Tuesday, March 16, 2010

आल इज वैल

कुछ न कुछ चलता न रहे तो ज़िंदगी क्या? इधर बीच में काफी भागदौड़ में व्यस्त रहा. न कुछ लिख सका न ज़्यादा पढ़ सका. इस बीच में बरेली के दंगे की ख़बरों से मन बहुत आहत हुआ. कुल्हाड़ा पीर पर एक बहुत अपनी दुकान भी जलकर राख हो गयी - यूं लगा जैसे दंगाइयों ने मेरे बचपन को ही झुलसाने की कोशिश की हो. दंगा कराने वाले जब गिरफ्तार हुए तो कुम्भकर्णी नींद ले रहे समाचार चैनलों की कान पर भी जून रेंगने लगी. बहरहाल, जो पकडे गए वे बरी भी हो गए मगर भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने का कितना उद्यम हुआ यह हम सब जानते हैं. भाई धीरू सिंह (बरेली) और भारतीय नागरिक (बरेली/लखनऊ) यथा समय जानकारी देते रहे, इससे काफी राहत मिली.

कुछ अपनों ने खैरियत पूछी थी. सो बता दूं कि फिलहाल जापान के एक शोधनगर में हूँ. अगले सप्ताह वापस घर पहुंचूंगा. तब पढ़ना, लिखना और सपनों की यात्रा वापस शुरू होगी. यहाँ तो वसंत आ चुकी है. उसके चित्र बाद में. अभी तो जापानी मुद्रा येन के कुछ चित्र. साथ ही कोका कोला की यह बोतल कुछ अलग सी लगी. कैन और बोतल का संगम याद दिला रहा है कि जापान किस तरह पूर्व और पश्चिम के मूल्यों में समन्वय बिठा सका है सो उसकी तस्वीर भी, ताकि सनद रहे.

सभी को युगादि, नव संवत्सर, चैत्रादि, चेती-चाँद, नव-रात्रि, गुडी पडवो, बोहाग बिहू तदनुसार कलियुग ५११२, सप्तर्षि ५०८५ की हार्दिक शुभकामनाएं!

Sunday, February 21, 2010

उठ दीवार बन

नरक के रस्ते से काफी बचना चाहा लेकिन फिर भी कुछ कहे बिना रहा न गया. स्वप्न-जगत से एक छोटा से ब्रेक ले रहा हूँ. तब तक गिरिजेश राव के "नरक के रस्ते" से प्रेरित कुछ अनगढ़ सी पंक्तियाँ प्रस्तुत है:

इंसान बलिश्ते क्यूँ अवरोध दानवी क्यूँ
प्रश्न सभी अपने रह जाते अनुत्तरित क्यूँ

क्यूँ त्याग दधीचि का भूदेव भूमिगत क्यूँ
ये सुरेश पराजित है वह वृत्र वृहत्तर क्यूँ

इस आग का जलना क्यूँ दिन रात सुलगना क्यूँ
ये नरक बनाते कौन इसमें से गुज़रना क्यूँ

दिल क्यूँ घबराता है यूँ दम घुटता है क्यूँ
चल उठ दीवार बनें बेबात का डरना क्यूँ

(अनुराग शर्मा)

Friday, February 19, 2010

नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे [6]

आइये मिलकर उद्घाटित करें सपनों के रहस्यों को. पिछली कड़ियों के लिए कृपया निम्न को क्लिक करें:
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अलार्म से पहले उठना - मेरा अवलोकन
प्रतिदिन एक ही समय पर उठने की बात और है. मगर हर दिन के अलग-अलग अलार्म से कुछ क्षण पहले उठने का अजूबा? आज सुबह मेरे उठने के पल भर बाद मेरे सेलफोन का छह बजे का अलार्म बजने लगा. मैंने तुरंत उसे बंद किया और देखा कि फ़ोन में छह बजकर दो मिनट हो चुके थे. मतलब यह कि अलार्म बजने से उसके बंद होने तक 2 मिनट से अधिक (और 3 से कम) गुज़र चुके थे जो मेरे अंदाज़े के एक पल से कहीं अधिक है. स्पष्ट है कि मैं अलार्म के दो मिनट तक बजते रहने के बाद उठा था मगर मेरे दिमाग को या तो इसका कतई भान नहीं था या फिर सोने और जागृति के बीच के पल में ऐन्द्रिक (श्रवण) अनुभूति ग्रहण करने में कोई रुकावट आई थी. और मैं इसी भ्रम में जीता रहा हूँ कि अलार्म मेरे जागने के बाद बजता है. पुरानी अनालॉग टाइमपीस घड़ी में यह संवेदी देरी पहचानना आसान नहीं है खासकर जब आप उठकर जल्दी से अपनी रेल, बस या जहाज़ पकड़ने की फ़िक्र में हों. मगर आजकल डिजिटल घड़ियों ने यह काम आसान कर दिया है. समीर जी और मुसाफिर भाई, अगली बार बारीकी से समय ज़रूर चेक करिये.

