Saturday, December 31, 2011

नववर्ष 2012 शुभ हो - इस्पात नगरी से [53]

स्वर्गीय डॉ. अमर कुमार
एक भावनात्मक नाता, एक लम्बा साथ। पुराना साल हमारे साथ लगभग 3,15,36,000 पल गुज़ारकर रुखसती की तैयारी में है। हममें से बहुत से लोगों के लिये यह समय साल भर के लेखेजोखे का है। कितना खोया, कितना पाया इसका हिसाब लगाना आसान नहीं है। इस वर्ष मैंने अमेरिका में कई नये स्थान देखे, भारत, कैनाडा और जापान की यात्रायें कीं। हर साल की तरह इस साल भी अनेक नये मित्र मिले, कितने ही नये ब्लॉगर्स हिन्दी ब्लॉगिंग में आये। इसके साथ ही हमने इस वर्ष कई मूर्धन्य ब्लॉगर्स को खोया है जिनमें श्रीमती सन्ध्या गुप्ता, डॉ अमर कुमार, श्री हिमांशु मोहन के नाम प्रमुख हैं। हिमांशु जी से मेरा विशेष परिचय नहीं रहा था परंतु सन्ध्या जी और डॉ. साहब से ब्लॉग जगत के किसी न किसी चौक, नुक्कड़ या मोड़ पर मुलाकात हो ही जाती थी। इन तीनों की कमी सदा महसूस होगी।

ब्लॉगिंग की बात जारी रखूँ तो इस बात की खुशी है कि कुछ निकट मित्रों के सहयोग से इस वर्ष एक सामूहिक ब्लॉग रेडियो प्लेबैक इंडिया की शुरूआत हुई जिस पर गीत संगीत, बोलती कहानियाँ और सभी प्रकार के ऑडियो, पॉडकास्ट आदि उपलब्ध हैं। इसी प्रकार इस वर्ष मैं करुणा, स्वास्थ्य और शाकाहार का प्रसार करने को प्रतिबद्ध निरामिष ब्लॉग से जुड़ सका।

भारतीय संस्कृति उत्सवप्रिय है। जहाँ तालिबानी मनोवृत्ति के लोग जब नव शारदा और नौरोज़ पर प्रतिबन्ध लगाने की बात करते हैं और पश्चिमी संस्कृति को मातृदिवस और पितृदिवस जैसे पर्व गढने पड़ते हैं वहीं हमारे एक वर्ष में 400 त्योहार आराम से मिल जायेंगे। वसुधैव कुटुम्बकम की परम्परा को नित नये उत्सवों के उल्लास में सम्मिलित होने में प्रसन्नता ही होती है। क्रिसमस और नव वर्ष के उत्सव की रोशनी के बीच जब मैने एक बेघर के दिल के अँधेरे में झांकने का अनगढ सा प्रयास किया तब याद आया कि न जाने कितने मित्र अपनी समस्याओं में उलझे हुए हैं। उनसे हमारा भौतिक सम्पर्क हो न हो, वे हमारी प्रार्थनाओं में हैं। ईश्वर उनपर कृपा करे और नववर्ष में उनका जीवन प्रसन्नता से भरे, यही कामना है। 2011 के खट्टे-मीठे अनुभव याद करते समय उन सभी लोगों का आभार भी कहना चाहता हूँ जो व्यक्तिगत लेन-देन से ऊपर उठकर सत्यनिष्ठा की समझ रखते हैं।

बेघरों की बात चलने पर श्रीमतीजी ने याद दिलायी व्हिटनी एलिमेंटरी स्कूल और उसकी प्राचार्या शैरी गाह्न (Sherrie Gahn) की। श्रीमती जी बड़े उत्साह से बताती रहीं कि किस प्रकार एक टीवी कार्यक्रम में शैरी की उपस्थिति मात्र से उनके विद्यालय के हर छात्र के लिये बैकपैक, स्कूल पुस्तकालय के लिये पुस्तकें और कम्प्यूटर तथा विद्यालय के लिये बहुत सा पैसा मिला। लास वेगास स्थित यह विद्यालय अमेरिका के किसी सामान्य विद्यालय से इस मामले में फ़र्क है कि वहाँ के 610 विद्यार्थियों में से 518 बेघर हैं।

