Wednesday, January 26, 2011

अनुरागी मन - कहानी भाग 9

पूर्वकथा:
एक अलौकिक सुन्दरी बार-बार दिखती है, वासिफ के घर उससे एक नाटकीय भेंट भी होती है और आशाओं पर तुषारापात भी। हवेली के बाहर आकर वे खो गये थे। आँखों में लाली और हाथों में कुल्हाड़ियाँ लिये दो बाहुबली जब उनकी ओर बढ़े तो उन्हें साक्षात काल का स्पर्श महसूस हुआ। अचानक ही मूसलाधार वर्षा शुरू हो गयी। उनका पाँव कीच भरे एक गड्ढे में पड़ा और धराशायी होने से पहले ही वे अपने होश खो बैठे।

पिछले अंक
भाग 1; भाग 2; भाग 3; भाग 4; भाग 5; भाग 6; भाग 7; भाग 8

अब आगे:

जब वीर की आँख खुली तो दादाजी के मंत्रोच्चार की जगह कान में किसी के सुबकने की आवाज़ पडी। उन्होने उठने का प्रयास किया तो दायें पंजे से कमर तक पीडा की एक असहनीय तरंग दौड गयी।

"हिलो मत बेटा" यह तो माँ की आवाज़ है। माँ को सिरहाने बैठा देखकर वीरसिंह दंग रह गये।

"मैं तो नई सराय में था माँ, घर कैसे आ गया? यह कोई सपना तो नहीं?"

"भगवान करे सपना ही हो बेटा" माँ ने आंचल से अपने आँसू पोंछते हुए अपूर्व शांति से कहा।

"अरे आप जग गये! अभी चाय लाती हूँ" यह तो रात वाली वही छोटी बच्ची थी। मगर वह तो नई सराय में थी। क्या वे सचमुच जग गये हैं या अभी कोई सपना देख रहे हैं? दिमाग पर ज़्यादा ज़ोर देने की ज़रूरत नहीं पडी। एक नज़र आसपास डालने भर से यह स्पष्ट हो गया कि वे दादाजी के घर में ही थे। उन्हें ध्यान आया कि रात में उस बच्ची के साथ पडोस के भट्ट जी थे। जब तक बच्ची उनके लिये चाय का प्याला लेकर वापस आयी उन्हें उसकी शक्ल भी पहचान में आने लगी थी।

"बरखा?" भट्ट जी की पोती निक्की का नाम यही था।

"जी हाँ, मैं! कल आप घर आने की बजाय वहाँ क्यों घूम रहे थे ... "

"तुम अब घर जाओ बेटा, थोडा आराम करो, आंखों में कितनी नीन्द भरी है!" माँ ने उलाहना सा देते हुए चाय का प्याला बरखा के हाथ से छीन सा लिया।

बरखा चुपचाप कमरे से बाहर निकल गयी। मित्रों को आगे की बात बताते हुए वीर सिंह का गला रुन्ध आया था। माँ से पता लगा कि रात में उन्हें दादाजी के विश्वासपात्र पुत्तू और लखना गड्ढे से निकालकर लाये थे। टांग तो तब तक टूट ही चुकी थी। लेकिन वे दोनों अचानक वहाँ कैसे पहुंचे और फिर कुल्हाडी वालों का क्या हुआ? माँ यहाँ कैसे आयी? भट्ट जी रात में खाना किसके लिये ला रहे थे? निक्की ने घर आने के बजाय "वहाँ" घूमने की बात क्यों की? और फिर निक्की के साथ माँ का अजीब सा व्यवहार! क्या इन सबको परी के बारे में पता चल गया है? धीरे-धीरे पता लगा कि अप्सरा का रहस्य अभी भी किसी पर खुला नहीं था।

परंतु उस भयावह रात की घटनायें जो अभी तक किसी चमत्कार सरीखी लग रही थीं, अब एक एक करके उघड़नी आरम्भ हो गयी थीं। जब वीरसिंह और झरना की कहानी अपने दुखद मोड़ पर थी तभी किसी समय दादाजी को भयंकर हृदयाघात हुआ था। जब तक कोई समझ पाता, उनके प्राणपखेरू उड चुके थे। पिताजी उस समय पूर्वोत्तर के मोर्चे पर विद्रोही आतंकियों से जूझ रहे थे। उन्हें खबर तो कर दी गयी थी मगर उनके समय पर पहुँचने की कोई आशा नहीं थी। वीर के लिये सारी नई सराय में ढुंढेरा पड रहा था। माँ को अपने मायके से यहाँ तक आने में दो घंटे लगे थे। वे दादाजी के दुख के साथ वीर के लिये भी चिंतित थीं। वीर की अनुपस्थिति में दादीजी की इच्छानुसार देर किये बिना शवदाह पुत्तू और लखना के हाथों कराया गया था। वही दोनों दादाजी द्वारा अभी भी पहनी हुई सोने की अंगूठियों के लिये रात में चौकीदारी कर रहे थे जब वीर अनजाने ही भटककर श्मशानघाट पहुँचे थे। आखिर दादा ने अपनी चिता पर से अपने प्यारे पोते को देख ही लिया।

