Monday, May 31, 2010

मनचाहे डाक टिकट

डाक टिकट इकट्ठा करने का शौक तो हम में से बहुत से लोगों को रहा होगा. थोड़ा बहुत मुझे भी है. बहुत से भारतीय टिकट और प्रथम दिवस आवरण अभी भी रखे हुए है. फ्रैंकिंग मशीन, ईमेल, कुरियर आदि सेवाओं के आ जाने से आजकल डाक टिकटों की ज़रुरत कम होती जा रही है. फिर भी कभी-कभी डाकघर का चक्कर लगा ही लेता हूँ. पिछले दिनों गया तो स्टंप्स.कॉम की और से बेचा जा रहा यह डब्बा उठा लाया. यह आपको अपने कम्प्युटर से अपनी मन-मर्जी के फोटो उपलोड करके उन्हें २० टिकटों की शीट पर छपने की सहूलियत देता है. छपे हुए टिकट स्टंप्स.कॉम द्वारा आपके घर भेज दिए जाते हैं. यह टिकट अमेरिका में डाक सेवा विभाग (USPS) द्वारा बनाए गए टिकटों के सामान ही स्वीकृत हैं. चाहे अपने परिवार के फोटो छापिये चाहे अपने इष्टदेव के. कुछ टिकट हमने भी बनाए. एक बानगी देखिये.


[सभी चित्र अनुराग शर्मा द्वारा
Photos by Anurag Sharma]

Friday, May 28, 2010

NRI अंतर्राष्ट्रीय निर्गुट अद्रोही सर्व-ब्लोगर संस्था

सर्व साधारण को सूचित किया जाता है कि जनता की बेहद मांग पर इत्तेफाक से कल हमारे इहाँ हमने खुद ही अंतर्राष्ट्रीय निर्गुट अद्रोही सर्व-ब्लोगर संस्था जनहित में बना ली है. कांग्रेस बनी तो बाद में कांग्रेस आई(इंदिरा), कांग्रेस भाई (कामराज) और कांग्रेस देसाई (मोरारजी) में टूटी. जनता दल बना तो आजतक इतना टूटा कि पता ही नहीं चलता साबुत कब था. कम्युनिस्ट पार्टी तो मार्क्सवाद, लेनिनवाद, स्टालिनवाद, कास्त्रोवाद से लेकर नक्सलवाद, माओवाद, और आतंकवाद तक हर रोज़ ही टूटती है.

इसी तरह जब अंतर्राष्ट्रीय निर्गुट अद्रोही सर्व-ब्लोगर संस्था टूटेगी तो पहले RI और NRI का भेद आयेगा. RI वाले गुट में तो वैसे भी प्रतियोगिता इतनी कड़ी है कि ढपोरशंख का नंबर भले ही आ जाय, अपना नंबर तो नहीं आ सकता है. इस मर्म को समझते हुए हम NRI वाले धड़े में शामिल हो गए हैं. अब संस्था बनी है तो पदाधिकारी भी चुने जायेंगे सो आप सब पर अति कृपा करते हुए किसी अन्य निरीह ब्लोगर को तकलीफ देने के बजाय हम खुद ही पूर्ण बहुमत से निर्विरोध उसके अध्यक्ष, संरक्षक, खजांची और अकेले कार्यकारी सदस्य चुन लिए गए हैं.

हम खुद ही सम्मलेन करेंगे, खुद ही उसमें भाग लेंगे. खुद ही उसमें सुझाव और भाषण देंगे और खुद ही उसकी रिपोर्ट और प्रेस विज्ञप्ति जारी करेंगे. पढेंगे भी खुद ही... नहीं यह ठीक नहीं है, पढने का काम मिलजुलकर करते हैं. रिपोर्ट लिखेंगे हम, पढ़ना आपको पड़ेगी. बल्कि अपने-अपने ब्लॉग पर लगानी भी पड़ेगी. चूंकि प्रश्न हिन्दी और हिन्दुस्तान की ब्लोगिंग का है इसलिए हिन्दुस्तान से बाहर करना पडेगा ताकि आपका विदेश भ्रमण भी हो जाय और आप माओवादियों के निर्दोष-मारण रेड-हंट अभियान की फ़िक्र किये बिना सम्मलेन में बेख़ौफ़ भागीदारी भी कर सकें.

हमारे सलाहकारों ने बताया है कि ब्लोगर संस्था की एक ज़िम्मेदारी जनजागृति की होती है. और जनजागृति के लिए रेवड़ी बांटने... नहीं-नहीं, पुरस्कार बांटने की परम्परा भी होती है. हम भी बांटेंगे. जितने लोग इस पोस्ट पर टिप्पणी लिखेंगे उन्हें टिप्पणी शिरोमणि पुरस्कार और जितने पसंद का चटका लगायेंगे उन्हें ब्लोग्वानी चटक चटका पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा. माफ़ कीजिये, इनाम में हम कुछ नकदी नहीं देंगे, अपनी लिखी बिना बिकी किताबों के बण्डल मुफ्त देंगे. आपको केवल अग्रिम डाक खर्च संस्था के खजाने में पहले से जमा कराना पडेगा.

हम अच्छी ब्लॉग रचनाओं को पुस्तकों का रूप देकर प्रकाशित भी करायेंगे. अब जैसा कि आप को पता है कि हर अच्छी ब्लॉग रचना हमारी ही होती है सो किताब पर नाम हमारा ही होगा. क्या कहा? आप मुकदमा करेंगे? तो भैय्या हमने पहले ही वकील रख लिए हैं. आप क्या समझते थे कि आपका दिया हुआ चन्दा हम सारा का सारा खुद खा जायेंगे? वकीलों को भी देना पड़ता है और सिक्योरिटी को भी.

अब इतनी बड़ी संस्था चलाने के लिए कुछ पैसा भी चाहिए न, सो वसूली का काम चौराहे के अनुभवी ट्रैफिक सिपाहियों को दे दिया गया है - अच्छी उगाही की उम्मीद है. हमारी एकल संस्था का नारा है - सारे ब्लोगर एक हो - संगठन में शक्ति है! सबको एक होना ही पडेगा और एक होकर हमें ही वोट देना पडेगा. जितने नहीं देंगे उनके DNS सर्वर की पहुँच गूगल तक बंद करा दी जायेगी. फिर लिखें खुदी, पढ़ें खुदी और टिप्पणी करें खुदी.

हर जोर जुल्म की टक्कर पर ब्लोगर हड़ताल करायेंगे!
आप आयें या न आयें हम सम्मलेन ज़रूर सजायेंगे!

तो ब्लोगर समाज, देर किस बात की है, फॉर्म बनाओ, छापो और भेज दो, टिप्पणी की फॉर्म में.

Thursday, May 27, 2010

माय नेम इज खान [कहानी]

अट्ठारह घंटे तक एक ही स्थिति में बैठे रहना कितनी बड़ी सजी है इसे वही बयान कर सकता है जिसने भारत से अमेरिका का हवाई सफ़र इकोनोमी क्लास में किया हो. अपन तो इस असुविधा से इतनी बार गुज़र चुके हैं कि अब यह सामान्य सी बात लगती है. मुश्किल होती है परदेस में हवाई अड्डे पर उतरने के बाद आव्रजन कार्यवाही के लिए लम्बी पंक्ति में लगना.