आठ वर्ष पहले इस पाठशाला में आयीं शैरी का कहना है कि इससे पहले उन्होंने ऐसी ग़रीबी नहीं देखी थी। हालात सुधरने के बजाय हर साल बिगड़ते ही गये। अंततः उन्होंने समुदाय के वयस्कों से मिलकर यह प्रस्ताव रखा कि यदि वे अपने बच्चों की शिक्षा की ज़िम्मेदारी उन्हें दें तो वे बच्चों के भोजन-वस्त्रों की ज़िम्मेदारी स्वतः ही ले लेंगी। लगभग 500 दानदाताओं के सहयोग से शैरी इन बच्चों के वस्त्र, भोजन, केश-कर्तन, चिकित्सा जैसी सुविधायें दे सकी हैं। दानदाताओं में निम्न मध्यवर्ग के व्यक्तियों से लेकर बड़े व्यवसायी भी शामिल हैं। जहाँ एक महिला फ़िलाडेल्फ़िया से 20 डॉलर प्रतिमास भेजती हैं, वहीं एक स्थानीय जुआरी दो हज़ार डॉलर प्रतिमास देता है।
जब मैंने लंचटाइम में बच्चों को केवल सॉस/केचप/चटनी खाते और उसमें से कुछ बचाकर घर ले जाने का प्रयास करते देखा तो मेरा दिल दहल गया। (~प्राधानाचार्या शैरी गाह्न)
पाप-नगर (sin city) के नाम से मशहूर और अनेक हिन्दी फ़िल्मों में दिखाये गये लास-वेगास नगर की तेज़ रोशनी और जगमगाते कसीनोज़ के पीछे 12% बेरोज़गारी छिपी है। फ़ोरक्लोज़र (गिरवी घर की किश्तें न दे सकने पर बैंक द्वारा कब्ज़ा करना) की दर सारे देश में सर्वाधिक है। अमेरिका में 12वीं कक्षा तक शिक्षा निशुल्क होते हुए भी बेरोज़गार माता-पिताओं के यह बेघर बच्चे शिक्षा के अधिकार से वंचित रहे थे तो ज़ाहिर है कि महंगी कॉलेज शिक्षा पाना उनके लिये जादुई सपने से कम नहीं है। इस बात को ध्यान में रखते हुए शैरी के विद्यालय ने अपने बच्चों की कॉलेज शिक्षा के लिये एक कोश भी बनाया है जो योग्य बच्चों की फ़ीस का ध्यान रखेगा।
आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें!
नीचे के विडियो में आप शैरी को देख सकते हैं एक टीवी कार्यक्रम में अपने छात्रों के बारे में बात करते हुए। मानवता अभी जीवित है और सदा रहेगी!


The Ellen DeGeneres Show - Whitney Elementary School from Aaron Pinkston on Vimeo.

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* सम्बन्धित कड़ियाँ *
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* ऐसा नव वर्ष
* नव शारदा - रंग ही रंग - शुभकामनायें!
* "क्रोधी" नाम सम्वत्सर शुभ हो!
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* भारतीय काल गणना
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Wednesday, December 28, 2011

सनातन धर्म खतरे में कभी नहीं था - धंधा खतरे में रहा होगा

इस्कॉन की "भग्वद्गीता यथारूप"
साइबेरिया (रूस) के तोमस्क के नगर न्यायालय ने इस्कॉन के संस्थापक एसी भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद कृत भगवद्गीता की व्याख्या "भगवद्गीता जस की तस" (भग्वदगीता ऐज़ इट इज़) के रूसी अनुवाद को अतिवादी भावनाएँ भड़काने वाला ग्रंथ मानने के स्थानीय अभियोजक के अनुरोध को निरस्त कर दिया।

स्वामी प्रभुपाद की पुस्तक पर पाबंदी लगाने का यह मामला विगत जून 2011 से साइबेरिया के तोमस्क की अदालत में लम्बित था जिसमें तोमस्क नगर के अभियोजन विभाग ने स्थानीय अदालत से तोम्स्क स्थित ISKCON (इस्कॉन = अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण चेतना समाज) की धार्मिक गतिविधियों की जाँच कराने का अनुरोध किया था। इस्कॉन स्वामी प्रभुपाद द्वारा की गयी भगवद्गीता की टीका में बताई गई वैष्णव शिक्षाओं का प्रचार करता है।

रूस के बहुत से नागरिकों ने खुलकर इस मुक़दमे को रूस में रहने वाले हिन्दुओं के अधिकारों का उल्लंघन माना। रूस के हिन्दुओं के साथ-साथ अन्य धर्मों के अनुयायियों ने भी इस मुक़दमे के बारे में अपनी नाराज़गी और रोष प्रकट किया था।
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः। मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः।।18।।
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।।19।।
(श्रीमद्भग्वद्गीता, अध्याय 16)

