Sunday, October 11, 2020

* घर के वृद्ध *


कहते कहते हुए रुक जाते हैं
जब न सुनता किसी को पाते हैं।

चलो अब डायरी में लिख लेंगे
मन को कहके यही भरमाते हैं।

बीती बातों को याद कर-कर के 
दिल के घावों को वे सहलाते हैं।

सबकी मजबूरियों को समझा है
अपनी बारी पे चुप हो जाते हैं।

अपनी तनहाइयों को झटका दे
गीत उत्सव के गुनगुनाते हैं॥
***

5 comments:

  1. हकीकत से जब रूबरू हो जाते हैं
    खुद को समझाते हुए पाते हैं

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  2. हमारा अवचेतन हमसे वही करवाता है जिसमें कोई लाभ हो, आनन्द हो. बहुत कम वृद्ध ऐसा कुछ कहते हैं जिसमें किसी की रूचि हो. आज तो किसी की बात सुनने का समय नहीं किसी को. छोटे बच्चे की बात सुन लें तो वह ही बहुत है.

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  3. बहुत सुन्दर

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  4. बहुत सार्थक, वृद्ध होना प्राकृतिक है ग्रेसफ़ुल वृद्ध होना एक कला !

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