Tuesday, September 27, 2011

नायकत्व क्या है - सारांश और विमर्श

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आपके सहयोग से एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूँ, नायकत्व को पहचानने का। पाँच कड़ियाँ हो चुकी हैं, पर बात अभी रहती है। भाग 1भाग 2भाग 3भाग 4;  भाग 5; ... और अब आगे:


न्यूयॉर्क में नेहरु व कास्त्रो; आज कौन कहाँ हैं? 
अपनी चार और छः वर्षीया बेटियों के साथ न्यूयोर्क नगर के एक मेट्रो स्टेशन पर खड़ा अधेड़ व्यक्ति जब निकट आती ट्रेन के आगे कुछ फ़ुट भर की दूरी से कूद गया तो लोगों के विस्मय का ठिकाना न रहा। पाँच डब्बे उसके ऊपर से गुज़र जाने के बाद ट्रेन रुकी तो लोगों ने उसकी आवाज़ सुनी, "मेरी बेटियों को बता दीजिये कि हम ठीक हैं।"

बिजली काट दी गयी और रक्षाकर्मी नीचे उतर गये। ट्रेन से चोट खाने में कुछ सेंटीमीटर ही बचे श्री वेज़्ली ऑट्री (Wesley Autrey) को सुरक्षित निकाल लिया गया। ऐंठन और चक्कर आने से बेहोश होकर ट्रेन के नीचे गिरे बीस वर्षीय युवक कैमरॉन हॉलोपीटर (Cameron Hollopeter) की जान भी बच गयी थी क्योंकि समय रहते एक साहसी नायक अपनी नन्ही बेटियों को पीछे छोड़कर अपनी जान पर खेल गया था। हमारे चहुँ ओर बिखरे अनेक नायकों की तरह वेज़्ली के उदाहरण ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया कि नायकों के लिये अवसरों की कोई कमी नही है।

उस रात अपने काम पर जाने से पहले वह 50 वर्षीय मज़दूर अस्पताल में भर्ती कैमरॉन से मिला और पत्रकारों के हुज़ूम के पूछने पर इतना ही बोला, "कोई अनोखी बात नहीं, मैंने केवल अपना कर्तव्यपालन किया है।"

निम्न सारणी में मैंने नायकों के कुछ सर्वमान्य गुण दर्शाने का प्रयास किया है। किसी विशेष क्रम में नहीं हैं। आपके सुझावों व सलाह के अनुसार यथायोग्य सुधार करता रहूँगा। देखिये और अपने विचारों से अवगत कराइये:

गुण  कुछ उदाहरण गुण विस्तार विलोम
साहस प्रत्येक नायक साहस के बिना नायकत्व ... असम्भव स्वार्थ, भय, शिथिलता
व्यक्तिगत स्वतंत्रता दैवी तंत्र में हर देवता स्वतंत्र है जबकि आसुरी/राक्षसी व्यवस्था में शक्ति का एक दमनकारी केन्द्र वैचारिक, आर्थिक, व्यक्तिगत, शैक्षणिक आदि हर प्रकार की स्वतंत्रता का सम्मान, असहमति का आदर तानाशाही, दमन, असहिष्णुता, अनुचित बलप्रयोग; जनजीवन सत्ताधीश के नियंत्रण में 
आंकलन, रणनीति, कार्य-निष्पादन प्रत्येक नायक स्थिति का सही आकलन, उसके अनुसार रणनीति का निर्माण और कार्य निष्पादन हिंसा, बाहुबल, रक्तिम क्रांति, बारूद की पूजा
धैर्य, सहनशक्ति, संयम प्रत्येक नायक जल्दी का काम शैतान का, सहज पके सो मीठा होय जल्दबाज़ी, अधीरता
निस्वार्थ भाव, उदारता, परोपकार, जनसेवा प्रत्येक नायक इदम् न मम्,
सर्वे भवंतु सुखिनः,
बहुजन हिताय बहुजन सुखाय
निहित स्वार्थ, लोभ, व्यक्तिगत लाभ की आशा
विश्वास, श्रद्धा प्रत्येक नायक काम तो होगा ही, पहली आहुति कौन दे शंका, अस्थिर मन, दुविधा
एकाग्रता प्रत्येक नायक असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥
अधूरा मन, चित्त की चंचलता, मोह, लोभ, अंतर्द्वन्द्व 
वीरता प्रत्येक नायक परशुराम से लेकर मंगल पाण्डे तक भय, स्वार्थ, मोह, कायरता, आतंक
सातत्य प्रत्येक नायक गीता के अनुसार "अभ्यास" कभी हाँ, कभी न, डांवाडोल मन
निश्चय, दृढता, संकल्प, इच्छाशक्ति, नि:शंकभाव भगवान राम, गुरु गोविन्द सिंह, शिवाजी, चन्द्रशेखर आज़ाद, भगवतीचरण वोहरा, नेताजी, एब्राहम लिंकन जनहित में जो ठान लिया वह होके रहेगा, लक्ष्यबेधन की सफलता में कोई शंका नहीं किस्म-किस्म के प्रारूप, आधा-अधूरा मन, भय से सत्ता/शक्ति/अधिकारी की बात मानना
शुचिता, पारदर्शिता, सत्य, ईमानदारी राजा हरिश्चन्द्र, विनोबा भावे, अनेक संत न झूठ की ज़रूरत न बेनामी सौदे, न विचारधारा के संकीर्ण बिन्दु, न दुराव, न छिपाव, दोस्ती, दुश्मनी सब स्पष्ट, ग्लासनोस्त  छल, सत्ता हथियाने तक विचारधारा के कलुषित पक्ष छिपाकर रखना। ऐसा एजेंडा जिसे छिपाना पड़े
सृजन, नवीनता विनोबा, गांधी, भीकाजी कामा, राधानाथ सिकदरराम चन्द्र शर्मा, बिन्देश्वर पाठक जयपुर पांव, सुलभ शौचालय, हिमालय त्रिकोणमिति सर्वेक्षण, भूदान और सविनय अवज्ञा जैसे आन्दोलन पुरानी समस्याओं का नूतन हल ढूंढने की लालसा और क्षमता के उदाहरण हैं लकीर के फ़कीर, मानसिक दिवालियापन, कट्टरपंथ
ज़िम्मेदारी का भाव, स्वीकारोक्ति रामप्रसाद बिस्मिल, राणा प्रताप, दलाई लामा अपने काम की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर, मिशन असफल होने पर ईमानदार स्वीकारोक्ति और कारण-निवारण आँकलन क्षमता का अभाव, दोषारोपण परिस्थितियों या अन्य पक्ष को; आंगन टेढा
यज्ञभाव, समन्वयीकरण, लोकतंत्र जॉर्ज वाशिंगटन, लेख वालेसा, गोर्बाचोफ़, अटल बिहारी वाजपेयी, गांधी, अन्ना हज़ारे, नाना साहेब, नेताजी मिलजुलकर विमर्श, लक्ष्य-निर्धारण, और उद्देश्य-प्राप्ति, भेद को मिटाकर साम का सम्मान, मतभेद व विविधता का आदर, व्यक्तिवाद का अभाव तानाशाही, भेद, द्वेष, अलगाववाद, विभाजन, विघटन, फिरकापरस्ती
निष्ठा, समर्पण नेताजी, शहीदत्रयी, तात्या टोपे, भरत, हनुमान, लक्ष्मण, विभीषण, मीरा, अजीमुल्ला खां छोटे उद्देश्यों के मुकाबले विस्तृत उद्देश्यों में निहित होती है, कई बार इसे ग़लती से स्वामिभक्ति समझा जा सकता है। बहसें, बाधायें, हुज्जत, हीन भावना, कुंठा, स्वामिभक्ति, व्यक्तिवाद, व्यक्तिपूजा
ज्ञान, जाँच, खोज, ज्ञानपिपासा, बहुमुखी प्रतिभा एच.एस.आर.ए. के अधिकांश क्रांतिकारी, भगवान राम, भगवान कृष्ण, ल्योंआर्दो दा विंची नायक जीवनभर सीखते-सिखाते हैं,  खुली जानकारी व्यवस्था; सत्ता की नहीं सत्य की खोज  अन्धश्रद्धा, विचारधारा/कल्ट/धर्म/जाति का परचम
शक्ति, बल, क्षमता प्रत्येक नायक सोने का दिल काफ़ी नहीं ... केवल अच्छा ही नहीं, सक्षम भी होना दौर्बल्य, अक्षमता, प्रमाद
क्षमा, वात्सल्य, प्रेम, करुणा बुद्ध, महावीर, प्रभु यीशु, मदर टेरेसा, रामानंद वसुधैव कुटुम्बकम् हिन्सा, क्रूरता, अहंकार, स्वाभिमान
निर्लिप्तता, निरपेक्षता दुर्गा भाभी, खुदीराम बासु गीता के अनुसार "वैराग्य" स्वार्थ, लोभ, अहंकार, पक्षपात
भावनात्मक परिपक्वता भारतीय ग्रंथों के अधिकांश नायक, भारतीय स्वतंत्रता सेनानी जोश नहीं होश से काम करना. भावनाओं से नहीं, विचार-विमर्श-मंत्रणा से कार्य निष्पादन, धीर, गंभीर, छवि से बेफिक्र प्रपंच, जोश में होश खो बैठना, उकसावे में आ जाना, भड़क जाना, आत्मविश्वास में कमी
त्याग, बलिदान मीरा, अरस्तू, यीशु, सीता, गुरु अर्जुन देव, रानी लक्ष्मीबाई, चाफेकर बन्धु आदि तन मन धन न्योछावर करने को तैयार, कर्मण्येवाधिकारस्ते ... स्वार्थ, लाभ-हानि का हिसाब, दूसरों से तुलना
न्यायप्रियता प्रत्येक नायक आदिशंकर और मण्डन मिश्र के शास्त्रार्थ में श्रीमती मिश्र का निर्णायक बनना महापुरुषों की न्यायप्रियता का अनूठा उदाहरण है माइट इज़ राइट; मेरा देश/धर्म/जाति/परिवार/विचार ही श्रेष्ठ; संकीर्णता, क्रूरता, मूर्खता 
मन्यु प्रत्येक नायक दधीचि से लेकर भगत सिंह तक क्रोध, आवेश, असहिष्णुता, अधैर्य, निर्बलता, संकीर्णता, क्रूरता, मूर्खता, अहंकार

हरि अनत हरि कथा अनंता!
ऐसा लगता है मानो नायकों में पवित्रता का अंश कुछ अधिक ही निखरकर आया हो। लिखने का अंत नहीं है परंतु कहीं तो रुकना ही होगा, इसलिये यहाँ इस शृंखला का समापन करता हूँ। भूल-चूक सुधारने के लिये आप पर विश्वास है। ज़रा अपने प्रिय नायक/नायिका का नाम तो बताइये और सम्भव हो तो उसे आदर करने का कारण भी।
[समाप्त]
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सम्बन्धित कड़ियाँ
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प्रेरणादायक जीवन-चरित्र
नायक किस मिट्टी से बनते हैं - 1
नायक किस मिट्टी से बनते हैं - 2
नायक किस मिट्टी से बनते हैं - 3
* नायक किस मिट्टी से बनते हैं - 4
नायक किस मिट्टी से बनते हैं - 5
डॉक्टर रैंडी पौष (Randy Pausch)
११ सितम्बर के बहाने ...