अहंकार, बल, घमण्ड, कामना और क्रोध के परायण और दूसरों की निन्दा करने वाले व्यक्ति अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अन्तर्यामी से द्वेष करने वाले हैं। ऐसे द्वेषी, पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में डालता हूँ। (योगेश्वर कृष्ण)
जहाँ मैं इस फैसले से बहुत प्रसन्न हूँ, वहीं इस मामले ने भारत में हो रहे एक परिवर्तन को उजागर किया है जिस पर हर जागरूक भारतीय, विशेषकर हिन्दू को ध्यान देने की आवश्यकता है। इस्कॉन व कृष्णभक्तों की प्रशंसा करनी चाहिये क्योंकि उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम में असीमित संयम का परिचय दिया। उनके विपरीत इस मुकदमे की खबर मिलते ही कुछ तथाकथित हिन्दुओं ने इस घटनाक्रम को इंटरनैट पर ऐसे प्रस्तुत किया मानो रूस में गीता पर प्रतिबन्ध लग गया है जो कि सरासर झूठ था। मज़े की बात यह है कि ऐसा प्रचार करने वाले बहुत से लोगों ने ज़िन्दगी में कभी गीता की न तो एक प्रति खरीदी होगी न कभी गीता उठाकर पढी होगी। क्योंकि गीता को पढने, समझने वाला बात को जाने बिना असंतोष भड़काने का माध्यम नहीं बनेगा। धार्मिक मामलों को समझे बिना ऐसे अधार्मिक लोगों की बेचैनी मैं बिल्कुल नहीं समझ पाता हूँ।

भारतीय धार्मिक और आध्यात्मिक परम्परा वीरता के साथ-साथ ज्ञान, संयम और सहिष्णुता की भी है। याद रहे कि हिंदुत्व के पालन और रक्षा के लिए उग्र, सांप्रदायिक, या हिंसक होना किसी भी रूप में आवश्यक नहीं है। धैर्य और उदारता पर आधारित जो सभ्यता अनंत काल से अनवरत आक्रमणों और आघातों के बावजूद सनातन चलती रही है उसे अपनी रक्षा के लिए अधैर्य की कोई आवश्यकता भी नहीं है। खतरे में होंगे कोई और धर्म, पंथ, मज़हब या राजनीतिक विचारधाराएँ; मेरा निर्भय धर्म कभी खतरे में नहीं था, न कभी होगा। गीता के नाम पर चला मुकदमा तो अपनी परिणति को प्राप्त हुआ, अब इस पर असंतोष भड़काने वाले वाक्य या आलेख लिखने वाले हर व्यक्ति का इतना फर्ज़ बनता है कि वह भगवान कृष्ण की गीता की या कम से कम स्वामी प्रभुपाद की "भगवद्गीता जस की तस" की एक प्रति अपने पैसे से खरीदकर पढ़ें, समझें और धर्म के कार्य में अपनी निष्ठा दृढ करे। जो लोग पहले से ही गीता एवम अन्य सद्ग्रंथ पढकर उन्हें अपने जीवन में यथासम्भव अपनाकर अपने को बेहतर व्यक्ति बनाने का सतत प्रयत्न करते रहे हैं, वे सात्विक व्यक्ति वाकई आदर के पात्र हैं।


शुभ समाचार का विडियो
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सम्बन्धित समाचार
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* भगवद्गीता पर रोक का मुक़दमा खारिज
* रूस में भगवदगीता पर पाबंदी की अर्जी खारिज
* ग्रंथों की महानता याद दिला दी रशिया ने

Tuesday, December 27, 2011

उत्सव की रोशनी और दिल का अँधेरा

क्रिसमस के अगले दिन हिमांक से नीचे के तापक्रम पर उसे देखा भोजन की जुगाड़ करते हुए। संसार के सबसे समृद्ध देश में वंचितों को देखकर यही ख्याल आता है कि संसार में मानवीय समस्यायें केवल इसीलिये हैं क्योंकि हमने उन्हें हल करने के प्रयास पूरे दिल से किये ही नहीं। नहीं जानता हूँ कि क्या करने से इस समस्या का उन्मूलन हो सकेगा। बस इतना ही जानता हूँ कि जो होना चाहिए वह किया नहीं जा रहा है। भाव अस्पष्ट हैं और इस बार भी रचना शायद काव्य की दृष्टि से ठीक न हो।

