों से सत्तारूढ़ सरकारी साधन-संपन्न दूसरे कम्युनिस्ट दल के साथ सशस्त्र संघर्ष में लिप्त है। इन दोनों कम्युनिस्ट दलों के बीच पिसते निर्दोष मासूम गरीब रोज़ अकारण ही मारे जा रहे हैं। मगर हिंसक कम्युनिस्ट संघर्षों का झंडा तो सारी दुनिया में निर्दोषों के खून से ही लाल किया गया है तो यहाँ कोई अपवाद क्यों हो?

शहरों में अपने परिवारों के साथ आराम की ज़िंदगी बिताने वाले लोग शायद उन परिस्थितियों के बारे में सोचकर ही सिहर जाएँ जो माओवाद, नक्सलवाद - जहां यह चित्र खींचा गया था - और आतंकवाद के अन्य प्रकारों से प्रभावित क्षेत्रों में दिन रात घट रहे है। मुझे चित्र की घटना, स्थल, समय, परिस्थिति या स्रोत के बारे में कुछ भी निश्चित पता नहीं है इसलिए उस पर कुछ नहीं कह सकता हूँ। आपत्ति तो मुझे इस बात पर है कि जन-भावना भड़काने के उद्देश्य से उस चित्र के साथ जानबूझकर सूअर का शिकार करके डंडे पर बांधकर लाते एक सुविधा-संपन्न पश्चिमी पर्यटक स्त्री-पुरुष का पूर्णतया असम्बद्ध चित्र वहां लगाकर इन दोनों चित्रों की तुलना की गयी है।

सुदूर बीहड़ वनों में माओवादियों द्वारा ज़हरीले कर दिए गए जलस्रोतों के बीच, १२३ अंश फेहरनहाईट के तापमान में तपती टीन और पुराने तम्बुओं के नीचे कई हफ़्तों से पसीने से लिजलिजा रही वर्दी में नहाना तो दूर, दांत मांजने की विलासिता की बात सोचे बिना कई-कई रातों तक बिना सोये, अपनी छः महीने की होंठकटी बिटिया को एक बार भी देखे बिना और इस अभियान पर आने से पहले अपनी अंधी और विधवा माँ के पाँव छूए बिना चल पड़ने की बेबसी लिए जो जवान देश के किसानों और आदिवासियों की जीवनरक्षा के साथ उनकी नदियों, पुलों, सडकों, रेल पटरियों, स्कूलों और गाँवों को आधुनिक विदेशी हथियारों से लैस निर्दय तस्करों, खनिज और वन संपदा के लुटेरों, माओवादियों और दुसरे आतंकवादियों से बचाने के लिए दीवार बन कर खड़े हुए हैं उन्हें अपने कर्म का औचित्य ढूँढने के लिए किसी झूठे, किताबी, स्वार्थी, हत्यारे सत्तालोलुप या धनलोलुप, वाद की ज़रुरत नहीं है।

माओवादियों की बंदूकों से निकलती आसुरी मौत के शिकार बने लोगों के साथ पूरी सहानुभूति और दया होने के बावजूद उनके शवों को ले जाने के लिए दुर्दम्य परिस्थितियों में काम करते वे सिपाही संदर्भित ब्लॉग के लेखकों की तरह मुम्बई के किसी एसी कमरे में बैठकर महंगी विदेशी परफ्यूम से सुवासित रुमाल से अपनी नाक ढंककर स्ट्रेचर मंगवाने का इंतज़ार नहीं कर सकते हैं। उन्हें वहीं जंगल से लकडियाँ तोड़कर या जैसे भी संसाधन हों उन्हें इकट्ठा करके अपना काम करना पडेगा। जिस किसी ने भी वह चित्र लिया है और जिस ने भी अपनी-अपनी पोस्ट पर लगाया है उनसे मेरा अनुरोध है कि अपना मानवीय पक्ष दिखाएँ और लाशों की राजनीति करके शिकायत करने के बजाय एसी कमरे से बाहर निकलें और निष्ठा से अपने काम में लगे उन निर्भीक सिपाहियों के काम में हाथ बंटाएं। नहीं कर सकते हैं तो कम से कम उनकी कार्य-परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील हों और प्रयास करें कि ऐसी परिस्थितियां बनने ही न पायें कि मानवता को रोज़ शर्मिन्दा होना पड़े। हमें गर्व है कि हम लोकतंत्र में रह रहे हैं और माओवादियों के कारनामों के साथ-साथ पुलिस की कमियाँ भी उजागर कर सकते हैं। भगवान् न करे माओवाद या तालेबान जैसी कोई आसुरी शक्ति अगर किसी इलाके में सफल हो गयी तो चीन, अफगानिस्तान, चेचन्या, म्यांमार और उत्तर कोरिया की तरह यहाँ भी आप न अपने ब्लॉग पर और न अपनी जुबां से इस देशसेवा का दंभ दिखा पायेंगे।

पुलिस और उस पर सत्ता रखने वाली सरकारें सही हों, यह ज़रूरी नहीं है। सत्ता का दुरुपयोग करने वालों की कमी नहीं है, खासकर तानाशाही "-वादों" वाली दम्भी सरकारों में। मगर उसका बहाना लेकर जान जोखिम में डालते सैनिकों पर बेल्ट के नीचे प्रहार करने के बहाने ढूंढना शर्मनाक है। जिन वीरों ने देशवासियों की सुरक्षा के लिए वर्दी पहनकर कफ़न बांधा है उनके भी मानवाधिकार है, यह बात अगर हम ही नहीं समझेंगे तो कौन समझेगा?

संदर्भित पोस्ट पर एक मृत मानव की एक शिकार किये गए सूअर से की गयी इस असंवेदनशील तुलना से मैं उतना ही व्यथित हूँ जितना माओवाद-प्रभावित क्षेत्रों में चल रही निष्ठुर कुत्ता-घसीटी से। विडम्बना है कि हमारा लोकतंत्र अपना विचार और भावनाएं व्यक्त करने का अधिकार देता है भले ही उससे एक मृतक का और मानव जीवन का घोर अपमान हो रहा हो। चित्र में दिखाई गयी स्त्री से मुझे सहानुभूति है। ईश्वर उसकी आत्मा को शान्ति दें। राज्य एवं केंद्र सरकार उन क्षेत्रों से अराजकता मिटाकर व्यवस्था लाये। हम लोग इंसान बनें और अपनी ब्लॉग पोस्टों या अखबारों में उसकी मृतदेह का भद्दा मज़ाक उड़ाने से बचें।

चलते चलते "दिनकर" की "परशुराम की प्रतीक्षा" से दो पंक्तियाँ

गर्दन पर किसका पाप वीर! ढोते हो?
शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो?

Wednesday, June 16, 2010

बांधों को तोड़ दो - एक कहानी

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"ये लोग होते कौन हैं आपको रोकने वाले? ऐसे कैसे बन्द कर देंगे? उन्होने कहा और आप सब ने मान लिया? चोर, डाकू, जेबकतरे सब तो खुलेआम घूमते रह्ते हैं इन्हीं सडकों पर... सारी दुश्मनी सिर्फ रिक्शा से निकाल रहे हैं? इसी रिक्शे की बदौलत शहर भर में हज़ारों गरीबों के घर चल रहे हैं। और उनका क्या जो अपने स्कूल, दुकान, और दफ्तर तक रिक्शा से जाते हैं? क्या वे सब लोग अब कार खरीद लेंगे?"

