Saturday, June 12, 2010

बोनसाई बनाएं - क्विक ट्यूटोरियल

बोनसाई के चित्रों की मेरी पिछली पोस्ट पर अपेक्षित प्रतिक्रियाएँ आयीं. कुछ लोगों को चित्र पसंद आये. सुलभ जायसवाल और भारतीय नागरिक ने बोनसाई कैसे बनाए जाते हैं यह जानना चाहा. रंजना जी को एक उड़िया फिल्म की याद आयी. मैं उनकी दया भावना की कद्र करता हूँ इसलिए कोई सफाई देने की गुस्ताखी नहीं करूंगा. भूतदया एक दुर्लभ सदगुण है और जिनके मन में भी है उनके लिए मेरे मन में बड़ा आदर है.
बोनसाई पर एक क्विक ट्यूटोरियल(भारतीय नागरिक के अनुरोध पर त्वरित कुंजी)
पौधे:
याद रखिये कि सच्चे बोनसाई पौधे नहीं वृक्ष हैं इसलिए उस जाति के पौधे चुनिए जो वृक्ष बन सकते हैं. मध्यम ऊंचाई के वृक्ष या झाडी आदर्श हैं. फाइकस जाति (अंज़ीर, वट, पीपल, गूलर, पाकड़ आदि) के वृक्षों की जड़ें प्राकृतिक रूप से उथली होती हैं इसलिए वे बोनसाई के लिए अच्छे प्रत्याशी हैं. मैंने बहुत से पेड़ जैसे चीड, कटहल, मौलश्री आदि दिल्ली में सफलता से उगाये थे - यह सभी वृक्ष भारत के मैदानी क्षेत्रों में आराम से रह जाते हैं. अमरुद, आम, अनार, स्ट्राबेरी आदि की प्राकृतिक रूप से छोटी नस्लें आसानी से मिल जाते हैं, उन्हें लगाएँ. लखनऊ में बौटेनिकल गार्डन के बाहर बहुत से पौधे मिलते हैं. अन्य नगरों में भी पौधशालाएँ मिल ही जायेंगी.

मृदा:
किताबों में अक्सर मिट्टी को कृमिरहित करने की बात कही गयी होती है मगर मैंने हमेशा बाग़ की मिट्टी का प्रयोग पत्तों और गोबर की खाद के साथ किया है. इतना ध्यान रहे कि पत्ते और गोबर की सड़न प्रक्रिया गमले में रखने से पहले ही पूरी हो चुकी हो. भारत में नीम के पत्तों की खाद मिलती है. उसका प्रयोग भी किया जा सकता है.

1995 - पिताजी तीन बोनसाई के साथ - फलित अनार, पाकड़, जूनिपर

ध्यान रहे:
जड़ों पर ज़रा सी धूप या हवा लगने भर से एक छोटा पौधा मर सकता है. जब भी मिट्टी बदलें, जड़ें काटें या पहली बार बर्तन में लगाएँ तो पौधे की जड़ों पर मिट्टी जमी रहने दें और या तो उसे गीले कपड़े में या पानी की बाल्टी/कनस्तर में रखें. ऐसे सारे काम शाम को ही करें ताकि बदलने के तुरंत बाद कड़ी धूप या गर्मी से बचाव हो सके. मिट्टी को मॉस घास या सूखी साधारण घास से ढंके रहने से मिट्टी की नमी देर तक रहती है. जड़ों में पानी कभी न ठहरने दें. शुरूआत में अधिकाँश पौधे जड़ें गलने से मरते हैं न कि मिट्टी सूखने से.

पात्र:
ऐसा हो कि उसमें कुछ पानी डालने पर मिट्टी इस तरह न बहने पाए कि जड़ें खुल जाएँ. शुरूआत बड़े बर्तन या गमले से से करें. अपना अनुभव और पौधे की दृढ़ता बढ़ने के बाद बर्तन छोटा कर सकते हैं. कहावत भी है पेड़ बड़ा और बर्तन छोटे.

श्रीगणेश:
अब आते हैं सबसे ख़ास मुद्दे पर, यानी बोनसाई का पुंसवन संस्कार. एक बोनसाई की शुरुआत आप बीज से भी कर सकते हैं. खासकर जिस तरह गर्मियों के दिनों में इधर-उधर बिखरी आम की गुठलियों में से बिरवे निकलते रहते हैं या दीवारों की दरारों में पीपल आदि उगते हैं - वे इस्तेमाल में लाये जा सकते हैं. मैं बोनसाई के लिए गुठली का प्रयोग तभी करता हूँ जब तैयार पौध मिलना असंभव सा हो. जैसे दिल्ली में हमने चीड़ एवं कटहल तथा पिट्सबर्ग में लीची बीजों से उगाई थी. अगर बीज से उगाने की मजबूरी हो तो पहले पौधे को ज़मीन पर पनपने दीजिये क्योंकि छोटे बर्तन में वर्षों तक वे पौधे जैसे ही रह जाते हैं और वृक्ष सरीखे नहीं दिखते हैं.

त्वरित-बोनसाई:
पौधशाला से एक-दो इंच मोटे व्यास के तने का पौधा गमले (या जड़ की थैली) सहित लाइये. उस पर अच्छी तरह जल का छिडकाव करें. बड़ी डंडियाँ सफाई से काटकर (कुतरकर नहीं - छाल न छिले) कुछेक डंडियाँ रहने दीजिये. जड़ को मिट्टी समेत निकालकर सबसे दूर वाली जड़ों को उँगलियों से कंघी जैसी करके तेज़ कैंची से काट दें. छाया में रहें और जितनी जल्दी संभव हो नए बर्तन में लगाकर जड़ों को मिट्टी से पूर्णतया ढँक दें. ध्यान रहे कि बची हुई जड़ें इस प्रक्रिया में मुड़ें या टूटें नहीं.

