Friday, October 17, 2025

उलटबाँसी सूरज की

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)

सुबह के सूरज की तो 
शान ही अलग है
ऊँचे लम्बे पेड़ों पर

शाम की बुढ़ाती धूप भी
देर तक रहती है मेहरबान
उपेक्षित करके छोटे पौधों को

यह भी कमाल है कि
छोटे पौधे बढ़ सकते थे
काश! धूप उन तक पहुँच पाती।

8 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 20 अक्टूबर 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  2. शायद छोटे पौधे भी कुदरत को चाहिये होते हैं, वे धरती की नमी को भीतर क़ैद रखते हैं और छोटे जीवों को पनाह देते हैं

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  3. सुंदर प्रस्तुति

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  4. यार, आपकी यह बात पेड़ों और पौधों से कहीं ज़्यादा, लोगों और हालातों की लगती है। बड़ा पेड़ जैसे सारी धूप खा जाता है, वैसे ही ज़िंदगी में कुछ लोग सारे मौके समेट लेते हैं। सुबह की धूप का रौब और शाम की नरमी, दोनों अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन छोटा पौधा वहीं इंतज़ार करता रहता है कि कब उसकी बारी आए।

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