आम तौर पर कर्मचारी काफी सभ्य और विनम्र होते हैं. खासकर भारतीय होने का फायदा तो हमेशा ही मिल जाता है. कई बार लोग नमस्ते कहकर अभिवादन भी कर चुके हैं. फिर भी, हम लोग ठहरे हिन्दुस्तानी. वर्दी वाले को देखकर ही दिल में धुक-धुक सी होने लगती है. खैर वह सब तो आसानी से निबट गया. अब एक और जांच बाकी थी. हुआ यह कि इस बार साम्बाशिवं जी ने बेलपत्र लाने को कहा था जो हमने दिल्ली में कक्कड़ साहब के पेड़ से तोड़कर एक थैले में रख लिए थे. यहाँ आकर डिक्लेर किये तो पता लगा कि आगे अपने घर की फ्लाईट पकड़ने से पहले फूल-पत्ती-जैव विभाग की जांच और क्लियरेंस ज़रूरी है. अरे वाह, यहाँ तो अपना भारतीय बन्दा दिखाई दे रहा है. चलो काम फ़टाफ़ट हो जाएगा.

नेम प्लीज़

शर्मा

कैसे हैं शर्मा जी? नेपाल से कि हिन्दुस्तान से?

दिल में आया कहूं कि हिन्दी बोल रहा है और पासपोर्ट देखकर भी देश नहीं पहचानता, कमाल का आदमी है. मगर फिर बात वहीं आ गयी कि हुज्जतियों से बचकर ही रहना चाहिए, खासकर जब वे अधिकारी हों.

कितने साल से हैं यहाँ?

कोई सात-आठ साल से

सात या आठ

हूँ... सात साल आठ महीने...

तो ऐसा कहिये न.

कब गए थे हिन्दुस्तान?

एक महीना पहले.

अब कब जायेंगे?

पता नहीं... अभी तो आये हैं.

हाँ यहाँ आके वहाँ कौन जाना चाहेगा?

भंग पीते हैं क्या?

नहीं तो!

तो ये पत्ते किसलिए लाये हैं? क्या देसी बकरी पाली हुई है?

किसी ने पूजा के लिए मंगाए हैं.

नशीले हैं?

नहीं बेल के हैं

कौन सी बेल?

एक फल होता है. थोड़ा जल्दी कर लीजिये, मेरी फ्लाईट निकल जायेगी.

एक घंटे की हुज्जत के बाद साहब को दया आ गयी.

चलो छोड़ दे रहा हूँ आपको. क्या याद करेंगे किस नरमदिल अफसर से पाला पडा था.

फ्लाईट तो निकल चुकी थी. चलते-चलते मैंने पूछा, "क्या नाम है आपका? भारत में कहाँ से हैं आप?"

"माय नेम इज खान... सलीम खान! इस्लामाबाद से."
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इस व्यंग्य का ऑडियो आवाज़ पर उपलब्ध है. सुनने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें.

Saturday, May 15, 2010

बुद्ध हैं क्योंकि भगवान परशुराम हैं

Bhagvan Parashu Ram Jamdagneya
1970 की हिन्दी फिल्म का पोस्टर
ज भगवान् परशुराम के जन्म दिन यानी अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर यूँ ही डॉ. मनोज मिश्र द्वारा मा पलायनम पर 5 हफ़्ते पहले पर पोस्ट किया गया आलेख क्या परशुराम क्षत्रिय विरोधी थे? याद आ गया। आलेख में यह दर्शाया गया था कि भगवान् परशुराम क्षत्रियों के नहीं बल्कि निरंकुश और अत्याचारी शासकों के विरुद्ध थे।

शास्त्रों में जहां भी उनका उल्लेख है वहां यह बात स्पष्ट समझ में आती है कि वे अत्याचार और निरंकुशता के खिलाफ ही सीना तान कर खड़े हुए थे। मगर इसका मतलब यह नहीं कि वे हिंसा को अहिंसा से ऊपर मानते थे। आम जनता को अनाचारियों के पापों से बचाने के लिए उन्होंने सहस्रबाहु को नर्मदा नदी के किनारे महेश्वर में मारा जहाँ आज भी उसकी समाधि और शिव मन्दिर है।

राजकुमार विश्वामित्र के भांजे परशुराम राज-परिवार में नहीं बल्कि ऋषि आश्रम में जन्मे थे और उनका पालन पूर्ण अहिंसक और सात्विक वातावरण में हुआ था। इसलिए उनके द्वारा अन्याय के खिलाफ हिंसा का प्रयोग कुछ लोगों के लिए वैसा ही आश्चर्यजनक है जैसा कि गौतम बुद्ध या महावीर जैसे राजकुमारों का बचपन से अपने चारों ओर देखी और भोगी गयी हिंसा के खिलाफ खड़े हो जाना। फर्क सिर्फ इतना है कि बुद्ध या महावीर जैसे राजकुमारों ने जब हिंसा का परित्याग किया तो कालान्तर में उनके अनुयायी इतने अतिवादी हो गए कि उनकी नयी परम्परा का पूर्णरूपेण पालन आम गृहस्थों के लिए असंभव सा हो गया और दैनंदिन जीवन के लिए अव्यवहारिक जीवनचर्या के लिए गृहस्थों से अलग भिक्षुकों की आवश्यकता पडी। इसके विपरीत भगवान् परशुराम ने स्वयं अविवाहित रहते हुए भी कभी अविवाहित रहने या अहिंसा के नाम पर हिंसक समुदायों या शासकों के विरोध से बचने जैसी बात नहीं की। उल्लेखनीय है कि महाभारत के दो महावीर भीष्म और कर्ण उनके ही शिष्य थे। समरकला के पौराणिक गुरु द्रोणाचार्य के दिव्यास्त्र भी परशुराम-प्रदत्त ही हैं।

अनाचार रोकने के लिये उन्हें हिंसा का सहारा लेना पडा फिर भी उन्होंने न सिर्फ २१ बार इसका प्रायश्चित किया बल्कि जीती हुई सारी धरती दान करके स्वयं ही देश निकाला लेकर महेंद्र पर्वत पर चले गए और राज्य कश्यप ऋषि के संरक्षण में विभिन्न क्षत्रिय कुलों को दिये। मारे गए राजाओं के स्त्री-बच्चों के पालन-पोषण और समुचित शिक्षा की व्यवस्था विभिन्न आश्रमों में की गयी और इन ब्रह्म-क्षत्रियों ने बड़े होकर अपने-अपने राज्य फिर से सम्भाले। भृगुवंशी परशुराम ऋग्वेद, रामायण, महाभारत और विभिन्न पुराणों में एक साथ वर्णित हुए चुनिन्दा व्यक्तित्वों में से एक हैं। ऋग्वेद में परशुराम के पितरों की अनेकों ऋचाएं हैं परन्तु १०.११० में राम जामदग्नेय के नाम से वे स्वयं महर्षि जमदग्नि के साथ हैं।

