Saturday, July 23, 2016

23 जुलाई लोकमान्य बाल गंगाधर टिळक

लोकमान्य के नाम से प्रसिद्ध नेता बाल गंगाधर टिळक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में हुआ था। वे एक विद्वान गणितज्ञ और दर्शन शास्त्री होने के साथ-साथ महान देशभक्त भी थे। ब्रिटेन से भारत की स्वतंत्रता की नींव रखने वाले महापुरुषों में वे अग्रगण्य थे।

उनके व्याकरणशास्त्री पिता को पुणे में शिक्षणकार्य मिलने पर वे बचपन में ही पुणे आ गये जो बाद में उनकी कर्मभूमि बना।

सन् 1876 में उन्होंने डेकन कॉलेज से गणित और संस्कृत में स्नातक की डिग्री ली और 1879 में वे मुम्बई विश्वविद्यालय से कानून के स्नातक हुए। पश्चिमी शिक्षा पद्धति से शिक्षित लोकमान्य टिळक पश्चिम के अंधे अनुकरण के विरोधी थे।

उन्होंने पुणे में एक स्कूल आरम्भ किया जो बाद में डिग्री कॉलेज तक विकसित भी हुआ और उनकी राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र भी बना. 1884 में उन्होंने लोकशिक्षा के उद्देश्य से डेकन एजूकेशन सोसायटी (Deccan Education Society) की स्थापना की। अंग्रेज़ी के महत्व को पहचानकर उन्होंने भारतीयों के अंग्रेज़ी सीखने पर भी विशेष ज़ोर दिया।

जनजागरण के उद्देश्य से उन्होंने मराठी में "केसरी" तथा अंग्रेज़ी में "मराठा" शीर्षक से समाचारपत्र निकाले। दोनों अखबारों ने जनता को जागृत करते हुए देश में आज़ादी की भावना को प्रखर किया। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें अपने लिये खतरनाक मानते हुए 1897 में पहली बार गिरफ़्तार कर 18 मास जेल में रखा।

टिळक ने 1805 के बंग-भंग का डटकर विरोध किया। विदेशी उत्पादोंके बहिष्कार का उनका आंदोलन जल्दी ही राष्ट्रव्यापी हो गया। उनके सविनय अवज्ञा के सिद्धांत को गांधीजी ने भी अपनाया और इस प्रकार सत्याग्रह के बीज पनपे।

लोकमान्य टिळक एक सजग और तार्किक व्यक्ति थे। कोई भी बात हो वे तर्क नहीं छोडते थे। वे हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे परंतु धार्मिक हिंदू जुलूसों पर मुस्लिम हमले के बारे में उन्होंने 10 सितम्बर 1898 को लिखा:

अगर मुस्लिम नमाज़ के समय हिंदुओं के भजन आदि बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं तो वे ट्रेन, जहाज़ और दुकानों में नमाज़ कैसे पढते हैं? यह कहना गलत है कि नमाज़ के समय मस्जिद के सामने से भजन आदि गाते हुए निकलना अधार्मिक है।

लोकमान्य टिळक का शवदाह पद्मासन में हुआ
दंगे-फ़साद से पहले हिंदूजन मुहर्रम जैसे उत्सवों में बढ-चढकर भाग लेते थे परंतु हिंदू उत्सवों को अपने घरों में ही सीमित रखते थे। शिवरात्रि, जन्माष्टमी, रामनवमी, रक्षा बंधन हों या गणेश चतुर्थी, हिंदू समाज उन्हें अपने अपने घरों में व्यक्तिगत उत्सव जैसे ही मनाते थे। टिळक ने गणेशोत्सव को भी एक सामाजिक रूप देने का आह्वान किया जिसकी परम्परा आज पूरे महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि बाहर भी एक सुदृढ रूप ले चुकी है।

1895 में पुणे की एक सार्वजनिक सभा में उन्होंने रायगढ में शिवाजी के स्मारक के पुनर्निर्माण के लिये एक स्मारक कोष की घोषणा की। लेकिन धार्मिक तनाव देखते हुए यह भी याद दिलाया कि समय बदल गया है और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में हिंदू और मुसलमान दोनों ही पिछड रहे हैं। सन् 1916 में हिंदू मुस्लिम एकता बनाने और अंग्रेज़ों के विरुद्ध साझा संघर्ष चलाने के उद्देश्य से उन्होंने मुहम्मद अली जिन्नाह के साथ लखनऊ समझौते (Lucknow Pact) पर हस्ताक्षर किये।