Saturday, September 24, 2011

नायक किस मिट्टी से बनते हैं - 5

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आपके सहयोग से एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूँ, नायकत्व को पहचानने का। चार कड़ियाँ हो चुकी हैं, पर बात अभी रहती है। भाग 1भाग 2भाग 3; भाग 4;  अब आगे:
लीक-लीक कायर चलैं, लीकहि चलैं कपूत
लीक छोड़ तीनौं चलैं, शायर-सिंह-सपूत॥
नायक विचारवान होते हैं, अभिनव मार्ग बनाते हैं, पुरानी समस्याओं के नूतन हल प्रस्तुत करते हैं। उनकी उपस्थिति से जड़ समाज को जागृति मिलती है। उनकी बहुत सी बातें शीशे की तरह साफ़ दिख जाती हैं परंतु बहुत से गुणों को ठीक प्रकार समझने के लिये हमें स्वयं भी थोड़ा ऊपर उठना पडेगा। याज्ञवल्क्य की वह कथा शायद आप लोगों को याद हो जब आश्रम के लिये धन की आवश्यकता पड़ने पर वे राजा जनक के दरबार में पहुँचते हैं और वहाँ चल रही शास्त्रार्थ प्रतियोगिता के विजेता को मिलने वाले स्वर्ण व गोधन साथ ले चलने का आदेश अपने शिष्यों को देते हैं। विद्वान प्रतियोगी इसे उनका अहंकार जानकर पूछते हैं कि क्या वे अपने को वहाँ उपस्थित सभी प्रतियोगियों से बेहतर समझते हैं, तब वे इसे विनम्रता से नकारते हुए कहते हैं कि उनके आश्रम को गायों की आवश्यकता है। उस प्रतियोगिता में उपस्थित अधिकांश विद्वज्जन इसे उनका अभिमान और हेकड़ी मान कर शास्त्रार्थ के लिये ललकारते हैं और अंततः याज्ञवल्क्य विजयी होकर सारी गायें अपने आश्रम ले जाते हैं।

इस सामान्य सी दिखने वाली कहानी को प्रतियोगी विद्वज्जनों की नज़र से बाहर आकर एक भिन्न दृष्टि से देखें तो दिखता है कि याज्ञवल्क्य को सम्मान पाने या प्रतियोगिता में अपने को सिद्ध करने में कोई रुचि नहीं थी। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सलाहकार डॉ वेन डायर इस प्रवृत्ति को "दूसरों की बनाई छवि से मुक्ति" कहते हैं। याज्ञवल्क्य की रुचि स्वर्ण या गोधन में भी नहीं थी परंतु वह उस समय एक आदर्श उद्देश्य की आवश्यकता थी, ठीक वैसे ही जैसे गंगा को गोमुख से गंगासागर तक लाना भागीरथ के लिये। याज्ञवल्क्य को न केवल अपनी क्षमता का बल्कि सभा के अन्य प्रतियोगियों की योग्यता का भी सही आँकलन था। अपनी विजय का विश्वास ही नहीं बल्कि ज्ञान होते हुए भी उन्होंने बहस में दूसरों को हराने से बचने का प्रयास किया और चुनौती दिए जाने पर भी अपनी योग्यता का ढिंढोरा पीटने के बजाय "आवश्यकता" की विनम्र बात की। इसके विपरीत उनके प्रतिद्वन्द्वी प्रतियोगी उनकी सदाशयता, सदुद्देश्य, विनम्रता, आँकलन क्षमता को न देख सके और उनमें उस स्वार्थ और अहंकार को देखते रहे जो याज्ञवल्क्य में नहीं बल्कि स्वयं उनमें उछालें ले रहा था। देखने वाली नज़र न हो तो सरलता भी अहंकार ही लगती है और इस प्रकार हमारी नज़र धुन्धली हो जाती है।
वृक्ष कबहुँ नहि फल भखे, नदी न संचै नीर।
परमारथ के कारन, साधुन धरा शरीर।। ~ संत कबीरदास
निर्लिप्तता और सर्वस्व त्याग तो नायकों का नैसर्गिक गुण है। मानव शवों की प्रसिद्ध "बॉडीज़" प्रदर्शनी के पिट्सबर्ग आने की बात पर स्थानीय अजायबघर के एक कर्मचारी को जब यह पता लगा कि मृतकों के शव चीन सरकार द्वारा अनैतिक रूप से अधिगृहीत किये गये हैं तो उन्होंने इसका विरोध किया। कानूनी बहस शुरू होने पर यह सिद्ध हुआ कि कि यदि अधिग्रहण के देश (चीन) के कानून का पालन किया गया है तो फिर यह शव अधिग्रहण अमेरिका में भी कानूनी ही माना जायेगा। प्रदर्शनी नहीं रुकी परंतु उस कर्मचारी ने "एक अनैतिक कार्य" का भाग बनने के बजाय नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। दूसरी ओर पशुप्रेम पर भाषण देने वाले एक ब्लॉग परिचित ने किस्सा लिखा जिसमें अपने एक क्लाइंट की निन्दा करते हुए उन्होंने उसके घर में होने वाले पशु-अत्याचार का ज़िक्र किया। मज़े की बात यह है कि वहाँ रहते हुये उन्होंने न तो अपने क्लाइंट से इस बारे में कोई बात की और न ही उनके दिमाग़ में एक बार भी उस कॉंट्रैक्ट को छोड़ने का विचार आया। सत्पुरुष इस प्रकार का दोहरा व्यवहार नहीं करते। वे मन-वचन-कर्म से ईमानदार और पारदर्शी होते हैं और निहित स्वार्थ और प्रलोभनों से विचलित नहीं होते। धन, लाभ, व्यक्तिगत स्वार्थ, और दूसरों की कीमत पर अपना उत्थान उनकी प्रेरणा कभी नहीं हो सकते। बात चाहे पशु-प्रेम की हो, बाल-श्रम की, नागरिक समानता की या नारी-अधिकारों की, नायकों का क्षेत्र सीमित या विस्तृत कैसा भी हो सकता है परंतु उनकी दृष्टि सदा उदात्त ही रहती है, कभी संकीर्ण नहीं होती।

प्रलोभन की तलवार दुधारी होती है। कई बार वह कुविचार की प्रेरणा बनता है और कई बार सत्कर्म में बाधा। लिखना, बोलना, उपदेश देना आसान होगा पर सत्पथ पर चलना "इदम् न मम्" के बिना शायद ही सम्भव हुआ हो।

साहस, धैर्य और सहनशीलता के बिना कैसा नायक? राणा प्रताप घास की रोटी खाकर लड़े, गुरु अर्जुन देव को भूखा प्यासा रखकर खौलते पानी, सुलगते लोहे और जलती रेत में डाला गया, प्रभु यीशु को चोरों और अपराधियों के साथ क्रॉस पर टांगा गया, मीरा को विष दिया गया मगर इनको इनके पथ से डिगाया न जा सका। नायक मानवमात्र की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के जीते-जागते प्रतिमान होते हैं। मानव मन की स्वतंत्रता और सम्मान में उनका दृढ विश्वास रहता है।

ग़रीबनवाज़ भगवान की भक्तवत्सलता से नायकों ने शरणागत-रक्षा का गुण अपनाया है। वे सबको अपनाते हैं। बुद्ध ने अंगुलिमाल को अपनाया। कभी मानव-उंगलियों का हार पहनने वाला दानव अहिंसा का ऐसा पुजारी बना कि पत्थरों से चूर होकर जान दे दी परंतु उफ़ नहीं की। न क्षोभ हुआ न हाथ उठाया। चाणक्य ने शत्रुपक्ष के राक्षस को उसकी योग्यता के अनुरूप सम्मान और ज़िम्मेदारी सौंपी। मुझे तो द्वेष से मुक्ति भी नायकत्व की एक अनिवार्य शर्त लगती है। गीता में इसी गुण को अद्रोह कहा गया है।

सामान्य दुर्गुणों यथा काम, क्रोध, लोभ, लोभ और मोह आदि को तो हम सभी आसानी से पहचान सकते हैं परंतु उनके अलावा भी अनेक दुर्गुण ऐसे हैं जिनको त्यागे बिना नायकत्व की कल्पना नहीं की जा सकती है। क्रूरता, सत्तारोहण की इच्छा, तानाशाही, अहंकार, दोषारोपण, कुंठा, हीन भावना, आहत होने का स्वभाव, अन्ध-स्वामिभक्ति आदि ऐसे ही दुर्गुण हैं।
[क्रमशः] [अगली कड़ी में सम्पन्न]
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सम्बन्धित कड़ियाँ
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प्रेरणादायक जीवन-चरित्र
नायक किस मिट्टी से बनते हैं - 1
नायक किस मिट्टी से बनते हैं - 2
नायक किस मिट्टी से बनते हैं - 3
* नायक किस मिट्टी से बनते हैं - 4
डॉक्टर रैंडी पौष (Randy Pausch)
महानता के मानक (प्रवीण पाण्डेय)
मैं कोई सांख्यिकीय नहीं हूं! (देवदत्त पटनायक)

ओसामा जी से हैलोवीन तलक - सैय्यद चाभीरमानी

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सैय्यद चाभीरमानी के परिचय की आवश्यकता नहीं है। आप उनसे पहले भी मिल चुके हैं। मैं तो उनकी बातों से इतना पक चुका हूँ कि घर से बाहर निकलने से पहले चुपचाप इधर-उधर झांक कर इत्मीनान कर लेता हूँ कि वे मेरी ताक में बाहर तो नहीं खडे हैं। हमने तो उनके डर से सुबह की सैर पर जाना भी बन्द कर दिया। उसके बाद वे शाम की चाय पे हमारे घर आने लगे तो आखिरकार हम घर बेच के शहर के बाहर चले गये। लेकिन जब भाग्य खराब हो तो सारी सतर्कता धरी की धरी रह जाती है। अपनी माँ के जन्मदिन पर बच्चों ने ज़िद की अपनी माँ के लिये कुछ उपहार खुद चुनकर लायेंगे तो उनकी ज़िद पर हम चल दिये नगर के सबसे बडे मॉल में। बच्चे मूर्तिकला और हस्तशिल्प खण्ड में खोजबीन करने में लग गये तभी अचानक एक भारी-भरकम मूर्ति हमारे ऊपर गिरी। हम भी चौकन्ने थे सो हमने अपना कंधा टूटने से पहले ही मूर्ति को पकडकर रोक लिया। यह क्या, मूर्ति तो "भाईजान, भाईजान" चिल्लाने लगी। देखा तो सैय्यद सामने मौजूद थे। दाढी तो उन्होंने पाकिस्तान छोड़ते ही कटा ली थी। इस बार मूंछ भी गायब थी।

इससे पहले कि वे हमें बोर करें इस बार हमने आक्रामक नीति अपना ली जिससे वे खुद ही बोर होकर निकल लें और हमें बख्श दें।

"मूंछ क्या हुई? क्या भाभी ने उखाड़ दी गुस्से में?"

"उसकी यह मज़ाल, काट नहीं डालूंगा उसे।"

"इत्ता आसान है क्या? पकडे नहीं जाओगे? कानून का कोई खौफ़ है कि नहीं?"

"क्यों दुखती रग़ पर हाथ रख रहे हो? पुराना टाइम होता तो पाकिस्तान ले जाकर काट देता। अब तो वहाँ भी पहुँच गये ये जान के दुश्मन। ओसामा जी को समन्दर में दफ़ना दिया। मगर एक बात बडे मज़े की पता लगी मियाँ ..."

"क्या?"

"येई कि तुमारे हिन्दुस्तान में भी एक शेर मौज़ूद है अभी भी।"

"एक? अजी हिन्दुस्तान तो शेरो-शायरी की जन्नत हैं, असंख्य शायर हैं वहाँ।"

"अमाँ, जेई बात खराब लगती है आपकी हमें, हर बात का उल्टा मतलब निकाल्लेते हो। हम बात कर रहे हैं, शेर जैसे बहादुर आदमी की।"

"अच्छा, अच्छा! अन्ना हज़ारे की खबर पहुँच गयी तुम तक?"

"हज़ार नहीं, एक की बात कर रहे हैं हम, अरे वोई जिसको जूते मारने की कै रहे थे कुछ हिन्दुत्वा वाले, विग्दीजे सींग टाइप कोई नाम था उसका। लगता चुगद सा है मगर बात बडी हिम्मत की कर रिया था।"

जब तक हम पूछ्ते कि सैयद किसके सींग की बात कर रहे हैं, वे खुद ही ऐसे ग़ायब हुए जैसे गधे के सिर से सींग। हमने भी भगवान का धन्यवाद दिया कि बला टली।

आगे चलते हुए जब स्टोर के हैलोवीन खण्ड पहुँचे तो सैयद से फ़िर मुलाक़ात हो गयी। इस बार वे एक यांत्रिक दानव को बड़े ग़ौर से देख रहे थे। जैसी कि अपनी आदत है मैने भी चुटकी ली, "लड़का ढूंढ रहे हैं क्या भाभीजान के लिये?"