तख्ती सब कहती है
समां शाम का कितना प्यारा
डरता उत्सव से अँधियारा

रिश्ते भरकाते तो डर क्या
हो भले शून्य से नीचे पारा

शाम ढली उल्लास भी बढ़ा
ठिठुर रहा पर वह बेचारा

सैंटा मिलता हरिक माल में
ओझल रहा यही दुखियारा

सबको तो उपहार मिले पर
ये क्यों न प्रभु को प्यारा

बर्फ ने काली रात धवल की
चन्दा छिपा छिपा हर तारा

रजत परत सब ढंके हुए थे
कांपते उघड़ा वक़्त गुज़ारा

अगला दिन भी रहा उनींदा
अलसाया था हर घर द्वारा

सूरज की छुट्टी कूड़े में
बीन रहा भोजन भंडारा

Monday, December 26, 2011

नाम का चमत्कार - कहानी

अब तक: नाते टूटते हैं पर जुड़े रह जाते हैं। या शायद वे कभी टूटते ही नहीं, केवल रूपांतरित हो जाते हैं। हम समझते हैं कि आत्मा मुक्त हो गयी जबकि वह नये वस्त्र पहने अपनी बारी का इंतज़ार कर रही होती है। न जाने कब यह नवीन वस्त्र किसी पुराने कांटे में अटक जाता है, खबर ही नहीं होती। तार-तार हो जाता है पर परिभाषा के अनुसार आत्मा तो घायल नहीं हो सकती। न जल सकती है न आद्र होती है। बारिश की बून्द को छूती तो है पर फिर भी सूखी रह जाती है।
नाम का चमत्कार कहानी की भूमिका पढना चाहें तो यहाँ क्लिक कीजिये
यह वह मेट्रो तो नहीं!
मेट्रो में घुसते ही सुवाक की नज़र सामने ही पहले से बैठी तारा पर पड़ी। लगभग उसी समय तारा ने उसे देखा। इस प्रकार अचानक एक दूसरे को सामने देखकर दोनों ही चमत्कृत थे।

"तुम यहाँ कैसे? बताया भी नहीं?" वह जगह बनाते हुए थोड़ी खिसकी।

"बता देता तो यह चमत्कारिक मिलन कैसे होता? चिंता नहीं, आराम से बैठो, मैं ऐसे ही ठीक हूँ।"

"दिल्ली कब आये?"

"कज़न की शादी थी। परसों वापसी है। आज सोचा कि मेट्रो का ट्रायल लिया जाये। तुम कहीं जा रही हो ... या कहीं से आ रही हो?"

"बेटे की दवा लेकर आ रही थी।" वह रुकी, सुवाक को एक बार ऊपर से नीचे तक देखा और बोली, "तुम बिल्कुल भी नहीं बदले। मेट्रो देखने के लिये तो सूट और टाई ज़रूरी नहीं था।"

"सर्दी थी सो सूट पहन लिया। नैचुरल है टाई भी लगा ली।"

वह मुस्कराई, "कफ़लिंक्स पर अभी भी इनिशियल्स होते हैं क्या?"

"इनिशियल्स? पूरा नाम होता है अब" वह हँसा, "सब कुछ पर्सनलाइज़्ड है, पेन से लेकर घड़ी तक। तुम भी तो नहीं बदलीं। मिलते ही मज़ाक उड़ाने लगीं।" वाक्य पूरा करके सुवाक ने अपनी माँ से चिपककर बैठे बेटे को ध्यान से देखा। उनकी बातों से बेखबर वह अपने डीएस पर कुछ खेलने में मग्न था।

"बच्चे की तबियत कैसी है अब?"

"ठीक है! चिंता की कोई बात नहीं है ..." तारा ने आसपास कुछ तलाशते हुए पूछा, "तुम अभी भी अकेले हो?"

"नहीं, पत्नी भी आयी है। पर सर्दी में उसे घर में रहना ही पसन्द है।"

" ... और बच्चे?"

"बस, हम दो।" सुवाक सकुचाया और मन में मनाया कि तारा बात आगे न बढाये।

"लेकिन तुम तो कहते थे ...." वाक्य पूरा करने से पहले ही तारा को उसकी अप्रासंगिकता का आभास हो चला था। परंतु तीर चल चुका था।

"मैं तो और भी बहुत कुछ कहता था। कहा हुआ सब होने लगे तो दुनिया स्वर्ग ही न हो जाये।"

"सॉरी!"

"सॉरी की कोई बात नहीं है, सुधा को बच्चों से नफ़रत तो नहीं पर ... और मुझे प्रकृति ने वह क्षमता नहीं दी कि मैं उन्हें नौ महीने अपने अन्दर पाल सकूँ।" बात पूरी करते-करते सुवाक को भी अहसास हुआ कि यह बात कहे बिना भी वार्तालाप सम्पूर्ण ही था।

"अच्छा? अगर विज्ञान कर सकता तो क्या तुम रखते?"

"इतना आश्चर्य क्यों? तुम मुझे जानती नहीं क्या? हाँSSS, जानती होतीं तो आज यह सर्प्राइज़ मीटिंग कैसे होती?"

"न, मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। कोई और बात याद आ गयी थी। तुम कहाँ तक जाओगे?"

"डरो मत, तुम्हारे घर नहीं आ रहा। स्टेशन से ही वापस हो लूंगा।" सुवाक शरारत से मुस्कराया।

"डर!" तारा ने गहरी सांस ली, "डर क्या होता है, तुम क्या जानो! सच, तुम कुछ भी नहीं जानते। तुम नहीं समझोगे, उस दुनिया को जिसमें मैं रहती हूँ। तुम्हें नहीं पता कि आज तुम्हें सामने देखकर मैं कितनी खुश हूँ ... आज हम मिल सके ..." बात पूरी करते-करते तारा की आँखें नम हो आयीं।

"कैसा है पहलवान?" सुवाक ने बात बदलने का भरपूर प्रयास किया।

"वे" तारा एक पल को सकुचाई फिर बोली, " ... वे तो शादी के साल भर बाद ही ..."

