Friday, September 22, 2017

प्रेम का धन

प्रेमधन

प्रेम भी एक प्रकार का धन ही है। बल्कि सच कहूँ तो इसका व्यवहार वित्त जैसा ही है। किसी के पास प्रेम की भावना का बाहुल्य है, और किसी के पास रत्ती भर भी प्रेम नहीं होता। अधिकांश लोग इन दोनों स्थितियों के बीच में कहीं खड़े, बैठे, या पड़े होते हैं। जिस प्रकार हर निर्धन भिखारी नहीं होता, उसी प्रकार अधिकांश प्रेमहीन लोग भी समुचित चिंतन, प्रयास, और श्रम से गुज़ारे भर का प्रेम कमा ही लेते हैं। और जिस प्रकार लोग धन देकर अपनी भौतिक ज़रूरतें पूरी करते हैं,  उसी प्रकार प्रेम देकर अपनी मानसिक आवश्यकताओं की आपूर्ति करते हैं। प्रेम एक भावनात्मक धन है और आपके भावनात्मक जीवन में इसका योगदान महत्वपूर्ण है। आइये, कुछ उदाहरणों के साथ समझें प्रेम के वित्त-सरीखे व्यवहार को।

प्रेम और अधिकार

ध्यान रहे कि अधिकार की भावना प्रेम नहीं होती। सच पूछिये तो ममत्व की भावना भी कुछ सीमा तक प्रेम नहीं है। उदाहरण के लिये, जो माता-पिता अपने बच्चों की शादी उनकी इच्छा के विरुद्ध जाकर, अपनी मर्ज़ी से करना चाहते हैं, वे बच्चों पर अपनी सम्पत्ति की तरह अधिकार तो मानते हैं, लेकिन उस भावना को प्रेम नहीं कहा जा सकता। प्रेम में प्रसन्नता तो है, लेकिन वह प्रसन्नता दूसरे की प्रसन्नता में निहित है। यदि आप किसी से प्रेम करते हैं तो आप उसे प्रसन्न देखना चाहते हैं। और उसकी प्रसन्नता के लिये आप कुछ भी करने को तैयार रहेंगे। सामान्य सम्बंधों में प्रेम और अधिकार की भावनायें एक साथ भी न्यूनाधिक मात्रा में पाई जाती हैं।

प्रेम धनाढ्य या कंगाल

जिसके पास पैसा नहीं है, वह सामान्यतः उसे खर्च नहीं कर सकता। ठीक उसी तरह जिसके पास संतोषजनक प्रेमभावना नहीं है, वह दूसरों को प्रेम नहीं दे पाता है। यदि आपके मन में यह भावना घर कर जाये कि आपको समुचित प्यार नहीं मिला तो आप किसी अन्य व्यक्ति को प्यार नहीं दे पायेंगे। कुढ़ते हुए प्यार नहीं होता, न बदले की भावना से ही किसी से प्यार किया जा सकता है। प्रेममय समाज, प्रेममय परिवार, और प्रेममय व्यक्ति किसी धनाढ्य समाज, परिवार या व्यक्ति के जैसे ही प्रेमधन को देने में सक्षम हैं। लेकिन दुर्भावना से ग्रस्त व्यक्ति किसी को प्रेम कैसे कर पायेगा। साथ ही यदि आप अपने को दलित, वंचित, और सताया हुआ ही मान बैठे हैं तो प्रेमधन के नाम पर आपकी थैली में कानी कौड़ी ही मिलेगी। इस स्थिति में आप प्रेम की पाई खर्च नहीं कर पायेंगे।

प्रेम का लेनदेन, उधारी और निवेश 

प्रेम का खाता भी किसी बैंक खाते जैसा ही है। जितनी अधिक राशि जमा है उतनी का ही उपयोग हो सकता है। और यह राशि प्रेम-व्यवहार के आधार पर घट-बढ़ भी सकती है। मेरे दादाजी कहते थे कि 'मिलना-मिलाना, आना-जाना, खाना-खिलाना' आपसी प्रेम बनाये रखने में सहायक सिद्ध होता है।

जिनके साथ आप प्रेम प्रदर्शित करते हैं, यदि वे लगातार आपको दुत्कारते रहें तो आपके प्रेमधन का खर्च उसकी प्राप्य भावना के मूल्य से अधिक है। ऐसे में एक सामान्य सम्भावना यह है कि आप कुछ समय बाद इस सौदे में लगातार हो रहे घाटे को पहचानकर इस व्यवहार को बंद कर देंगे। रिश्ते की गर्माहट आमतौर पर इसी तरह कम होती है, और अधिकांश मैत्रियाँ अक्सर इसी कारण से टूटती हैं।

एक और सम्भावना यह भी है कि आपके पास इतना पैसा है कि आप किसी सत्कार्य की तरह इस व्यवहार को चलाते रहें। चूंकि स्वार्थ से बचना कठिन है, इसलिये इकतरफ़ा प्रेम को जारी रखने की यह दूसरी सम्भावना सामान्यतः, रक्त सम्बंधों या वैवाहिक सम्बंध से बाहर दुर्लभ ही होती है। इस सम्बंध में मेरा प्रिय कथन है:
इक दाता है इक पाता है, तो हर रिश्ता निभ टिक जाता है