हमेशा की तरह कहने के बाद लगा कि शायद नहीं कहना चाहिये था पर ज़बान का तीर कोई ब्लॉग-पोस्ट तो है नहीं कि छोड़ने के बाद हवा में ही दिशा बदल डालो। सैयद ने अपनी चारों आंखें हम पर गढाईं। हम कुछ असहज हुए। फिर अचानक से वे ठठाकर हँस पड़े और बोले, "अरे मैं न पडता इन झमेलों में। 20 खरीदने पडेंगे।"

"बीस क्यों भई?" अब चौंकने की बारी हमारी थी, "भाभी तो एक ही हैं?"

"तुम्हें पता ही नहीं, अपनी चार बीवियाँ हैं। एक यहाँ है, बड़ी तीन पाकिस्तान में ही रहती हैं।"

"तो भी चार ही हुए न?" यह नया पाकिस्तानी गणित हमें समझ नहीं आया।

"हरेक की चार माँ भी तो हैं, 16 उनके लिये 16 जमा 4, कुल बीस हुए कि नहीं?"

हम कुछ समझते इससे पहले ही सैयद चाभीरमानी फिर से ग़ायब हो चुके थे।
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सम्बन्धित कड़ियाँ
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* सैय्यद चाभीरमानी और हिंदुत्वा एजेंडा
* सैय्यद चाभीरमानी और शाहरुख़ खान

Friday, September 23, 2011

क्षमा वीरस्य भूषणम् -एक पत्रोत्तर के बहाने ...

कितना ढूंढा हाथ न आया सच का एक क़तरा भी
कहने को उनके खत में बहुत कुछ लिखा था
भारतीय समाज में अनेक खूबियाँ हैं। कुछ अच्छी बातें तो सभी धर्मों में नायकों, संतों और उपदेशकों द्वारा कही और सही गयी हैं। बहुत सी भारतीय संस्कृति की अपनी अनूठी विशेषतायें हैं। लेकिन कई ऐसी भी हैं जिनमें भिन्न उद्गमों से आये विचार गड्डमड्ड से हो गये हैं और इस प्रक्रिया में सद्विचार की मूलभावना की ऐसी-तैसी हो गयी है। बहसबाज़ी के प्रति मेरी स्पष्ट नापसन्द होते हुए भी कई बार यह "ऐसी-तैसी" मुझे भीड़ की मुखालफ़त करने को मजबूर करती है। इसी परम्परा में आज सत्यवादिता और क्षमा पर दो शब्द कहने को बाध्य हुआ हूँ। सत्य पर जहाँ-तहाँ टिप्पणियों या कविताओं के बीच बात होती रही। क्षमा पर काफ़ी पहले एक लघु-आलेख "छोटन को उत्पात" लिख चुका हूँ। मगर अपनी भाषा को लेकर खबरों में बने रहने वाले एक ब्लॉग पर आज मेरा नाम लेकर लिखे गये एक पत्र देखकर इस विषय पर ऐसा कुछ कहना ज़रूरी सा हो गया है जिससे मैं अब तक बचना चाह रहा था। कुछ ज़रूरी यात्राओं पर हूँ। लेकिन फिर भी अपने व्यक्तिगत समय को निचोड़कर आपसे बात करने बैठा हूँ। पत्र तो एक बहाना है क्योंकि पत्रलेखक को तो बस अपनी बात कहनी थी। इस नाते मुझे उत्तर देने की कोई बाध्यता नहीं थी लेकिन मुझ पर विश्वास करने वाले अपने मित्रों और पाठकों के प्रति आदर व्यक्त करने के लिये मैं पत्र में वर्णित बेतुके और झूठे आरोपों के कारण एक बार यहाँ पर अपना उत्तर लिखना एक आवश्यकता और अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझता हूँ।

सत्यवादिता का दावा बहुत से लोग करते दिखते हैं। "हम तो खरी कहते हैं", "बिना लाग लपेट के बोलते हैं", और "सच तो कड़वा ही होता है" जैसे वाक्यों का उद्घोष अक्सर सुनाई देता है। सत्यवादिता का झूठा दावा करने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि सत्यनिष्ठा सत्य कहने से ज़्यादा सत्य सुनने, सोचने और करने में निहित है। अधिकांश लोग कड़वा इसलिये नहीं बोलते क्योंकि वही सच है बल्कि इसलिये बोलते हैं क्योंकि "सच" का उतना कड़वा भाग ही उस समय के उनके निहित स्वार्थ की सिद्धि में सहायक होता है। सच का ऐसा वीभत्स परचम लहराने वाले अक्सर अन्य समयों पर जाने-अनजाने ही सत्य की हत्या सी करते रहते हैं। सत्यनिष्ठ बनना है तो हमें पहले तो सत्य को बेहतर समझने की शक्ति विकसित करनी पड़ेगी और साथ ही कड़वा कहने की तरह ही सत्य सुनना भी सीखना पड़ेगा।

क्षमा वीरों का आभूषण है। वीर अत्याचार नहीं करते, ग़लतियों से बचते हैं परंतु जहाँ आवश्यक है वहाँ क्षमा मांगने में संकोच नहीं करते। इसके उलट प्रकृति के लोग अपनी हर बेवकूफ़ी को झूठ, उद्दंडता और शेखी से ढंकने और लीपापोती में ही लगे रहते हैं। वीर के लिये अपनी ग़लतियों की क्षमा मांगना जैसा नैसर्गिक और सहज है क्षमादान वैसी सामान्य घटना नहीं है क्योंकि वीरों के लिये क्षमा ऐसा भूषण है जिसको कागज़ के टुकडों जैसे बांटते नहीं फ़िरा जा सकता है। ऐसा भी हुआ है कि किसी ज़िद्दी बच्चे ने हर बार खुद ही ग़लती करके और फ़िर हल्ला मचाकर ज़बर्दस्ती दसरों से माफ़ी मंगवाने की कोशिश की है। भारतीय परिवेश में ऐसा भी देखा गया है जब उस ज़िद्दी बच्चे के माँ-बाप-भाई-बहिन-मित्रों ने दूसरे पक्ष को यह कहकर कन्विंस करने का प्रयास किया है कि, "यह तो पागल है, आप ही मान जाओ।" भले लोग अक्सर इस झांसे में आ जाते हैं पर यह नहीं समझते कि अनुचित माफ़ीनामों की मुण्डमाल अपने गले में लटकाये ये दबंग/बुली बच्चे ही आगे बढ़कर अपनी अनुचित मांग पर समर्पण न करने वाली लड़कियों के चेहरे पर तेज़ाब फ़ेंकने की हद तक पहुँच जाते हैं।

इंसान ग़लतियों का पुतला है। मेरे जीवन में भी ग़लतियाँ हुई हैं। मैंने उन्हें पहचानकर सुधारने का प्रयास किया है और जहाँ आवश्यकता हुयी, क्षमा भी मांगी है। लेकिन बचपन में भी ऐसे उद्दंड बुलीज़ की ज़िद पर अनैतिक समर्पण करने के बजाय उनके माताओं-पिताओं को उनकी ग़लती के लिये आगाह किया है।

जिस पत्र का ज़िक्र ऊपर है वह मैंने आज दिव्या के "ज़ीलज़ेन" ब्लॉग पर अपने नाम लिखा देखा है। टेक्स्ट निम्न है:
अनुराग जी ,
आप मेरे अपनों को मुझसे तोड़कर मुझे कमज़ोर करना चाहते हो । सभी को अपने साथ मिला लेना चाहते हो। सबको मेल लिख-लिख कर और फोन करके तथा उनके घर जाकर उन्हें अपना बनाना चाहते हो? कोई बात नहीं। ईश्वर आपको इतनी शक्ति दे की आप सभी से प्रेम कर सको। दिव्या से नफरत निभाने के फेर में आपने कुछ लोगों के साथ मित्रता करने की सोची, यही ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी उपलब्धि समझूंगी।
मुझे तो अकेले ही चलने की आदत है। बस कुछ के साथ आत्माओं का मिलन हो चुका है, वहां फोन आदि की ज़रुरत नहीं पड़ती है। मेरे दुःख में वे रो पड़ते हैं और मुझे खुश देखकर भी उनकी आँखें छलछला पड़तीं हैं।
किसी को फोन कर सकूँ इतना पैसा ही नहीं है मेरे पास। नौकरी नहीं करती हूँ न इसीलिए सरकारी फोन जो मुफ्त में मिलता है बड़े ओहदे वालों को, वह भी सुविधा नहीं है मेरे पास। और फिर सबसे बड़ी मुश्किल तो यह है की मैं 'स्त्री' हूँ । किसी को फोन करुँगी तो वह एक अलग ही समस्या खड़ी कर देगा। लेकिन मेरे पास स्पष्टवादिता और पारदर्शिता है। वही मेरी ताकत है, और वही मेरा गहना।
आपने मुझे 'schizophrenic' और 'paranoid' कहा, फिर भी जाइए आपको माफ़ किया !
Zeal
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ज़ीलज़ेन दिव्या को मेरा उत्तर:

आश्चर्य है कि एक तरफ आप मुझे माफी देने की बात कर रही हैं साथ ही उसी प्रविष्टि में मुझे संबोधित पत्र से ठीक ऊपर समाज की तमाम स्त्रियों की दुर्दशा के लिए मुझे ज़िम्मेदार ठहराते हुए आप आदरणीय भोला जी को मुझे कभी माफ़ न करने की सलाह भी दे रही हैं:
यदि मैं आपकी जगह होती तो बेटी का अपमान करने वाले को कभी माफ़ न करती। इन्हें माफ़ कर दिया जाता है इसीलिए समाज में स्त्रियों की दुर्दशा है।
मुझे यह स्पष्ट नहीं हुआ कि आपकी इन दो परस्पर विरोधाभासी बातों में से कौन सी बात सही है। वैसे भी, इस पत्र में कहे गये शब्दों के बारे में आप कितनी गम्भीर हैं यह इस पोस्ट से नहीं ज़ीलज़ेन पर इसके बाद आने वाली प्रविष्टियों से पता लगेगा।

आपने मुझे माफ़ किया? किस ज़ुर्म के लिये? जी नहीं, ग़लती आपकी है तो माफ़ी भी आप पर ही उधार रहती है, और आपको ही मांगनी चाहिये - मुझसे ही नहीं उन सभी से जिनपर आपने झूठे लांछन लगाये हैं या समय-असमय हैरास या बुली किया है। एक माफ़ी विशेषकर स्वर्गीय डॉ. अमर कुमार से मांगने को बकाया है जिन पर आपने लम्बे समय तक हैरास करने का आरोप लगाया, बैन किया और उनके भयंकर पीड़ा से जूझते हुए होने पर भी उन्हें आपके ब्लॉग पर की गयी अपनी बीसियों टिप्पणियाँ हटाने को बाध्य किया। लगे हाथ एक माफ़ी अपने पितातुल्य भोला जी से भी मांग लीजिये जिनके व्यक्तिगत पत्र को अपने ब्लॉग पर रखकर आपने एक भोले पिता के साथ भयंकर विश्वासघात किया है।

दूसरी बात यह कि मुझे क्षमा करने का अधिकार आपको दिया किसने? सच्चे-झूठे आरोप लगाने वालों को सज़ा या माफ़ी का अधिकार होता तो अदालतों में जजों की आवश्यकता ही न होती और क्षमादान की अर्ज़ी बड़ी अदालतों और राष्ट्रपति आदि के पास न जाकर मुहल्लों (आजकल कतिपय ब्लॉग्स पर भी) के अन्धेरे कोनों में अपनी गुंडागर्दी के क़सीदे पढ रहे भर्हासियों के पास जाया करतीं। कुछ असभ्य समाजों में शायद ऐसा सही भी समझा जाता हो, परंतु मैं ऐसी असभ्यता को सिरे से अस्वीकार करने वालों में से हूँ। पहले आपने समय-समय पर अनेक ब्लॉगरों को अपशब्द कहे, फिर शिष्ट भाषा में लिखी मेरी हालिया टिप्पणी को बदबूदार कहा और मुझे अपशब्द कहे। उसके बाद मेरे ब्लॉग पर रखे एक व्यंग्य को अपना अपमान बताकर स्वयं और कुछ अन्य व्यक्तियों द्वारा अपने ब्लॉग पर पुनः अपशब्द कहे गये और भोले भाले पाठकों की भावनाओं को भड़काया गया। ... और अब पत्र के नाम पर एक नया ड्रामा?

