(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)
दोनों दिल ऐसे मिले, दिल का गिला सारा गयाये जग हमारा हो गया, मेरा-तिरा सारा गया॥
तेरी वफ़ा ने छू लिया तो ज़ख़्म सारे भर गये
इक तेरे आने से मेरा दर्द-ए-दिल सारा गया॥
रात की तन्हाई में, इक चाँद, कुछ तारे भी थे
तेरे उजाले में मगर, उनका नशा सारा गया॥
इश्क़ के कूचे में हमने, नाम जब तेरा लिया
ग़मज़दा अपना फ़साना, लम्हों में सारा गया॥
रहने की, तेरे दिल के कोने में, लगन ऐसी जगी
हम जहाँ भी रहते थे, वाँ का पता सारा गया॥
बदसूरती पर मेरी जिसको, न ज़रा भी नाज़ था
तेरी नज़र को देखकर, वो आईना सारा गया॥
तेरी नज़र को देखकर, वो आईना सारा गया॥
मैं यहाँ कुछ कर सकूँ, थोड़ी जगह मुझको भी दे
खुद को साबित करने में, मैं सारा का सारा गया॥
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वाह
ReplyDeleteवाह!! बेहद खूबसूरत शायरी, शीर्षक में मारा लिखा है और ग़ज़ल में सारा, इसका कोई विशेष कारण है क्या
ReplyDeleteजी, इस ग़ज़ल की तुक के अनुसार मारा नहीं हो सकता, लेकिन होना चाहिये था सो शीर्षक में ही सही...
Deleteलाज़वाब ग़ज़ल।
ReplyDeleteसादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार २५ नवंबर २०२५ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
बेहतरीन ! ...
ReplyDeleteमुखौटों में लिपटा रहा असली चेहरा मेरा कुछ इस कदर,
आईना ग़म-ज़दा रहा ताज़िंदगी, पर उसे दिखा ना सका।
लाजवाब
ReplyDeleteवाह
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