Thursday, October 14, 2010

मुद्रित लेखन का भविष्य [इस्पात नगरी से - 31]

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चारिहु जुग को महातम, कहि के जनायो नाथ।
मसि-कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ॥
(संत कबीर)
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भारत में ज्ञान श्रुति के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी तक पहुंचाया जाता रहा है। इसलिये ज्ञानी होने के लिये लिपिज्ञान की आवश्यकता ही नहीं थी। परंतु लिखे बिना अक्षर अक्षर कैसे रहेंगे? लिपियाँ ईजाद हुईं और फिर शिलालेख, चर्म आदि से होकर भोजपत्र, ताडपत्र आदि तक पहुंचे। और फिर मिस्र और चीन का कागज़ और उसके बाद पी-शेंग के छपाई के अक्षर - न जाने क्या क्या होता रहा। पन्द्रहवीं शताब्दी के मध्य में जब योहान गटैनबर्ग (1395-1468) ने छापेखाने का आविष्कार किया तब से अब तक दुनिया ही बदल गयी है। पत्र-पत्रिकायें-पुस्तकें पढ़कर बड़ी हुई मेरी पीढी तो शायद ऐसे समाज की कल्पना भी नहीं कर सकती है जिसमें कागज़ पर मुद्रित अक्षर न हों। 31 दिसम्बर 1999 के अंक (Y2K किसे याद है?) में टाइम पत्रिका ने रेडिओ, फ़ोन, कम्प्यूटर, इंटर्रनेट आदि जैसे आविष्कारों को दरकिनार करते हुए जब गटैनबर्ग को "मैन ओफ द मिलेनियम" कहा तो मेरे जैसे एकाध लोगों को छोड़कर किसी को आश्चर्य (या आपत्ति) नहीं हुई।
बॉस्टन जन पुस्तकालय का मुखडा


मुद्रित शब्द बहुत समय तक आम आदमी की पहुँच से बाहर रहे हैं। सारे विश्व में एक समय ऐसा भी था जब पुस्तक एक विलासिता की वस्तु थी जिसे अति-धनाढ्य वर्ग ही रख सकता था। ऐसे ही समय अमेरिकी नगर बॉस्टन में कुछ लोगों को विचार आया कि क्यों न एक ऐसी संस्था बनाई जाये जो उन लोगों को किताबें छूने, देखने और पढ़ने का अवसर प्रदान करे जिनमें इन्हें खरीदने की सामर्थ्य नहीं है। सन 1848 में बॉस्टन की नगर पालिका के सौजन्य से अमेरिका का पहला जन-पुस्तकालय बना जिसमें से पुस्तक निशुल्क उधार लेने का अधिकार हर वयस्क को था। लगभग सवा दो करोड़ पुस्तकों/दृश्य/श्रव्य माध्यम के साथ यह पुस्तकालय आज भी अमेरिका के विशालतम पुस्तकालयों में से एक है।

मुद्रित शब्दों के इसी गर्वोन्मत्त संग्रहालय के बाहर मुझे मुद्रित शब्दों की एक और गति के दर्शन हुए। एक पंक्ति में लगे हुए धातु और प्लस्टिक के यह बूथ विभिन्न मुद्रित संस्करणों को निशुल्क बांट रहे हैं। वैसे अमेरिका में समाचार पत्र और पत्रिकायें अभी भी आ रहे हैं परंतु कई बन्द होने के कगार पर हैं और कई ऑनलाइन संसकरणों की ओर अधिक ध्यान दे रहे हैं। पिछले वर्ष एक पत्रिका ने कागज़ों के साथ एक विडिओ  विज्ञापन लगाने का अनोखा प्रयोग भी किया था। सोचता हूँ कि टाइम पत्रिका के सम्पादकों ने आज के समय को 10 साल पहले चुनौती देना शुरू किया था मगर हम अक्सर भूल जाते हैं कि जब रस्साकशी काल के साथ होती हो तो जीत किसकी होगी?
बॉस्टन जन पुस्तकालय की बगल में निशुल्क पत्रों के खोखे

