Sunday, October 17, 2010

अनुरागी मन - कहानी भाग 6

==============
अब तक की कथा:
==============
अनुरागी मन - 1
अनुरागी मन - 2
अनुरागी मन - 3
अनुरागी मन - 4
अनुरागी मन - 5
==============
रेखाचित्र: अनुराग शर्मा
.
“क्या पढ़ रहे हैं आप? देखें, कौन सी किताब पसन्द आयी अपको?”

कहते हुए परी उनके निकट आ गयी। जब तक वे बताते कि अजब लिपि में लिखी इन किताबों के बारे में वे बिल्कुल अज्ञानी हैं, किताब को निकट से देखने के प्रयास में परी उनसे सटकर खड़ी थी। इतना निकट कि वे उसकी सांसों के आवागमन के साथ-साथ उसके शरीर का रक्त प्रवाह भी महसूस कर सकते थे। क्या परियों के शरीर में इंसानों की तरह रक्त ही बहता है या कोई दैवी द्रव? सुरा? वारुणी? यह कैसा प्रश्न है? उन्हें लगा जैसे वे दीवाने होते जा रहे हैं। भला कोई अप्सरा उनसे निकटता बढ़ाना क्यों चाहेगी? कुछ तो है जो वे देख नहीं पा रहे हैं। कन्धे से एड़ी तक हो रहे उस सम्मोहक स्पर्श से उनके शरीर में एक अभूतपूर्व सनसनी हो रही थी। उनके हृदय की बेचैनी अवर्णनातीत थी। अगर वे दो पल भी उस अवस्था में और रहते तो शायद अपने-आप पर नियंत्रण खो देते। कुशलता से अपने अंतर के भावों पर काबू पाकर उन्होंने पुस्तक को मेज़ पर फ़ेंका और पास पड़े सोफे में धंस से गये।

बाहर गली में कोई ज़ोर से रेडियो बजा रहा था शायद:

बाहर से पायल बजा के बुलाऊँ
अंदर से बाहों की सांकल लगाऊँ
तुझको ही ओढूँ तुझी को बिछाऊँ
तोहे आंचल सा SSS
तोहे आंचल सा कस लूं कमरिया में
नहीं जाना कुँवर जी बजरिया में

एक रहस्यपूर्ण मुस्कान लिये अप्सरा कुछ देर उन्हें देखती रही फिर साथ ही बैठ गयी। उसने चाय का प्याला उठाकर वीरसिंह के हाथ में कुछ इस तरह उंगलियाँ स्पर्श करते हुए थमाया कि वीरसिंह के दिल के तार फिर से झनझना उठे। वीरसिंह चाय पीते जा रहे थे, आस पास का नज़ारा भी कर रहे थे और बीच-बीच में चोर नज़रों से अपनी परी के दर्शन भी कर लेते थे। वे मन ही मन विधि के इस खेल पर आश्चर्य कर रहे थे परंतु साथ ही अपने भाग्य को सराह भी रहे थे। हवेली के अन्दर झरना के साथ के वे क्षण निसन्देह उनके जीवन के सबसे सुखद क्षण थे।

तभी वासिफ की माँ भी अन्दर आ गयीं। उन्होंने बताया कि वासिफ अपने दादाजी के साथ कुछ दूर तक गया है और वापस आने तक वीर को वहीं रुकने को कहा है। सामने बैठकर माँ वीर के घर-परिवार दादा-दादी आदि के बारे में पूछती रहीं और प्याला हाथ में थामे वीर विनम्रता से हर सवाल का जवाब देते हुए अगले प्रश्न की प्रतीक्षा करते रहे। हाँ, माँ की नज़रें बचाकर बीच-बीच अप्सरा-दर्शन करते रहे। अफसोस कि उनकी चोरी हर बार ही पकड़ी जाती क्योंकि झरना उन्हें अपलक देख रही थी। नज़रें मिलने पर दोनों के चेहरे खिल उठते थे। न मालूम क्या था उन कंटीले नयनों में, ऐसा लगता था मानो उनके हृदय को बीन्धे जा रहे हों।

इसी बीच बाहर से एक आवाज़ सुनाई दी, “ज़रीना, ओ ज़रीना बेटी ... ज़रा हमारे कने अइयो”।

आवाज़ सुनते ही अप्सरा “अभी आयी” कहकर बाहर दौड़ी। अब वीर सिंह का सर चकराने लगा। क्या परी ने अपना नाम उन्हें जानबूझकर ग़लत बताया था या फिर वे सचमुच दीवाने हो गये हैं जो उन्होंने ज़रीना की जगह झरना सुना। उन्हें क्या होता जा रहा है। चाय में कुछ मिला है क्या? या इस पुरानी हवेली की हवा में ही ...?

“बहुत पसीना आ रहा है बेटा, तबीयत तो ठीक है न?” वासिफ की माँ ने प्यार से दायीं हथेली के पार्श्व से उनका माथा छूकर पूछा।

[क्रमशः]

26 comments:

  1. बहुत इंतज़ार के बाद अगली कड़ी आई ...रोचकता और सस्पेंस बरक़रार है ...!