"क्या हुआ? कैसे?"

"ज़मीन का झगड़ा, सगे चाचा ने ... छोड़ो न वह सब। तुम कैसे हो?"

"हे राम!"

भगवान भी क्या-क्या खेल रचता है। उन आँखों की तरलता ने सुवाक को झकझोर दिया। उसका मन करुणा से भर आया। दिल किया कि अभी उठाकर उसे अंक में भर ले। मगर अब उन दोनों की निष्ठायें अलग थीं। वैसे भी यह भारत था। आसपास के मर्द-औरत, बूढे-जवान पहले से ही अपनी नज़रें उन पर ही लगाये हुए थे।

"तुमने यह शादी क्यों की?" सुवाक पूछना चाहता था मगर वार्ता के इस मोड़ पर वह कुछ बोल न सका। लेकिन इसकी ज़रूरत भी नहीं पड़ी। तारा खुद ही कुछ बताना चाह्ती थी।

"मुझे ग़लत मत समझना। मैंने यह शादी सिर्फ़ इसलिये की ताकि मेरे भाई तुम्हें ..." वह फफक पड़ी, "तुम कुशल रहो, लम्बी उम्र हो।"

"माफ करना तारा, मैंने अनजाने ही ... तुम्हारे ज़ख्म हरे कर दिये। मुझे लगता था कि तुमने मुझे नहीं पहचाना। लेकिन आज समझा कि तुमसे बड़ा नासमझ तो मैं ही था ... मैंने तो, कोशिश भी नहीं की।"

माँ के स्वर का परिवर्तन भाँपकर बच्चे ने खेल से ध्यान हटाकर माँ की ओर देखा और अपने नन्हें हाथों से उसे प्यार से घेर लिया। सुवाक का हृदय स्नेह से भर उठा, "तुम्हारा क्या नाम है बेटा?"

बच्चा अपनी मीठी तोतली आवाज़ में बोला तो सुवाक के मन में घंटियाँ सी बज उठीं। तारा भी मुस्कराई। दोनों की आँखें मिलीं और तारा ने एकबारगी उसे देखकर अपनी नज़रें झुका लीं। सुवाक ने मुस्कराकर अपनी जेब से एक बेशकीमती पेन निकालकर बच्चे को दिया, "ये तुम्हारा गिफ़्ट मेरे पास पड़ा था। सम्भालकर रखना।"

पेन हाथ में लेकर बच्चा बोला, "कौन सा पेन है यह? सोने का है?"

तारा ने उठने का उपक्रम करते हुए अपने बेटे से कहा, "अभी ये पैन और गेम मैं रख लेती हूँ, घर चलकर ले लेना" फिर सुवाक से बोली, "मेरा स्टेशन आ रहा है। हम शायद फिर न मिलें, तुम अपना ध्यान रखना और हाँ, जैसे हो हमेशा वैसे ही बने रहना।"

"वैसा ही? मतलब डरावना?"

"मतलब तुम्हें पता है!"

दोनों हंसे। पेन को अभी तक हाथों से पकड़े हुए बच्चा एकाएक खुशी से उछल पड़ा, "अंकल तो जादूगर हैं, पेन पर मेरा नाम लिखा है। उन्हें पहले से कैसे पता चला?"

बेटे का हाथ थामे तारा ने ट्रेन से उतरने से पहले मुड़कर सुवाक को ऐसे देखा मानो आँखों में भर रही हो, फिर मुस्कराई और चल दी।

[समाप्त]

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* कोई चेहरा भूला सा.... कहानी
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Saturday, December 24, 2011

जब से गये तुम - कविता

कई ब्लॉग्स पर बहुत सी टिप्पणियाँ अभी भी प्रकाशित नहीं हो रही हैं। कृपया अपने ब्लॉगर डैशबोर्ड में जाकर "स्पैम" टैब देखकर वहाँ पड़ी टिप्पणियों को चुनकर "स्पैम नहीं" क्लिक करके रिलीज़ कर दीजिये। समस्या को विस्तार से जानने के लिये "ये क्या हो रहा है भाई?" पढें। धन्यवाद!
अभिषेक के ब्लॉग पर चिट्ठी पढकर कुछ पंक्तियाँ प्रस्फुटित हुईं। शायद कविता न कही जा सके, फिर भी सोचा कि साझा कर ही लूँ ...

