मिटते साये छल के दिल में, बीते कल के भय के हों।
साफ़ नज़र आती है मंज़िल, साफ़ नज़र है राहों की,
मिटने हैं वे सभी निशाँ जो, रंजो-ग़म, विस्मय के हों।
कहा जो तुमने, सच ही होगा, छल शब्दों में होगा क्यों,
रिश्ते वही टिकेंगे जग में, जो प्रीति और विनय के हों।
तुमने थामा हाथ हमारा, युग तक यह विश्वास रहे,
टूटन कैसी, रिश्ते जो हों, निष्ठा और आश्रय के हों।
फूल वही खिलते उपवन में, जिनकी रहे सलामत जड़,
झूठ की नींव गिरा दी जाये, भवन सभी विजय के हों।

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में मंगलवार 28 एप्रिल, 2026
ReplyDeleteको लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
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सुंदर सृजन, रंजोगम का मिटना तो ठीक है पर विस्मय तो जीवन को नया बनाये रखता है न
ReplyDeleteयार, सच कहूँ तो ये कविता पढ़कर मन में एक शांत भरोसा सा बस जाता है। आपने प्यार और रिश्तों को बहुत इज्जत के साथ पेश किया है, और वही बात दिल तक सीधी पहुँचती है। आपकी ये लिखावट अलग इसलिए लगती है क्योंकि इसमें दिखावा नहीं, सच्ची नीयत और गहरा सम्मान साफ झलकता है।
ReplyDeleteकहा जो तुमने, सच ही होगा, छल शब्दों में होगा क्यों,
ReplyDeleteरिश्ते वही टिकेंगे जग में, जो प्रीति और विनय के हों। मौजूदा समय में रिष्तों की गहराई को क्या खूबसूरत से कह डाला आपने अनुराग जी
बहुत अच्छा लिखा है , जैसा कि अनिता जी ने लिखा है विस्मय कौतूहल तो जीवन है , एक दो और शब्द हैं , आप चाहे तो प्रयोग कर सकते हैं , अभिनय या अनिर्णय ।
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