लोकमान्य टिळक के हस्ताक्षर

सन् 1907 में अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें एक बार फिर गिरफ़्तार कर छह वर्ष तक म्यानमार की माण्डले जेल में रखा जहाँ उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ श्रीमद्भग्वद्गीतारहस्य का लेखन किया. सन् 1893 में उनकी द ओरायन (The Orion; or, Researches into the Antiquity of the Vedas), तथा 1903 में आर्कटिक होम इन द वेदाज़ (The Arctic Home in the Vedas) नामक पुस्तकें प्रकाशित हुईं।

सन् 1914 में उन्होंने भारतीय स्वराज्य समिति (Indian Home Rule League) की स्थापना की और 1916 में उनका प्रसिद्ध नारा "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा" प्रसिद्ध हुआ। 1918 में वे लेबर पार्टी से भारत की स्वतंत्रता के लिये सहयोग लेने ब्रिटेन गये।

लोकमान्य टिळक ने आज़ादी की किरण नहीं देखी। उनका देहावसान 1 अगस्त सन् 1920 को मुम्बई में हुआ। महात्मा गांधी ने उन्हें कहा "नव भारत का निर्माता" और नेहरू जी ने उन्हें "भारतीय स्वाधीनता संग्राम का जनक" बताया।

23 जुलाई लोकमान्य बाल गंगाधर टिळक

लोकमान्य के नाम से प्रसिद्ध नेता बाल गंगाधर टिळक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में हुआ था. वे एक विद्वान गणितज्ञ और दर्शन शास्त्री होने के साथ-साथ महान देशभक्त भी थे. ब्रिटेन से भारत की स्वतंत्रता की नींव रखने वाले महापुरुषों में वे अग्रगण्य थे.

उनके व्याकरणशास्त्री पिता को पुणे में शिक्षणकार्य मिलने पर वे बचपन में ही पुणे आ गये जो बाद में उनकी कर्मभूमि बना.

सन् 1876 में उन्होंने डेकन कॉलेज से गणित और संस्कृत में स्नातक की डिग्री ली और 1879 में वे मुम्बई विश्वविद्यालय से कानून के स्नातक हुए. पश्चिमी शिक्षा पद्धति से शिक्षित लोकमान्य टिळक  पश्चिम के अंधे अनुकरण के विरोधी थे.

उन्होंने पुणे में एक स्कूल आरम्भ किया जो बाद में डिग्री कॉलेज तक विकसित भी हुआ और उनकी राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र भी बना. 1884 में उन्होंने लोकशिक्षा के उद्देश्य से  डेकन एजूकेशन सोसायटी (Deccan Education Society) की स्थापना की. अंग्रेज़ी के महत्व को पहचानकर उन्होंने भारतीयों के अंग्रेज़ी सीखने पर भी विशेष ज़ोर दिया.

जनजागरण के उद्देश्य से उन्होंने मराठी में "केसरी" तथा अंग्रेज़ी में  "मराठा" शीर्षक से समाचारपत्र निकाले. दोनों अखबारों ने जनता को जागृत करते हुए देश में आज़ादी की भावना को प्रखर किया. ब्रिटिश सरकार ने उन्हें अपने लिये खतरनाक मानते हुए 1897 में पहली बार गिरफ़्तार कर 18 मास जेल में रखा.

टिळक ने 1805 के बंग-भंग का डटकर विरोध किया. विदेशी उत्पादोंके बहिष्कार का उनका आंदोलन जल्दी ही राष्ट्रव्यापी हो गया. उनके सविनय अवज्ञा के सिद्धांत को गांधीजी ने भी अपनाया और इस प्रकार सत्याग्रह के बीज पनपे.  