मुझे इस विषय में आप से बात करने की कोई इच्छा नहीं है। फिर भी यदि आप इस मामले को आगे बढाना ही चाहती हैं तो आपके ब्लॉग पर रखी माता-पिताओं की लम्बी सूची में से किसी ज़िम्मेदार और समझदार व्यक्ति को या फ़िर अपने वकील को मुझे सम्पर्क करने को कहें। अन्यथा, आप अपनी ओर से सीधे मुझे सम्बोधित करके कुछ भी कहने से बचें, यही हम सबके लिये ठीक होगा।
मैंने किसी भी पोस्ट या टिप्पणी में आपको 'schizophrenic' और 'paranoid' नहीं कहा है। व्यंग्य, कल्पना और वास्तविकता के अंतर को पहचानिए और मुझपर बिला वजह के दोषारोपण से बचिए।
आपकी एक पिछली पोस्ट में आपने "अपने" ईश्वर द्वारा मुझे शीघ्र ही सज़ा देने का आह्वान किया गया था उसके साथ आपके इस पत्र में व्यक्त मुझे शक्ति देने की प्रार्थना कुछ ठीक बैठ नहीं रही है, कृपया अपने विचारों को थोड़ा ठोंक बजा लें। अनेक लोगों के खिलाफ़ अंट-शंट लिखने के बाद आपने मेरे खिलाफ़ ऊल-जलूल आलेख और टिप्पणियाँ लिखीं तो सब ठीक था और मेरा एक जनरल व्यंग्य पढते ही दुनिया इतनी उलट-पुलट हो गयी कि आपके "प्राइवेट" ईश्वर को दखल देने की आवश्यकता पड़ गयी? आपने इससे पिछली पोस्ट में भी यह आरोप लगाया कि मैं आपके खिलाफ़ षडयंत्र करके आपके मित्रों को अपने खेमे में ले जा रहा हूँ। याद दिला दूँ कि मैं एक व्यस्त व्यक्ति हूँ, मुझे आपके खिलाफ़ षडयंत्र करने की फ़ुर्सत नहीं है क्योंकि यह ब्रह्माण्ड आपका चक्कर नहीं लगाता है। और भी ग़म हैं ज़माने में ...। मैं क्या करता हूँ, यह जानना ही चाहती हैं तो मेरा ब्लॉग ध्यान से पढिये, मेरी आवाज़ में विनोबा भावे के शब्द सुनिये और अगर कुछ हल्का-फुल्का चाहिये तो मेरी पढ़ी हुई कहानियाँ सुनिये। संसार बहुत बड़ा है और इसमें आप और आपके ब्लॉग के आरोप-प्रत्यारोपों के अलावा भी बहुत कुछ है। मसलन, यदि कोई सत्य का दूसरा पहलू जानने को उत्सुक हो तो, गिरिजेश राव की हालिया प्रविष्टि हौं प्रसिद्ध पातकी भी पढी जा सकती है, आँखें खोलने वाली है। वैसे बात माफ़ी की चल रही है तो यह भी याद दिला दूँ कि आपके ब्लॉग पर जिस प्रकार डॉ. अजित गुप्ता जी का नाम माँ की सूची में लिखने के बावजूद तथाकथित भाइयों से उनका अपमान करवाया गया वह दुर्व्यवहार काफ़ी असभ्य और गरिमाहीन था।
माँ शब्द की गरिमा बनाये रखने के लिये यदि आपके ब्लॉग पर अपनी सभ्यता के नमूने दिखाते ये भाई उसी ब्लॉग पर अपनी माँ से लिखित में माफ़ी मांगेंगे तब आपकी उस कागज़ी सूची में कुछ दम अवश्य दिखेगा वरना शब्दों का क्या है, रबड की ज़ुबान और प्लास्टिक के कीबोर्ड का क्या भरोसा ...
और जहाँ तक लोगों से मिलने की बात है, मैं किससे मिलता हूँ, कहाँ जाता हूँ, इसका अधिकार आपने कब से ले लिया? किस नाते से? ज़रूरत नहीं है फिर भी इतना स्पष्ट कर दूँ कि आपकी सूची के जिन लोगों को छीन लेने का आरोप आप लगा रही हैं मैंने उनकी पहल का मित्रवत उत्तर दिया है जो कि एक सभ्य और सहृदय व्यक्ति से अपेक्षित है। यदि आपको यह लगता है कि आपके लम्बे समय के मित्र, भाई और पिता मेरी एक बात से आपका पक्ष छोड़कर मेरी ओर आ गये हैं तो क्या इससे आपको अपने और मेरे विषय में कुछ अंतर पता नहीं लगा? अपने भाइयों और पिताओं की निर्णय-क्षमता पर विश्वास करके उन्हें सम्मान देना सीखिये, सूचियाँ तो धोबी को देने वाले कपड़ों की भी बनती हैं। आपको भले ही न हो पर मुझे यक़ीन है कि ऐसे लोग आपका भला चाहते हैं न कि वे लोग जो झूठी वाहवाहियाँ लिखकर आपको चने के झाड़ पर चढाते रहे हैं। आपके सच्चे शुभचिंतकों को मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनायें!

ज़ीलज़ेन पर वह तथाकथित बदबूदार टिप्पणी
बदबूदार टिप्पणी का सुगन्धित जवाब
ज़ीलज़ेन के प्रकरण पर यह मेरी इकलौती पोस्ट है। इस मुद्दे को यहीं समाप्त करते हुए जागरूक मित्रों का हार्दिक धन्यवाद अवश्य देना चाहूँगा। सतह से नीचे जाकर सत्य को पहचानना और सत्य के लिये खड़े होना आज भी उतना ही ज़रूरी है। यदि उन व्यक्तिगत पोस्ट्स को भुला भी दिया जाए जिनमें दिव्या ने कुछ ब्लॉगरों की व्यक्तिगत ईमेल और स्वास्थ्य संबंधी गुप्त जानकारियों को ज़ीलज़ेन ब्लॉग पर लहराया था तो भी याद रहे, बीते कल में श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय जी और डॉ. कुमार की बारी थी, आज अजित जी, शिल्पा मेहता और मेरी है, कल आपकी भी हो सकती है, शायद होगी ही।

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सम्बंधित कड़ियाँ
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* हौं प्रसिद्ध पातकी
* 'ओढ़नीया ब्लॉगिंग' चालू आहे ...
* सबका कारण एक है!
* अब कुपोस्ट से आगे क्या?
* सत्यमेव जयते - कविता
* नानृतम् - कविता
* सत्य के टुकड़े - कविता
* छोटन को उत्पात
* हमें तुम रोको मत पथ में
* उपेक्षा नहीं, प्रेम और सहानुभूति
* ए ब्यूटिफ़ुल माइन्ड
* टसुए बहाने का हुनर...

Sunday, September 18, 2011

नायक किस मिट्टी से बनते हैं - 4

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आपके सहयोग से एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूँ, नायकत्व को पहचानने का। तीन कड़ियाँ हो चुकी हैं, पर बात अभी रहती है। भाग 1; भाग 2; भाग 3; अब आगे:

वीरांगना दुर्गा भाभी
नायकों को सुपर ह्यूमन दर्शाना मेरा उद्देश्य नहीं है। वे भी हमारे-आपके बीच से ही आते हैं लेकिन कुछ अंतर के साथ। जैसा कि हमने पहले देखा कि वे अपनी नहीं दूसरों की सोचते हैं। कार्य कितना भी कठिन हो वे अपनी सोच को कार्यरूप करने का साहस रखते हैं और बाधा कैसी भी आयें, सफल कार्य-निष्पादन की क्षमता और कुशलता रखते हैं। और यह सब काम वे सबको साथ लेकर करते हैं। नायक स्पूनफ़ीड नहीं करते बल्कि समाज को सक्षम बनाते हैं। वे विघ्नसंतोषी नहीं बल्कि सृजनकारी होते हैं। वे न्यायप्रिय होते हैं और सत्यनिष्ठा को अन्य निष्ठाओं के ऊपर रखते हैं। इन सबके साथ उनका चरित्र पारदर्शी होता है क्योंकि वे मन-वचन-कर्म से ईमानदार होते हैं। जो होते हैं, वही दिखते हैं, वही कहते हैं, वही करते हैं। उनका उद्देश्य सत्तारोहण नहीं बल्कि जनसेवा होता है। वे समाज पर अपनी विचारधारा और तानाशाही थोपते नहीं। खलनायकों को उनके चमचे भले ही विश्व का सबसे बड़ा विचारक बताते हों, नायकों का सम्मान जनता स्वयं करती है क्योंकि वे जनसामान्य के सपनों को साकार करने की राह बनाते हैं।
सूरा सोहि सराहिये जो लड़े दीन के हेत, पुरजा-पुरजा कट मरे तऊँ न छाँड़े खेत ~संत कबीर

रानी लक्ष्मीबाई (ब्रिटिश लाइब्रेरी)
झांसी की रानी अबला नहीं थीं। आज़ाद हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठे। भारत के अधिसंख्य क्रांतिकारियों ने जीवन के तीन दशक भी नहीं छुए। हम सब जीवन भर सीखते हैं, फिर भी सर्वस्व न्योछावर करना नहीं सीख पाते। कुछ लोग तो मानो बात-बात पर आहत होने, शिकायत करने की कसम ही खाकर बैठे होते हैं। नायक घुलने वाली मिट्टी के नहीं बनते। वे अपने साथ दूसरों के जीवन को भी आकार देते हैं।  उम्र के साथ हम सभी के अनुभव बढते हैं, परंतु नायक ज्ञानपिपासु होते हैं। ज्ञान महत्वपूर्ण है इसलिये बहुत कुछ जानते हुए भी नायक जीवन भर सीखते हैं। वे हमसे बेहतर सीखते हैं क्योंकि वे परस्पर विरोधी विचारधाराओं में से भी जनोपयोगी बिन्दु चुन पाते हैं। उनके साहस और उदारता जैसे गुण उनसे असम्भव कार्य निष्पादित करा पाते हैं। साहस को पूर्ण करने के लिये नायकों के पास धैर्य भी बहुतायत में होता है और उन्हें इन गुणों का संतुलन भी आता है। नायकों की आँकलन क्षमता उनकी एक विशेषता है। वे अपनी क्षमता का सही आँकलन कर पाते हैं और साथ ही अपने सामने रखी चुनौतियों का भी। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ नायक के कर्म का फल उसके जीवनकाल में समाज को नहीं मिल पाता है। इससे उनका आँकलन ग़लत सिद्ध नहीं होता। वे जानते हैं कि कार्यसिद्धि में समय लगेगा परंतु यदि वे आरम्भिक आहुति न दें तो शायद वह कार्य असम्भव ही रह जाये। कुल मिलाकर नायक असम्भव को सम्भव बनाने की प्रक्रिया जानते हैं।
अष्टादशपुराणानां सारं व्यासेन कीर्तितम् परोपकार: पुण्याय पापाय परपीड़नम्।।
(परोपकार पुण्य है और परपीड़ा पाप है)