छोटा बेटा रामसिंह बहुत गुस्से में था। गुस्से मे तो हरिया खुद भी था परंतु वह अब इतना समझदार था कि अपने आंसू पीना जानता था। लेकिन बेचारे बच्चों को दुनिया की समझ ही कहाँ होती है? वे तो सोचते हैं कि संसारमें सब कुछ न्याय के अनुसार हो। और फिर रामसिंह तो शुरू से ही ऐसा है। कहीं भी कुछ भी गलत हो रहा हो, उसे सहन नहीं होता है, बहुत गुस्सा आता है।

इस दुख की घड़ी में जब हरिया बडी मुश्किल से अपनी हताशा को छिपा रहा है, उसे अपने बेटे पर गर्व भी हो रहा है और प्यार भी आ रहा है। हरिया को लग रहा है कि बस दो चार साल रिक्शा चलाने की मोहलत और मिल गयी होती तो इतना पैसा बचा लेता कि रामसिंह को स्कूल भेजना शुरू कर देता। अब तो लगता है कि अपना सब सामान रिक्शे पर लादकर किसी छोटे शहर का रास्ता पकडना पडेगा।

“अगर सभी रिक्शेवाले एक हो जायें और यह गलत हुक्म मानने से मना कर दें तो सरकार चाहे कितनी भी ज़ालिम हो उन्हें रोक नहीं पायेगी” अभी चुप नहीं हुआ है रामसिंह।

उसे इस तरह गुस्से मे देखकर हरिया को तीस साल पुरानी बात याद आती है। हरिया यहाँ नहीं है, इतना बडा भी नहीं हुआ है। वह बिल्कुल अपने छोटे से राम के बराबर है, बल्कि और भी छोटा। गांव की पुरानी झोंपडी मे खपडैल के बाहर अधनंगा खडा है। पिताजी मुँह लटकाये चले आ रहे हैं। वह हमेशा की तरह खुश होकर उनकी गोद में चढने के लिये दौडता हुआ आगे बढता है। उसे गोद में लेने के बजाय पिताजी खुद ही ज़मीन पर उकडूँ बैठ जाते हैं। पिताजी की आंख में आंसू है। माँ तो खाना बनाते समय रोज़ ही रोती है मगर पिताजी तो कभी नहीं रोते। तो आज क्यूं रो रहे हैं। वह अपने नन्हें हाथों से उनके आंसू पोछ्कर पूछ्ता है, “क्या हुआ बाबा? रोते क्यों हो?”

“हमें अपना घर, यह गांव छोडकर जाना पडेगा बेटा हरिराम” पिताजी ने बताया ।

पूछ्ने पर पता लगा था कि उनके गांव और आसपास के सारे गांव डुबोकर बांध बनाया जाने वाला था।
नन्हा हरिया नहीं जानता था कि बांध क्या होता है। लेकिन उस वय में भी उसे यह बात समझ आ गयी थी कि यह उसके घर-द्वार, कोठार, नीम, शमी, खेत और गाँव को डुबोने की योजना है। कोई उसके घर को डुबोने वाला है, यह ख़याल ही उसे गुस्सा दिलाने के लिए काफी था। फिर भी उसने पिताजी से कई सवाल पूछे।

"ये लोग कौन हैं जो हमारा गाँव डुबो देंगे?"

"ये सरकार है बेटा, उनके ऊपर सारे देश की ज़िम्मेदारी है।"

"ज़िम्मेदार लोग हमें बेघर क्यों करेंगे? वे हत्यारे कैसे हो सकते हैं?" हरिया ने पूछा।

"वे हत्यारे नहीं हैं, वे सरकार हैं। बाँध से पानी मिलेगा, सिंचाई होगी, बिजली बनेगी, खुशहाली आयेगी।"

"सरकार कहाँ रहती है?"

"बड़े-बड़े शहरों में - कानपुर, कलकत्ता, दिल्ली।"

"बिजली कहाँ जलेगी?

"उन्हीं बड़े-बड़े शहरों में - कानपुर, कलकत्ता, दिल्ली।"

"तो फिर बांध के लिए कानपुर कलकत्ता दिल्ली को क्यों नहीं डुबाते हैं ये लोग? हमें ही क्यों जाना पडेगा घर छोड़कर?"

"ये त्याग है बेटा। अम्मा ने दधीचि और पन्ना धाय की कहानियां सुनाई थी, याद है?"

"सरकार त्याग क्यों नहीं करती है? तब भी हमने ही किया था। अब भी हम ही करें?"

पिताजी अवाक अपने हरिराम को देख रहे थे। ठीक वैसे ही जैसे आज वह अपने रामसिंह को देख रहा है। हरिया ने अपनी बांह से आँख पोंछ ली. रामसिंह अभी भी गुस्से में बोलता जा रहा था। रधिया एक कोने में बैठकर खाने के डब्बों को पुरानी चादर में बाँध रही थी। ठीक वैसी ही दुबली और कमज़ोर जैसे अम्मा दिखती थी तीस साल पहले।

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सम्बन्धित आलेख
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(बांधों को तोड़ दो - ऑडियो)

जल सत्याग्रह - मध्य प्रदेश का घोगल ग्राम
संता क्लाज़ की हकीकत
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बांधों को तोड़ दो (उपन्यास अंश)

Sunday, June 13, 2010

देव लक्षण - देवासुर संग्राम ७


उत देव अवहितम देव उन्नयथा पुनः
उतागश्चक्रुषम देव देव जीवयथा पुनः

हे देवों, गिरे हुओं को फिर उठाओ!
(ऋग्वेद १०|१३७|१)

देव (और दिव्य) शब्द का मूल "द" में दया, दान, और (इन्द्रिय) दमन छिपे हैं। कुछ लोग देव के मूल मे दिव या द्यु (द्युति और विद्युत वाला) मानते है जिसका अर्थ है तेज, प्रकाश, चमक। ग्रीक भाषा का थेओस, उर्दू का देओ, अंग्रेज़ी के डिवाइन (और शायद डेविल भी) इसी से निकले हुए प्रतीत होते हैं। भारतीय संस्कृति में देव एक अलग नैतिक और प्रशासनिक समूह होते हुए भी एक समूह से ज़्यादा प्रवृत्तियों का प्रतीक है। तभी तो "मातृदेवो भवः, पितृदेवो भवः, आचार्यदेवो भवः सम्भव हुआ है। यह तीनों देव हमारे जीवनदाता और पथ-प्रदर्शक होते हैं। यही नहीं, मानवों के बीच में एक पूरे वर्ण को ही देवतुल्य मान लिया जाना इस बात को दृढ करता है कि देव शब्द वृत्तिमूलक है, जातिमूलक नहीं।

देव का एक और अर्थ है देनेवाला। असुर, दानव, मानव आदि सभी अपनी कामना पूर्ति के लिये देवों से ही वर मांगते रहे हैं। ब्राह्मण यदि ज्ञानदाता न होता तो कभी देव नहीं कह्लाता। सर्वेषामेव दानानाम् ब्रह्मदानम् विशिष्यते! ग्रंथों की कहानियां ऐसे गरीब ब्राहमणों के उल्लेख से भरी पडी हैं जिनमें पराक्रम से अपने लिये धन सम्पदा कमाने की भरपूर बुद्धि और शक्ति थी परंतु उन्होने कुछ और ही मार्ग चुना।

द्यु के एक अन्य अर्थ के अनुसार देव उल्लसितमन और उत्सवप्रिय हैं। स्वर्गलोक में सदा कला, संगीत, उत्सव चलता रह्ता है। वहां शोक और उदासी के लिये कोई स्थान नहीं है। देव पराक्रमी वीर हैं। जैसे असुर जीना और चलना जानते हैं वैसे ही जिलाना और चलाना देव प्रकृति है।

असुर शब्द का अर्थ बुरा नही है यह हम पिछ्ली कड़ियों में देख चुके हैं। परंतु पारसी ग्रंथो में देव के प्रयोग के बारे में क्या? पारसी ग्रंथ इल्म-ए-क्ष्नूम (आशिष का विज्ञान) डेविल और देओ वाले विपरीत अर्थों को एक अलग प्रकाश में देखता है। इसके अनुसार अवेस्ता के बुरे देव द्यु से भिन्न "दब" मूल से बने हैं जिसका अर्थ है छल। अर्थात देव और देओ (giant) अलग-अलग शब्द है।