लोकमान्य टिळक एक सजग और तार्किक व्यक्ति थे. कोई भी बात हो वे तर्क नहीं छोडते थे. वे हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे परंतु धार्मिक हिंदू जुलूसों पर मुस्लिम हमले के बारे में उन्होंने 10 सितम्बर 1898 को लिखा:

अगर मुस्लिम नमाज़ के समय हिंदुओं के भजन आदि बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं तो वे ट्रेन, जहाज़ और दुकानों में नमाज़ कैसे पढते हैं? यह कहना गलत है कि नमाज़ के समय मस्जिद के सामने से भजन आदि गाते हुए निकलना अधार्मिक है.

लोकमान्य टिळक का शवदाह पद्मासन में हुआ 
दंगे-फ़साद से पहले हिंदूजन मुहर्रम जैसे उत्सवों में बढ-चढकर भाग लेते थे परंतु हिंदू उत्सवों को अपने घरों में ही सीमित रखते थे. शिवरात्रि, जन्माष्टमी, रामनवमी, रक्षा बंधन हों या गणेश चतुर्थी, हिंदू समाज उन्हें अपने अपने घरों में व्यक्तिगत उत्सव जैसे ही मनाते थे. टिळक ने गणेशोत्सव को भी एक सामाजिक रूप देने का आह्वान किया जिसकी परम्परा आज पूरे महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि बाहर भी एक सुदृढ रूप ले चुकी है.

1895 में पुणे की एक सार्वजनिक सभा में उन्होंने रायगढ में शिवाजी के स्मारक के पुनर्निर्माण के लिये एक स्मारक कोष की घोषणा की. लेकिन धार्मिक तनाव देखते हुए यह भी याद दिलाया कि समय बदल गया है और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में हिंदू और मुसलमान दोनों ही पिछड रहे हैं. सन् 1916 में  हिंदू मुस्लिम एकता बनाने और अंग्रेज़ों के विरुद्ध साझा संघर्ष चलाने के उद्देश्य से उन्होंने  मुहम्मद अली जिन्नाह के साथ लखनऊ समझौते (Lucknow Pact) पर हस्ताक्षर किये.

लोकमान्य टिळक के हस्ताक्षर

सन् 1907 में अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें एक बार फिर गिरफ़्तार कर छह वर्ष तक म्यानमार की माण्डले जेल में रखा जहाँ उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ श्रीमद्भग्वद्गीतारहस्य का लेखन किया. सन् 1893 में उनकी द ओरायन (The Orion; or, Researches into the Antiquity of the Vedas), तथा 1903 में आर्कटिक होम इन द वेदाज़ (The Arctic Home in the Vedas) नामक पुस्तकें प्रकाशित हुईं.

सन् 1914 में उन्होंने भारतीय स्वराज्य समिति (Indian Home Rule League) की स्थापना की और 1916 में उनका प्रसिद्ध नारा "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा" प्रसिद्ध हुआ. 1918 में वे लेबर पार्टी से भारत की स्वतंत्रता के लिये सहयोग लेने ब्रिटेन गये.

लोकमान्य टिळक ने आज़ादी की किरण नहीं देखी. उनका देहावसान 1 अगस्त सन् 1920 को मुम्बई में हुआ. महात्मा गांधी ने उन्हें कहा "नव भारत का निर्माता" और नेहरू जी ने उन्हें "भारतीय स्वाधीनता संग्राम का जनक" बताया.


Saturday, June 11, 2016

बिस्मिल का पत्र अशफ़ाक़ के नाम - इतिहास के भूले पन्ने

सताये तुझ को जो कोई बेवफ़ा बिस्मिल।
तो मुंह से कुछ न कहना आह कर लेना।।
हम शहीदाने-वफा का दीनो ईमां और है।
सिजदा करते हैं हमेशा पांव पर जल्लाद।।


मैंने इस अभियोग में जो भाग लिया अथवा जिनको जिन्दगी की जिम्मेदारी मेरे सिर पर थी, उन में से सब से ज्यादा हिस्सा श्रीयुत अशफाकउल्ला खां वारसी का है। मैं अपनी कलम से उन के लिये भी अन्तिम समय में दो शब्द लिख देना अपना कर्तव्य समझता हूं।