कठिन समय = नायक की पहचान
कठिन समय नायक उत्पन्न तो नहीं करता परंतु कठिन समय में एक नायक की परीक्षा आसानी से हो जाती है। भारत का स्वाधीनता संग्राम हो, विभाजन या देश पर कम्युनिस्ट चीन का अक्रमण, जीवन में कठिन समय आते ही हैं। सभ्य समाज को खलनायक अपना ऐसा निकृष्टतम रूप दिखाते हैं कि आम आदमी बेबसी महसूस करता है। ऐसे समय पर नायकों की पहचान आसानी से हो जाती है। जिनकी तैयारी है, जो सक्षम भी हैं और इच्छुक भी, वे ऐसे समय पर स्वतः ही आगे आ जाते हैं। इसके अतिरिक्त, कई बार ऐसे अवसर भी आते हैं जब नायक अपना समय चुनते हैं। वे धैर्य और संयम के साथ सही समय की प्रतीक्षा करते हैं। वे जोश से नहीं होश से संचालित होते हैं। नायक प्रकाश-दाता भी हैं और पथ-निर्माता भी। नायकों के विभिन्न स्तर हो सकते हैं और नायकों के अपने नायक भी होते हैं। हम चाहें तो उनकी इस व्यक्तिगत रुचि में उनसे असहमत भी हो सकते हैं। रामायण से उदाहरण लें तो हनुमान जी अपने आप में एक नायक भी हैं पर उनके नायक श्रीराम हैं। इसी प्रकार गांधी को नायक न मानने वाला कोई व्यक्ति विनोबा भावे या नेताजी सुभाष को अपना नायक मानता रह सकता है, भले ही वे दोनों ही गांधीजी को जीवनपर्यंत अपना नायक मानते रहे।

विद्या विवादाय धनं मदाय शक्ति: परेषां परिपीडनाय खलस्य साधोर्विपरीतमेतज्ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय।।
(साधु का ज्ञान, धन व शक्ति जनसामान्य के विकास, समृद्धि व रक्षा के लिये होती है)

जगप्रसिद्ध जननायक महात्मा गांधी
जहाँ खलनायकों के बहुत से गुण आनुवंशिक हो सकते हैं वहीं नायकों के गुणों के पीछे अभी तक ऐसी कोई जानकारी नहीं है। तो भी स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन हमें अपनी छोटी-मोटी चिंताओं से ऊपर उठने का अवसर देता है। जो व्यक्ति हर बात को अपने ऊपर आक्षेप समझेगा, जिसकी दुनिया "मैं" से आगे नहीं हो वह एक साधारण मानव भी बन पाये तो ग़नीमत है। नायक जन-गण के हित के बारे में सोचते हैं । पिछली कडी में हमने देखा कि जब नेताजी अपनी बेटी को छोडकर गये तब वह मात्र चार सप्ताह की थी। अनिता ने अपने पिता को नहीं देखा लेकिन उन्होंने अपने को भाग्यशाली बताते हुए अन्य भारतीयों की पीडा को बड़ा बताया। भगत सिंह के परिवार में उनसे पहले कई क्रांतिकारी हो चुके थे। चन्द्रशेखर आज़ाद का परिवार भूखे रहकर भी अपनी ईमानदारी से कोई समझौता करने को तैयार नहीं हुआ। गांधी जी अपनी जमी-जमाई प्रैक्टिस छोडकर आये परंतु आज़ादी के बाद अपनी संतति के लिये भी कोई पद लेने की आवश्यकता नहीं समझी। इन सब उदाहरणों से नायक के विकास में उसके परिवेश की भूमिका दिखाई देती है।
नाक्षरं मंत्ररहितं नमूलंनौषधिम् अयोग्य पुरूषं नास्ति योजकस्तत्रदुर्लभ:।।
(नायक हर व्यक्ति में छिपी सम्भावना देख सकते हैं)

चिड़ियन ते मैं बाज तुड़ाऊँ
दूसरों का नायकत्व स्वीकार पाना भी सबके बस की बात नहीं है। नायकों में कमी ढूंढना बडा आसान है। वे भी इंसान हैं। वक्र दृष्टि फेंकिये कोई न कोई कमी नज़र आ जायेगी। नायकों को हममें कमी नहीं दिखती, तभी तो वे हमें अंगीकार कर पाते हैं। जहाँ खलनायक अक्सर भेदवादी होते हैं और समाज को बाँटने के लिये नये-नये "वाद" उत्पन्न करते हैं वहीं नायक समन्वय में विश्वास करते हैं। उनके लिये समाज के एक अंग के विकास का अर्थ दूसरे अंग का ह्रास नहीं होता। नायक की क्रांति में नरसंहार नहीं होता है बल्कि उसका उद्देश्य नरसंहार जैसे दानवी कृत्यों को यथासम्भव रोकना होता है। परशुराम ने निरंकुश और निर्दय शासकों की हिंसा को रोका और चन्द्रशेखर आज़ाद और रामप्रसाद बिस्मिल ने ब्रिटिश राज की हिंसा को रोका। गांधी का मार्ग भले ही भगतसिंह से भिन्न रहा हो परंतु अहिंसा के प्रति उनके विचार एकसमान थे। एक आस्तिक के शब्दों में कहूँ तो खलनायक समाज को विभक्त करते हैं जबकि नायक भक्त होते हैं। वे अपने को समाज का अभिन्न अंग मानकर समाज में रहते हुए, उसकी अच्छाइयों का विस्तार करते हुए उसके उत्थान की बात करते हैं। खलनायक असंतोष और विद्वेष भड़काते हैं जबकि नायक दूसरे पक्ष को समझने की दृष्टि प्रदान करते हैं। खलनायक संकीर्ण होते हैं जबकि नायक "सर्वे भवंतु सुखिनः ..." के मार्ग पर चलते हैं।
वीर सावरकर - प्रथम दिवस आवरण

ऐसा लगता है कि नायकों में परोपकार की प्रवृत्ति होती है। लेकिन यह प्रवृत्ति एक सामान्य मानवीय प्रवृत्ति है। अनुकूल वातावरण उत्पन्न करके हम इसे बढावा दे सकते हैं। इसी प्रकार विभिन्न कौशल सीखकर और बच्चों को सिखाकर हम अपनी और उनकी क्षमतायें और आत्मविश्वास बढा सकते हैं।  मुझे लगता है कि नायकत्व के निम्न गुण सीखे जा सकते हैं और उनकी उन्नति और प्रसार के लिये हमें वातावरण बनाना ही चाहिये: स्वास्थ्य, साहस, करुणा, परोपकार, दान, उदारता, समन्वय, सामाजिक ज़िम्मेदारी, विभिन्न कौशल।

इस विषय पर विमर्श के लिये इतना कुछ है कि कभी पूरा न हो परंतु अपनी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए मैं अगली दो कड़ियों में इस शृंखला के समापन का वायदा करके यहाँ से विदा लेता हूँ। चलते-चलते बस एक प्रश्न: क्या आपने अपने आस-पास बिखरे नायकत्व को पहचाना है?

[क्रमशः]
[सभी चित्र/स्कैन अनुराग शर्मा द्वारा :: Snapshots by Anurag Sharma]

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सम्बन्धित कड़ियाँ
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* प्रेरणादायक जीवन-चरित्र
* नायक किस मिट्टी से बनते हैं - 1
* नायक किस मिट्टी से बनते हैं - 2
* नायक किस मिट्टी से बनते हैं - 3
* डॉक्टर रैंडी पौष (Randy Pausch)
* महानता के मानक

Friday, September 16, 2011

अब कुपोस्ट से आगे क्या होगा?

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क्या कहा? आपको नई पोस्ट लिखने का आइडिया नहीं मिल रहा? हमें भी नहीं मिल रहा। आइये ब्लॉग भ्रमण पदयात्रा पर निकलते हैं एक से एक नायाब आइडिया लेने। यह पोस्ट "अपोस्ट से आगे - कुपोस्ट तक" का विस्तार ही है। किसी भी ब्लॉग, ब्लॉगर, बेनामी, अनामी, पोस्ट, प्रविष्टि, टिप्पणी, व्यवहार, लक्षण, बीमारी, कविता, कहानी, व्यंग्य आदि से समानता संयोग  मात्र है। आलोचनाओं और आपत्तियों का स्वागत है। हाँ, सोते समय मैं टिप्पणियाँ मॉडरेट नहीं कर सकूंगा। मेरे जागने तक कृपया धैर्य रखें। जो पाठक "सैंस ओफ़ ह्यूमर" को साँप की जाति का प्राणी समझते हों, वे "अपोस्ट से कुपोस्ट तक" के इस सफ़र को न पढें तो उनकी अगली "प्रतिक्रियात्मक" पोस्ट के पाठकों का बहुमूल्य समय नष्ट होने से बच जायेगा।  
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[रश्मि जी, शिल्पा जी के सुझाव और सद्भावना का आदर करते हुए इस पोस्ट पर टिप्पणी का प्रावधान बन्द कर दिया गया है। आपकी असुविधा के लिये खेद है।]

- आज फिर पत्नी ने हमें बेलन से पीटा। हमने भी कह दिया कि अगर एक बार भी और मारा तो हम ... ... ... ... प्यार से फिर पिट लेंगे पर ब्लॉगिंग नहीं छोड़ेंगे।

- हम पागल नहीं हैं। आप लोग हमें पागल न समझें। हमारी नौकरी हमारे पागलपन के कारण नहीं छूटी है।  काम-धाम तो हम अपनी मर्ज़ी से नहीं करते हैं ताकि कीबोर्ड-सेवा कर सकें। वर्ना हम तो पीएचडी हैं, डॉ फ़ुर्सत लाल, ... "आवारा" तो हमारा तखल्लुस है यूँ ही धोखा देने के लिये। कहावत भी है, भूत के लात, लगाने के और, चलाने के और।

- आज हमारी पत्नी ने पूछा, "आज भी खाना खायेंगे क्या?" हमने जवाब नहीं दिया और उनके विरोध में यह पोस्ट लिख दी। आखिर हम अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी तो नहीं छोड़ सकते न!

- आज एक पत्नी ने पति से पूछा, "सुनते हो! आज साड़ी धुला लूँ क्या? मैली हो गयी है।"

- आज एक पति ने पत्नी से पूछा, "सुनती हो! आज दाढी बना लूँ क्या? नाई की दुकान बन्द है।"

- आज एक फलवाले ने ग्राहक से पूछा, "दीदी जी? आखिरी बचा है, मुफ़्त में दे दूंगा। क्या कहती हैं जी?"

- आज एक बिना नहाये गन्धाते टिप्पणीकार ने एक ओवर-पर्फ़्यूम्ड ब्लॉगर से कहा, "कब तक अपना रोना रोते रहोगे? आखिरी टिप्पणी दे तो दी, फिर भी कहते हो, सुधरने का मौका नहीं मिला।"

- एक बोगस साइट ने हमारे ब्लॉग का मूल्य एक मिलियन डॉलर आंका है। अफ़सोस कि अमेरिकी संस्था के प्लैटफॉर्म/सर्वर पर बने इस ब्लॉगर का पैसा भी अमेरिका ही जाता है। क्या हमारे स्विस खाते में नहीं जा सकता?