मैं अकेला नहीं
क्योंकि
मेरे पास है खज़ाना
बीता वक़्त, टूटे वादे
वे अमिट यादें
और इन सब में
समाये तुम

जानता हूँ कि
तुम्हारी भी एक दुनिया है
नितांत अपनी, निजी
मुझसे अलग, मुझसे दूर

फिर भी
दुःख, पीड़ा या खालीपन
दूर-दूर तक नहीं दिखते
मैं भी नहीं
होता है केवल
परमानन्द
जब मेरे तसव्वुर में होते हो
तुम!


(~अनुराग शर्मा)
क्रिस्मस के बड़े दिन की हार्दिक शुभकामनायें!

Thursday, December 22, 2011

नाम का चमत्कार - भूमिका

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो. न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।
जादूगर के मंच पर बड़े कमाल होते हैं। इसी तरह हिन्दी फ़िल्मों में भी संयोग पर संयोग होते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि ऐसे, जादू, कमाल और संयोग केवल किताबी बातें हैं। उनकी निजी ज़िन्दगी में शायद ऐसा कोई कमाल कभी हुआ ही नहीं। मैं यह नहीं मानता। मुझे तो लगता है कि वे अपने जीवन में नित्यप्रति घट रहे चमत्कार को देख पाने की शक्ति खो चुके हैं। लेकिन श्रीमान सुवाक त्रिगुणायत ऐसे लोगों में से नहीं है। शायद यही एक कारण है कि उनके इतने कठिन नाम, अति-सुरुचिपूर्ण जीवनशैली और विराट भौगोलिक दूरी के बावजूद वे अब तक मेरे मित्र हैं।

ये सुवाक की मैत्री का ही चमत्कार है कि मैंने भी आज उस्तादी उस्ताद से करने का प्रयास किया है। प्रस्तुत है, एक छोटी कहानी जो मेरे एक पसन्दीदा ब्लॉग पर प्रकाशित एक कहानी से प्रभावित तो है मगर है अपने अलग अन्दाज़ में - विडियो किल्ड द रेडियो स्टार बनाम अउआ, अउआ? नहीं! ट्वेल्व ऐंग्री मैन बनाम एक रुका हुआ फैसला? कतई नहीं!

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही
अब तो उसका वापस घर आना इतने-इतने दिन बाद होता है कि हर बार भारत नया लगता है। पिछली बार देखे हुए भारत से एकदम भिन्न। सुवाक की यह विशेषता है कि परिवर्तन अच्छा है या बुरा, इसके बारे में कोई भी उसे कुछ कहने को बाध्य नहीं कर सकता। उसके जीवन में श्वेत-श्याम कुछ भी नहीं है। दुश्मनों से दुआ-सलाम की बात हो या दोस्तों की खिंचाई, जो सुवाक को जानता नहीं, उसके लिये आदमी अजीब है मगर जो उसे जानते भी हैं उनमें भी कई उससे बचते हैं। कुछ-एक लोग उसके तौर-तरीके से सहमे रहते हैं और साज-सलीके से कुछ झिझके से रहते हैं। जो बचे वे उसकी बेबाकी से बचना चाहते हैं। एक सहकर्मिणी ने एक बार उसकी अनुपस्थिति में कहा था कि वह सुवाक से बहुत डरती थी। मेरी हँसी रोके न रुकी। कोई सुवाक से भी डरा हो, इससे बड़ा मज़ाक क्या होगा। लेकिन जीवन में जिस प्रकार चमत्कार होते हैं, उसी प्रकार मज़ाक भी बखूबी होते हैं। बल्कि कई बार तो ज़िन्दगी ऐसा मज़ाक कर जाती है कि हम हँस भी नहीं पाते। तारा और सुवाक का ब्रेकअप भी ऐसा ही एक मज़ाक था।  तारा के अनुसार उसने अपने परिवार का सम्मान बचा लिया और सुवाक? उसने तो शायद कभी कुछ खोया ही नहीं। पहले नौकरी छोड़ी, फिर शहर और फिर देश।

नाते टूटते हैं पर जुड़े रह जाते हैं। या शायद वे कभी टूटते ही नहीं, केवल रूपांतरित हो जाते हैं। हम समझते हैं कि आत्मा मुक्त हो गयी जबकि वह नये वस्त्र पहने अपनी बारी का इंतज़ार कर रही होती है। न जाने कब यह नवीन वस्त्र किसी पुराने कांटे में अटक जाता है, खबर ही नहीं होती। तार-तार हो जाता है पर परिभाषा के अनुसार आत्मा तो घायल नहीं हो सकती। न जल सकती है न आद्र होती है। बारिश की बून्द को छूती तो है पर फिर भी सूखी रह जाती है।
[नाम का चमत्कार - कहानी]

"रेडियो प्लेबैक इंडिया" पर गिरिजेश राव की कहानी "राजू के नाम एक पत्र" का ऑडियो सुनने के लिये यहाँ क्लिक कीजिये