अशफ़ाक,

मुझे भली भांति याद है कि मैं बादशाही एलान के बाद शाहजहांपुर आया था, तो तुम से स्कूल में भेंट हुई थी। तुम्हारी मुझसे मिलने की बड़ी हार्दिक इच्छा थी। तुम ने मुझ से मैनपुरी षडयन्त्र के सम्बन्ध में कुछ बातचीत करना चाही थी। मैंने यह समझा कि एक स्कूल का मुसलमान विद्यार्थी मुझ से इस प्रकार की बातचीत क्यों करता है, तुम्हारी बातों का उत्तर उपेक्षा की दृष्टि से दिया था। तुम्हें उस समय बड़ा खेद हुआ था। तुम्हारे मुख से हार्दिक भावों का प्रकाश हो रहा था।

तुम ने अपने इरादे को यों ही नहीं छोड़ दिया, अपने इरादे पर डटे रहे। जिस प्रकार हो सका कांग्रेस में बातचीत की। अपने इष्ट मित्रों द्वारा इस बात का वि्श्वास दिलाने की कोशिश की कि तुम बनावटी आदमी नही, तुम्हारे दिल में मुल्क की खिदमत करने की ख्वाहि्श थी। अन्त में तुम्हारी विजय हुई। तुम्हारी कोशिशों ने मेरे दिल में जगह पैदा कर ली। तुम्हारे बड़े भाई मेरे उर्दू मिडिल के सहपाठी तथा मित्र थे। यह जान कर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। थोड़े दिनों में ही तुम मेरे छोटे भाई के समान हो गये थे, किन्तु छोटे भाई बन कर तुम्हें संतोष न हुआ।

तुम समानता के अधिकार चाहते थे, तुम मित्र की श्रेणी में अपनी गणना चाहते थे। वही हुआ? तुम मेरे सच्चे मित्र थे। सब को आश्चर्य था कि एक कटटर आर्य समाजी और मुसलमान का मेल कैसा? मैं मुसलमानों की शुद्धि करता था। आर्यसमाज मन्दिर में मेरा निवास था, किन्तु तुम इन बातों की किंचितमात्र चिन्ता न करते थे। मेरे कुछ साथी तुम्हें मुसलमान होने के कारण कुछ घृणा की दृष्टि से देखते थे, किन्तु तुम अपने निश्चय में दृढ़ थे। मेरे पास आर्यसमाज मन्दिर में आते-जाते थे। हिंदू-मुसलिम झगड़ा होने पर तुम्हारे मुहल्ले के सब कोई तुम्हें खुल्लम खुल्ला गालियां देते थे, काफिर के नाम से पुकारते थे, पर तुम कभी भी उन के विचारों से सहमत न हुये।

सदैव हिन्दू मुसलिम ऐक्य के पक्षपाती रहे। तुम एक सच्चे मुसलमान तथा सच्चे स्वदेश भक्त थे। तुम्हें यदि जीवन में कोई विचार था, तो यही था कि मुसलमानों को खुदा अकल देता कि वे हिन्दुओं के साथ मेल कर के हिन्दोस्तान की भलाई करते। जब मैं हिन्दी में कोई लेख या पुस्तक लिखता तो तुम सदैव यही अनुरोध करते कि उर्दू में क्यों नहीं लिखते, जो मुसलमान भी पढ़ सकें ?

तुमने स्वदेश भक्ति के भावों को भी भली भांति समझाने के लिये ही हिन्दी का अच्छा अध्ययन किया। अपने घर पर जब माता जी तथा भ्राता जी से बातचीत करते थे, तो तुम्हारे मुंह से हिन्दी शब्द निकल जाते थे, जिससे सबको बड़ा आश्चर्य होता था। तुम्हारी इस प्रकार की प्रकृति देख कर बहुतों को संदेह होता था, कि कहीं इस्लाम-धर्म त्याग कर शुद्धि न करा ले। पर तुम्हारा हृदय तो किसी प्रकार से अशुद्ध न था, फिर तुम शुद्धि किस वस्तु की कराते ? तुम्हारी इस प्रकार की प्रगति ने मेरे हृदय पर पूर्ण विजय पा ली। बहुधा मित्र मण्डली में बात छिड़ती कि कहीं मुसलमान पर विश्वास करके धोखा न खाना।