आइये अब ज़रा देखें कि निरीश्वरवादी धाराओं के देव कैसे दिखते हैं:
अमरा निर्जरा देवास्त्रिदशा विबुधाः सुरा:
सुपर्वाणः सुमनसस्त्रिदिवेशा दिवौकसः।
आदितेया दिविषदो लेखा अदितिनन्दनाः
आदित्या ऋभवोस्वप्ना अमर्त्या अमृतान्धसः।
बहिर्मुखाः ऋतुभुजो गीर्वाणा दानवारयः
वृन्दारका दैवतानिम पुंसि वा देवतास्त्रियाम।

[अमरकोश स्वर्गाधिकान्ड - 7-79]

बौद्ध/जैन ग्रंथ अमरकोश के अनुसार देव स्वस्थ, तेजस्वी, निर्भीक, ज्ञानी, वीर और चिर-युवा हैं। वे मृतभोजी न होकर अमृत्व की ओर अग्रसर हैं। वे सुन्दर लेखक है और तेजस्वी वाणी से मिथ्या सिद्धांतों का खन्डन करने वाले हैं। इसके साथ ही वे आमोदप्रिय, सृजनशील और क्रियाशील हैं।

कुल मिलाकर, देव वे हैं जो निस्वार्थ भाव से सर्वस्व देने के लिये तैय्यार हैं परंतु ऐसा वे अपने स्वभाव से प्रसन्न्मन होकर करते हैं न कि बाद में शिकवा करने, कीमत वसूलने या शोषण का रोना रोने के लिये। वे सृजन और निर्माणकारी हैं। जीवन का आदर करने वाले और शाकाहारी (अमृतान्धसः) हैं तथा तेजस्वी वाणी के साथ-साथ उपयोगी लेखनकार्य में समर्थ हैं। इस सबके साथ वे स्वस्थ, चिरयुवा और निर्भीक भी हैं। वे आदितेया: हैं अर्थात बन्धनोँ से मुक्त हैँ। अगली कड़ी में हम देखेंगे असुरों के समानार्थी समझे जाने वाले भूत, पिशाच और राक्षस का अर्थ।

[क्रमशः अगली कडी के लिये यहाँ क्लिक करें]

Saturday, June 12, 2010

एक अंतर-राष्ट्रीय वाहन

भारत में भले ही कुछ नगरों के प्रशासन को रिक्शे और रिक्शा चालक अपनी शान में गुस्ताखी लग रहे हों परन्तु अमेरिका के कुछ शहरों में रिक्शा पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है. यहाँ प्रस्तुत हैं दो बड़े नगरों न्यू योर्क व वाशिंगटन डीसी से रिक्शा के चित्र:


श्री रत्न सिंह शेखावत जी ने बैट्री चलित रिक्शा के बारे में सुन्दर आलेख लिखा है, ज़रूर देखिये.


सभी चित्र अनुराग शर्मा द्वारा
[Rickshaw in USA: Photos of by Anurag Sharma]

बोनसाई बनाएं - क्विक ट्यूटोरियल

बोनसाई के चित्रों की मेरी पिछली पोस्ट पर अपेक्षित प्रतिक्रियाएं आयीं. कुछ लोगों को चित्र पसंद आये. सुलभ जायसवाल और भारतीय नागरिक ने बोनसाई कैसे बनाए जाते हैं यह जानना चाहा. रंजना जी को एक उड़िया फिल्म की याद आयी. मैं उनकी दया भावना की कद्र करता हूँ इसलिए कोई सफाई देने की गुस्ताखी नहीं करूंगा. भूतदया एक दुर्लभ सदगुण है और जिनके मन में भी है उनके लिए मेरे मन में बड़ा आदर है.
बोनसाई पर एक क्विक ट्यूटोरियल(भारतीय नागरिक के अनुरोध पर त्वरित कुंजी)
पौधे:
याद रखिये कि सच्चे बोनसाई पौधे नहीं वृक्ष हैं इसलिए उस जाति के पौधे चुनिए जो वृक्ष बन सकते हैं. मध्यम ऊंचाई के वृक्ष या झाडी आदर्श हैं. फाइकस जाति (अंज़ीर, वट, पीपल, गूलर, पाकड़ आदि) के वृक्षों की जड़ें प्राकृतिक रूप से उथली होती हैं इसलिए वे बोनसाई के लिए अच्छे उम्मीदवार हैं. मैंने बहुत से पेड़ जैसे चीड, कटहल, मौलश्री आदि दिल्ली में सफलता से उगाये थे - यह सभी वृक्ष भारत के मैदानी क्षेत्रों में आराम से रह जाते हैं. अमरुद, आम, अनार, स्ट्राबेरी आदि की प्राकृतिक रूप से छोटी नस्लें आसानी से मिल जाते हैं, उन्हें लगाएं. लखनऊ में बौटेनिकल गार्डन के बाहर बहुत से पौधे मिलते हैं.

मृदा:
किताबों में अक्सर मिट्टी को कृमिरहित करने की बात कही गयी होती है मगर मैंने हमेशा बाग़ की मिट्टी का प्रयोग पत्तों और गोबर की खाद के साथ किया है. इतना ध्यान रहे कि पत्ते और गोबर की सडन प्रक्रिया गमले में रखने से पहले ही पूरी हो चुकी हो. भारत में नीम के पत्तों की खाद मिलती है. उसका प्रयोग किया जा सकता है.

1995 - पिताजी तीन बोंसाई के साथ - फलित अनार, पाकड, जूनिपर

ध्यान रहे:
जड़ों पर ज़रा सी धूप या हवा लगने भर से एक छोटा पौधा मर सकता है. जब भी मिट्टी बदलें, जड़ें काटें या पहली बार बर्तन में लगाएं तो पौधे की जड़ों पर मिट्टी जमी रहने दें और या तो उसे गीले कपड़े में या पानी की बाल्टी/कनस्तर में रखें. ऐसे सारे काम शाम को ही करें ताकि बदलने के तुरंत बाद कड़ी धूप या गर्मी से बचाव हो सके. मिट्टी को मौस घास या सूखी साधारण घास से ढंके रहने से मिट्टी की नमी देर तक रहती है. जड़ों में पानी कभी न ठहरने दें. शुरूआत में अधिकाँश पौधे जड़ें गलने से मरते हैं न कि मिट्टी सूखने से.

पात्र:
ऐसा हो कि उसमें कुछ पानी डालने पर मिट्टी इस तरह न बहने पाए कि जड़ें खुल जाएँ. शुरूआत बड़े बर्तन या गमले से से करें. अपना अनुभव और पौधे की दृढ़ता बढ़ने के बाद बर्तन छोटा कर सकते हैं. कहावत भी है पेड़ बड़ा और बर्तन छोटे.

श्रीगणेश:
अब आते हैं सबसे ख़ास मुद्दे पर, यानी बोनसाई का पुंसवन संस्कार. एक बोनसाई की शुरुआत आप बीज से भी कर सकते हैं. खासकर जिस तरह गर्मियों के दिनों में इधर-उधर बिखरी आम की गुठलियों में से बिरवे निकलते रहते हैं या दीवारों की दरारों में पीपल आदि उगते हैं - वे इस्तेमाल में लाये जा सकते हैं. मैं बोनसाई के लिए गुठली का प्रयोग तभी करता हूँ जब तैयार पौध मिलना असंभव सा हो. जैसे दिल्ली में हमने चीड एवं कटहल तथा पिट्सबर्ग में लीची बीजों से उगाई थी. अगर बीज से उगाने की मजबूरी हो तो पहले पौधे को ज़मीन पर पनपने दीजिये क्योंकि छोटे बर्तन में वर्षों तक वे पौधे जैसे ही रह जाते हैं और वृक्ष सरीखे नहीं दिखते हैं.

