यार, आपकी यह बात पेड़ों और पौधों से कहीं ज़्यादा, लोगों और हालातों की लगती है। बड़ा पेड़ जैसे सारी धूप खा जाता है, वैसे ही ज़िंदगी में कुछ लोग सारे मौके समेट लेते हैं। सुबह की धूप का रौब और शाम की नरमी, दोनों अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन छोटा पौधा वहीं इंतज़ार करता रहता है कि कब उसकी बारी आए।
मॉडरेशन की छन्नी में केवल बुरा इरादा अटकेगा। बाकी सब जस का तस! अपवाद की स्थिति में प्रकाशन से पहले टिप्पणीकार से मंत्रणा करने का यथासम्भव प्रयास अवश्य किया जाएगा।
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 20 अक्टूबर 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteशायद छोटे पौधे भी कुदरत को चाहिये होते हैं, वे धरती की नमी को भीतर क़ैद रखते हैं और छोटे जीवों को पनाह देते हैं
ReplyDeleteसुंदर
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ReplyDeleteशुभ हो दीप पर्व
Deleteबेहतरीन
ReplyDeleteसुंदर प्रस्तुति
ReplyDeleteयार, आपकी यह बात पेड़ों और पौधों से कहीं ज़्यादा, लोगों और हालातों की लगती है। बड़ा पेड़ जैसे सारी धूप खा जाता है, वैसे ही ज़िंदगी में कुछ लोग सारे मौके समेट लेते हैं। सुबह की धूप का रौब और शाम की नरमी, दोनों अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन छोटा पौधा वहीं इंतज़ार करता रहता है कि कब उसकी बारी आए।
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