तुम्हारी जीत हुई, मुझ में तुम में कोई भेद न था। बहुधा मैंने तुमने एक थाली में भोजन किये। मेरे हृदय से यह विचार ही जाता रहा कि हिन्दू मुसलमान में कोई भेद है। तुम मुझ पर अटल विश्वास तथा अगाध प्रीति रखते थे, हां ! तुम मेरा नाम लेकर नहीं पुकार सकते थे। तुम तो सदैव राम कहा करते थे। एक समय जब तुम्हें हृदय-कम्प का दौरा हुआ, तुम अचेत थे, तुम्हारे मुंह से बारम्बार राम, हाय राम! के शब्द निकल रहे थे। पास खड़े हुए भाई बान्धवों को आश्चर्य था कि राम, राम कहता है।

कहते थे कि अल्लाह, अल्लाह कहो, पर तुम्हारी राम-राम की रट थी। उसी समय किसी मित्र का आगमन हुआ, जो राम के भेद को जानते थे। तुरन्त मैं बुलाया गया। मुझसे मिलने पर तुम्हें शान्ति हुई,  तब सब लोग राम-राम के भेद को समझे। अन्त में इस प्रेम, प्रीति तथा मित्रता का परिणाम क्या हुआ ? मेरे विचारों के रंग में तुम भी रंग गये। तुम भी एक कट्टर क्रान्तिकारी बन गये।  अब तो तुम्हारा दिन-रात प्रयत्न यही था, कि जिस प्रकार हो सके मुसलमान नवयुवकों मंस भी क्रान्तिकारी भावों का प्रवेष हो सके। वे भी क्रान्तिकारी आन्दोलन में योग दे।

जितने तुम्हारे बन्धु तथा मित्र थे, सब पर तुमने अपने विचारों का प्रभाव डालने का प्रयत्न किया। बहुधा क्रान्तिकारी सदस्यों को भी बड़ा आश्चर्य होता कि मैने कैसे एक मुसलमान को क्रान्तिकारी दल का प्रतिष्ठित सदस्य बना लिया। मेरे साथ तुमने जो कार्य किये, वे सराहनीय हैं! तुम ने कभी भी मेरी आज्ञा की अवहेलना न की। एक आज्ञाकारी भक्त के समान मेरी आज्ञा पालन में तत्पर रहते थे। तुम्हारा हृदय बड़ा विशाल था। तुम्हारे भाव बड़े उच्च थे।

मुझे यदि शान्ति है तो यही कि तुमने संसार में मेरा मुंह उज्जवल कर दिया। भारत के इतिहास में यह घटना भी उल्लेखनीय हो गई, कि अशफाकउल्ला ख़ाँ ने क्रान्तिकारी आन्दोलन में योग दिया। अपने भाई बन्धु तथा सम्बन्धियों के समझाने पर कुछ भी ध्यान न दिया। गिरफतार हो जाने पर भी अपने विचारों में दृढ़ रहा ! जैसे तुम शारीरिक बलशाली थे, वैसे ही मानसिक वीर तथा आत्मा से उच्च सिद्ध हुए। इन सबके परिणाम स्वरूप अदालत में तुमको मेरा सहकारी ठहराया गया, और जज ने हमारे मुकदमें का फैसला लिखते समय तुम्हारे गले में भी जयमाल फांसी की रस्सी पहना दी।

प्यारे भाई तुम्हे यह समझ कर सन्तोष होगा कि जिसने अपने माता-पिता की धन-सम्पत्ति को देश-सेवा में अर्पण करके उन्हें भिखारी बना दिया, जिसने अपने सहोदर के भावी भाग्य को भी देश सेवा की भेंट कर दिया, जिसने अपना तन मन धन सर्वस्व मातृसेवा में अर्पण करके अपना अन्तिम बलिदान भी दे दिया, उसने अपने प्रिय सखा अशफाक को भी उसी मातृभूमि की भेंट चढ़ा दिया।

असगर हरीम इश्क में हस्ती ही जुर्म है।
रखना कभी न पांव, यहां सर लिये हुये।।

सहायक काकोरी शडयन्त्र का भी फैसला जज साहब की अदालत से हो गया। श्री अशफाकउल्ला खां वारसी को तीन फांसी और दो काले पानी की आज्ञायें हुईं। श्रीयुत शचीन्द्रनाथ बख़्शी को पांच काले पानी की आज्ञायें हुई।

- राम

[Content courtesy: Dr. Amar Kumar; इस प्रामाणिक पत्र के लिये स्वर्गीय डॉ. अमर कुमार का आभार]