- यह हमारी सांख्यिकीय पोस्ट है। हमने दो साल में अपने ब्लॉग पर 20 लोगों को 2000 गालियाँ दीं और 200 को बैन किया।

- हिन्दी ब्लॉगिंग में काफ़ी गुटबन्दी है। कुछ सीनियर डॉक्टर ब्लॉगर ऐसा कहते हैं कि हमारा क्लिनिकल डिप्रैशन और बाइपोलर डिसऑर्डर इलाज के बिना ठीक नहीं हो सकता है। हमने भी दृढ प्रतिज्ञा कर ली है कि हम अपनी बीमारियाँ ब्लॉगिंग से ही ठीक करके दिखायेंगे। एक पाठक ने अपना स्कीज़ोफ़्रीनिया भी ऐसे ही ठीक किया था। और फिर हम तो आत्माकल्प वाली मृत-संजीवनी बूटी भी पीते हैं।

- पिछले 250 आलेखों की तरह इस आलेख को भी हमारा अंतिम आलेख समझा जाये। पिछले सौ हफ़्तों की तरह इस हफ़्ते फ़िर हम टंकी पर उछलेंगे। आप मनायेंगे तो हम उतर आयेंगे। किसी ने नहीं मनाया तो हम अपनी बेनामी पहचानों का प्रयोग कर लेंगे।

 - ज़िन्दगी और मौत से लड़ते एक ब्लॉगर से जब हमने हमारे ब्लॉग पर टिप्पणी न करने के लिये कई बार शिकायत की तो उन्होंने यह बात एक पोस्ट में लगा दी। हमेशा की तरह हम यहाँ भी बुरा मान गये। हमने उन्हें कह दिया कि हमारे लिये आप जीते जी मर चुके। वैसे बुज़ुर्गों के लिये हमारे दिल में बड़ा सम्मान है। अगर कभी हम अपनी गुस्से की बीमारी के कारण उनका अपमान करते भी हैं तो दवा खाने पर सामान्य होते ही उनके सम्मान में एक पोस्ट लिखकर माफ़ी भी मांग लेते हैं। दवा का असर निकलते ही फिर से उन्हें बुरी-भली कह देते हैं।

 - हम एक लिस्ट बना रहे हैं जिसमें उन लोगों का नाम लिखेंगे जो कहते हैं कि हम जल्दी और बेबात भड़क जाते हैं। जो हमें गुस्सैल कहते हैं उन सब के खिलाफ़ हम पाँच-पाँच पोस्ट लिखेंगे। इससे हमारी पोस्ट संख्या भी बढ़ जायेगी।

 - किस-किस को बैन करें हम?! हर ब्लॉगर हमसे जलता है? जिसने हमें ब्लॉगिंग सिखाई वह भी, जो हमें अपनी शिक्षा का सदुपयोग करने को कहता है वह भी, और जिसका ईमेल खाता हमने खुलाया वह भी।

 - समाज सेवा के लिये हम अपने ऐक्स मित्र के सम्मान में "गप्पू पसीना खास हो गया" शीर्षक से एक नई पोस्ट लिखेंगे।

 - कुछेक ब्लॉगर मन्दिरों और ऐतिहासिक बिल्डिंगों के अरोचक लेख लिखते हैं। हमने उन्हें आगाह करके वहाँ जाना बन्द कर दिया है। आशा है कि वे अपना अन्दाज़ बदलेंगे।

 - पोस्ट ग्रेजुएट हकीम तो हम पहले से हैं, अब तो नीम चढ़ा करेला भी खाते हैं।

कुत्ता-पालकों की सहायतार्थ
 - एक ब्लॉगर ने "अपने कुत्ते कैसे चरायें" शीर्षक से एक पोस्ट लिखी है। हमें लगता है कि यह हमारे खिलाफ़ एक साज़िश है। इससे पहले हम "अपना ड्रैगन ट्रेन कैसे करें" फ़िल्म पर भी अपनी आपत्ति दर्ज़ करा चुके हैं।

- मेरे ब्लॉग पर हिन्दी की बात न करें, अच्छी हिन्दी पढनी है तो किसी हिन्दी पीएचडी के ब्लॉग पर तशरीफ़ ले जायें। आप भी यहाँ बैन किये जाते हैं। और आप भी ... और आप भी।

- और कोई ब्लॉगर होता तो आपकी टिप्पणी मॉडरेट करके तलने के लिये छोड़ देता लेकिन हम उसका उपयोग रॉंग-इंटरप्रिटेशन करके अपने अति-उत्साही पाठकों को आपके खिलाफ़ भड़काने के लिये करेंगे।

- आजकल हम भाषा की शालीनता पर आलेख लिख रहे हैं, इसी शृंखला में दूसरे गुटों के बदतमीज़, बेहया, बेशर्म, बेग़ैरत, नालायक, नामाकूल, नामुराद ब्लॉगर की शान में मेरा विनम्र आलेख पढिये।

 - " विरोधीपक्ष के प्राणियों को बार्कीकरण करने दीजिये। आप तो अपने आँख-कान बन्द करके हमारी भाषा की तारीफ़ कीजिये वरना ... एक और बैन।

 - क्या कहा? आप राइट थे? तो लैफ़्ट टर्न लेकर निकल लीजिये और अपनी ऊर्जा इस ब्लॉग पर बर्बाद मत कीजिये।

 - हमारे भेजे में बचपन से मियादी डाइबिटीज़ है। हमारे कड़वे लेख पर आयी टिप्पणियों में इतनी मिठास थी कि हमारे बर्दाश्त की क्षमता के बाहर थी। आज हमें इंसुलिन की अतिरिक्त डोज़ लेनी पड़ी। अगली पोस्ट पर हम कमेंट ऑप्शन बन्द करने पर विचार करेंगे।

 - बहुत कम ब्लॉगर हैं जो हमारी तरह सीरियस ब्लॉगिंग करते हैं। हम तो हर टिप्पणी पढकर सीरियस हो जाते हैं और एक जवाबी पोस्ट लिख कर कान के नीचे "झन्नाट" मारते हैं ताकि हिन्दी ब्लॉगिंग का स्तर इसी प्रकार ऊँचा उठता रहे।

 - सारा ब्लॉग जगत सैडिस्टिक हो गया है। जिन्हें हमने रोज़ अपशब्द कहे उनमें से कुछ की हिम्मत बढती जा रही है। सब लोग हमारी व्यथा और अपमान पर व्यंग्यात्मक प्रविष्टियाँ लिखते हैं। उनकी कक्षा शीघ्र ही ली जायेगी।

- हम ब्लॉगिंग का तूफ़ान हैं, कहीं आप भी खुद को आंधी तो नहीं समझ रहे?

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सम्बन्धित कड़ियाँ
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* कहें खेत की सुनैं खलिहान की
* हिन्दी ब्लॉगिंग में विश्वसनीयता का संकट
* अंतर्राष्ट्रीय निर्गुट अद्रोही सर्व-ब्लॉगर संस्था
* अपोस्ट से आगे - कुपोस्ट तक

Friday, September 9, 2011

११ सितम्बर के बहाने ...

न्यू यॉर्क अग्निशमन दस्ता

11 सितम्बर के आतंकवादी आक्रमण की दशाब्दी निकट है। इसी दिन 2001 में हम धारणा, धर्म और विचारधारा के नाम पर निर्दोष हत्याओं के एक दानवी कृत्य के गवाह बने थे। इसी दिन खलनायकों ने अपना रंग दिखाकर साढे तीन हज़ार निर्दोष नागरिकों की जान ली थी, वहीं दूसरी ओर नायकों की भी कमी नहीं थी। न्यूयॉर्क प्रशासन, विशेषकर पुलिस व अग्निशमन विभाग ने उस दिन जो अदम्य साहस दिखाया था वह आज भी प्रेरणा देता है। 11 सितम्बर 2001 को जिस प्रकार अमेरिका की जनता ने एकजुट होकर अपनी अदम्य इच्छा-शक्ति का प्रदर्शन किया था वह अनुकरणीय है। साढे तीन हज़ार निर्दोष लोगों की हत्या, लेकिन बदले की कोई कार्यवाही नहीं। न दंगे न हिंसा, न किसी समुदाय के विरुद्ध दुष्प्रचार। लोग चुपचाप सहायता कार्यों में जुट गये। लगभग सभी नगरों में रक्तदाता, चिकित्सक ऐवम स्वयंसेवक आदेश के इंतज़ार के लिये तैयार खडे थे। वह एक घटना संसार में बहुत से बदलाव लाई। आज न ओसामा न सद्दाम है, न तालेबान और न ही पाकिस्तान का सैनिक तानाशाह। भारत और अमेरिका के सम्बन्ध भी अब वैसे हैं जैसे कि विश्व के दो महानतम और स्वतंत्र लोकतन्त्रों के आरम्भ से ही होने चाहिए थे। मानवता पर 9-11 जैसे संकट आते रहे हैं परंतु हमने सदा ही सिर ऊंचा करके कठिन समयों का सामना किया है। 9-11-2001 के शहीदों को मेरा नमन।

खतरे रहेंगे और सामना करने वाले नायक भी
अग्निशमन दस्ते की बात पर याद आया कि अमेरिका में अधिकांश नगरों के अग्निशमन दस्ते कर्मचारियों से नहीं बल्कि समाजसेवकों से संचालित होते हैं। अपने जीवनयापन के लिये कोई नौकरा या व्यवसाय करने वाले स्वयंसेवी आवश्यकता के समय फ़ायरट्रक लेकर चल पड़ते हैं। वास्तव में यहाँ जनसेवा का कार्य काफी व्यवस्थित और संगठित है। लोकोपकार की आर्थिक व्यवस्था तो सुदृढ़ है ही, जनसेवा के अन्य भी अनेक रूप हैं। यथा मरीज़ों की शारीरिक अंगों की आवश्यकता और उसे प्रकार दाताओं की राष्ट्रीय सूचियाँ उपलब्ध रहती हैं। अंगदान को सहमत वयस्कों के ड्राइवर्स लाइसेंस पर यह बात अंकित होती है ताकि दुर्घटना की स्थिति में अंगों को इंतज़ार करते मरीजों तक यथासंभव शीघ्रता से पहुचाया जा सके और अंग प्रत्यारोपण का कार्य आवश्यकतानुसार सुचारु रूप से चलता रहे। यह व्यवस्था दो-चार दिन में तो नहीं बनी होगी। पीढियाँ लगी हैं। आज कुछ कुंठित लोग भले ही अमेरिका को विश्व का दादा कहकर हल्ला मचा लें लेकिन कोई भी यह नकार नहीं सकता कि इस राष्ट्र के पीछे शताब्दियों का चरित्र निर्माण छिपा है। चरित्र निर्माण की यह प्रक्रिया बचपन से ही अमेरिकी जीवन का अंग बन जाता है। जहाँ जीवन में नैतिकता का स्तर ही ऊँचा हो वहाँ सम्भावनायें प्रबल होंगी ही।

लॉक्स ऑफ़ लव - बच्चों द्वारा केशदान
अमेरिका से तुलना करता हूँ तो भारत में बच्चों में समाजकार्य की चेतना की कमी दिखती है। अमेरिका में छोटे-छोटे बच्चे भी अपनी शैक्षिक या धार्मिक संस्थाओं के सहारे सेवाकार्य से जुडे रहते हैं जिनमें अनाथालयों में समय देने से लेकर वृद्धगृहों में एकाकी लोगों से जाकर मिलना और सांस्कृतिक कार्यक्रम करने जैसे कार्य शामिल हैं। वृक्षारोपण, रक्तदान, पक्षियों को दाना देना जैसी बातें तो यहाँ सामान्य जीवन का भाग ही लगती हैं। छोटे बच्चे कुछ और नहीं तो अपने सिर के बाल ही लम्बे करके फिर दान दे देते हैं ताकि उनसे कैंसर पीड़ितों के विग बन सकें। पुरानी पुस्तकों से लेकर नये खिलौनों तक, दान की प्रवृत्ति बचपन से ही प्रोत्साहित की जाती है।

वह दिन याद रहे
यहाँ शारीरिक श्रम का भी बहुत महत्व है। लोग अपने घर के अधिकांश कार्य स्वयं ही करते हैं। मज़दूरों को अच्छी दिहाड़ी भी मिलती है और श्रम को सम्मान भी। हमारे देश में भी त्याग, साहस, करुणा, प्रेरणा और प्रेम की कोई कमी नहीं है। बल्कि भारत की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि के कारण यह बहुत आसान है। लेकिन हमें ऐसी व्यवस्था का निर्माण तो करना होगा जहाँ बच्चे आरम्भ से ही समाज के प्रति सकारात्मक ज़िम्मेदारियों से जुड़ सकें।