[क्रमशः].

Sunday, January 23, 2011

यथार्थ में वापसी

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snow clad hill
दिसंबर २०१० में भारत आने से पहले मैंने बहुत कुछ सोचा था - भारत में ये करेंगे, उससे मिलेंगे, वहाँ घूमेंगे आदि. जितना सोचा था उतना सब नहीं हो सका.

पुरानी लालफीताशाही, अव्यवस्था और भ्रष्टाचार से फिर एकबारगी सामना हुआ. मगर भारतीय संस्कृति और संस्कार आज भी वैसे ही जीवंत दिखे. एक सभा में जब देर से पहुँचने की क्षमा मांगनी चाही तो सबने प्यार से कहा कि "बाहर से आने वाले को इंतज़ार करना पड़ता तो हमें बुरा लगता."


बर्फीली सड़कें
व्यस्तता के चलते कुछ बड़े लोगों से मुलाक़ात नहीं हो सकी मगर कुछ लोगों से आश्चर्यजनक रूप से अप्रत्याशित मुलाकातें हो गयीं. कुछ अनजान लोगों से मिलने पर वर्षों पुराने संपर्कों का पता लगा. अपने तीस साल पुराने गुरु और उनकी कैंसर विजेता पत्नी के चरण स्पर्श करने का मौक़ा मिला.
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२ अंश फहरन्हाईट
दिल्ली की गर्मजोशी भरी गुलाबी ठण्ड के बाद पिट्सबर्ग की हाड़ कंपाती सर्दी से सामना हुआ तो लगा जैसे स्वप्नलोक से सीधे यथार्थ में वापसी हो गयी हो. वापस आने के एक सप्ताह बाद आज भी मन वहीं अटका हुआ है. लगता है जैसे अमेरिका मेरे वर्तमान जीवन का यथार्थ है और भारत वह स्वप्न जिसे मैं जीना चाहता हूँ
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बर्फ का आनंद उठाते बच्चे
जिस रात दिल्ली पहुँचा था घने कोहरे के कारण दो फीट आगे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था और जिस शाम पिट्सबर्ग पहुँचा, हिम-तूफ़ान के कारण हवाई अड्डे से घर तक का आधे घंटे का रास्ता तीन घंटे में पूरा हुआ क्योंकि लोग अतिरिक्त सावधानी बरत रहे थे. मगर स्कूल बंदी होने के कारण बच्चों की मौज थी. उन्हें हिम क्रीड़ा का आनंद उठाने का इससे अच्छा अवसर कब मिलेगा?
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मिट्टी के डाइनासोर
बिटिया ने अपने पापा के स्वागत में मिट्टी के नन्हे डाइनासोर बनाकर रखे थे. बहुत सी किताबें साथ लाया हूँ. कुछ खरीदीं और कुछ उपहार में मिलीं. मित्रों और सहकर्मियों के लिए भारत से छोटे-छोटे उपहार लाया और अपने लिए लाया भारत माता का आशीर्वाद.

Sunday, January 9, 2011

डाटागंज से कुछ डेटा

रुहेलखंड प्रवास के कुछ चित्र

दातागंज, रामपुर, बरेली, बदायूँ, पापड, फीरोज़पुर आदि की एक चित्रमय यात्रा
गली के मोड पे, सूना सा ... 

सर्दी में वसंत 

राजमार्ग पर यातायात पुलिस
बरेली में पौष के चिल्ला जाडे 
बरेली का प्रसिद्ध मांझा
अपने गाँव की बिल्लियाँ 
गाँव का सूरज

गाँव के खेत में बजरबट्टू 

मेरा विद्यालय - सात वर्षों का गहन नाता

[सभी चित्र अनुराग शर्मा द्वारा :: Photos by Anurag Sharma]