त्वरित-बोनसाई:
पौधशाला से एक-दो इंच मोटे व्यास के तने का पौधा गमले (या जड़ की थैली) सहित लाइए. उस पर अच्छी तरह जल का छिडकाव करें. बड़ी डंडियाँ सफाई से काटकर (कुतरकर नहीं - छाल न छिले) कुछेक डंडियाँ रहने दीजिये. जड़ को मिट्टी समेत निकालकर सबसे दूर वाली जड़ों को उँगलियों से कंधी जैसी करके तेज़ कैंची से काट दें. छाया में रहें और जितनी जल्दी संभव हो नए बर्तन में लगाकर जड़ों को मिट्टी से पूर्णतया ढँक दें. ध्यान रहे कि बची हुई जड़ें इस प्रक्रिया में मुड़ें या टूटें नहीं.

देखरेख:
उसी प्रजाति के किसी बड़े वृक्ष की तरह ही उसके छोटे रूप को भी पूरी धूप चाहिए यानी जैसा पौधा वैसी धूप. खाद और जल की मात्रा पौधे और बर्तन के आकार के अनुपात में ही हो, कुछ कम चल जायेगी मगर ज़्यादा उसे मार सकती है. आवश्यकतानुसार अतिरिक्त डंडियों की छंटाई समय-समय पर करते रहें. पत्तों की धूल गीले और साफ़ रुमाल से हटा सकते हैं परन्तु ध्यान रहे कि पत्तों पर किसी तरह की चिकनाई न लगे, आपकी त्वचा की भी नहीं. हर एकाध साल में पौधे को गमले से निकालकर अतिरिक्त जड़ों को सफाई से काट दें और इस प्रकार खाली हुए स्थान को खाद और मिट्टी के मिश्रण से भर दें.

गुरु की सीख:
बलरामपुर में रहने वाले हमारे गुरुजी किसी का किस्सा सुनाते हैं जो न बढ़ने वाले, या बीमार हो रहे पौधों को फटकार देते थे, "दो दिन में ठीक नहीं हुए तो उखाड़ फेंकेंगे." अधिकाँश पौधे डर के मारे सुधर जाते थे.

शुभस्य शीघ्रम:
बस शुरू हो जाइए, और अपनी प्रगति बताइये. हाँ यदि जामुन की बोनसाई (और वृक्ष भी) लगाते हैं तो मुझे बड़ी खुशी होगी. यहाँ आने के बाद जामुन देखने को आँखें तरस गयी हैं.

स्ट्राबेरी का चित्र अनुराग शर्मा द्वारा Strawberry photo by Anurag Sharma

Thursday, June 10, 2010

बोनसाई - कुछ स्वर्गीय, कुछ पार्थिव

दिल्ली में मेरी बालकनी पर सौ बोनसाई रहती थीं. यहाँ आया तो बहुत समय तक अपार्टमेन्ट में रहते कुछ किया नहीं,धीरे-धीरे फिर से हाथ आजमाना शुरू किया. मौसम अतिवादी होता है फिर भी कई पौधे कई-कई साल चले मगर एक छोटे से पाकड़ के अलावा अभी कुछ भी जीवित नहीं है. कुछ झलकियाँ:

ये पौधे भगवान को प्यारे हो गए!

 केला 

पाकड़
लीची
अकेला जीवित पाकड़

सभी चित्र अनुराग शर्मा द्वारा
[Bonsai: Photos by Anurag Sharma]

Wednesday, June 9, 2010

श्रीमान बबल्स कुमार की अदाएं

बेटी ने जब पहली बार कुत्ता पालने की जिद की तो कुत्ते-बिल्ली से एलर्जिक माता-पिता ने बहला दिया. जब आग्रह की आवृत्ति और दवाब बढ़ने लगे तो यह तय हुआ कि बिटिया रानी एक महीने तक घर के अन्दर रखे पौधों को पानी देकर यह सिद्ध करेंगी कि वे एक जीवित प्राणी की ज़िम्मेदारी लेने में सक्षम हैं. तीन सप्ताह पूरे होते-होते कुछ बोनसाई मृत्यु के कगार पर आने लगीं तो तय हुआ कि जितनी ज़िम्मेदारी दिखाई गयी है उसके अनुसार कुत्ता-बिल्ली तो नहीं लेकिन आधा दर्ज़न छोटी मछलियाँ घर में लाई जा सकती हैं. शीशे का मर्तबान तैयार करके उसमें पत्थर डाले गए और शाम को मछलियों को एक नया घर मिला.

एक हफ्ते के अन्दर पौधे तो पिताजी ने संभाल लिए मगर मछलियाँ माँ की विशेष निगहबानी के बावजूद अल्लाह को प्यारी हो गयीं. इसके बाद काफी दिनों तक पालतू पशु की बात बंद हो गयी. छठी कक्षा में पहुँचते पहुँचते कुत्ता फिर से एक प्राथमिकता बन गया. एक बार फिर ज़िम्मेदारी सिद्ध करने की प्रक्रिया पूरी हुई. इस बार ज़िम्मेदारी के अंक बढ़कर इतने हो गए कि एक चूहा लाया जा सके. पिताजी अभी भी डर रहे थे क्योंकि उनकी लापरवाही से बचपन में पाला हुआ सफ़ेद चूहों का जोड़ा असमय स्वर्गवासी हो चुका था. काफी बहस-मुसाहिबा हुआ और बिटिया को उनके जन्मदिन पर अन्य उपहारों के साथ एक ड्वार्फ हैमस्टर मिल गया जिसका नामकरण हुआ बबल्स.
तो आइये मिलते हैं श्रीमान बबल्स कुमार से:


कैमरे से बचते हुए


भोजनथाल से दुनिया कैसी दिखती है


ज़रा जलपान करके आते हैं



छत पर हवाखोरी


उस पार की दुनिया कैसी है?


तखलिया- यह साहब के आराम का वक्त है

सभी चित्र अनुराग शर्मा द्वारा [Photos of Bubbles by Anurag Sharma]
पुनर्प्रस्तुति के लिए श्रीमान बबल्स कुमार की लिखित अनुमति आवश्यक है
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एक दुखद सूचना
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Monday, June 7, 2010

अंधा प्यार - एक कहानी

आज एक छोटी सी कहानी कुछ अलग तरह की...

रीना
ज़िंदगी मुकम्मल तो कभी भी नहीं थी। बचपन से आज तक कहीं न कहीं, कोई न कोई कमी लगातार बनी रही। बाबा कितनी जल्दी हमें छोड़कर चले गए। अर्थाभाव भी हमेशा ही बना रहा। हाँ, ज़िंदगी कितनी अधूरी थी इसका अहसास उससे मुलाक़ात होने से पहले नहीं हुआ था। समय के साथ हमारा प्यार परवान चढ़ा। ज़िन्दगी पहली बार भरी-पूरी दिखाई दी। हर तरफ बहार ही बहार। जिससे प्यार किया वह विकलांग है तो क्या हुआ? मगर अच्छे दिन कितनी देर टिकते हैं? पहले विवाह और फिर उसके साल भर में ही युद्ध शुरू हो गया। इनकी पलटन भी सीमा पर थी। कितनी बहादुरी से लड़े। मगर फिर भी... हार तो हार ही होती है। कितने दिए बुझ गए। यही क्या कम है कि ये वापस तो आये। मगर लड़ाई ने ज़िंदगी को बिलकुल ही बदल दिया। देश पर जान न्योछावर करने के लिए हँसते-हँसते सीमा पर जाने वाला व्यक्ति कोई और था और हर बात पर आग-बबूला हो जाने वाला जो उदास, कलही व्यक्ति वापस आया वह कोई और।