जब भी भगवान् परशुराम की बात आती है तब-तब उनके परशु और समुद्र से छीनकर बसाए गए परशुराम-क्षेत्र का ज़िक्र भी आता है। गोवा से कन्याकुमारी तक का परशुराम क्षेत्र समुद्र से छीना गया था या नहीं यह पता नहीं मगर परशुराम इस मामले में अग्रणी ज़रूर थे कि उन्होंने परशु (कुल्हाड़ी) का प्रयोग करके जंगलों को मानव बस्तियों में बदला। मान्यता है कि भारत के अधिकांश ग्राम परशुराम जी द्वारा ही स्थापित हैं। राज्य के दमन को समाप्त करके जनतांत्रिक ग्राम-व्यवस्था का उदय उन्हीं की सोच दिखती है। उनके इसी पुण्यकार्य के सम्मान में भारत के अनेक ग्रामों के बाहर ब्रह्मदेव का स्थान पूजने की परम्परा है। यह भी मान्यता है कि परशुराम ने ही पहली बार पश्चिमी घाट की कुछ जातियों को सुसंकृत करके उन्हें सभ्य समाज में स्वीकृति दिलाई। पौराणिक कथाओं में यह वर्णन भी मिलता है कि जब उन्होंने भगवान् राम को एक पौधा रोपते हुए देखा तब उन्होंने काटे गए वृक्षों के बदले में नए वृक्ष लगाने का काम भी शुरू किया। कोंकण क्षेत्र का विशाल सह्याद्रि वन क्षेत्र उनके वृक्षारोपण द्वारा लगाया हुआ है। हिंडन तट का पुरा महादेव मन्दिर, कर्नाटक के सात मुक्ति स्थल और केरल के १०८ मंदिर उनके द्वारा स्थापित माने जाते हैं। आज के साम्यवादी केरल में परशुराम एक्सप्रेस का चलना किसी आश्चर्य से कम नहीं है।

जिस प्रकार हिमालय काटकर गंगा को भारत की ओर मोड़ने का श्रेय भागीरथ को जाता है उसी प्रकार पहले ब्रह्मकुण्ड (परशुराम कुण्ड) से और फिर लौहकुन्ड (प्रभु कुठार) पर हिमालय को काटकर ब्रह्मपुत्र जैसे उग्र महानद को भारत की ओर मोड़ने का श्रेय परशुराम जी को जाता है। दुर्जेय ब्रह्मपुत्र का नामकरण इस ब्राह्मणपुत्र के नाम पर ही हुआ है। यह भी कहा जाता है कि गंगा की सहयोगी नदी रामगंगा को वे अपने पिता जमदग्नि की आज्ञा से धरा पर लाये थे।

परशुराम क्षेत्र के निर्माण के समय भगवान परशुराम का आश्रम माने जाने वाले सूर्पारक (मुम्बई के निकट सोपारा ग्राम) में महात्मा बुद्ध ने तीन चतुर्मास बिताये थे। कभी कभी मन में आता है कि अगर शाक्यमुनि बुद्ध के शिष्यों ने अहिंसा के अतिवाद को नहीं अपनाया होता तो बौद्धों का परचम शायद आज भी चीन से ईरान तक लहरा रहा होता। न तो तालेबानी दानव बामियान के बुद्ध को धराशायी कर पाते और न ही चीन के माओवादी दरिन्दे तिब्बती महिलाओं का जबरन बंध्याकरण कर पाए होते। इस निराशा के बीच भी खुशी की बात यह है कि सुदूर पूर्व के क्षेत्रों में बौद्ध धर्म आज भी जापान तक जीवित है और इस अहिंसक धर्म को जीवित रखने का श्रेय भगवान् परशुराम के सिवा किसी को नहीं दिया जा सकता है।

परशुराम क्षेत्र के धुर दक्षिण, केरल में जाएँ तो परशुराम द्वारा प्रवर्तित एक कला आज भी न सिर्फ जीवित बल्कि फलीभूत होती दिखती है। वह है विश्व की सबसे पुरानी समर-कला "कलरिपयट्टु।" दुःख की बात है कि जूडो, कराते, तायक्वांडो, ताई-ची आदि को सर्वसुलभ पाने वाले अनेकों भारतीयों ने कलारि का नाम भी नहीं सुना है। भगवान् परशुराम को कलारि (प्रशिक्षण शाला/केंद्र) का आदिगुरू मानने वाले केरल के नायर समुदाय ने अभी भी इस कला को सम्भाला है।

बौद्ध भिक्षुओं ने जब भारत के उत्तर और पूर्व के सुदूर देशों में जाना आरंभ किया तो वहां के हिंसक प्राणियों के सामने इन अहिंसकों का जीवित रहना ही असंभव सा था और तब उन्होंने परशुराम-प्रदत्त समर-कलाओं को न केवल अपनाया बल्कि वे जहाँ जहाँ गए, वहाँ स्थानीय सहयोग से उनका विकास भी किया। और इस तरह कलरिपयट्टु ने आगे चलकर कुंग-फू से लेकर जू-जित्सू तक विभिन्न कलाओं को जन्म दिया। इन दुर्गम देशों में बुद्ध का सन्देश पहुंचाने वाले परशुराम की सामरिक कलाओं की बदौलत ही जीवित, स्वस्थ और सफल रहे।

कलारि के साधक निहत्थे युद्ध के साथ-साथ लाठी, तलवार, गदा और कटार उरमि की कला में भी निपुण होते हैं। इनकी कटार इस्पात की पत्ती से इस प्रकार बनी होती थी कि उसे धोती के ऊपर कमर-पट्टे (belt) की तरह बाँध लिया जाता था। कई लोगों को यह सुनकर आश्चर्य होता है कि लक्ष्मण जी ने विद्युत्जिह्व दुष्टबुद्धि नामक असुर की पत्नी श्रीमती मीनाक्षी उर्फ़ शूर्पनखा के नाक कान एक ही बार में कैसे काट लिए। लचकदार कटारी से यह संभव है। केरल के वीर नायक सेनानी उदयन कुरूप अर्थात ताच्चोली ओथेनन के बारे में मशहूर था कि उनकी फेंकी कटार शत्रु का सर काटकर उनके हाथ में वापस आ जाती थी।

किसी भी कठिन समय में भारतीय संस्कृति की रक्षा के निमित्त सामने आने वाले सात प्रातः स्मरणीय चिरंजीवियों में परशुराम का नाम आना स्वाभाविक है:

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमानश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः ॥
(श्रीमद्‍भागवत महापुराण)

एक बार फिर, अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं! भगवान् परशुराम की जय!
अपडेट: परशुराम जी से सम्बन्धित वाल्मीकि रामायण के तीन श्लोक
(सुन्दर हिन्दी अनुवाद के लिये आनन्‍द पाण्‍डेय जी का कोटिशः आभार)

वधम् अप्रतिरूपं तु पितु: श्रुत्‍वा सुदारुणम्
क्षत्रम् उत्‍सादयं रोषात् जातं जातम् अनेकश: ।।१-७५-२४॥

अन्‍वय: पितु: अप्रतिरूपं सुदारुणं वधं श्रुत्‍वा तु रोषात् जातं जातं
क्षत्रम् अनेकश: उत्‍सादम्।।