दूसरी बात जो देखने को मिलती वह है नेतृत्व की दृढ इच्छाशक्ति. हमारा जहाज़ कंधार में खड़ा था। तालेबान के पास कोई वायुसेना नहीं थी। पाकिस्तान के अलावा उसे किसी राष्ट्र की मान्यता भी प्राप्त नहीं थी परन्तु हमने कमांडो कार्यवाही करने के बजाय उन खूंख्वार आतंकवादियों को छोड़ा जिन्होंने बाद में और अधिक नृशंस कार्यवाहियाँ कीं। इसके विपरीत अमेरिका को ९-११ के बाद निर्णय लेने में एक मिनट भी नहीं लगा। हमें भी अपने नेताओं में नेतृत्व क्षमता और दृढनिश्चय की मांग करनी चाहिए।

[चित्र अनुराग शर्मा द्वारा :: Photos by Anurag Sharma]
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सम्बन्धित कड़ियाँ
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911 स्मारक 

नायक किस मिट्टी से बनते हैं - 3

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पिछली दो कड़ियों में हमने देखा कि नायक निर्भय और उदार होते हैं, साहस रखते हैं और त्याग के लिये तत्पर रहते हैं। दोनों प्रविष्टियों पर आयी टिप्पणियों से विचारों की अन्य बहुत सी खिडकियाँ खुलीं। हमने देखा कि नायक होने का दिखावा देर तक नहीं चलता। जीवन में नायक बनने का अवसर आने पर खरा टिकता है और खोटा साफ़ हो जाता है। नायक गढ़े नहीं जा सकते, वे अपने कर्म के बल पर टिकते हैं। मढ़े या गढ़े हुए नायक का पहले अगर गलती से सम्मान हो भी गया हो तो बाद में और अधिक छीछालेदर होती है। विमर्श में नायकों द्वारा दूसरों के सम्मान, शरणागत-वत्सलता और क्षमा का ज़िक्र भी आया और यह भी स्पष्ट हुआ कि नायक अहं को पीछे छोडकर बहुजन हिताय बहुजन सुखाय कर्म करते हैं। अभिषेक ओझा ने दूरदर्शिता की बात की। गौरव अग्रवाल और सलिल वर्मा ने क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल, उद्यम, साहस, धैर्यं, बुद्धि, शक्ति, और पराक्रम की बात की। संजय अनेजा ने वीरता और बर्बरता का अंतर स्पष्ट किया। स्वामिभक्ति पर जहाँ दोनों प्रकार के विचार मिले वहीं शिल्पा जी ने कहा कि "वीरता, साहस, निर्भयता त्याग" किसी नायक में अपेक्षित होते हुए भी अनिवार्य नहीं हैं। मैने इस बात पर काफ़ी विचार किया लेकिन अब तक ऐसा कोई नायक सोच नहीं पाया जिसमें इन गुणों का अभाव रहा हो। क्या आप ऐसे कुछ लोकनायकों का नाम याद दिला सकते हैं?
भाग 1भाग 2अब आगे:
नायक, नायक बन ही नहीं पाए यदि उसमें क्षमाभाव नहीं हो। नायक समूह का नेतृत्व करता है, समूह में सभी प्रकार के दृष्टिकोण होते है। विरोधी संशय, प्रतिघात और परिक्षण भी। क्षमायुक्त समाधान ही उसे नायक पद प्रदान करने में समर्थ है। महानता की आभा का स्रोत क्षमा ही है। ~ हंसराज सुज्ञ
अनिता बोस (आभार: हिन्दुस्तान)
सप्ताहांत में कुछ मित्रों से बात हुई। जिन्होंने अपने-अपने नायक में वचन और कर्म की ईमानदारी देखी। ऐसा लगता है कि नायकों में एक प्रकार की पारदर्शिता पाई जाती है। हमारे एक परिचित संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों को कपोल-कल्पना कहते हैं लेकिन कई बार देखा है कि वे दूसरों की बात काटने के लिये उन्हीं ग्रंथों के सन्दर्भ देते हैं जिन्हें वे झूठा बताते हैं। ऐसे कृत्य में बेईमानी छिपी है। इसी प्रकार यदि ईश्वर और नैतिकता में विश्वास न रखने वाला व्यक्ति अपने लाभ के लिये धर्म के ऊपरी चिह्न तिलक आदि लगा ले किसी धार्मिक ट्रस्ट का नियंत्रक बन जाये तो यह भी एक प्रकार का छल ही हुआ। नायक की कथनी और करनी एक होती है। हो सकता है कि समय के साथ नायक के विचार बदलें, तब उसके वचन और कर्म भी उसी प्रकार बदलते हैं परंतु किसी भी क्षण उसके वचन और कर्म में भेद नहीं होता। मसलन यदि मैं किसी व्यक्ति से मुफ़्त में कुछ न लेने की बात करता हूँ तो मैं अपने नियोक्ता से बिना ब्याज़ मिलने वाला ऋण भी नहीं लूंगा। इसी प्रकार भ्रष्टाचारियों से घिरे रहकर स्वयं को स्वच्छ बताने में ईमानदारी नहीं दिखती।
जब पिता मुझे छोडकर गये तब मैं चार सप्ताह की थी। स्वतंत्रता संग्राम में अनेक लोगों ने त्याग करने के साथ कष्ट भी भोगे हैं, हम तो भाग्यशाली थे। ~ अनिता बोस फ़ैफ़ (नेताजी की पुत्री)
नायक का जीवन दूसरों के उत्थान को समर्पित होता है। उसे दूसरों के विकास की, उनकी आवश्यकताओं की समझ और उन्हें साथ लेने की व्यवहार-कुशलता भी होती है। वानर भालू तो राम के साथ चले ही, नन्ही गिलहरी भी चल पडी, राम के विराट व्यक्तित्व के सामने उसे कोई क्षुद्रत्व महसूस नहीं हुआ। गांधी और अन्ना इस मामले में समान हैं कि उनके साथ वे लोग भी आसानी से जुड सके जो किसी अन्य आन्दोलन में भागीदारी नहीं कर पाते। ऐसे नायक व्यापक जनसमूह को अपने साथ बान्ध पाते हैं, यहाँ तक कि परस्पर विरोधी विचारधारायें भी उनके सामने मिलकर चलती हैं। बादशाह खान और मौलाना आज़ाद को गांधीजी के अहिंसावाद में बौद्ध, जैन, हिन्दू या सिख विचारधारा का प्रक्षेपण नहीं दिखाई दिया।

नायक असम्भव को सम्भव कर दिखाते हैं। वे अति-सक्षम होते हैं। नायक सोने के दिल से संतुष्ट होने वाला जीव नहीं है उसे कुशल हाथ और सुदृढ पाँव भी चाहिये। उनमें ज्ञान के साथ दूरदृष्टि भी होती है। अधिक काम करने के बजाय वे कुशल काम कर दिखाते हैं। शिवाजी की सेना बहुत छोटी थी, न उतने अस्त्र थे न धन। तो उन्होंने छापामार युद्ध किये। तात्या टोपे को भारतीय सैनिकों की रसद की चिंता थी इसलिये उन्होंने उनके कूच के मार्ग में पडने वाले सभी ग्राम-प्रमुखों को आस-पास के ग्रामों की सहायता से रोटी का इंतज़ाम करने की ज़िम्मेदारी पहले ही विचार करके सौंपी। हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के छोटे से संगठन ने अंग्रेज़ों की सेना, पुलिस और खुफ़िया संस्थाओं की नाक में दम कर दिया था।

उद्यमेन हि सिध्यंति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशंति मुखे मृगाः॥

सोते शेर के मुख में हिरण नहीं घुसते। इसी प्रकार मनोरथ सिद्धि कर्म से होती है। नायक स्वयं कर्म करते हैं और अपने साथियों और अनुगामियों से असम्भव को सम्भव करा लेते हैं। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त जैसे शहीदों के आदर्श गुरु गोविन्द जब कहते हैं, "चिड़ियन ते मैं बाज तुड़ाऊँ, तब गोविन्द सिंह नाम कहाऊँ" तो वे ऐसा असम्भव कर दिखाने की क्षमता रखते हैं। मानवाधिकार विहीन समाज और अपनी बर्बरता के लिये मशहूर तुर्क, अफ़ग़ान बाज़ों को मासूम चिड़ियों से तुड़ाकर, सतलज से काबुल तक निशान साहिब फ़हरा देना क्या किसी आम आदमी के लिये सम्भव होता?

नेताजी और राजनेता (आभार: पीटीआइ)
नायक जन-गण के बीच आशा और उल्लास का संचार करते हैं। वे उन्हें मृत्यु से छुड़ाकर अमृत्व की ओर ले जाते हैं। रोज़ घुट-घुटकर मरने, अपनी अंतरात्मा के विरुद्ध काम करने से बचाकर सत्यनिष्ठा के उस मार्ग पर लाते हैं जहाँ व्यक्ति अपना सर्वस्व त्यागकर भी अपने को भाग्यशाली समझता है। नायकों की विशेषता यह है कि वे जिसका जीवन छू लेते हैं वही बदल जाता है। राम अपने साथ हनुमान को भी भगवान बना देते हैं। नेताजी गांधीजी से अनेक मतभेद होते हुए भी उन्हें राष्ट्रपिता की उपाधि दे देते हैं। फूलमाला पहनकर बैंड बजवाकर जेल जाने वाले कॉंग्रेसियों पर हँसने वाले चन्द्रशेखर आज़ाद मोतीलाल नेहरू की शवयात्रा में शरीक़ होते हैं और अहिंसावादी गान्धी के अनुयायी चन्द्रशेखर आज़ाद की शवयात्रा में इलाहाबाद की गलियों में तिल भर की जगह नहीं छोडते हैं। दूसरे शब्दों में, नायक व्यक्तिगत मतभेदों को ताख पर रखकर व्यापक उद्देश्यों के लिये काम करते हैं और अपने साथियों का भी निरंतर विकास करते रहते हैं। यदि कोई निरंतर अपना या अपने सीमित गुट का विकास कर रहा हो तो वह तानाशाह हो सकता है मगर नायक हरगिज़ नहीं। ऐसे व्यक्ति सत्ता भले ही हथिया लें सम्मान के अधिकारी नहीं होते, उनका बारूद खत्म होते ही उनका तख्ता और उनकी मूर्तियाँ उखाड़ दी जाती हैं। इसके उलट, नायकों का यश न केवल स्थायी होता है, वह लोगों के हृदय से आता है। उनमें किसी प्रकार का दवाब नहीं होता। माओवादी और जिहादी रोज़ गले काट रहे हैं तो भी उन्हें जन-समर्थन नहीं मिलता जबकि नेताजी की आवाज़ पर 50,000 से अधिक लोग अंग्रेज़ी सेना का मुकाबला करने आज़ाद हिन्द सेना में शामिल हो गये थे। ऐसे जननायकों के तत्कालीन विरोधी भी एक दिन अपनी भूल का प्रायश्चित कर उन्हें फूल-माला चढाते हैं।
कम्युनिस्टों द्वारा नेताजी के ग़लत आंकलन के लिये मैं क्षमा मांगता हूँ ~ बुद्धदेव भट्टाचार्य (कोलकाता, 23 जनवरी 2003)
यह तो स्पष्ट है कि नायक अकेले नहीं पडते। उनके साथ जनता होती है। उनके साथ अन्य नायक भी होते हैं। नायकों के साथ आने पर जनता का विकास तो होता ही है, नायक स्वयं भी एक दूसरे के आलोक से आलोकित होते हैं। नायकों की छत्रछाया में दूसरी पंक्ति सदा तैयार रहती है, "बिस्मिल" गये तो "आज़ाद" आ गये। नायक प्रतियोगिता नहीं करते, वे संरक्षक होते हैं। वे रत्नाकर को महर्षि वाल्मीकि और विभीषण को लंकेश बनाते हैं। उनका भी कोई प्रेरणा पुंज होता है और वे भी चाणक्य की तरह नये चन्द्रगुप्त मौर्य विकसित करते हैं।

विजेतव्या लंका चरणतरणीयो जलनिधिः
विपक्षः पौलस्त्य रणभुवि सहायाश्च कपयः ।
तथाप्येको रामः सकलमवधीद्राक्षसकुलम
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महता नोपकरणे॥

सवा लाख से एक लड़ाने की बात हो या वानरों से राक्षस तुड़ाने की, नायकों की कार्यसिद्धि में अस्त्र-शस्त्र से अधिक महत्वपूर्ण भूमिका उनके मनोबल की होती है। संकल्प और दृढ इच्छाशक्ति के बिना नायक बन पाना असम्भव सा ही है। गृहमंत्री के रूप में सरदार पटेल आज तक याद किये जाते हैं क्योंकि भारत के एकीकरण में उनकी इच्छाशक्ति का बडा योगदान रहा। अशिक्षा, ग़रीबी, आतंकवाद, भेद-भाव, सूखा, बाढ, कश्मीर आदि के मुद्दे आज तक हमें सता रहे हैं क्योंकि नेतृत्व में इच्छाशक्ति न होने पर सब संसाधन बेकार हैं। जब एक नगर के लिये पूरे राज्य सरीखा मंत्रिमण्डल हो और वह सदन भी सुरक्षा व्यवस्था सुधारने के बजाय अपने वेतन भत्ते बढ़ाने में ज़्यादा रुचि रखता हो तब अदालत परिसर में बम फ़टने से दुख कितना भी हो आश्चर्य नहीं होता है। राष्ट्र को शासक मंत्रिमण्डलों की नहीं नायकों की आवश्यकता है, क्षमता, साहस, उदारता, ईमानदारी और इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। यह कमी कैसे पूरी हो?