अमित
आँखें नहीं बचीं है तो क्या हुआ? क्या-क्या नहीं देखा है इस छोटी सी ज़िंदगी में। और क्या-क्या नहीं किया है। साम्राज्यवाद की सूली पर इंसानों को गाजर-मूली की तरह कटते देखा है। खुद भी काटा है, इन्हीं हाथों से। बस यही सब देखना बाकी था। आँखें तो भगवान् ने ले ही लीं, जीवन भी उसी युद्धभूमि में क्यों न ले लिया? क्यों छोड़ दिया यह दिन देखने को? तीन साल पहले ही तो रीना से विवाह हुआ था। कितने सपने संजोये थे। क्या-क्या उम्मीदें थीं। हालांकि बाद में दरार आ गई। कितना प्यार दिया रीना को। फिर यह सब कैसे हो गया? वे दोनों एक ही कॉलेज में थे। शायद शादी से पहले ही कुछ रहा होगा। तभी तो इतना नज़दीकी होने के बावजूद दिनेश आया नहीं था शादी में। और उसके बाद भी महीनों तक बचता रहा था। मैं समझता था कि काम के सिलसिले में व्यस्त है। और अब यह छलावा... हे भगवान्! यह कैसी परीक्षा है? यह क्या हो गया है मुझे? मैं तो कभी भी इतना कायर नहीं था? नहीं! मैं हार मानने वाला नहीं हूँ. अगर मेरे जीवन में कुछ गलत हो रहा है तो उसे ठीक करने की ज़िम्मेदारी भी मेरी ही है। एक सच्चा सैनिक प्राणोत्सर्ग से नहीं डरता। पत्नी रीना व बचपन का दोस्त दिनेश, दोनों ऐसे लोग जिनकी खुशी के लिए मैं हँसते-हँसते प्राण दे दूं। मैं ही हूँ उनकी राह का रोड़ा, उनकी खुशी में बाधक। आज यह रोड़ा हटा ही देता हूँ। वे और परेशान न हों इसलिए इसलिए आत्महत्या कर लूंगा... आज ही... उनके सामने। कब तक इस अंधे की छडी बनकर अपनी कुर्बानी देती रहेगी?

दिनेश
अपने से ज़्यादा यकीन करता था मेरे ऊपर। मगर लगता है वह बात नहीं रही अब। शक का कीड़ा उसके दिमाग में बैठ गया है। हमेशा मुस्कराता रहता था। मैं रीना को कभी मज़ाक में भाभी जान कहता तो कभी सिर्फ उसे चिढाने के लिए सिर्फ जान भी कह देता था। कभी भी बुरा नहीं मानता था। मगर जब से लड़ाई से वापस आया है सब कुछ बदल गया है। हम दोनों की आवाज़ भी एकसाथ सुन ले तो उबल पड़ता है। हरदम खटका सा लगा रहता है। कहीं कुछ ऊँच-नीच न हो जाए।

रीना
पति के हाथ में भरी हुई पिस्तौल...किसलिए? अपनी पत्नी को मारने के लिए! जितना हुआ बहुत हुआ। क्या-क्या नहीं किया मैंने? इस शादी के लिए अपने प्यार की कुर्बानी। लड़ाई के दिनों में हर रोज़ विधवा होकर फिर से अनाथ हो जाने का भयावह अहसास। उसके बाद आज का यह नाटक... आज के बाद एक दिन भी इस घर में नहीं रह सकती मैं।

अमित
अपने ऊपर शर्म आ रही है। अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारी अपनी पत्नी पर शक किया मैंने। उसका नाम किसी और के साथ जोड़ा। और वह भी उस दोस्त के साथ जिसे मैं बचपन से जानता हूँ। जिसने मेरी खुशी के लिए अपना प्यार भी कुर्बान कर दिया मुझे बताये बिना। आज अगर बिना बताये घर नहीं पहुंचता और उनकी बातें कान में नहीं पडतीं तो शायद कभी सच्चाई नहीं जान पाता। असलियत जाने बिना अपनी जान भी ले लेता और उन्हें भी जीते जी मार दिया होता। दिनेश ने हँसते हँसते मेरी शादी रीना से कराई और उस दिन से आज तक उसे अपनी सगी भाभी से भी बढ़कर आदर दिया। ईश्वर कितना दयालु है जो इन दोनों का त्याग मेरे सामने उजागर हो गया और मेरे हाथ से इतना बड़ा पाप होने से बच गया।

दिनेश
बहुत सह लिया यार। अब भाड़ में गयी दोस्ती। मैं जा रहा हूँ आज ही अपना बोरिया-बिस्तरा बाँध कर। आज तो बाल-बाल बचा हूँ। भरी हुई पिस्तौल थी उसके हाथ में। आज मैं यह लाइन लिख नहीं पाता। गिड़गिड़ाने पर अगर जान बख्श भी देता तो भी मेरी बची हुई टांग तो तोड़ ही डालता शायद। रीना को भी जान से मार सकता था। ये कहो कि बाबा जी की किरपा से हमारी किस्मत अच्छी थी कि हमने उसकी कार बेडरूम की खिड़की से ही देख ली थी और उसके घर में घुसने से पहले ही अपने संवाद बोलने लगे। वरना तो बस राम नाम सत्य हो ही गया था... अपने को बहुत होशियार समझता है... अंधा कहीं का।
[अनुराग शर्मा]

Saturday, June 5, 2010

असीम - कहानी

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वह अन्दर क्या आयी, सारा दफ्तर महक उठा था। रोजाना की उन ग्रामीण गंधों के बीच यह खुशबू ही उसके आने का पता मुझे देती थी। तब मैं मुंबई और पुणे के बीच में एक छोटे से गाँव में एक सरकारी बैंक में एक प्रोबेशनरी अधिकारी की अस्थायी पोस्टिंग पर था। अपने जीवन में पहली बार मैं अपने परिवार से दूर एक ऐसी जगह में था जहाँ की भाषा एवं संस्कृति मेरे लिए नई थी। शाखा में मेरे अलावा पाँच व्यक्ति थे। सभी लोग बहुत अच्छे और नेक थे। अपने स्वाभाव के अनुकूल मैं भी दो एक दिन में ही इस परिवार का अटूट हिस्सा बन गया।

प्रोबेशनरी होने के कारण मैं अपने बैंक की इस शाखा के नियमित स्टाफ में नहीं गिना जाता था। मेरे बैठने के लिए कोई निश्चित जगह भी नहीं थी। आज यहाँ तो कल वहां। मुझे बैंकिंग के सभी आयाम सीखने थे और शाखा में मेरे लिए काम की कोई कमी न थी। घाटे, जोशी, शिंदे और पंवार मुझसे कहीं वरिष्ठ थे। सिर्फ़ ममता ही मेरी हमउम्र थी। जैसे मैं एक प्रोबेशनरी अधिकारी था उसी तरह वह एक प्रोबेशनरी क्लर्क थी। उसने यह नौकरी मुझसे कोई तीन महीने पहले शुरू की थी। वह एक पतली दुबली, आकर्षक और वाक्पटु लडकी थी। वैसे तो सबसे ही हंस बोलकर रहती थी लेकिन मुझसे कुछ अधिक ही घुल मिल रही थी। हाँ, नटखट बहुत थी। मुझे तो हमेशा ही छेड़ती रहती थी।


उस दिन मैं शाखा के एक कोने में अकेला बैठा हुआ रोजनामचा लिख रहा था। तभी ममता अपनी चिर-परिचित मुस्कान बिखेरती हुयी आई और मेरे सामने बैठ कर एकटक मुझे देखने लगी। मैं भी औपचारिकतावश मुस्कराया और फ़िर अपने काम में लग गया।

“क्या कर रहे हो?” उसने पूछा, “इतना सुंदर लिखते हो तुम।”

फ़िर मेरे जवाब का इंतज़ार किए बिना ही बोलती चली गयी।

“तुम्हारी लाइन तो तुम्हारी तरह ही है, सुंदर, साफ और स्पष्ट।”

मैंने काम रोककर उसकी और देखा और देखता ही रह गया। सुंदर तो वह हमेशा ही थी, पर आज कुछ ज़्यादा ही आकर्षक दिख रही थी।