एक किस्सा
आधी रात में कुछ खड़खड़ होती है और आँख खुल जाती है. देखता हूँ कि बैठक में पड़े सोफे पर सो रहा हूँ. हल्का सा आश्चर्य भी होता है, फिर याद आता है कि शाम को ज़्यादा थक गया था. सामने की दीवार पर बहुत बड़ी (लगभग 5x12 वर्ग फुट) आयताकार खिड़की है. यहाँ आमतौर पर खिडकियों, दरवाजों के बाहर लोहे की सलाख या लकड़ी की किवाड़ आदि नहीं होते हैं. खिड़की में से चांदनी छनकर अन्दर आ रही है. आसमान बहुत साफ़ है. तारे झिलमिला रहे हैं और चौदहवीं का चांद बहुत सुन्दर दिखाई दे रहा है. रात में भी खिड़की इतनी साफ़ है कि मुझे लगता है मानो उसमें शीशा हो ही नहीं. मैं ध्यान से देखता हूँ तो पाता हूँ कि शीशा सचमुच नहीं है. मतलब यह कि खिड़की के नाम पर बस दीवार में एक बड़ा सा खाली छिद्र है.

अब मुझे खड़खड़ की उस आवाज़ की फ़िक्र होती है जिसकी वजह से मेरी आँख खुली थी. मैं साँस रोककर सुनता हूँ, कुछ नहीं है, मुझे पुलिस अधिकारी फूफाजी की बात याद आती है कि फिल्मों में दिखाई जाने वाली बातों से उलट असली ज़िन्दगी में चोरी-चकारी जैसे व्यवसाय को अपनाने वाले लोग काफी काहिल और लालची किस्म के लोग होते हैं. यदि उन्हें ज़मीन पर ही कुछ चुराने को मिल जाए तो वे एक मंजिल भी नहीं चढ़ते. अगर खिड़की खुली मिल जाए तो वे ताला तोड़ने की ज़हमत नहीं करते.

उनकी बात याद आते ही मुझे इस तथ्य का संतोष होता है कि मेरा अपार्टमेन्ट पाँचवीं मंजिल पर है. फिर भी ऐसा क्यों लगता है जैसे कि सोफे के पीछे दो क़दमों की आवाज़ आयी थी? मैं फिर से सोचता हूँ, तब याद आता है कि पाँचवीं मंजिल पर तो पिछ्ला अपार्टमेन्ट था, यह वाला तो ग्राउंड फ्लोर पर ही है. मुझे अपनी इस बेवकूफी पर ताज्जुब होता है. अब मैं बिलकुल चौकन्ना होकर लेटा हूँ. आँख नाक कान सब खुले हैं. तभी...

तभी सामने का दरवाज़ा खुलता है. इसके साथ ही मैं एक क्षण गँवाए बिना "कौन है?" चिल्लाता हुआ चादर फेंककर दरवाज़े तक पहुँच जाता हूँ. देखता हूँ कि दरवाज़े पर श्रीमती जी खड़ी हैं. ताला उन्होंने अपनी चाबी से खोला था. कल रात हम सब उनकी बहन का जन्मदिन मना रहे थे. मेरा कुछ काम रह गया था सो मैं जल्दी वापस आ गया था और काम पूरा करके बाहर सोफ़े पर ही सो गया था. वे रुक गयी थीं और अभी वापस आयी थीं. पत्नी से पूछता हूँ कि क्या उन्होंने मुझे कुछ कहते सुना, उनका जवाब नकारात्मक है. बताने की ज़रूरत नहीं कि मेरे चादर फेंकने से पहले तक की हर बात एक स्वप्न का हिस्सा थी. सुबह हो चुकी थी और सोफा के सामने वाली दीवार पर कोई खिड़की नहीं थी.

स्वप्न को गतिमान करने में माहौल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. उपरोक्त स्वप्न पूरी तरह मेरी पत्नी के क़दमों की आवाज़ और दरवाज़ा खोलने के प्रयत्न से संचालित था. फूफाजी से चोरों के विषय में मेरी कोई बात कभी नहीं हुई थी. यह विचार मेरे दिमाग में ठीक उसी तरह आया जैसे कि जागृत अवस्था में आया होता. मगर ख़ास बात यह है कि यह विचार किसी बीती हुई घटना पर आधारित न होकर उसी समय की परिस्थिति की प्रतिक्रया स्वरूप बना था. हाँ स्वप्न में यह दुविधा ज़रूर थी कि अपार्टमेन्ट किस मंजिल पर है क्योंकि मैं अतीत में विभिन्न मंजिलों पर रह चुका था. वैसे यह वाला अपार्टमेन्ट पाँचवीं मंजिल पर ही था.

यह सपना किसी सामान्य सपने जैसा ही है मगर यहाँ इस विशेष सपने का ज़िक्र करना मैं बहुत ज़रूरी समझता हूँ क्योंकि यह सपना कई महत्त्वपूर्ण बातें बता रहा है. क्या आप अंदाज़ लगा सकते हैं इतना विस्तृत सपना देखने में मुझे कितनी देर लगी होगी और क्यों?

[क्रमशः]