देखरेख:
उसी प्रजाति के किसी बड़े वृक्ष की तरह ही उसके छोटे रूप को भी पूरी धूप चाहिए यानी जैसा पौधा वैसी धूप. खाद और जल की मात्रा पौधे और बर्तन के आकार के अनुपात में ही हो, कुछ कम चल जायेगी मगर ज़्यादा उसे मार सकती है. आवश्यकतानुसार अतिरिक्त डंडियों की छंटाई समय-समय पर करते रहें. पत्तों की धूल गीले और साफ़ रुमाल से हटा सकते हैं परन्तु ध्यान रहे कि पत्तों पर किसी तरह की चिकनाई न लगे, आपकी त्वचा की भी नहीं. हर एकाध साल में पौधे को गमले से निकालकर अतिरिक्त जड़ों को सफाई से काट दें और इस प्रकार खाली हुए स्थान को खाद और मिट्टी के मिश्रण से भर दें.

गुरु की सीख:
बलरामपुर में रहने वाले हमारे गुरुजी किसी का किस्सा सुनाते हैं जो न बढ़ने वाले, या बीमार हो रहे पौधों को फटकार देते थे, "दो दिन में ठीक नहीं हुए तो उखाड़ फेंकेंगे." अधिकाँश पौधे डर के मारे सुधर जाते थे.

शुभस्य शीघ्रम:
बस शुरू हो जाइए, और अपनी प्रगति बताइये. हाँ यदि जामुन की बोनसाई (और वृक्ष भी) लगाते हैं तो मुझे बड़ी खुशी होगी. यहाँ आने के बाद जामुन देखने को आँखें तरस गयी हैं.

स्ट्राबेरी का चित्र अनुराग शर्मा द्वारा Strawberry photo by Anurag Sharma

Thursday, June 10, 2010

बोनसाई - कुछ स्वर्गीय, कुछ पार्थिव

दिल्ली में मेरी बालकनी पर सौ बोनसाई रहती थीं. यहाँ आया तो बहुत समय तक अपार्टमेन्ट में रहते कुछ किया नहीं,धीरे-धीरे फिर से हाथ आजमाना शुरू किया. मौसम अतिवादी होता है फिर भी कई पौधे कई-कई साल चले मगर एक छोटे से पाकड़ के अलावा अभी कुछ भी जीवित नहीं है. कुछ झलकियाँ:

ये पौधे भगवान को प्यारे हो गए!

 केला 

पाकड़
लीची
अकेला जीवित पाकड़

सभी चित्र अनुराग शर्मा द्वारा
[Bonsai: Photos by Anurag Sharma]

Wednesday, June 9, 2010

श्रीमान बबल्स कुमार की अदाएं

बेटी ने जब पहली बार कुत्ता पालने की जिद की तो कुत्ते-बिल्ली से एलर्जिक माता-पिता ने बहला दिया. जब आग्रह की आवृत्ति और दवाब बढ़ने लगे तो यह तय हुआ कि बिटिया रानी एक महीने तक घर के अन्दर रखे पौधों को पानी देकर यह सिद्ध करेंगी कि वे एक जीवित प्राणी की ज़िम्मेदारी लेने में सक्षम हैं. तीन सप्ताह पूरे होते-होते कुछ बोनसाई मृत्यु के कगार पर आने लगीं तो तय हुआ कि जितनी ज़िम्मेदारी दिखाई गयी है उसके अनुसार कुत्ता-बिल्ली तो नहीं लेकिन आधा दर्ज़न छोटी मछलियाँ घर में लाई जा सकती हैं. शीशे का मर्तबान तैयार करके उसमें पत्थर डाले गए और शाम को मछलियों को एक नया घर मिला.

एक हफ्ते के अन्दर पौधे तो पिताजी ने संभाल लिए मगर मछलियाँ माँ की विशेष निगहबानी के बावजूद अल्लाह को प्यारी हो गयीं. इसके बाद काफी दिनों तक पालतू पशु की बात बंद हो गयी. छठी कक्षा में पहुँचते पहुँचते कुत्ता फिर से एक प्राथमिकता बन गया. एक बार फिर ज़िम्मेदारी सिद्ध करने की प्रक्रिया पूरी हुई. इस बार ज़िम्मेदारी के अंक बढ़कर इतने हो गए कि एक चूहा लाया जा सके. पिताजी अभी भी डर रहे थे क्योंकि उनकी लापरवाही से बचपन में पाला हुआ सफ़ेद चूहों का जोड़ा असमय स्वर्गवासी हो चुका था. काफी बहस-मुसाहिबा हुआ और बिटिया को उनके जन्मदिन पर अन्य उपहारों के साथ एक ड्वार्फ हैमस्टर मिल गया जिसका नामकरण हुआ बबल्स.
तो आइये मिलते हैं श्रीमान बबल्स कुमार से:


कैमरे से बचते हुए


भोजनथाल से दुनिया कैसी दिखती है


ज़रा जलपान करके आते हैं



छत पर हवाखोरी


उस पार की दुनिया कैसी है?


तखलिया- यह साहब के आराम का वक्त है

सभी चित्र अनुराग शर्मा द्वारा [Photos of Bubbles by Anurag Sharma]
पुनर्प्रस्तुति के लिए श्रीमान बबल्स कुमार की लिखित अनुमति आवश्यक है
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एक दुखद सूचना
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