Monday, July 19, 2010

यह सूरज अस्त नहीं होगा!


(19 जुलाई 1827 --- 8 अप्रैल 1857)

जिस ईस्ट इंडिया कम्पनी का सूर्य कभी अस्त नहीं होता था, वह हमेशा के लिये डूब गया. सिर्फ एक सिपाही ने गोली चलाने का साहस किया और यह असम्भव घटना इतिहास में दर्ज़ हो गयी. उसी सिपाही की गोली का एक साइड इफ़ेक्ट यह भी हुआ कि विश्व के सबसे धनी मुगल साम्राज्य का भी खात्मा हो गया. एक सिपाही का साहस ऐसे दो बडे राजवंशों का काल सिद्ध हुआ जिनका डंका कभी विश्व के अधिकांश भाग में बजता था.

इतिहास भी कैसी-कैसी अजब करवटें लेता है – क्या इत्तफाक़ है कि 1857 की क्रांति को भडकाने वाली एनफील्ड राइफल के लिये पशु-वसा में लिपटी उस गोली को बनाने वाली एनफील्ड कम्पनी इंग्लैंड में अपनी दुकान कबकी समेट चुकी है परंतु भारत में अभी भी गोली (बुलेट मोटरसाइकिल) बना रही है.



1857 के स्वाधीनता संग्राम की पहली गोली चलाने वाले अमर शहीद मंगल पांडे के जन्म दिन पर नमन! मृत्युदंड के समय वे 29 वर्ष के थे.

मंगल पाण्डेय की भूमिका में आमिर खान

[सभी चित्र इंटरनैट से साभार]
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Thursday, July 15, 2010

तहलका तहलका तहलका

नोट: उत्खनन क्षेत्र की साईट १९२.३ बी पर मिले एमु के चर्मपत्र पर लिखे इस वार्तालाप से दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप की प्राचीन मय सभ्यता के कुछ रहस्य उजागर होते हैं. इस चर्मपत्र का रहस्य अब तक उसी प्रकार से गुप्त रखा गया है जैसे कि आज तक किसी भी मानव के चन्द्रमा पर और हिमालय की एवेरेस्ट चोटी पर न पहुँच पाने का रहस्य. छद्म-वैज्ञानिकों के अनुसार इस चर्मपत्र पर इंसानी रक्त से लिखी गयी इबारत एक प्रोडिजी बालक "वंशबुद्धि अखबार पौलिसी" और एक युवक "सतर्कवीर कटहल दिलजला" का वार्तालाप है जो किसी सम्राट के गुप्तचर द्वारा छिपकर् दर्ज किया गया मालूम होता है. सुविधा के लिए हम इन्हें क्रमशः वंश और वीर के नाम से पुकारेंगे. आइये पढ़ते हैं इस दुर्लभ प्रतिलिपि का अकेला हिन्दी अनुवाद केवल आपके लिए. सरलता के उद्देश्य से अनुवाद के भाषा और सन्दर्भ सम्पादित किये गये हैं. कृपया इसे सीरियसली न लें, धन्यवाद!

वीर: यार तू हर समय क्या सोचता रहता है?
वंश: यह भारत कहाँ है?
वीर: धरती के नीचे, पाताल में.
वंश: वहां कैसे जाते हैं?
वीर: पानी से?
वंश: पानी में ज़िंदा कैसे रहते हैं?
वीर: अरे पानी के अन्दर नहीं जाते, पानी के जहाज़ से जाते हैं. सीधे चलते जाते हैं और भारत आ जाता है.
वंश: जब ज़मीन के नीचे है तो सीधे चलते जाने से कैसे आ जाता है.
वीर: अरे आजकल विज्ञान का युग है. गुरूजी कहते हैं कि अब दुनिया गोल हो गयी है. सीधे चलते रहो तो धरातल से पाताल पहुँच जाते हैं. भारत, हमारे ठीक नीचे.
वंश: यकीन नहीं होता.
वीर: Ripley's! Believe it.

