Saturday, September 5, 2026

सच: कुछ हाइकु खरे-खरे

1. खरे बोल से तौबा


​कड़वा सच,
सुनाते ही रहते,
सह न पाते।
2. पर उपदेश

​ज़हर सच,
औरों को ही पिलाते,
खुद न पीते।

3. अहंकार

​कहते खरे,
कोई और जो कहे,
लगते खोटे।

4. दर्पण
सच का शीशा,
औरों को दिखाते हैं,
खुद छुपाते।

Tuesday, August 18, 2026

मौन का आधार और संवाद का आकार

मौन के विज्ञान के
विद्वान भी होंगे कहीं,
हम भला कैसे कहें कि
मौन का आधार क्या है।

प्रश्न जब कोई उठे और
उत्तरों की प्यास हो,
दो तटों को जोड़ दे
उस सेतु की ही आस हो।

कोरियन के प्रश्न का,
उत्तर जापानी में मिले,
राह छूटे समझ की जब,
संवाद का आकार क्या है?

जवाब के बदले अगर
चुप्पी ही सहसा आ ढले,
वह कतरनी की तरह
हर एक रिश्ते को छले।

रोकती जो राह को
'स्टॉप साइन' बन गई,
घातक बनी इस चुप्पी का
आखिर सही आधार क्या है?

चुप्पी ही उत्तर है क्या,
या बस उपेक्षा भाव है?
या अहंता से जन्मता
भीतरी कोई घाव है?

प्रश्न को समझे नहीं,
या वक्त माँगा जा रहा,
मौन के इस व्यूह का
सत्य और आगार क्या है?

संवाद ही तो ज़िंदगी का
सहज-सच्चा रूप है,
मौन जब छाया न दे तो
काटती वह धूप है।

जो शब्द की हत्या करे
और अर्थ को ही मेट दे,
उस मौन से बेहतर तो फिर
स्पष्ट एक इनकार है!

हम भला कैसे कहें
क्या मौन ही आधार है?

Sunday, August 16, 2026

संकेन्द्रीय वृत्त

(एक केयरगिवर की गाथा) मेरे जिम्मे थे—

हमारे साझा खाते, साझे ऋण, 
साझे कार्ड, और
हर वित्तीय बोझ 
जिसमें कुछ जाना था।

बिखरी पड़ी हैं
तुम्हारी खूबसूरत तस्वीरें
जिसमें मैं नहीं हूँ;
क्योंकि मैं हमेशा
कैमरे के उस पार खड़ा था।

तुम्हारे हिस्से में था—
एक विचित्र ब्रह्माण्ड,
कई संकेन्द्रीय वृत्तों का घेरा।

केंद्र में तुम,
हर फ्रेम में मुस्कुराते हुए,
चारों ओर के घेरों में
माता‑पिता, भाई‑बहन,
रक्त-सम्बन्धी, प्रशंसक,
दोस्त, पड़ोसी, सहकर्मी,
नितांत अजनबी भी।

बस एक भला मानस था
जिसके लिए मुस्कान नहीं थी
वह जो हर बार
पीछे खड़ा रहता था।

जो धीरे‑धीरे
निरंतर अपमानित होते हुए
पीछे छूट ही गया—
घर-परिवार,
नाते-संस्कार,
नज़र से भी,
याद से भी।

बहुत कुछ हुआ
समय-समय पर
डायरियाँ चीती गईं, 
तो लेखन गया, 
तस्वीरें पोती गईं, 
चित्रकला गई, 
फोटो काटे गए 
तो फोटोग्राफी बुझ गई, 
पौधे मारे जाने से,
बागवानी की आत्मा सिधार गई, 
‘कान‑पकाना’ कहकर
गायन रोका गया
इस प्रकार
गुनगुनाना भी शांत हो गया।

मेरा अस्तित्व ही नहीं
मेरी उपस्थिति भी
किसी अपराध की तरह
मिटाई जाती रही, 
धीरे-धीरे, लेकिन सतत।

इलेक्ट्रॉनिक्स कैश हुए, 
कलेक्टबल्स ट्रैश हुए, 
एक्सेसरीज़ दान में गईं— 
मित्रों-परिवारों से मिले
और दो चोरियों से बचे
उन सभी उपहारों को
जिन पर किसी का नाम था
एक-एक कर
किस अनाम प्रेत ने उठाया,
कभी पता न चला।

शिकायतों के चलते
दस घर बदलने पड़े
दशक बीतते-बीतते —
क्योंकि कोई घर कभी
मायके से दूर,
कोई परिजनों से कटा हुआ,
कभी मित्रों से बिछड़ा हुआ था।