अर्थ: पिता के अत्‍यन्‍त भयानक वध को, जो कि उनके योग्‍य नहीं था,सुनकर
मैने बारंबार उत्‍पन्‍न हुए क्षत्रियों का अनेक बार रोषपूर्वक संहार किया।।

पृथिवीम् च अखिलां प्राप्‍य कश्‍यपाय महात्‍मने
यज्ञस्‍य अन्‍ते अददं राम दक्षिणां पुण्‍यकर्मणे ॥१-७५-२५॥

अन्‍वय: राम अखिलां पृथिवीं प्राप्‍य च यज्ञस्‍यान्‍ते पुण्‍यकर्मणे
महात्‍मने कश्‍यपाय दक्षिणाम् अददम् ।

अर्थ: हे राम । फिर सम्‍पूर्ण पृथिवी को जीतकर मैने (एक यज्ञ किया) यज्ञ
की समाप्ति पर पुण्‍यकर्मा महात्‍मा कश्‍यप को दक्षिणारूप में सारी
पृथिवी का दान कर दिया ।

दत्‍वा महेन्‍द्रनिलय: तप: बलसमन्वित:
श्रुत्‍वा तु धनुष: भेदं तत: अहं द्रुतम् आगत: ।।१-७५-२5॥

अन्‍वय: दत्‍वा महेन्द्रनिलय: तपोबलसमन्वित: अहं तु धनुष: भेदं
श्रुत्‍वा तत: द्रुतम् आगत: ।।

अर्थ: (पृथ्‍वी को) देकर मैने महेन्द्रपर्वत को निवासस्‍थान बनाया, वहाँ
(तपस्‍या करके) तपबल से युक्‍त हुआ। धनुष को टूटा हुआ सुनकर वहाँ से
मैं अतिशीघ्रता से आया हूँ ।।

भगवान् परशुराम श्रीराम चन्‍द्र को लक्ष्‍य करके उपर्युक्त बातें कहते
हैं।  इसके तुरंत बाद ही उन्‍हें विष्‍णु के धनुष पर प्रत्‍यंचा चढा कर
संदेह निवारण का आग्रह करते हैं। शंका समाधान हो जाने पर विष्‍णु का
धनुष राम को सौंप कर तपस्‍या हेतु चले जाते हैं ।।

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सम्बंधित कड़ियाँ
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* परशुराम स्तुति
* परशुराम स्तवन
* अक्षय-तृतीया - भगवान् परशुराम की जय!
* परशुराम और राम-लक्ष्मण संवाद
* मटामर गाँव में परशुराम पर्वत
* भगवान् परशुराम महागाथा - शोध ग्रंथ
* ग्वालियर में तीन भगवान परशुराम मंदिर
* अरुणाचल प्रदेश का जिला - लोहित
* बुद्ध पूर्णिमा पर परशुराम पूजा

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Thursday, May 13, 2010

वरुण देव मंदिर - देवासुर संग्राम ६


मर्त्या हवा अग्ने देवा आसु:
शुभ कार्य करके मनुष्य देव बनते हैं (शतपथ ब्राह्मण)


शतपथ ब्राह्मण के उपरोक्त कथन और अन्य भारतीय ग्रंथों में बिखरे उल्लेखों के अनुसार प्रत्येक मनुष्य में देव बनने की क्षमता है. मगर यह देव होता क्या है? अगली कड़ी में हम देखेंगे - देव लक्षण.

देवासुर गाथा के बारे में पढ़कर पूजा अनिल जी ने मैड्रिड स्पेन से हमें वरुण देव के पुष्कर (राजस्थान) के एक मंदिर के करीब 13 साल पुराने दो चित्र भेजे हैं. यहाँ उनकी अनुमति से दर्शनार्थ प्रदर्शित हैं. इसका मतलब यह है कि अभी भी वरुणदेव के मंदिर हमारे अनुमान से कहीं अधिक हैं.


वरुण देव का वाहन "मीन"


वरुण देव के अवतार झूलेलाल देवता अपने रथ पर

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Tuesday, May 11, 2010

असुर और सुर भेद - देवासुर संग्राम ५


ॐ भूर्भुवः स्वः वरुण! इहागच्छ, इह तिष्ठ वरुणाय नमः, वरुणमावाहयामि, स्थापयामि।

पिछली गर्मियों (जून २००९) में छत्तीसगढ़ के कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू सूखे से बचाव के लिए ऐतिहासिक बुद्धेश्वर महादेव मंदिर में वरुण यज्ञ कराने के कारण चर्चा में आये थे. राजनगर नंगल के श्रद्धा के केंद्र वरुण देव मंदिर के बारे में शायद निर्मला कपिला जी अधिक जानकारी दे सकें. असुर-आदित्य वरुणदेव दस दिक्पालों में से एक हैं जिनके कन्धों पर पश्चिम दिशा का भार है. उनका अस्त्र पाश है. पापियों को वे इसी पाश से बांधते हैं. सिंध और कच्छ की तटीय क्षेत्रों में वरुणदेव की पूजा अधिक होती थी. भारत में वरुण देव के शायद बहुत मंदिर नहीं बचे हैं. यह कहते हुए मुझे ध्यान है कि भारत के बारे में कोई भी बात कहते समय मुझे भारत की अद्वितीय विविधता के बारे में अपने अज्ञान का ध्यान रखना चाहिए. शायद इसी लेख पर किसी टिप्पणी में भारत के एक ऐसे क्षेत्र का पता लगे जहां वरुणदेव के मंदिरों की भरमार हो. पाकिस्तानियत नाम के ब्लॉग में सिंध प्रदेश के मनोरा द्वीप में स्थित ऐसे एक मंदिर का सचित्र वर्णन है. इस मंदिर और उसकी दुर्दशा के बारे में अधिक जानकारी फैज़ा इल्यास की इस रिपोर्ट में है
त्वम॑ग्ने रु॒द्रो असु॑रो म॒हो दि॒वस्त्वं शर्धो॒ मारु॑तं पृ॒क्ष ई॑शिषे।
त्वं वातै॑ररु॒णैर्या॑सि शंग॒यस्त्वं पू॒षा वि॑ध॒तः पा॑सि॒ नु त्मना॑॥
पीछे एक कड़ी में हमने असुर का संधि विच्छेद असु+र के रूप में देखा था.
हड़प्पा साहित्य और वैदिक साहित्य के भगवान सिंह "सुर" का अर्थ कृषिकर्मा मानते है. उन्हीं के अनुसार उत्पादन के साधनों पर अधिकार रखने वाले देव थे और अनुत्पादक लोग असुर। तो क्या उत्पादन के समर्थक सुर हुए और अनुत्पादक बंध और हड़ताल के समर्थक असुर? आइये देखें, व्याख्याकारों के अनुसार असुर की कुछ परिभाषायें निम्न है:
  • असुं राति लाति ददाति इति असुरः
  • असुषु रमन्ते इति असुरः 
  • असु क्षेपणे, असून प्राणान राति ददाति इति असुरः
  • सायण के अनुसार: असुर = बलवान, प्राणवान
  • निघंटु के अनुसार: असुर = जीवन से भरपूर, प्राणवान
खैर अपना-अपना ख्याल है - हमें क्या? मगर इस बीच हम देव शब्द की परिभाषा तो देख ही लें - अगली कड़ी में.