वीर: आज का फ़ुटबाल का खेल बढ़िया था, खूब मज़ा आया?
वंश: फ़ुटबाल के नियमों में कभी कोई परिवर्तन होगा क्या?
वीर: तुम हमेशा परिवर्तन की बात क्यों करते हो? हमारे काट मार कमरकस बाबा के बनाए हुए नियम अपने आप में सम्पूर्ण हैं. उनमें रंचमात्र परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है.
वंश: क्या बात करते हो? गेंद...
वीर: फिर वही गेंद की बात. इतनी कड़ी क्यों होती है? खिलाड़ियों के पैर लहूलुहान हो जाते हैं. [हंसता है] अरे हम असुरवीर हैं. हमारे कपडे, भोजन, ज़मीन, झंडा सब लहू से लाल है, पैरों का क्या है?
वंश: मैं कड़ेपन की बात नहीं कर रहा हूँ.
वीर: फिर क्या बात है?
वंश: पिछले खेल में जीते हुए कप्तान के सर को गेंद की तरह प्रयोग क्यों करते हैं हम? यह मानवता के विरुद्ध है.
वीर: तुम्हें क्या हो गया है? अव्वल तो हम मानव नहीं हैं.... और फ़ुटबाल खेलना कहीं से भी मानवता के विरुद्ध नहीं है.

वंश: अच्छा यह बताओ कि हम लोग मानवों से ज़्यादा क्यों जीते हैं?
वीर: क्योंकि वे मूर्ख हैं.
वंश: मूर्खता का अल्पायु से क्या सम्बन्ध है?
वीर: सम्बन्ध है. उन मूर्खों ने अपने पंचांग में हर वर्ष ३६० दिनों का रखा है. जबकि हमारे दार्शनिकों ने साल को २०० दिन का बनाया है.
वंश: उससे क्या?
वीर: इस प्रकार ३६००० दिनों में वे केवल १०० साल ही जीते हैं जबकि हम लोग १८० साल के हो जाते हैं.
वंश: हमारा पंचांग किसने बनाया?
वीर: मयासुर बाबा ने. देखा नहीं, वे प्रस्तर शिलाओं पर कुछ खोदकर रखते जाते हैं और हमारे गुलाम उनका ढेर लगाते जाते हैं.
वंश: हाँ, देखा तो है. वे कब तक यह पंचांग लिखते रहेंगे?
वीर: जब तक जीवित हैं. उनकी गणना के अनुसार अपने देहांत से पहले वे २०१२ ईसवी तक के पंचांग लिख लेंगे.
वंश: और अगर २०१२ ईसवी के प्राणी आगे के पंचांग न पाकर यह सोचने लगे कि आगे उनका समय समाप्त हो गया है, या ब्रह्माण्ड का अंत होने वाला है, तब तो अफरातफरी मच जायेगी न?
वीर: मुझे नहीं लगता कि भविष्य के लोग ऐसे मूर्ख होंगे. लेकिन भविष्य के बारे में कुछ कहा भी नहीं जा सकता है.
वंश: Ripley's! Believe it.

[समाप्त]

The description of the Mesoamerican ballgame from Harvard museum of natural history
मय सभ्यता की कन्दुक क्रीडा का वर्णन - हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय से
[चित्र अनुराग शर्मा द्वारा. Photo by Anurag Sharma]

Wednesday, July 7, 2010

सच मेरे यार हैं - कहानी भाग २

पिछले अंश में आपने देखा कि वर्षों के बाद फेसबुक तकनीक द्वारा मैने बचपन के मित्र को फिर से पाया।

अब आगे की कहानी ...

मैं दुविधा में था कि तुमसे मिलूँ कि बिना मिले ही वापस चला जाऊं। जब ऑटो रिक्शा वाले ने पूछा, "कनाट प्लेस से चलूँ कि बहादुर शाह ज़फर मार्ग से?" तो दिमाग में बिजली सी कौंध गयी। क्या गज़ब का इत्तेफाक है। मुझे तो पता ही नहीं था कि तुम्हारा दफ्तर संजय के घर के रास्ते में पड़ता है। तुम हमेशा कहती थीं कि आगरा चाहे किसी काम से जाओ, ताजमहल देखना भी एक ज़रूरी रस्म होती है। इसी तरह दिल्ली आ रहा हूँ तो तुमसे मिले बिना थोड़े ही जाऊंगा। पहले की बात और थी, अब तो तुम भी कुछ सहनशील ज़रूर हुई होगी। मुझे भी तुम्हारी उपेक्षा का दंश अब उतना नहीं चुभता है।

"बहादुर शाह ज़फर मार्ग से ही चलो। बल्कि मुझे वहीं जाना है" मैंने उल्लास से कहा।

ऑटो वाला ऊंची आवाज़ में बोला, "लेकिन आपने तो..."