Friday, December 16, 2011

बेहतर हो - कविता

(~ अनुराग शर्मा)

ये दिन जल्दी ढल जाये तो बेहतर हो
रात अभी गर आ जाये तो बेहतर हो
सूरज से चुन्धियाती आंखें बहुत सहीं
घनघोर घटा अब घिर आये तो बेहतर हो

बातों को तुम न पकड़ो तो बेहतर हो
शब्दों में मुझे न जकड़ो तो बेहतर हो
कौन किसे कब परिभाषित कर पाया है
नासमझी पे मत अकड़ो तो बेहतर हो

विषवेल अगर छँट पाये तो बेहतर हो
इक दूजे को सहन करें तो बेहतर हो
नज़दीकी ने थोड़ा सा असहज किया
कुछ दूरी फिर बन जाये तो बेहतर हो

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सम्बन्धित कड़ियाँ
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* यूँ भी तो हो - एक इच्छा
* काश - कविता

Friday, December 9, 2011

श्रद्धांजलि - डॉ.संध्या गुप्ता

अनुराधा जी की टिप्पणी से इस दुखद समाचार की जानकारी मिली। स्तब्ध हूँ, पर बताना ज़रूरी समझता हूँ। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति और परिवार को शक्ति दे!
डॉ. संध्या गुप्ता की बीमारी की खबर मुझे कुछ समय पहले मिली थी। इस सिलसिले में मैंने उन्हें ब्लॉग के जरिए संदेश भेजा, पर जबाव अभई तक नहीं आया। लेकिन जागरण- याहू न्यूज पर यह खबर अभी देखी तो शेयर कर रही हूं- बुरी खबर है
"नहीं रही डॉ.संध्या गुप्ता, शोक में डूबा विश्वविद्यालय"
लिंक यह रहा।
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/jharkhand/4_8_8465580.html

उनका जाना सदमे से कम नहीं है। दो साल पहले ही उनसे दिल्ली में मुलाकात हुई थी, भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार समारोह में।

ज्यादा कहा नहीं जा रहा। उनसे फिर बात न कर पाने का अफसोस रहेगा।
(आर. अनुराधा)

डॉ. सन्ध्या गुप्ता
सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ.संध्या गुप्ता अब इस दुनियां में नहीं रही। पिछले कई माह से बीमार चल रही डॉ.गुप्ता ने गुजरात के गांधी नगर में आठ नवम्बर 2011 को सदा के लिए आंखें मूंद ली हैं। वह अपने पीछे पति सहित एक पुत्र व एक पुत्री को छोड़ गयी है। पुत्र प्रो.पीयूष यहां एसपी कॉलेज में अंग्रेजी विभाग के व्याख्याता है। उनके आकस्मिक निधन पर विश्वविद्यालय परिवार ने गहरा दुख प्रकट किया है। प्रतिकुलपति डॉ.प्रमोदिनी हांसदा ने 56 वर्षीय डॉ.गुप्ता के निधन पर शोक प्रकट करते हुए कहा कि दुमका से बाहर रहने की वजह से आखिरी समय में उनसे कुछ कहा नहीं जा सका इसका उन्हें सदा गम रहेगा। उन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा कि हिंदी जगत ने एक अनमोल सितारा खो दिया है।

डॉ.गुप्ता को उनकी काव्यकृति 'बना लिया मैंने भी घोंसला' के लिए मैथिलीशरण गुप्त विशिष्ट सम्मान से सम्मानित किया गया था।
मित्रों, एकाएक मेरा विलगाव आपलोगों को नागवार लग रहा है, किन्तु शायद आपको यह पता नहीं है की मैं पिछले कई महीनो से जीवन के लिए मृत्यु से जूझ रही हूँ । अचानक जीभ में गंभीर संक्रमण हो जाने के कारन यह स्थिति उत्पन्न हो गयी है। जीवन का चिराग जलता रहा तो फिर खिलने - मिलने का क्रम जारी रहेगा। बहरहाल, सबकी खुशियों के लिए प्रार्थना।
(सन्ध्या जी की अंतिम पोस्ट से)

विनम्र श्रद्धांजलि!

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सम्बन्धित कड़ियाँ
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* नहीं रही डॉ.संध्या गुप्ता, शोक में डूबा विश्वविद्यालय
* क्या आपको कुछ पता है?
* फिर मिलेंगे - सन्ध्या जी की अंतिम पोस्ट
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Wednesday, December 7, 2011

क़ौमी एकता - लघुकथा

"अस्सलाम अलैकुम पण्डित जी!  कहाँ चल दिये?

"अरे मियाँ आप? सलाम! मैं ज़रा दुकान बढा रहा था। मुहर्रम है न आज!"