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Friday, May 7, 2010

देव, दैत्य, दानव - देवासुर संग्राम ४

तम उ षटुहि यः सविषुः सुधन्वा
यो विश्वस्य कषयित भेषस्य
यक्ष्वा महे सौमनसाय रुद्रं
नमोभिर देवमसुरं दुवस्य
पिछली कड़ी में हमने जिन वरुण देव को ऋग्वैदिक ऋषियों द्वारा असुर कहे जाते सुना था वे मौलिक देवों यानी अदिति के पुत्रों में से एक हैं. अदिति सती की बहन और दक्ष प्रजापति की पुत्री हैं. कश्यप ऋषि और अदिति से हुए ये देव आदित्य भी कहलाते रहे हैं जबकि इनमें से कई माननीय असुर कहे गए हैं. भारत में कोई संकल्प लेते समय अपना और अपने गोत्र का नाम लेने की परम्परा रही है. जिन्हें भी अपना गोत्र न मालूम हो उन्हें कश्यप गोत्रीय कहने की परम्परा है क्योंकि सभी देव, दानव, मानव, यहाँ तक कि अप्सराएं भी कुल मिलाकर कश्यप के ही परिवार का सदस्य हैं. कश्मीर प्रदेश का और कैस्पियन सागर का नाम उन्हीं के नाम पर बना है. भगवान् परशुराम ने भी कार्तवीर्य और अन्य अत्याचारी शासकों का वध करने के बाद सम्पूर्ण धरती कश्यप ऋषि को ही दान में लौटाई थी और मारे गए राजाओं के स्त्री बच्चों के पालन,पोषण, शिक्षण की ज़िम्मेदारी विभिन्न ऋषियों को दे दी गयी थी. क्या सम्पूर्ण धरती का कश्यप को दिया जाना और दैत्य, दानव और देवों का भी उन्हीं की संतति होना उनके द्वारा किसी सामाजिक, राजनैतिक परिवर्तन का सूचक है? मुझे ठीक से पता नहीं. मगर यह ज़रूर है कि प्राचीन ग्रंथों में असुर और सुर शब्दों का प्रयोग जाति या वंश के रूप में नहीं है.

असुर शब्द का एक अर्थ हमने पीछे देखा जिससे असुरों की आसवन की कला में निपुणता का अहसास मिलता है. वारुणी भी नाम से ही उनसे सम्बंधित दीखती है. कच की कथा में असुरों द्वारा नियमित शराबखोरी के स्पष्ट वृत्तांत हैं इसलिए यह कहना कि असुर मदिरापान नहीं करते थे असत्य होगा. हाँ उसी कथा से और अन्यत्र प्रहलाद आदि की कथाओं से यह स्पष्ट है कि दैत्य क्रूर बहुत थे. उन्हें बुद्धिबल से अधिक हिंसाबल में विश्वास था. एक और चीज़ जो स्पष्ट दिखती है कि उनके शासन में शासक के अलावा किसी सर्वशक्तिमान ईश्वर की कल्पना इस हद तक असहनीय थी कि उस अपराध में राजा अपने राजकुमार की भी जान लेने के पीछे पड़ जाता है. आस्तिकों के प्रति घोर असहिष्णुता एक प्रमुख दैत्य गुण रहा है. वे स्थापत्य और पुर-निर्माण में कुशल थे. पर उनके राज्य में सिर्फ शासकों की ही मूर्तियाँ बनती और लगती थी. क्या आज के तानाशाह उनसे किसी मामले में भिन्न हैं? सोवियत संघ में लेनिन की मूर्तियों की बाढ़ हो या कम्युनिस्ट चीन में माओ की, या क्यूबा में फिदेल कास्त्रो की. लक्ष्मणपुर की आप जानो.

असुर शब्द के कुछ अन्य अर्थ:
१. तीव्र गति से कहीं भी पहुँचने वाले
२. अपने सिद्धांत से न हटने वाले
३. अपरिमित शक्ति के स्वामी
[असु का एक अर्थ अस्तित्व (जीवन) भी हो सकता है. मुझे संस्कृत नहीं आती - विद्वानों की राय अपेक्षित है - जिन विद्वानों ने संस्कृत अंग्रेज़ी में पढी हो वे क्षमा करें.]

डॉ. मिश्रा द्वारा उद्धृत रामायण की समुद्र मंथन वाली पंक्तियों में ज़रूर आदित्यों को सुर और दैत्यों को असुर के नाम से स्पष्ट चिन्हित किया गया है. तो क्या यह सही है कि उस मंथन के बाद (या वहीं से) एक नया वर्ग सुर पैदा हुआ? क्या यह मंथन दो बड़े राजनैतिक सिद्धांतों का मंथन करके एक नयी व्यवस्था निकालने का साधन था जिसमें हलाहल से लेकर अमृत तक सभी कुछ निकला? क्या अमृत देवताओं तक आने का कोई विशेष अर्थ है? यह सब आपके ऊपर छोड़ता हूँ मगर "अदिति के सुर" से इतना तय लगता है कि वरुण उस समय असुर उपाधि को छोड़कर सुर हो गए हैं. शायद वह एक नया तंत्र था जो असुरों (यहाँ से आगे असुर=दैत्य) के अब तक सामान्य-स्वीकृत तौर-तरीके से भिन्न था. वह नया तंत्र क्या था?



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Thursday, May 6, 2010

वारुणी - देवासुर संग्राम 3



असुराः तेन दैतेयाः सुराः तेन अदितेः सुताः।
हृष्टाः प्रमुदिताः च आसन् वारुणी ग्रहणात् सुराः॥ 


दैत्य वे असुर, अदिति के पुत्र सुर. प्रसन्न, स्वस्थ वारुणी को सुरों ने ग्रहण किया.

वाल्मीकि रामायण में ज़िक्र है समुद्र मंथन से उत्पन्न हुई वारुणी का जिसे अदिति की संतति सुरों ने स्वीकार किया. मदमाते नयनों वाली वारुणी वरुण से (या उनके द्वारा) उत्पन्न हुई हैं और असुर (वहां पर) उन्हें नहीं लेते हैं इसके कई कारण हो सकते हैं. एक स्पष्ट कारण यह है कि वे विजेता होते हुए भी हारे हुए देवों से मिलकर समुद्र मंथन अभियान में शामिल होने के लिए सिर्फ इसलिए राजी हुए थे ताकि अमृत पा सकें न कि वारूणी. मगर एक बात और है. उस बात को बेहतर समझने के लिए पहले ऋग्वेद तक चलते हैं. वारूणी के सृजक वरुण हैं, इसलिए हम उनकी स्तुति का एक मंत्र देखें:

अव ते हेळो वरुण नमोभिरव यज्ञेभिरीमहेहिविभःकशाया
कषयन्नस्मभ्यमसुर परचेता राजन्नेनांसिशिश्रथः कर्तानि जा

यहाँ समुद्र के स्वामी वरुणदेव को असुर कहकर पुकारा गया है. यह अकेली जगह नहीं है जहां उन्हें असुर कहा गया है बल्कि ऋग्वेद में उन्हें अनेकों स्थानों पर आदर से असुर कहकर पुकारा गया है. वरुणदेव जल के स्वामी हैं. आज भी सप्त-सैन्धव के मूलनिवासी सिन्धीजन द्वारा पूजे जाते झूलेलाल उनके अवतार माने जाते हैं. झूलेलाल की सवारी मछली है और समुद्र के स्वामित्व को बताने वाला उनका एक नाम दरयाशाह भी है.