कभी पड़ोसी बुरे,
कभी मोहल्ला ग़लत,
कभी शहर, तो कभी देश—  
दो बार तो मंज़िल ही ग़लत निकली।

किसी घर में धूप कम थी,  
किसी में चाँदनी अधिक थी।  
कमी अलग-अलग होते हुए भी,
समानता एक ही रही—
हर शिफ़्टिंग मुझे अकेले ही करनी पड़ी।

सामान बाँधना, छाँटना,  
भरना, ढोना, उतारना, खोलना,  
सफ़ाई करना— सब अकेले ही किया
जैसे सारा जीवन, अकेले ही जिया।
तुम कभी साथ थीं ही नहीं
क्योंकि तुम्हारे अन्य सामाजिक फ़र्ज़
अधिक ज़रूरी लगे थे, हर बार, लगातार।

वक़्त गुज़रता गया
आशा धूमिल होती रही
परंतु मैं मिटा नहीं,
न भूत हुआ,
यदा कदा सामने लाया जाता रहा
जब सुरक्षा चाहिए होती,
या संकट में सहारा,
जब पैसों की ज़रूरत होती,
या किसी महफ़िल तक जाने को
चालक नहीं मिलता था,
या एक सर चाहिये होता था
खानदानी मूर्खता से हुई
हानियों का ठीकरा फोड़ने को।

तुम्हारे खाते जुड़े रहे
तुम्हारे अपने रक्त‑सम्बन्धों से
गौरव, अपनी जाति से
द्वेष मुझसे, मेरे हितैषियों से।

तुम्हारे उत्सव सजते रहे
तुम्हारे मित्र‑मंडल के लिए
और मैं—
मैं बस कभी‑कभार
तुम्हें वहाँ छोड़ आता था,
जहाँ मैं स्वयं
कभी आमंत्रित नहीं था।

धीरे‑धीरे
मैं मिटता गया—
तुम्हारे जीवन से,
अपने जीवन से,
सार्वजनिक पटल से,
अपने लोगों से,
अपने मित्रों से,
और उन सबकी दृष्टि से
जो सच में मेरी परवाह करते थे,
गाहे-बगाहे तारीफ़ भी।

और यह सब होते हुए भी,
मैं दशकों साथ चलता रहा था
अपने उस सबसे बड़े शत्रु के
जिसने कभी नहीं गँवाया
एक भी अवसर मुझे निशाना बनाने का
दिल दुखाने का
मेरे विकेट उखाड़ने का
मेरे खिलाफ़ गोल करने का
मुझे अपमानित
और बदनाम करने का
अपनी सखियों में
उनके पतियों में
यारों में, दिलदारों में
यहाँ तक कि
मुहल्ले के दुकानदारों में।

चीड़ और चांद

(चित्र व शब्द: अनुराग शर्मा)

चीड़ की इन ऊँची शाखों पर
शाम ने टांग दी है, 
अपनी अंतिम साँस
जैसे कोई ख़त,
जिसे लिखकर डाक में डाल दिया हो,
पर मंज़िल तक पहुँचना अभी बाक़ी हो।

चांद आज
कुछ ज़्यादा ही नीचे झुक आया है,
शायद ची‌ड़ की सुइयों में
अपनी ही कोई पुरानी ख़ुशबू ढूँढने।

हवा ने
दोनों के बीच
एक धीमी‑सी सरगोशी छेड़ दी है।
पता नहीं किसकी बात है,
पर सारी रात
पत्ते उसे दोहराते रहे हैं।

कभी‑कभी लगता है
चीड़ और चांद
दो पुराने दोस्त हैं।
एक ज़मीन पर टिक कर ऊँचा उठता है,
दूसरा गगन में रहकर
थोड़ा‑थोड़ा नीचे उतरता है।

... और इन दोनों के बीच
की ख़ामोशी ही
असल कहानी है।

Sunday, April 26, 2026

हिंदी ग़ज़ल: अनुराग शर्मा

द्वार प्रेम के खुले हुए हों, बंद झरोखे संशय के हों,
मिटते साये छल के दिल में, बीते कल के भय के हों।

साफ़ नज़र आती है मंज़िल, साफ़ नज़र है राहों की,
मिटने हैं वे सभी निशाँ जो, रंजो-ग़म, विस्मय के हों।

कहा जो तुमने, सच ही होगा, छल शब्दों में होगा क्यों,
रिश्ते वही टिकेंगे जग में, जो प्रीति और विनय के हों।