ज्ञातव्य है कि कुछ सप्ताह पहले एक बडी विडिओ लाइब्रेरी "ब्लॉकबस्टर" ने दिवालियेपन की अर्ज़ी दी है। एक बडे पुस्तक विक्रेता के दिवाले की अफवाह भी गर्म है। हम लोग सचमुच एक बहुत बडे परिवर्तन के गवाह हैं।
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इस्पात नगरी से - पिछली कड़ियाँ
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[सभी चित्र अनुराग शर्मा द्वारा - All photographs by Anurag Sharma]
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14 comments:

  1. 'जब रस्साकशी काल के साथ होती हो तो जीत किसकी होगी?' यह 'काल' का ही प्रभाव है कि जो पुस्‍तकें कल तक 'विलासिता की वस्‍तु'थीं, आज वे 'अजूबा' बन गई हैं।

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  2. इस पोस्ट को पढ़कर किताबों का ....इन मुद्रित अनमोल शब्दों का ...और मान करने का मन कर रहा है... अच्छी जानकारी

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  3. ईबुक के प्रादुर्भाव के बाद पता नहीं पुस्तकों की स्थिति क्या होगी?

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  4. आह... सामयिक प्रविष्टि है पर...बदलाव बस ऐसे ही होते हैं !

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  5. दौर खराब कहा जा सकता है, लेकिन पेड़ बहुत काटे जाते हैं. जो मजा किताब पढ़ने में है, वह कम्प्यूटर स्क्रीन में कहां..... बोस्टन की बनी हुई एक मशीन गीता प्रेस में भी रखी है, जो पैर से चलाई जाती थी...

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  6. किताब और कागज़ का ही सम्बन्ध है . ई बुक अपनी तो सम्झ से बाहर है

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  7. बदलाब कितना भी आ जाये लेकिन किताबे फ़िर से अपना स्थान पायेगी,क्योकि किताब की अपनी शान हे, बहुत सुंदर ग्याण बर्धक लेख, धन्यवाद
    वेसे हमारे यहां जन पुस्तकालय वाले पढाई की मंहगी महंगी पुसतके भी रखते हे, ओर बच्चो को फ़्रि पोस्ट से घर भेजते हे, मेरे बच्चे घर पर बिलकुल मुफ़त मगवांते हे, ओर वापिस भेजने के लिये भी मुफ़त,

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  8. गाँव में बैठा यह टिप्पणी कर रहा हूँ। बिजली महरानी भगवान भरोसे हैं लेकिन यहाँ मैं कोई भी ई बुक ऐक्सेस कर सकता हूँ।
    उसी पुस्तक का प्रिंट संस्करण लेना हो तो कम से कम 60 किमी. दूर गोरखपुर जाना पड़ेगा। वहाँ भी मिलने की कोई गारंटी नहीं।
    अब इसके बहुतेरे अर्थ लगाए जा सकते हैं।

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  9. शायद इसका जवाब भविष्य के गर्भ में ही छुपा है.

    दुर्गा नवमी एवम दशहरा पर्व की हार्दिक बधाई एवम शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  10. दुर्गा नवमी और दशहरे की शुभकामनायें.

    पिछले ३० साल में विग्यान नें जो तरक्की की है, उसके कारण पढने पर काफ़ी असर हुआ है इसमें कोई शक नही.

    फ़ेसबूक और ट्विटर का चलन अभी शैशव अवस्था पर है, पर कहना सुना भी अब कम हो चला है.मुख्तसर से फ़ार्मेट में मुख्तसर सी बौनी बौनी बातें....

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  11. दशहरा की ढेर सारी शुभकामनाएँ!!

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  12. दशहरे की शुभकामनायें !

    वैसे लिखने की व्यवस्था हमारे यहाँ तो रामायण और महाभारत काल से रही है , इस पर कुछ प्रकाश डालेंगे ?

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  13. हम लोग सचमुच एक बहुत बडे परिवर्तन के गवाह हैं।


    सत्य कहा...

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मॉडरेशन की छन्नी में केवल बुरा इरादा अटकेगा। बाकी सब जस का तस! अपवाद की स्थिति में प्रकाशन से पहले टिप्पणीकार से मंत्रणा करने का यथासम्भव प्रयास अवश्य किया जाएगा।