अब जब असुर वरुणदेव के नितांत अपने समुद्र का मंथन हो रहा हो तब वहां उनका एक प्रमुख स्थान होना वाजिब है और उनके अपने राष्ट्र के रत्न वारुणी में उनकी या उनके लोगों की क्या विशेष रूचि हो सकती है लिहाजा वह रत्न विपक्ष के पास गया.

भले ही आजकल हम असुर शब्द का प्रयोग किसी को गाली देने के लिए करते हों विद्वानों के अनुसार वरुण, मित्र आदि भारतीय मुनियों द्वारा पूजित बहुत से असुरों में से एक हैं और असुर शब्द में अनादर का भाव नहीं है. भारतीय ग्रंथों में मयासुर को इंद्र के वास्तुशिल्पी से भी महान बताया गया है. दूसरे अनेकों असुरों को महादेव द्वारा वरदान दिए जाने की कथाएं जहां तहां मिलती हैं. असुरराज प्रहलाद की वंशरक्षा के लिए भगवान् विष्णु स्वयं प्रतिबद्ध थे. केरल का विशु महोत्सव असुरराज बाली के पाताल लोक से वापस आने के सम्मान में ही मनाया जाता है. मैसूर राज्य का नाम ही महिषासुर के नाम पर है. भगवान् परशुराम के पूर्वज ऋषि भृगु के पुत्र शुक्राचार्य जैसे महारथी असुरों के गुरु यूं ही तो नहीं बन गए थे. यहाँ यह ध्यान आ गया कि शुक्राचार्य की माँ उषा (उष्णा) असुर राजकुमार प्रह्लाद की बहन थीं.

फिर भी आसुरी तंत्र और देवी तंत्र में कई बड़े अंतर हैं. आज के लिए सिर्फ दो कथाएं:

१. एक देवासुर संग्राम में बहुत सी जानें जाने के बाद भी जब कोई निर्णय नहीं हो सका तो विष्णु जी ने प्रस्ताव रखा कि युद्ध को अनंत काल तक चलाने के बजाय दोनों पक्षों से कुछ लोगों का एक छोटा सा दल लेकर उनमें प्रतियोगिता करा ली जाए. जो जीते विजय उसी की. दोनों तैयार. प्रतियोगिता थी लड्डुओं के थाल में से जल्दी-जल्दी खाकर पहले ख़त्म करने की. देवता तो ऐसी बेतुकी असंतुलित प्रतियोगिता के बारे में सुनकर ही चौंक गए. दोनों दलों को लड्डू के साथ एक-एक कमरे में बंद कर दिया गया, नियम था कि खाते समय कोहनी नहीं मोडनी है. महा पराक्रमी असुर सोचते ही रह गए जबकि देवता क्षण भर में लड्डू के थाल ख़त्म करके बाहर आ गए और विजयी हुए. कोहनी मोड़े बिना दूसरों को देना उनका नैसर्गिक गुण जो ठहरा. देव शब्द का एक अर्थ दाता ही होता है.

२. देवासुर दोनों ब्रह्मा के पास ज्ञान लेने गए और ब्रह्मा ने सिर्फ एक अक्षर कहा "द." दोनों ही प्रसन्नमन वापस आ गए. देवों ने जान लिया था कि उन्हें दमन (इन्द्रिय दमन = इंद्र की ज़रुरत इसीलिये थी) करना है जबकि असुरों ने अपने अन्दर दया की कमी को पहचाना.

ट्रान्सलिट्रेशन में संस्कृत टाइप करने में बहुत मुश्किल हो रही है, इसलिए न चाहते हुए भी यहाँ विश्राम लेता हूँ. जाने से पहले आज का सवाल - ऋग्वेद में एक देव को एक ही साथ असुर और देव दोनों ही श्रेणियों में रखा गया है - देखते हैं कि इस देव का नाम कौन बताता है.

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असुर शब्द का अर्थ - देवासुर संग्राम २



असुराः तेन दैतेयाः सुराः तेन अदितेः सुताः।
हृष्टाः प्रमुदिताः च आसन् वारुणी ग्रहणात् सुराः॥

ऐसा पढने में आया कि समुद्र मंथन में पहली बार उत्पन्न हुई सुरा को स्वीकार करने के कारण देवता सुर कहलाये. आइये इस कथन पर एक बार पुनर्विचार करें. सुरा के जन्म (समुद्र मंथन) के समय सुर (देवता) पहले से स्थापित थे. इसलिए यह मानना कि सद्यजन्मा सुरा - जिसका पहले नाम ही नहीं था - उसे स्वीकार करने की वजह से देवताओं और असुरों की दोनों जातियों का ही नया नामकरण हो गया, कुछ जमता नहीं. वैसे भी उस समुद्र मंथन में एक नहीं चौदह रत्न निकले थे जिनमें से अधिकाँश सुरा से अधिक दुर्लभ और बहुमूल्य बल्कि अद्वितीय थे. उनके नाम पर कोई नामकरण क्यों नहीं हुआ?

इससे भी बड़ी बात यह है कि पहले संग्राम और बाद में समुद्र मंथन देवासुर के बीच ही हुआ था. मतलब कम से कम असुर शब्द पहले से मौजूद था. फिर सुर शब्द के असुर से व्युत्पन्न होने की संभावना है न कि सुरा से. यहाँ मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि सुर सुरापान करते थे या नहीं. मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि उनका नाम समुद्र मंथन से पहले से ही सुर था. कम से कम असुर शब्द तो पहले ही से प्रचलन में था. सुर और असुर दोनों ही शब्द ऋग्वेद में बहुत शुरू में ही प्रयुक्त हुए हैं और प्राचीन हैं.

एक नज़र देखने पर ऐसा लग सकता है जैसे सुर से असुर की व्यत्पत्ति हुई हो जबकि तथ्य इसके उलट है. असुर शब्द प्राचीन है. बाद में अ-असुरों को सुर शब्द से नवाज़ा गया था. सुर वे हैं जो असुर नहीं हैं या अब असुर नहीं रहे. आम तौर पर यह शब्द देवताओं के लिए प्रयुक्त होता है और असुर दानवों के लिए परन्तु जहां आदित्य, दानव, दैत्य, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर आदि शब्द जातिसूचक (tribe/race/region) हैं वहीं सुर, असुर, देव और ऋषि शब्द उपाधियों जैसे हैं. इसीलिये कुछ असुर भी देवता हैं और कुछ मानव भी. ठीक उसी तरह जैसे ऋषि ब्राह्मण भी हैं राजा भी हैं और नारद जैसे देवता भी.

ऊपर के श्लोक का अर्थ केवल इतना ही है कि वारुणि को सुरों ने ग्रहण किया।

असुर शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है असु+र. यहाँ असु का अर्थ है द्रव शक्ति या शक्ति का रस. आसव, आसवन आदि सभी इसी के सम्बंधित शब्द हैं. "र" का अर्थ है स्वामी. अर्थात असुर वे हैं जो या तो शक्तिरस के स्वामी हैं या फिर द्रव, तरल या जल की शक्ति के स्वामी हैं.