अब तक हमने नायकों के निम्न गुणों पर दृष्टि डाली है: निर्भयता, उदारता, साहस, त्याग, निस्स्वार्थ भाव, निर्लिप्तता, सत्यनिष्ठा, मानवता, क्षमा/करुणा, उदात्तमन, ईमानदारी, व्यवहार-कुशलता, जनता का साथ। असम्भव को सम्भव करने की क्षमता, परस्पर विकास, संरक्षण/मेंटॉर, बिना दवाब के जनसमर्थन, उद्देश्य की व्यापकता, दृढ इच्छाशक्ति/मनोबल। आपकी टिप्पणियों में वर्णित कई गुण अभी भी छूट गये हैं। उन पर भी बात होगी। मुझे लगता है कि ज्ञान/समझ/अनुभव भी नायकों का गुण होना चाहिये। आपको क्या लगता है? क्या एक सफल नायक के लिये शक्ति भी आवश्यक है?
[क्रमशः]

Saturday, September 3, 2011

नायक किस मिट्टी से बनते हैं - भाग 2

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अन्ना बनना है तो शब्द और कृति को एक करो ... शुद्ध आचार, निष्कलंक जीवन, त्याग करना सीखो, कोई कुछ कहे तो अपमान सहना सीखो ~अन्ना हज़ारे (27 अगस्त 2011, रामलीला मैदान)

पिछली प्रविष्टि और आपकी टिप्पणियों में हमने नायकत्व की नीँव के कुछ रत्नों का अवलोकन किया। देवेन्द्र जी ने स्पष्ट किया कि सर्वगुण सम्पन्न होते हुए भी यदि व्यक्ति मैं और मेरे में ही सिमटा हुआ है तो उसके नायक हो पाने की सम्भावना नहीं है। शिल्पा जी ने भी यही बात एक उदाहरण के साथ प्रस्तुत की और अली जी ने भी कल्याण या फिर लोक कल्याण कहकर इसी बिन्दु को उभारा। "बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय" की भावना के बिना बड़ा बनना वाकई कठिन है।

साहस, निर्भयता, उदारता और त्याग पर कुछ बात हुई। निस्वार्थ प्रवृत्ति, दूसरों के सम्मान की रक्षा, कर्मयोग आदि जैसे सद्गुणों का ज़िक्र आया। आगे बढने से पहले आइये उदारता, त्याग और निस्वार्थ भावना के अंतर पर एक नज़र डालते हैं।

निस्वार्थ होने का अर्थ है स्वार्थरहित होकर काम करना। अच्छी भावना है। हम सब ही सत्कार्य के लिये अपना समय, श्रम ज्ञान और धन देना चाहते हैं। कोई नियमित रक्तदान करता है और किसी ने नेत्रदान या अंगदान का प्रण लिया है। विनोबा ने एक इंच भूमि का स्वामित्व रखे बिना ही विश्व के महानतम भूदान यज्ञ का कार्य सम्पन्न कराया। भारत में लोग गर्मियों में प्याऊ लगाते हैं और पिट्सबर्ग में मेरे पडोसी पक्षियों के लिये विशेषरूप से बने बर्डफ़ीडर में खरीदकर दाना रखते हैं। हृदय में उदारता हो तो निस्वार्थ भाव से कर्म करना नैसर्गिक हो जाता है। उदारता और त्याग का सम्बन्ध भी गहन है। दिल बड़ा हो तो त्याग आसान हो जाता है। याद रहे कि सत्कार्य के लिये भी चन्दा मांगना उदारता नहीं हैं, आगे बढकर दान देना अवश्य उदारता हुई। चन्दा इकट्ठा करना, चन्दा देना या उसका सदुपयोग करना, यह सभी निस्वार्थ हो सकते हैं। त्याग अनेक प्रकार के हो सकते हैं। स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने सुखी भविष्य के साथ अपने तन, मन, धन सबका त्याग राष्ट्रहित में कर दिया। विनोबा जेल में थे तब भी उस समय का सदुपयोग उन्होंने अपराधी कैदियों के लिये गीता के नियमित प्रवचन करने में किया।

माता-पिता अक्सर अपनी संतति के लिये छोटे-बडे त्याग करते हैं। लोग अपने सहकर्मियों, पडोसियों, अधिकारियों के लिये भी छोटे-मोटे त्याग कर देते हैं लेकिन उसमें अक्सर स्वार्थ छिपा होता है। मंत्री जी ने चुनाव से ठीक पहले सारे प्रदेश के इंजीनियर बुलाकर अपने शहर में बडे निर्माणकार्य कराये। सरकारी पैसा, सरकारी कर्मचारी, सरकारी समय का दुरुपयोग हुआ और अन्य नगरों के साथ अन्याय भी हुआ। लेकिन यदि मंत्री जी कहें कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत समय का त्याग तो किया तो उसके पीछे चुनाव जीतने का स्वार्थ था। कुछ लोग सदा प्रबन्धन की कमियाँ गिनाते रहते हैं, उन्हें हर शिक्षित, धनी या सम्पन्न व्यक्ति शोषक लगता है। वे हर समिति की निगरानी चाहते हैं। वे कहते हैं कि उनका उद्देश्य जनता को जागरूक करना है। लेकिन यदि ये लोग जनता के असंतोष को भड़काकर अपनी कुंठा निकालते हों या हिंसा फ़ैलाकर अपनी स्वार्थसिद्धि करें तो उसमें स्वार्थ भी है और उदारता व त्याग का अभाव भी। ऐसे खलनायकों के मुखौटे लम्बे समय तक टिकते नहीं। क्योंकि निस्वार्थ कर्म के बिना सच्चा नायक बना ही नहीं जा सकता।

आचार्य विनोबा भावे
(11 सितम्बर, 1895 - 15 नवंबर, 1982)
भारत में जातिगत, धर्मगत दंगे तो होते ही हैं, कई बार हिंसा के पीछे क्षेत्र, भाषा और आर्थिक कारण भी होते हैं। हिन्दुओं को मुस्लिम बस्ती से गुज़रते हुए भय लगता है। कानपुर के दंगों में जब हिन्दू-मुसलमान एक दूसरे से डरकर भाग रहे थे, गणेश शंकर विद्यार्थी दंगे की आग में कूदकर निर्दोष नागरिकों की जान बचा रहे थे। 25 मार्च 1931 को धर्मान्ध दंगाइयों ने उनकी जान ले ली परंतु उनकी उदार भावना को न मिटा सके। जब आम लोग डरकर छिप रहे थे तब विद्यार्थी जी अपना आत्म-त्याग करने सामने आये क्योंकि उनके पास नायकों का एक अन्य स्वाभाविक गुण निर्भयता भी था। उदारता का पौधा निर्भयता की खाद पर पलता है। माओवाद से सताये जा रहे इलाकों में रात में ट्रेनें तक नहीं निकलतीं। वर्तमान नेता अपने लाव-लश्कर के साथ भी ऐसे स्थानों की यात्रा की कल्पना नहीं कर सकते। 18 अप्रैल 1951 को नलगोंडा (आन्ध्रप्रदेश) में भूदान आन्दोलन की नींव रखने से पहले और बाद में विनोबा ने निर्भयता से न केवल कम्युनिस्ट आतंकवाद से प्रभावित क्षेत्रों की पदयात्रायें कीं और जनता से मिले बल्कि ज़मीन्दारों को भी अपनी पैतृक भूमि को भूमिहीनों को बांटने के लिये मनाया। विनोबा को न भूपतियों के आगे हाथ फैलाने में झिझक थी और न ही आतंकियों की बन्दूकों का डर। अपनी जान की सलामती रहने तक कोई भी जन-नायक होने का भ्रम उत्पन्न कर सकता है, लेकिन भय और नायकत्व का 36 का आंकड़ा है।

बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह ब्रिटिश सरकार की निर्दयता को अच्छी प्रकार पहचानते हुए भी आत्मसमर्पण करते हैं। शांतिकाल में भर्ती हुआ कोई सैनिक युद्धकाल में शांति की चाह कर सकता है परंतु उन लाखों भारतीयों के बारे में सोचिये जो द्वितीय विश्व युद्ध में भारत की प्रत्यक्ष भागीदारी या ज़िम्मेदारी न होने पर भी भारत की आज़ादी की शर्त पर जान हथेली पर रखकर एशिया और यूरोप के मोर्चों पर निकल पडे। उनमें से न जाने कितने कभी वापस नहीं आये। वे सभी वीर हमारे नायक हैं।

दो महानायक: नेताजी और बादशाह खान
कभी परम्परा की आड में, कभी धर्म के बहाने से, कभी वैचारिक प्रतिबद्धता के नाम पर और कभी राजनीतिक सम्बन्ध की ओट में कापुरुष अपने खलनायकत्व का औचित्य सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर पकडे गये बहुत से जर्मन युद्धापराधियों ने अपने क्रूरकर्म को स्वामिभक्ति कहकर सही ठहराने का प्रयास किया था। स्वामिभक्ति का यह बहाना भी कायरता का एक नमूना है। क्या स्वामिभक्ति सत्यनिष्ठा के आडे आ सकती है या यह भय और कायरता को छिपाने का बहाना मात्र है?

मदर टेरेसा
26 अगस्त 1910 - 5 सितम्बर 1997
दो विश्व युद्धों में 1070 जीवन न्योछावर करने वाली गढवाल रेजिमेंट के पेशावर में तैनात सत्यनिष्ठ सिपाहियों ने अप्रैल 1930 में खान अब्दुल गफ़्फ़ार खाँ की गिरफ़्तारी का विरोध कर रहे निहत्थे पठान सत्याग्रहियों पर गोली चलाने के आदेश को मानने से इनकार कर दिया था। इस काण्ड में चन्द्र सिंह गढवाली के नेतृत्व में 67 भारतीय सिपाहियों का कोर्टमार्शल हुआ था जिनमें से कई को आजीवन कारावास की सज़ा हुई थी। और इससे पहले 1857 की क्रांति में भी वीर भारतीय सैनिकों ने सत्यनिष्ठा को स्वामिभक्ति से कहीं ऊपर रखा।

क्या आप सहमत हैं कि साहस, निर्भयता, उदारता और त्याग वीरों के अनिवार्य गुण हैं? क्या वीर नायक सदैव ही सत्यनिष्ठा को अन्ध स्वामिभक्ति से ऊपर रखते हैं? एक नायक में और क्या ढूंढते हैं आप? परोपकार, समभाव, करुणा, प्रेम, दृढता, ज्ञान?  एक अन्य भारतीय कथन है, "क्षमा वीरस्य भूषणं", क्या आपको लगता है कि क्षमा भी नायकों का गुण हो सकता है?

[क्रमशः]