“देख क्या रहे हो …” उसके चेहरे पर शरारत नाचने लगी, “तुम्हारी लाइन तो बिल्कुल क्लियर है।”

उसके कथन ने मुझे हतप्रभ कर दिया। इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता, वह उठी और बोली, “डरो मत निखिल, मैं तुम्हें खाने वाली नहीं हूँ।”

वह खिलखिलायी और मेरे उत्तर का इंतज़ार किए बिना अपनी सीट पर चली गयी। मैं आश्चर्यचकित रह गया। अजीब लड़की है यह। मुझे तो इसकी कोई बात समझ नहीं आती है।


उस बार सम्पूर्ण शाखा की तनख्वाह तैयार करने का काम मुझे दिया गया। शायद वह भी मेरी ट्रेनिंग का एक हिस्सा था। मैं एक कोने में बैठा हुआ खाते और केलकुलेटर से जूझ रहा था कि फिजां में खुशबू सी तिरने लगी। हाँ, वह ममता ही थी। उसने मेरी सहायता करने की पेशकश की जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। इतने खूबसूरत सहायक को कोई मना भी कैसे कर सकता था। मैं सभी कर्मचारियों के मूल वेतन की गणना करने लगा और वह भत्तों की। बड़ी बड़ी संख्याएँ मेरे सामने कागज़ पर उलझ रही थीं। जोड़ में कोई गलती हो रही थी जिसे मैं पकड़ नही पा रहा था। उसने पूछा तो मैंने बताया।

वह बोली, “तो ढूंढो न। प्यार से देखोगे तो कुछ भी मिल सकता है।”

फ़िर एकटक मुझे देखा, हँसी और धीमे सुरों में गुनगुनाने लगी, “ढूंढो ढूंढो रे साजना...”

पहली बार मैंने महसूस किया कि वह बहुत सुरीली थी। गाते गाते वह रुकी और मेरी आंखों में आँखें डालकर फ़िर से गुनगुनाने लगी। इस बार मराठी में शायद कोई कविता थी या कोई ऐसा गीत जो मैंने पहले नहीं सुना था। गीत के बोल कुछ इस तरह से थे:

मामूली मछली के पीछे
दौड़ रहा क्यों इधर उधर
यह मोती तेरे पास गिरा है
दैवी, धवल, अछूता
क्यों अनदेखी करता उसकी
ओ निर्मोही मछुआरे
आगे बढ़कर पा ले उसको
तप तेरा सार्थक हो जाए
श्रम का पूरा फल तू पाये
यह मोती तेरा हो जाए
यह मोती तेरा हो जाए।

मैं सम्मोहित सा उसका गीत सुनता रहा। गीत पूरा होने पर मेरी तंद्रा भंग हुई। कुछ देर प्रयास करने के बाद वेतन की गणना में हो रही गलती भी पकड़ में आ गयी। हम फ़िर से काम पर लग गए।

जब उसने मेरे पेट्रोल भत्ते के बारे में पूछा तो मैंने कहा, “पाँच।”

“नेट?” उसने पूछा।

मेरा सम्मोहन शायद अभी भी पूरी तरह से उतरा नहीं था इसलिए मैं उसकी बात ठीक से समझ न सका।

“क्या कहा तुमने?”

“मैंने कहा नेट, N-E-T ...” वह खिलखिलायी, “और तुमने क्या सुना - नाइटी?”


धीरे धीरे वह मुझसे और भी खुलने लगी। अब वह हर रोज़ सुबह को काम शुरू करने से पहले दस पन्द्रह मिनट मेरे पास आकर बैठ जाती थी और कुछ न कुछ बात करती थी। एक दिन जब वह अपने स्कूल के दिनों के बारे मैं बता रही थी, शिंदे शरारत से मुस्कुराता हुआ हमारी ओर आया।

“इन लड़कियों से दूर ही रहना निखिल वरना बरबाद हो जाओगे” शिंदे फुसफुसाया।

“निखिल बरबाद होने वालों में से नहीं है” ममता ने मेरा बचाव किया।

“तुम्हारे सामने कौन टिक सकता है?” शिंदे ने चुटकी ली।

“निखिल तो उर्वशी और मेनका के सामने भी डिगने वाला नही, इतना तो मैं जान गई हूँ”, यह कहकर वह खिलखिला उठी।

उसका चेहरा लाल आभा से खिल उठा। उसकी बात सच नही थी। मैं डिगने वाला भले ही न होऊँ मगर आजकल मुझे उसका ख्याल अक्सर आता था। शाखा से चले जाने के बाद भी मानो वह अपना कोई अंश मेरे पास छोड़ जाती थी। मैं सोचने लगा कि शायद मेनका और उर्वशी भी ममता के जैसे ही दिखते होंगे। इसीलिए उनकी सुन्दरता की उपमा आज तक दी जाती है।

ममता ऑफिस में नहीं थी। वह किसी ट्रेनिंग पर मुम्बई गई थी। शिंदे अक्सर किसी न किसी बहाने से उसका नाम लेकर मेरी दुखती रग पर नमक छिड़क जाता था। वह पूरा सप्ताह कठिनाई से बीता। खैर, कठिन दिन भी ख़त्म हुए और वह अपनी ट्रेनिंग पूरी कर के वापस आ गयी। सुबह को वह मेरे पास आकर बैठ गयी और बिना कुछ कहे मुझे अपलक देखती रही। मैं थोड़ा असहज होने लगा था।

“तुम्हें मेरी याद आती थी क्या?” उसने मासूमियत से पूछा।

“ईअर एंड का इतना काम था। तुम्हें याद करने बैठते तो शाखा ही बंद हो जाती।”

“मैं भी कोई कम व्यस्त नहीं थी ट्रेनिंग में, फ़िर भी मैं तुम्हें रोज़ याद करती थी।” यह कहते हुए उसके चेहरे पर उदासी की कालिमा सी छा गई।

“हरदम सोचती थी कि तुम अकेले बैठे होगे, अकेले खाना खा रहे होगे। किसी से कुछ कहोगे नहीं मगर चुपचाप मुझे ढूंढ रहे होगे।”

उसकी बात चलती रही, “ट्रेनिंग में एक पंजाबी लड़की भी थी। वह मुम्बई की ही एक शाखा से आयी थी। पहले दिन से ही मेरी सखी बन गयी। वह बिल्कुल तुम्हारे जैसे ही हिन्दी बोलती थी। वह जब भी बोलती थी मुझे लगता था जैसे तुम वहां पर आ गए हो। अच्छा लगता था।”

बैंक कर्मियों का गाँव वालों के ह्रदय में एक विशेष स्थान था। चाहे गाँव के मन्दिर में कोई समारोह हो या किसी के घर में, हम लोगों को ज़रूर बुलाया जाता था। आज काशिद के बेटे की शादी थी। इसलिए वह बुलावा देने के लिए आया था। अब चूंकि मैं भी इस परिवार का एक हिस्सा था, सो मुझे भी बुलाया गया। उसके जाने के बाद ममता मेरे पास आयी और धीरे से बोली, “काशिद के घर में हर समारोह में मांस ही पकता है, तुम तो शाकाहारी हो। भूखे रह जाओगे वहां पर।”

मैंने सिर हिलाकर हाँ की तो उसने फुसफुसाकर कहा, “तुम मेरे घर आ जाना, मैं कुछ अच्छा बना कर रखूँगी तुम्हारे लिए।”

उस दिन मेरा उसके घर जाना हुआ तो पता लगा कि वह खाना भी बहुत अच्छा बनाती है। लज़ीज़ खाने के बाद हमने बैठकर बहुत सारी बातें कीं। मैंने उसके गाने भी सुने। रात में देर हो गयी थी। उसने कहा भी कि अगर मैं उसके घर रुकना चाहूँ तो उसे कोई आपत्ति नहीं है। वापस आने को दिल तो नहीं कर रहा था लेकिन मैं रात में एक अकेली अविवाहित लडकी के एक कमरे के घर में नहीं रुक सकता था। अपनी सभ्यता के लबादे में लिपटा हुआ मैं, मन मारकर वापस घर आ गया। रात में देर तक नींद नहीं आयी। उसी के ख्याल दिमाग में आते रहे।