पारसी आर्यों में परमेश्वर का नाम अहुर माजदा (असुर ?) है जिसके तीनों प्रमुख सहायक असुर ही हैं. इन तीनों असुरों में मित्र का नाम इसलिए उल्लेखनीय है कि उनकी पूजा भारत और ईरान से बाहर भी विभिन्न क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से होती रही है इसके अनेकों प्रमाण उत्खनन से मिले हैं. मित्र का ज़िक्र वेदों में भी है. तो क्या कुछ वैदिक ऋषि एक असुर के पूजक थे या फिर पारसियों ने भाषा की किसी गलती या भेद से असुर को सुर कहना शुरू किया, या फिर यह दोनों दल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और इनमें से कुछ सुरासुर दोनों ही हैं? या फिर सुर, सुरा और संयुक्त समुद्र-मंथन अभियान का मतलब उससे विपरीत है हमें आधुनिक प्रगतिशील विद्वान वर्ग द्वारा समझाया जाता रहा है?

आइये अगली कड़ी में मित्र से इतर एक अन्य प्राचीन असुर से मिलकर देखें कि असुर आखिर किस शक्ति के स्वामि हैं और इस बारे में संस्कृत ग्रन्थ क्या कहते हैं. अन्य देवताओं इंद्र आदि के विपरीत उनकी पूजा आज भी होती है, वे अभी भी एक भारतीय समुदाय के अधिष्ठाता देवता हैं और असुर की पिछली परिभाषा (असु+र) पर आज भी खरे उतारते हैं. मेरे लिए वह एक वैदिक आश्चर्य है और शायद इस कन्फ्यूज़न को सुलझाने का एक सूत्र भी. क्या आप बता सकते हैं कि मैं किस असुर की बात कर रहा हूँ?

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Wednesday, May 5, 2010

सीरिया की शराब - देवासुर संग्राम 1


इस साल की शुरूआत होते-होते डॉ. अरविन्द मिश्रा ने जब सुर असुर का झमेला शुरू किया तब हमें खबर नहीं थी कि हम भी इसके लपेटे में आ जायेंगे. लेकिन हम भी क्या करें, दूर देश के झमेलों में टंगड़ी उड़ाने की आदत अभी गयी नहीं है पूरी तरह से. उस पर तुर्रा ये कि डॉ. साहब ने एक पोस्ट और लिखी थी जिसका हिसाब करना बहुत ज़रूरी था. इस आलेख का शीर्षक था - असुर हैं वे जो सुरापान नहीं करते!

जब अपने ही खाने में कोई रूचि न हो तो दूसरे लोग क्या खा पी रहे हैं इसमें हमें क्या रूचि हो सकती है फिर भी सुरापान की बात से लगा कि इस विषय पर रोशनी तो पड़नी ही चाहिए वरना कई भाई लोग अँधेरे का दुरुपयोग कर लेंगे. सो भैया वार्ता शुरू करते हैं दूर देश से जिसका नाम है सुरस्थान. इस राष्ट्र को विभिन्न कालों में लोगों ने अपने-अपने जुबानी आलस के हिसाब से अलग-अलग नामों से पुकारा है. इतिहासकारों के हिसाब से सुरस्थान के उत्तर में उनका पड़ोसी राष्ट्र था असुरस्थान. कभी यह द्विग्म सुरिस्तान-असुरिस्तान कहलाया तो कभी सीरिया-असीरिया. असीरिया के निवासी असीरियन, असुर या अशुर हुए और सुरिस्तान के निवासी विभिन्न नामों से प्रसिद्ध हुए. जिनमें एक नाम सूरी भी था जिसका मिस्री भाषा में एक रूप हूरी भी हुआ. संस्कृत/असंस्कृत का स और ह का आपस में बदल जाना तो आपको याद ही होगा. तो हमारा अंदाज़ ऐसा है कि अरबी परम्पराओं की हूर का सम्बन्ध इंद्रलोक की अप्सराओं से है ज़रूर.

यह दोनों ही क्षेत्र प्राचीनतम मानव सभ्यताओं की जन्मस्थली कहे जाने वाले मेसोपोटामिया के निकट ही हैं. वही मेसोपोटामिया जहां कभी सुमेरियन सभ्यता खाई खेली. बल्कि फारसी भाषा के सुरिस्तान-असुरिस्तान तो ठीक वहीं हैं. क्या देवासुर संयुक्त समुद्र मंथन अभियान में सुमेरु पर्वत का प्रयुक्त होना कुछ अर्थ रखता है? अभी तो पता नहीं मगर आगे देखेंगे हम लोग. वैसे यवन लोग सुमेरु और असीरिया लगभग एक ही स्थान को कहते थे. सत्य जो भी हो परन्तु इन सभी स्थानों की भौगोलिक स्थितियों में काफी ओवरलैप तो है ही. हिब्रू भाषा में असुरिस्तान को अस्सुर और पहलवी में अथुर कहा गया है. बाद में अरबी में सीरिया को अल-शाम और असीरिया को अल-जज़ीरा कहा गया.

इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर ऐतिहासिक खनन और खोजें हुई हैं जिनकी जानकारी इंटरनेट पर सर्वत्र उपलब्ध है. उदाहरण के लिए ढाई हज़ार साल पहले के असीरियन राजा असुर बनिपाल के बारे में जानकारी यहाँ विकिपीडिया पर है.

हम संस्कृत को देवभाषा कहते हैं. क्या होता अगर इसे सुरवाणी कहते? क्या सुरवाणी शब्द का तद्भव सुरयानी हो सकता है? अगर हो सकता है तो ध्यान रखिये कि असीरिया की भाषा को अरबी में सुरयानी कहते हैं. एक संभावना यह भी है कि निरंतर चलते देवासुर संग्राम के कारण इनकी सीमाएं गड्डमड्ड होती रही हों. यह तो था भारत से बाहर एक भौगोलिक दर्शन. अगले अंक में देखेंगे एक वैदिक आश्चर्य! तब तक के लिए आपकी ज्ञानपूर्ण टिप्पणियों का इंतज़ार रहेगा.

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Monday, May 3, 2010

अहिसा परमो धर्मः

आधी रात थी. मैं दिल्ली फ़ोन लगा रहा था. भारत का कोड, दिल्ली का कोड, फ़िर फ़ोन नम्बर. सभी तो ठीक था - ९१-११-२५२.... पहली बार में फोन नहीं लगा. उसके बाद कितनी भी कोशिश की, डायल टोन ही वापस नहीं आयी. कुछ ही क्षणों में किसी ने बहुत बेरहमी से दरवाजा खटखटाया. समझ में नहीं आया कि इतनी रात में कौन है और घंटी न बजाकर दरवाज़ा क्यों पीट रहा है. जब तक दरवाज़े तक पहुँचा, घंटी भी लगातार बजने लगी. देखा तो काले कपडों में साढ़े छः फ़ुट का एक पुलिस अधिकारी एक हाथ में पिस्टल और दूसरे में टॉर्च लेकर खड़ा था. मुझे देखकर बड़ी विनम्रता से कुशल-क्षेम पूछने लगा.