    ReplyDelete
  2. पुरानी कड़ियों को पढ़कर पुनः तारतम्य बना।

    ReplyDelete
  3. पढ़कर रोमांच का अनुभव हुआ। स्वाति की बूँदों जैसी आ रही हैं कडि़याँ...

    ReplyDelete
  4. इसे पढते हुई मुझे खुद भी सनसनी सी हुई तब वीर सिंह का क्या हाल रहा होगा , बखूबी समझा जा सकता है !
    अब आप इसे निस्पृह हो कैसे लिख पाए बस ये सोच रहा हूं :)

    ReplyDelete
  5. प्रतीक्षा रहेगी अगली कड़ी की...कृपया अधिक विलम्ब न कीजियेगा..

    ReplyDelete
  6. न मालूम क्या था उन कंटीले नयनों में, ऐसा लगता था मानो उनके हृदय को बीन्धे जा रहे हों।

    सुन्दर कहानी पर टुकड़ों में क्यूँ, अधीरता बढाती है...........


    चन्द्र मोहन गुप्त

    ReplyDelete
  7. मैं सिर्फ ये अर्ज करना चाहता हूँ कि आप अपनी कहानियों के लिए एक अलग ब्लॉग शुरू करें ताकि दुसरे विषयों कि वजह से कथा में व्यवधान ना पड़े.

    ReplyDelete
  8. ये छटवी कड़ी भी रोचक रही ... आगे का इंतज़ार रहेगा ...

    ReplyDelete
  9. बहुत इन्‍तजार के बाद अगली कडी आई, यह तो ठीक है। किन्‍तु बात वहीं की वहीं है - अगली कडी कब आएगी?

    ReplyDelete
  10. अति सुन्दर प्रस्तुति . धन्यवाद

    ReplyDelete
  11. कुछ दिन पहले ही आपके ब्लॉग से जुड़ी हूँ.... इसलिए आपने सभी कड़ियाँ पोस्ट में शामिल की
    बहुत अच्छा रहा ....अच्छी लग रही है कहानी .... आगे भी इंतजार रहेगा

    ReplyDelete
  12. मैं अतुल जी से सहमत हूँ।
    इस मोड़ से जाते हैं
    कुछ सुस्त कदम ... ;)
    @ अली जी
    नाव में पानी आता रहता है लेकिन खेने वाले पानी उलीचते रहते हैं और नाव खेते रहते हैं।

    ReplyDelete
  13. रेखाचित्र में वीरसिंह का चेहरा आप से मिलता जुलता है। क्या संयोग है!

    ReplyDelete
  14. abhi bhi purani wali ek ek karake padh raha hoon ...detail comment thodi baad mein :)

    ReplyDelete
  15. @ VICHAAR SHOONYA जी

    आपकी सलाह बहुत मूल्यवान है।

    ReplyDelete
  16. @गिरिजेश राव,

    वीर सिंह के साथ जहाँ इतने इत्तेफाक़ हुए हैं वहाँ एक और सही।

    ReplyDelete
  17. Vichar shoonya se mein bhi sahmat hoo.

    waise aapka ye V Singh badaa majanoo hai ...pyaar mein naam kya shkl bhi ek jaisi dikhai deti hai !! khatiyaa par pada padaa veer singh badaa udaas tha ...jharana jo nahee aa rahi thi etani der se kamare se baahar :)

    ReplyDelete
  18. अली साहब के कमेंट को मैं सैकंड करता हूँ(अक्षरश:), आप पर क्या बीती होगी लिखते समय?

    हम बोतल से पीने वाले, हमें घुंट घुंट पिला रहे हैं जी आप? इत्ता इंतज़ार और इत्ती सी पोस्ट, गल्त बात है जी।

    ReplyDelete
  19. इतनी देर बाद अगली कडी से रोचकता कम हो जाती है अगली कडी जल्दी लिखा करें। अच्छी रोचकता लिये चल रही है कहानी। बधाई।

    ReplyDelete
  20. रेडियो पर बजा गाना: मस्त.
    अब आगे?

    ReplyDelete
  21. रोचकता बढ़ती जा रही है। छुट्टी के दिन फिर एक बार सभी किश्तें पढ़नी पड़ेंगी।

    ReplyDelete
  22. anurag bhai ,

    namaste

    kayee dino se, yehan aayee nahee - ab sare bhaag aram se panktibadhdh , padhoongi.

    Rekha Chitr bhee badhiya hai

    Sa sneh ashish,
    - L

    ReplyDelete
  23. बेहद रोचक लगा अनुरागी मन - कहानी भाग ६ का ये अंश , पुरानी कड़ियों को पढ़ कर समझना पड़ेगा......

    regards

    ReplyDelete
  24. मै इस बार बहुत देर से आई पर चलिए आपकी ६ वी कड़ी पढ़ ली !

    ReplyDelete
  25. ज़रीना झरना
    नाम कोइ भी हो
    खुशबु ए गुलाब की
    महकती रहेगी ...
    स स्नेह
    - लावण्या

    ReplyDelete

मॉडरेशन की छन्नी में केवल बुरा इरादा अटकेगा। बाकी सब जस का तस! अपवाद की स्थिति में प्रकाशन से पहले टिप्पणीकार से मंत्रणा करने का यथासम्भव प्रयास अवश्य किया जाएगा।