समय कैसे गुज़रता गया पता ही नही चला। एक बार एक बेइंतहा खूबसूरत नौजवान दफ्तर में आया। वह सीधा ममता की तरफ़ बढ़ा। ममता भी अपनी सीट से उठकर उसको गले मिली। फ़िर उसे साथ लेकर मैनेजर के केबिन में गयी। वे दोनों वहीं से बाहर चले गए। दरवाजे से निकलते समय सबकी नज़र बचाकर उसने मुझे वेव किया और मुस्कुरा कर बायीं आँख दबा दी।

उनके आँख से ओझल होते ही शिंदे मेरे पास आया और बताने लगा कि यह लड़का अनिल ममता का मंगेतर है। लड़का बहुत सुंदर था और हर तरह से ममता के लिए उपयुक्त लगता था। फ़िर भी खुश होने के बजाय मुझे धक्का सा लगा। ममता की शादी तय हो चुकी है मुझे इसका ख्वाब में भी अंदाजा नहीं था। अनिल को ममता के आसपास देखकर मुझे ईर्ष्या होने लगी। उससे भी ज़्यादा दुःख इस बात का हुआ कि ममता ने मुझसे अनिल का या अपनी शादी तय होने का कोई ज़िक्र कभी नहीं किया।

“आज पनवेल चल रहे हो मेरे साथ?” उसने मुझसे हर शनिवार की तरह ही पूछा।

“इस बार तो नही। अगले सप्ताह के बारे में क्या ख्याल है?” मैंने हमेशा की तरह ही दोहराया।

दरअसल शनिवार को हमारी शाखा जल्दी बंद हो जाती थी। ममता हर शनिवार को अपने माता पिता के घर पनवेल चली जाती थी। हर बार वह मुझे साथ ले चलने की बात करती थी। और मैं अगले शनिवार का बहाना करके टाल देता था। ऐसा नहीं कि मैं कभी भी पनवेल नहीं गया। हाँ इतना ज़रूर है कि उसके साथ जाना नहीं हो सका। एक बार, सिर्फ़ एक बार मैं पनवेल में था। वह भी शनिवार का ही दिन था। और मैं ही नहीं, मेरे सारे सहकर्मी भी वहां थे। यह अवसर था ममता और अनिल के विवाह का।

सुंदर तो वह हमेशा से ही थी। परन्तु आज वैवाहिक वस्त्राभूषणों से उसका सौंदर्य दप-दप दमक रहा था। मुझे देखते ही उसका चहकना शुरू हो गया। उसने अपने माता पिता व अनिल से परिचय कराया। मैंने पहली बार अनिल को इतने नजदीक से देखा। मुझे वह बहुत ही सरल, सज्जन और सभ्य लगा। मुझे खुशी हुयी कि ममता उसके साथ खुश रह सकेगी।

शाखा में हमेशा जैसी ही चहल पहल थी। परन्तु उसके बिना सब खाली खाली सा लग रहा था। दिन इतना लंबा हो गया था कि काटे नहीं कटा। एक एक दिन कर के दो हफ्ते इसी तरह मुश्किल से गुज़रे। पन्द्रह दिन के बाद शाखा की रौनक वापस लौटी। मैं शाखा में घुसा तो सब उसे घेरे हुए खड़े थे। वह बहुत खुश दिख रही थी। मुझे देखते ही वह सबको छोड़कर मेरे पास आयी। उसने हाथ बढ़ाया तो मैंने हाथ मिलाकर उसे बधाई दी।

“इस बार सच सच बताना” उसने पूछा, “मेरी याद आती थी न?”

“हाँ” मैं झूठ नहीं बोल सका।

“मुझे भी आयी थी। मैं तो सारा वक्त तुम्हारे बारे में सोचती थी।” उसने बेझिझक कहा।

उसकी बात सुनकर मैं जड़वत रह गया। एक तरफ़ मुझे गुदगुदी भी हो रही थी। ममता जैसी सुंदरी अपने हनीमून पर मेरे बारे में सोचती रही हो। अपनी इससे बड़ी तारीफ़ मैंने आज तक नहीं सुनी थी। मेरा दिल बल्लियों उछल रहा था। इस अनमोल खुशी के साथ साथ मन के किसी कोने में मुझे अपराधबोध भी हुआ। लगा जैसे कि मैंने अनिल के शरीर का एक हिस्सा अनाधिकार ही चुरा लिया हो। ईमानदारी की भावना को मेरे गुनाह-ऐ-बालज्ज़त पर काबू पाते देर न लगी।

“क्या कह रही हो ममता?” मैंने एक एक शब्द को दृढ़ता से कहा, “मेरे बारे में अब सोचना भी मत। मत भूलो कि अब तुम शादीशुदा हो।”

“तो? क्या मैं इंसान नहीं? निखिल, प्यार कोई मिठाई का टुकडा नहीं है जो किसी को देने से ख़त्म हो जायेगा। यह तो खुशबू है। जितना दोगे उतना ही फैलेगी।”

यह सब बोलते हुए उसके चेहरे पर गज़ब का तेज था। अपने दोनों हाथों से उसने मेरा दायाँ हाथ पकड़ लिया। उसकी आँखें खुशी से चमक रही थीं। एक विवाहिता भारतीय नारी के सारे चिन्हों ने उसकी खूबसूरती को कई गुना बढ़ा दिया था। मेरा चेहरा सुर्ख हो गया था। दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा। मेरे ह्रदय की हर हलचल से बेखबर वह बोलती जा रही थी।

“मैं एक बहती नदी हूँ और मुझे बहुत दूर तक बहना है। लेकिन अंततः मैं अपने सागर में ही मिलती हूँ। अपने सागर में समर्पित होना मेरा भाग्य है। मेरा सागर अनिल है। और तुम ... तुम एक सुंदर, सुगन्धित उपवन हो। मैं जब तुम्हारे पास से बहकर चली तो तुम्हें पास से देखने का मन किया। कुछ पल के लिए अपना प्रवाह रोककर मैं तुम्हारे पास बैठ गयी। तुम्हें तो पता है कि मैंने अपना कोई भी किनारा तोडा नहीं। मैंने तुमसे कुछ भी लिया नहीं। न ही तुमने मुझसे ऐसा कुछ चुराया जो कि मेरे सागर का था। तुम्हारा यह दो क्षण का साथ, तुम्हारी यह खुशबू मुझे अच्छी लगी और मैंने उसे अपने ह्रदय में भर लिया। यकीन रखो हमने कुछ भी ग़लत नहीं किया है।”
मैं मंत्रमुग्ध सुनता जा रहा था और वह बोलती गयी। दशकों गुज़र गए हैं मगर मुझे अभी तक याद है उसने क्या-क्या कहा।

“जब मैं अपने समुद्र में समा रही थी तो तुम्हारी खुशबू भी मेरे साथ थी।”

[समाप्त]

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(सृजनगाथा में प्रकाशित)
~ अनुराग शर्मा

Thursday, June 3, 2010

यह लेखक बेचारा क्या करे?

कविता और यात्रा संस्मरण के अलावा जब भी कुछ लिखने बैठता हूँ तो एक बड़ी मुश्किल से गुज़रना पड़ता है. वह है ईमानदारी और सद्भाव के बीच की जंग. लेखन का गुण मुझमें शायद प्राकृतिक नहीं होगा इसलिए मेरी कहानियों में गूढ़ भावपक्ष प्रधान नहीं होता है. सोचता हूँ कि यदि मेरी कहानियाँ, व्यंग्य और लेख विशुद्ध साहित्यिक कृति होते और उनका कथ्य सांकेतिक और अर्थ गूढ़ होता तो शायद इस मुश्किल से बच जाता.