उसके बताने पर समझ आया कि दिल्ली फ़ोन करने के प्रयास में गलती से आपदा-सहायता नम्बर ९११ डायल हो गया था. चूंकि मैंने फ़ोन पर कुछ बोला नहीं इसलिए आपात-विभाग ने तुंरत ही एक पुलिसकर्मी को भेज दिया. मैंने स्थिति का खुलासा किया तो वह खलल डालने के लिए क्षमा मांगकर वापस चला गया. इसी प्रकार जब मेरे एक सहकर्मी को दफ्तर में दौरा पड़ा तो प्राथमिक चिकित्सा कर्मियों को पहुँचने में १० मिनट भी नहीं लगे.

मुझे ध्यान आया जब १० साल पहले दिल्ली में हमारे घर में चोरी हुई थी तो १०० नम्बर काफी समय तक व्यस्त ही आता रहा था. २०० कदम की दूरी पर स्थित थाने से दो पुलिसकर्मी घर तक पहुँचने में आधे घंटे से ज़्यादा लगा था और तफ्तीश के बारे में तो सोचना ही बेकार था. इसी तरह दिल्ली में बीमार के घर पर चिकित्सा सुविधा पहुँचाना तो दूर, सड़क पर दुर्घटना में घायल हुए अधिकाँश लोगों की मौत सिर्फ़ समय पर चिकित्सा न मिलने से ही हो जाती है. यह हाल तो है राजधानी का. थोड़ा दूर निकल गए तो फ़िर तो कहना ही क्या.

प्रशासन तंत्र की कुशलता अमेरिका की एक विशेषता है. कुछ लोग इसका कारण समृद्धि बताएँगे. ग़लत नहीं है, मगर इसमें समृद्धि से ज़्यादा काम मानवीय दृष्टिकोण का है. नाभिकीय समझौते की बाबत हमारे एक नेता ने हाल ही में अमेरिका को मुसलमानों का सबसे बड़ा दुश्मन बता दिया. जब मैंने अपने पाकिस्तानी मुसलमान मित्र से इसका ज़िक्र किया तो उन्होंने कहा कि जितने बेखौफ वे और उनका परिवार अमेरिका में महसूस करते हैं उस स्थिति की पकिस्तान में उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी. उनकी बात एक आम मुसलमान के लिए बिल्कुल सच है. आम अमेरिकी आपको इंसान की तरह देखता है - हिन्दू या मुसलमान की तरह नहीं.

महात्मा गाँधी की हत्या के बाद पूरे महाराष्ट्र में ब्राह्मणों पर ज़ुल्म हुए. दशकों बाद इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली-यूपी में वही इतिहास सिखों के ख़िलाफ़ दोहराया गया. मजाल तो है कि अमेरिका में ११ सितम्बर २००१ को ३००० लोगों की नृशंस हत्या के बाद भी आम जनता किसी एक समुदाय या राष्ट्रीयता के ख़िलाफ़ क़त्ले-आम करने निकली हो. उलटा मेरे अमेरिकी हितैषियों ने बार बार यह पूछा कि कभी मेरे साथ कहीं किसी तरह का भेदभाव तो नहीं हुआ. जनता जागरूक थी और प्रशासन मुस्तैद था तो दंगा और आगज़नी कैसे होती?
अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वरः  (महाभारत - आदिपर्व ११।१३)
कई बरस पहले की बात है. मेरी नन्ही सी बच्ची भारत वापस बसने की बात पर सहम सी जाती थी. मैंने कई तरह से यह जानने की कोशिश की कि आख़िर भारत में ऐसा क्या है जिसने एक छोटे से बच्चे के मन पर इतना विपरीत असर किया है. बहुत कुरेदने पर पता लगा कि भारत में उसने बहुत बार सड़क पर लोगों को बच्चों पर और ग़रीबों पर, खासकर ग़रीब चाय वाले लड़के या रिक्शा वाले के साथ मारपीट करते हुए देखा. उसको हिंसा का यह आम प्रदर्शन अच्छा नहीं लगा. यह बात सुनने पर मुझे याद आया कि बरसों के अमेरिका प्रवास में मैंने एक बार भी किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति पर हिंसा करते हुए नहीं देखा. अगर देखा भी तो बस एकाध भारतीय माता-पिता को ही अपने मासूमों के गाल पर थप्पड़ लगाते देखा.

भारत में बच्चे तो बच्चे, कई वयस्क(?) भी हर समस्या का हल तानाशाही और सशस्त्र आन्दोलनों में ढूंढ रहे होते हैं. बच्चों के साथ स्कूलों में कई मास्टर कसाई की तरह पेश आते हैं तो घरों में कई अभिभावक. सड़क के किनारे खुले में बनी मांस की दुकानों पर, ढाबों, ठेलों व खोखों पर भी छोटे-छोटे बच्चों को बचपन से ही हिंसा दिखाई देती है. अमेरिका में अधिकाँश लोगों के मांसाहारी होने के बावजूद भी वह हिंसा कत्लगाह से बाहर खुली सड़क तक नहीं आ सकती है. इसके उलट भारतीय बच्चे परिवार, विद्यालय, आस-पड़ोस सब जगह ताकतवर को कमज़ोर पर हाथ उठाते हुए देखते हैं और धीरे-धीरे अनजाने ही यह हिंसा उनके जीवन का एक सामान्य अंग बन जाती है.
परम धरम श्रुति विदित अहिंसा। पर निंदा सम अध न गरीसा।।
सभी जानते हैं कि अमेरिका में बन्दूक खरीदने के लिए सरकार से किसी लायसेंस की ज़रूरत नहीं होती है. यहाँ के लोग बन्दूक को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़कर देखते है. निजी हाथों में दुनिया की सबसे ज्यादा बंदूकें शायद अमेरिका में ही होंगी. मगर हत्याओं के मामले में वे अव्वल नंबर नहीं पा सके. २००७-०८ में अमेरिका में हुए १६,६९२ खून के मुकाबले शान्ति एवं अहिंसा के देश भारत में ३२,७१९ मामले दर्ज हुए. इस संख्या ने भारत को क़त्ल में विश्व में पहला स्थान दिलाया. हम सब जानते हैं कि हिन्दुस्तान में एक अपराध दर्ज होता है तो कितने बिना लिखे ही दफ़न हो जाते हैं.

ऐसा नहीं है कि इनमें सब अच्छा है और हममें सब बुरा. मगर हमें एक पल ठहरकर इतना तो सोचना ही पड़ेगा कि अहिंसा और प्रेम की धरती अपनी भारत भूमि को हिंसा से बंजर होने से रोकने के लिए हमने क्या किया? समय आ गया है जब हमें मजबूरी का नाम महात्मा गांधी जैसे आम मुहावरों की आड़ में पनप रही हिंसक वृत्तियों को रोकने के प्रयास शुरू करना पड़ेगा. आम जन के साथ साथ प्रशासन को भी जागरूक होना पड़ेगा.

[यह लेख पहले (सन् 2008 में) सृजनगाथा में प्रकाशित हो चुका है]

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