"तो? इतनी जल्दी क्यों? तुम तो रात-रात भर यहाँ बैठते हो। आज दिन में ही?"

"क्या करें, बड़ा खराब समय आ गया है। आपको पता नहीं पिछली बार कितना फ़जीता हुआ था? और फिर आज तो तारीख भी ऐसी है।"

"अरे पुरानी बातें छोड़ो पण्डित जी। आज तो आप बिल्कुल बेखौफ़ बैठो। मैं यहीं हूँ।"

"मियाँ, पिछली बार आपके मुहल्ले का ही जुलूस था जिसने आग लगाई थी।"

"मुआफ़ी चाहता हूँ पण्डित जी, तब मैं यहाँ नहीं था, इसीलिये ऐसा हो सका। अब मैं वापस आ गया हूँ, सब ठीक कर दूँगा।"

"अजी आपके होने से क्या फ़र्क पड़ेगा? कहीं आपकी ही इज़्ज़त न उतार दें मेरे साथ।"

"उतारने दीजिये न, वो मेरी ज़िम्मेदारी है! लेकिन आप दुकान बन्द नहीं करेंगे आज।"

"शर्मिन्दा न करें, आपकी बात काटना नहीं चाहता हूँ, पर मैं रुक नहीं सकता ... जान-माल का सवाल है।"

"पर वर कुछ नहीं। आज मैं यहीं बैठकर चाय पियूँगा। जुलूस गुज़र जाने तक यहीं बैठूंगा। देखता हूँ कौन माई का लाल आगे आता है।"

"क्यों अपने आप को कठिनाई में डाल रहे हो मियाँ? इतने समय के बाद मिले हो। मेरे साथ घर चलो, वहीं बैठकर चाय भी पियेंगे, बातें भी करेंगे। खतरा मोल मत लो। "

"न! खुदा कसम मैं आज यहाँ से उठने वाला नहीं पूरा जुलूस निकल जाने तक। होरी से कहकर यहीं दो चाय मंगवाओ।"

"आप समझ नहीं रहे हैं मियाँ, अब पहले वाली बात नहीं रही। ये लौडे हम बुज़ुर्गों की भावनायें नहीं समझते। दुश्मन मानते हैं हमें।"

"आप यक़ीन कीजिये, इनमें किसी की मज़ाल नहीं जो मेरे सामने खड़ा हो सके। चलाने से पहले बहुत कुछ समझाया है इन्हें।"

"जैसी आपकी मर्ज़ी मियाँ! होरी, जा मुल्ला जी के लिये एक स्पेशल चाय लेकर आ फ़टाफ़ट!"

"एक नहीं, दो!"

"अरे मैं अभी चाय पी नहीं पाऊंगा, मौत के मुँह में बैठा हूँ।"

"वो परवरदिग़ार सबकी हिफ़ाज़त करता है। जब तक मैं यहाँ हूँ, आप बेफ़िकर होकर बैठिए।"

"बेफ़िकर? ज़रा पलट के देखिये! आ गये हुड़दंगी। शीशे तोड़ रहे हैं। ताजिये दिखने से पहले तो जलाई हुई दुकानों का धुआँ दिखने लगा है।"

"अरे! ये कैसे हो गया? चलने से पहले मैने सबको समझाया था, क़ौमी एकता पर एक लम्बी तकरीर दी थी।"

"बस ऐसे ही होता है आजकल। एक कान से सुनकर दूसरे से निकालते हैं। अब मेरी जान और दुकान आपके हवाले है।"

"ज़ाकिर!, हनीफ़! क्या हो रहा है ये सब? क्या बात तय हुई थी जुलूस उठने से पहले?"

"अरे आप यहाँ? सब खैरियत तो हैं?"

"मुझे क्या हुआ? थोड़ा तेज़ चलकर पण्डितजी से मिलने आ गया था।"

"आपको ऐसे बिना-बताये ग़ायब नहीं होना चाहिये था। शहर का माहौल बड़ा खराब है।"

"बेटा, ये पण्डित रामगोपाल हैं! मेरे लिये सगे भाई से बढकर हैं।"

"वो तो ठीक है। लेकिन आपको ग़ायब देखके वहाँ तो ये उड़ गयी कि हिन्दुओं ने आपको अगवा कर लिया है ... हमने बहुत रोका मगर जवान खून है, बेक़ाबू हो गया। हम भी क्या करते? किस-किस को समझाते?"

Thursday, December 1, 2011

तू मेरा बन - कविता

रेशम तन
निर्मल मन

तुझको ही
चाहें जन

हटा तमस
चमके जीवन

मन बाजे
छन छन

जग तेरा
तू मेरा बन

(~ अनुराग शर्मा)
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सम्बन्धित कड़ियाँ
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* सब तेरा है
* क्यों सताती हो?
* आग मिले