मगर क्या करूँ, कवि या कथाकार न होकर किस्सागो ठहरा. मेरी अधिकाँश कहानियां अक्सर किसी घटना विशेष के चारों ओर घूमती हैं. ज़ाहिर है कि घटना है तो पात्र भी होंगे और एक सत्यवादी के पात्र हैं तो काफी हद तक जैसे के तैसे ही होंगे. जब लोग मेरी कहानियों के संस्मरण होने की आशंका व्यक्त करते हैं तो आश्चर्य नहीं होता है. आश्चर्य तो तब भी नहीं होता है जब लोग मेरे संस्मरणों को भी कहानी कह देते हैं. आश्चर्य तब होता है जब लोग पात्रों को वास्तविक लोगों से मिलाना शुरू करते हैं.

कहानी तो कहानी कई बार तो लोग कविता में भी व्यक्ति विशेष ढूंढ निकालते हैं. यहाँ मैं यह बताना ज़रूरी समझता हूँ कि मेरी कहानियां पूर्ण सत्य होने के बावजूद उनका कोई भी पात्र सच्चा नहीं है (हाँ, आत्मकथात्मक उपन्यासों की बात अलग है). उसके कई कारण हैं. पहला कारण तो यह है कि एक परिपक्व लेखक की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि उसके पात्रों की गोपनीयता और आदर बना रहे. आप कहेंगे कि फिर सिर्फ आदर्शवादी कहानियां लिखिए मगर प्रश्न यह नहीं है कि क्या लिखा गया है, प्रश्न है कि उसे कैसे पढ़ा और क्या समझा गया है. पाठक किस बात का क्या अर्थ लगायेंगे, यह समझ पाना आसान होता तो तसलीमा नसरीन और सलमान रश्दी जैसे अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त लेखकों की जान पर इतना बवाल न होता.

कोई भी लेखक अपने हर पाठक की मनस्थिति या परिस्थितियों के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है. परन्तु फिर भी एक अच्छे लेखक में इतनी बुद्धि होनी चाहिए कि वह जो कुछ लिख रहा है वह कम से कम तकलीफदेह हो. कठिन है, कुछ स्थितियों में शायद असंभव भी हो मगर यदि किसी लेखक की हर पुस्तक हर जगह जलाई जाती है या फिर इसके उलट उस पुस्तक की वजह से हर देश काल में कुछ लोग ज़िंदा जलाए जाते हैं तो कहीं न कहीं कोई बड़ी गड़बड़ ज़रूर है.

मेरा प्रयास यह रहता है कि मेरी कहानी सच के जितना भी निकट रह सकती है रहे मगर सभी पात्र काल्पनिक हों. कुछ कहानियां आत्मकथ्यात्मक सी होती हैं मगर मेरी कथाओं में ऐसा करने का उद्देश्य सिर्फ एक पात्र की संख्या घटाकर कहानी को सरल करना भर है. इससे अधिक कुछ भी नहीं. इसलिए मेरी कहानियों का मैं "अनुराग शर्मा" तो क्या मेरा जाना-पहचाना-देखा-भाला कोई भी हाड-मांस का व्यक्ति न होकर अनेकानेक वृत्तियों को कहानी के अनुरूप इकट्ठा करके खडा किया गया एक आभासी व्यक्तित्व ही होता है. शायद यही वजह हो कि मैं लघुकथाएं नहीं लिखता क्योंकि दो-तीन पैराग्राफ में पात्रों के साथ इतनी छूट नहीं मिल पाती है और वे कहीं न कहीं किसी वास्तविक व्यक्तित्व की छायामात्र रह जाते हैं.

लिखते समय अक्सर ही मैं एक और समस्या से दो-चार होता हूँ. यह समस्या पहले वाली समस्या से बड़ी है. वह है लेखक की सामाजिक ज़िम्मेदारी की समस्या. यह समस्या न सिर्फ कविता, कहानी में आती है बल्कि एक छोटी सी टिप्पणी लिखने में भी मुंह बाये खड़ी रहती है. यकीन मानिए, बहुत बार बहुत सी पोस्ट्स पर मैं सिर्फ इसलिए टिप्पणी नहीं छोड़ता हूँ क्योंकि मैं अपनी बात को इतनी स्पष्टता से नहीं कह पाता हूँ कि उसमें से सामाजिक ज़िम्मेदारी की अनिश्चितता का अंश पूर्णतया निकल जाए. सामाजिक ज़िम्मेदारी की बात सहमति, असहमति से अलग है. कुछ व्यक्तियों से इस विषय पर मेरी बातचीत भी हुई है कि किसी पोस्ट-विशेष पर मैंने टिप्पणी क्यों नहीं की या फिर कुछ अलग सी क्यों की. हाँ इतना ज़रूर है कि यदि कोई पोस्ट ही अपने आप में किसी महत्वपूर्ण मुद्दे को उठा रही है तो बात दूसरी है.

इस ज़िम्मेदारी का उदाहरण कई बड़े-बड़े लोगों के छोटे छोटे कृत्यों से स्पष्ट हो जाता है. कुछ लोग एक तरफ तो भगवान् राम के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगायेंगे मगर उसके साथ ही जान-बूझकर राम और सीता जी के भाई बहन होने जैसी ऊल-जलूल बातें उछल-उछलकर फैलायेंगे. कुछ लोग शायद कभी मंदिर न गए हों मगर सिर्फ दूसरे लोगों को भड़काकर मज़ा लेने के लिए देवी-देवताओं के अश्लील चित्र बार-बार बनाएं तो यह तय है कि वे जानबूझकर एक परिपक्व नागरिक की अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी से हाथ झाड़ रहे हैं.

विषय से भटकाव ज़रूरी नहीं था इसलिए मुद्दे पर वापस आते हैं. मेरे ख्याल से एक लेखक के लिए - भले ही वह सिर्फ ब्लॉग-लेखक ही क्यों न हो - लेखक होने से पहले अपने नागरिक होने की ज़िम्मेदारी को ध्यान में रखना अत्यावश्यक है.

जिस तीसरी बात का ध्यान मैं हमेशा रखता हूँ वह है विषय के प्रति ईमानदारी. यह काम मेरे लिए उतना मुश्किल नहीं है जितने कि पहले दोनों. एक आसानी तो यह है कि मैंने अंधी स्वामिभक्ति को सद्गुण नहीं बल्कि दुर्गुण ही समझा है. पहली निष्ठा सत्य के प्रति हो और निस्वार्थ हो तो आपके ज्ञानचक्षु खुले रहने की संभावना बढ़ जाती है. मुझे यह भी फायदा है कि मैं किसी एक देश, धर्म या राजनैतिक विचारधारा से बंधा हुआ नहीं हूँ. जो कहता हूँ वह करने की भी कोशिश करता हूँ तो कोई द्वंद्व पैदा ही नहीं होता. नास्तिक हूँ परन्तु नास्तिक और धर्म-विरोधी का अंतर देख सकता हूँ. मुझे दूसरों के धर्म या आस्था को गाली देने की कोई ज़रुरत नहीं लगती है. विषय के प्रति ईमानदारी के मामले में बहुत से लोग मेरे जैसे भाग्यशाली नहीं होते हैं. परिवार, जाति, देश, धर्म, लिंग, संस्कृति, भाषा, राजनैतिक स्वार्थ आदि के बंधनों से छूटना कठिन है

संक्षेप में, मेरे लेखन के तीन प्रमुख सूत्र:
1. पात्रों की गोपनीयता
2. पाठकों के प्रति संवेदनशीलता
3. विषय के प्रति ईमानदारी

क्या कहा, एक महत्वपूर्ण सूत्र छूट गया है? बताइये न वह क्या है?