तुमने थामा हाथ हमारा, युग तक यह विश्वास रहे, 
टूटन कैसी, रिश्ते जो हों, निष्ठा और आश्रय के हों।

फूल वही खिलते उपवन में, जिनकी रहे सलामत जड़,
झूठ की नींव गिरा दी जाये, भवन सभी विजय के हों।

Friday, March 20, 2026

🌙ग़ज़ल - तुम्हारे हैं

Happy New Year 5128 📅 "रौद्र" नामक संवत्सर पर सबको शुभकामनाएँ 🙏 *श्री शालिवाहन शक 1948, युगाब्द 5128, संवत 2083 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, गुढीपड़वा, नवरात्रि व हिंदू नववर्ष पर आपको सपरिवार हार्दिक शुभेच्छा* 🌹

सबको कुछ इस तरह दुलारे हैं,
जैसे वे सब भी उनको प्यारे हैं।

चोट दिल की कहाँ सम्हालेंगे,
हम तो बस दर्द के सहारे हैं।

रात भर ख़ुद से बात करते हैं,
दिन में ख़ामोशियों के मारे हैं।

ज़िंदगी इक अजीब सौदा है,
हमने बस क़र्ज़ ही उतारे हैं।

कोई मंज़िल न, कोई रस्ता है,
हम तो गुज़रे हुए नज़ारे हैं।

कल की उम्मीद नहीं बाकी है,
आज भी आस पर गुज़ारे हैं।

तुम गए तब से रातें काली हैं,
चंदा है न गगन में तारे हैं।

हम तो दिन-रात इतना कहते हैं,
तुम भी कह दो कभी "तुम्हारे हैं!"
***

Thursday, March 5, 2026

लेखक को जानिये - अनुराग शर्मा के साक्षात्कार और वार्ताएँ

प्रकाशित साक्षात्कार-वार्ता, कथन-वाचन शृंखला में कुछ और साक्षात्कार यहाँ प्रस्तुत हैं।

विडियो साक्षात्कार - Video Interviews

आभार पूजा अनिल 
(किस्साटेल के लिये अनुराग शर्मा और पूजा अनिल की वार्ता हाफ़-सेंचुरी, आधी सदी का क़िस्सा पर )
https://www.facebook.com/share/v/172nDdavMp/
आभार विनीता तिवारी (सेतु के दस वर्षों पर अनुराग शर्मा और विनीता तिवारी की वार्ता)


आभार रचना श्रीवास्तव (शशि पाधा जी की पुस्तक कही-अनकही पर चर्चा)

आभार वैश्विक हिंदी परिवार - उतरी अमेरिका (प्रस्तोता: आस्था नवल)

Saturday, February 14, 2026

कविता: साक्षात्कार

कविता एक उल्लास है, पर्व है, होली सा
तुम्हें निर्मल देखना चाहता हूँ मैं,
विशुद्ध रूप, न कोई आभूषण,
न प्रसाधन, न भूमिका, न रंग-रोगन
मात्र तुम, अपने अस्तित्व की प्रथम ध्वनि जैसी।

एक बार तुमसे मिलना चाहता हूँ,
नव-वसंत की खुलती कोंपलों जैसे,
शरच्चंद्र में गिरते परिपक्व पत्तों से,
अमृत चांदनी के अनावृत आकाश में।

कठोर निस्तब्ध शीत में,
या नवतपे की दहकती धूप में,
मॉनसून की सोंधी मिट्टी के कम्पन में,
मैं तुम्हें हर रूप में स्वीकारना चाहता हूँ।

हृदय की मखमली तहों के नीचे दुबके,
तुम्हारे सत्य से मिलना चाहता हूँ,
जो आँखों की झिलमिलाहट में  जब-तब,
प्रश्न, कभी प्रतिप्रश्न बनकर उभरता है।

सत्य जो किसी दर्पण में  दिखता नहीं,
किसी मंच पर कभी चमकता नहीं,
रंगीला सा, पर छिपा शर्मीला सा,
कृत्रिम आवरणों की भीतों के पीछे।

उस जीवंत नारी से मिलना चाहता हूँ,
जो रस्मों को नहीं, स्वयं को निभाये,
जिसकी मुस्कान में अभिनय नहीं,  
मन निश्छल छलक-छलक जाये।

और जब वह अपने समूचे ऋत,
अलंकारहीन, निर्मल रूप में साक्षात हो,
तो मुझे भी यथावत देखे, पहचान सके,
बस इतना ही चाहता हूँ।

क्योंकि साक्षात सत्य को हम,
उतना ही अनुभूत कर सकते हैं,
जितना सत्य हम अपने भीतर
पल्लवित कर सके हों।