Saturday, February 14, 2026

कविता: साक्षात्कार

कविता एक उल्लास है, पर्व है, होली सा
तुम्हें निर्मल देखना चाहता हूँ मैं,
विशुद्ध रूप, न कोई आभूषण,
न प्रसाधन, न भूमिका, न रंग-रोगन
मात्र तुम, अपने अस्तित्व की प्रथम ध्वनि जैसी।

एक बार तुमसे मिलना चाहता हूँ,
नव-वसंत की खुलती कोंपलों जैसे,
शरच्चंद्र में गिरते परिपक्व पत्तों से,
अमृत चांदनी के अनावृत आकाश में।

कठोर निस्तब्ध शीत में,
या नवतपे की दहकती धूप में,
मॉनसून की सोंधी मिट्टी के कम्पन में,
मैं तुम्हें हर रूप में स्वीकारना चाहता हूँ।

हृदय की मखमली तहों के नीचे दुबके,
तुम्हारे सत्य से मिलना चाहता हूँ,
जो आँखों की झिलमिलाहट में  जब-तब,
प्रश्न, कभी प्रतिप्रश्न बनकर उभरता है।

सत्य जो किसी दर्पण में  दिखता नहीं,
किसी मंच पर कभी चमकता नहीं,
रंगीला सा, पर छिपा शर्मीला सा,
कृत्रिम आवरणों की भीतों के पीछे।

उस जीवंत नारी से मिलना चाहता हूँ,
जो रस्मों को नहीं, स्वयं को निभाये,
जिसकी मुस्कान में अभिनय नहीं,  
मन निश्छल छलक-छलक जाये।

और जब वह अपने समूचे ऋत,
अलंकारहीन, निर्मल रूप में साक्षात हो,
तो मुझे भी यथावत देखे, पहचान सके,
बस इतना ही चाहता हूँ।

क्योंकि साक्षात सत्य को हम,
उतना ही अनुभूत कर सकते हैं,
जितना सत्य हम अपने भीतर
पल्लवित कर सके हों।

3 comments:

  1. अंतिम पद सर्वश्रेष्ठ लगा, किसी को पहचानने के लिये भीतर सत्य की आँख होनी ही चाहिए, वरना सत्य तो हर क्षण सम्मुख है

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  2. आपकी इस पोस्ट में सच्चे और साफ प्रेम की भावना दिखाई देती है, जहाँ दिखावे या बनावट की कोई जगह नहीं है। आप जिस तरह किसी को उसके असली रूप में स्वीकार करना चाहते हैं, वह बहुत गहरी सोच को दिखाता है।

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