"कोई नहीं! तुम्हारे पैसे पूरे ही मिलेंगे" मैंने उसकी बात बीच में ही काट दी।

उसने पूरा पता पूछा और मैंने अपने मन में हज़ारों बार दोहराया हुआ तुम्हारे दफ्तर का पता उगल दिया। एक प्रसिद्ध पत्रकार ने कहा था कि दिल्ली में एक विनम्र ऑटो रिक्शा ड्राइवर मिलने का मतलब है कि आपके पुण्यों की गठरी काफी भारी है। वह शीशे में देखकर मुस्कराया और कुछ ही देर में ही मैं तुम्हारे दफ्तर के बाहर था।

अरे यह चुगलीमारखाँ यहाँ क्या कर रहा है? जब तक मैं छिपने की जगह ढूंढता तब तक वह सामने ही आ गया।

"क्या हाल हैगा? यहां कैसे आना हुआ?"

"सुनील साहब! बस आपके दर्शन के लिये चले आये?"

"क्या काम पड़ गया? बिना मतलब कौन आता है?"

"..."

"शाम को मिलता हूँ। अभी तो ज़रा मैं निकल रहा था, जन्नल सैक्ट्री साहब आ रहे हैं न!"

इतना कहकर उसने अपना चेतक दौड़ा दिया। मेरी जान में जान आयी। अन्दर जाकर चपरासी से तुम्हारी जगह पूछी और उसने जिधर इशारा किया तुम ठीक वहीं दिखाई दीं।

ओ माय गौड! यह तुम ही हो? सेम सेम बट सो डिफरैंट! नाभिदर्शना साडी, बड़े-बड़े झुमके और तुम्हारे चेहरे पर पुते मेकअप को देखकर समझ आया कि तुम्हारा ज़िक्र आने पर राजा मुझे दिलासा देता हुआ हमेशा यह क्यों कहता था कि शुक्र मनाओ गुरु, बच गये। अजीब सा लगा। लग रहा था जैसे कार्यालय में नहीं, किसी शादी में आयी हुयी हो।

मैं जड़वत खड़ा था। भावनाओं का झंझावात सा चलने लगा। एक दिल कहने लगा, “देख लिया, तसल्ली हुई, अब चुपचाप यहाँ से निकल चलो।” दूसरा मन कहता था, “बस एक बार पूछ लो, तुम्हें अपनी ज़िन्दगी से झटककर खुश तो है न।”

मैं कुछ तय कर पाता, उससे पहले ही तुमने मुझे देख लिया। आश्चर्य और खुशी से तुम्हारा मुँह खुला का खुला रह गया। बिना बोले जिस तरह तुमने दोनों हाथों के इशारे से मुझे एक काल्पनिक रस्सी में लपेटकर अपनी ओर खींचा, वह अवर्णनीय है।

मैं मंत्रमुग्ध सा तुम्हारे सामने पडी कुर्सी पर बैठ गया। तुम्हारा दफ्तर काफी सुन्दर था। तुम्हारी सीट के पीछे पूरी दीवार पर शीशा लगा था। यूँ ही नज़र वहाँ पडी तो तुम्हारी पीठ दिखी। देखा कि तुम्हारे वस्त्र मेरी कल्पना से अधिक आधुनिक थे। इस नाते पीठ भी कुछ ज़्यादा ही खुली थी। लगभग उसी समय तुमने मेरी आंखों में आंखें डालकर देखा और कहा, “क्या देख रहे हो?” जैसे कोई चोरी पकडी गयी हो, मैंने अचकचाकर कहा, “कुछ भी तो नहीं, दफ्तर शानदार है।”

“हाँ!” तुमने हंसते हुए जवाब दिया, “मैने सोचा तुम्हें भी शीशे में अपना चेहरा देखने की आदत पड़ गयी। जो भी आता है, यहाँ बैठकर शीशा देखने लग जाता है। ... और सुनाओ, सब कैसा चल रहा है? तुम तो ऐसे गायब हुए कि फिर मिले ही नहीं।”

“गायब मैं नहीं तुम हुयी थीं” मैंने कहना चाहा मगर शब्द गले के अन्दर ही अटके रह गये, हज़ार कोशिश करने पर भी बाहर नहीं निकल सके।

[क्रमशः]