कई बार प्यार में उधारी भी होती है, जब आप किसी की निरंतर बेरुखी के बावज़ूद एक परिवर्तन-बिंदु (threshold point) की आशा में एकतरफ़ा प्यार लुटाते रहते हैं। यदि निर्धारित समय में वह परिवर्तन बिंदु आपकी दृष्टि-सीमा में नहीं दिखता तो आप अपना प्रेम समेटकर दूसरी ओर निकल लेते हैं। कभी-कभी इसका उलटा भी होता है जब परिवर्तन बिंदु न आने की वजह आपके प्रेम के योगदान की कमी होती है, और प्रेम को समुचित मात्रा तक बढ़ाकर अपना वांछित सरलता से पाया जा सकता है।


प्रेमिल विडम्बना

प्रेमधन की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि कंजूस अक्सर दानवीर की शिकायत लगा रहा होता है।
प्रेमधन से हीन लोग अक्सर इतने आत्मकेंद्रित होते हैं कि प्रेममय व्यवहार या व्यक्ति को देख नहीं पाते। जिस प्रकार आर्थिक व्यवहार में हर शिकायत जायज़ नहीं होती उसी तरह दो व्यक्तियों के रिश्ते में दूसरी ओर से प्रेम न मिलने की शिकायत करने वाला व्यक्ति ही रिश्ते में प्रेम-वंचना का ज़िम्मेदार हो सकता है। नवविवाहितों को मेरी सलाह यही है कि जब भी आप अपने जीवन-साथी की शिकायत किसी तीसरे व्यक्ति से करें तो जीवन-साथी की उपस्थिति में करें ताकि वह सिक्के का दूसरा पक्ष सामने रख सके जिसे देखने से शायद आप वंचित रहे हों।

प्रेम निवेश

जैसे धन का निवेश अच्छा या बुरा परिणाम देता है, ठीक वैसे ही आप जिससे प्यार करते हैं, उसके गुण-दुर्गुण आपकी भावनात्मक उन्नति या पतन के कारक बन सकते हैं। कई बार अंधाधुंध निवेश किसी बुरे निवेश को बचा लेता है। लेकिन सामान्यतः बुरे निवेश में हुए घाटे को बट्टे-खाते में डालकर वहाँ से बच निकलना ही बेहतर उपाय है। इसी प्रकार प्रेम भी सोच-समझकर सही व्यक्ति से कीजिये और ग़लती होने की स्थिति में अपनी हानि को न्यूनतम करने का प्रयास करते हुए बंधन से बाहर आने में ही बुद्धिमता है। ऐसे कई झटके खाने वाले प्रेम-निर्धन का दिवाला पिट जाना एक सामान्य घटना है। लेकिन यह भी सच है कि धन की ही तरह आपके अंतर का प्रेम जितना अधिक होगा, दूसरी ओर से अपेक्षित परिणाम न आने पर भी आपके प्रेम की निरंतरता बने रहने की सम्भावना उतनी ही अधिक है।

निवेश की गुणवत्ता के अलावा उसकी व्यापकता भी वित्त और प्रेम में समान होती है। जिस प्रकार धन सम्पदा की बहुलता के अनुपात में व्यक्ति फेरी लगाने से लेकर वैश्विक संस्थान चलाने तक के विभिन्न स्तरों में से कहीं हो सकता है उसी प्रकार बड़े प्रेम धनाढ्य का निवेश एक व्यक्ति से बढ़कर, एक समूह, समाज या संसार के लिये हो सकता है।

धरोहर बनाम स्व-अर्जित प्रेमभाव

कई परिवार, समुदाय, राष्ट्र या समाज विपन्न होने के कारण उनकी संतति भी विपन्न होती है क्योंकि परिवेश में धन होता ही नहीं। वित्त की कमी, प्राकृतिक धन यथा हरीतिमा, जल, वनस्पति, खनिज आदि की अनुपलब्धता के साथ पुरुषार्थ धन की कमी यथा  कृषि, उद्योग, विपणन आदि की कमी के कारण धन विरासत में उपलब्ध नहीं होता। ऐसे समाज में जहाँ बहुतेरे लोग विपन्न ही मर जाते हैं, कोई एकाध अपवाद स्वयम्भू धनाढ्य बनने का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। वित्त की यही सामाजिक स्थिति प्रेम के बारे में भी सत्य है। कई समुदायों में क्रोध, हिंसा, शिकायत आदि जैसी प्रेम-निर्धनता किसी विरासत की तरह सर्व-व्याप्त है और वे स्वाभाविक प्रेम की धरोहर से वंचित हैं। उन्हें पता ही नहीं कि प्रेम क्या है और प्रेममय समाज वांछित क्यों है।  ऐसे अभागे समुदाय में प्रेममय बनना कठिन तो है परंतु असम्भव नहीं।

आध्यात्मिक उन्नति के साथ ही प्रेम-धन का विस्तार होता जाता है। हम भारतीयों के लिये प्रेम की हज़ारों वर्ष से निरंतर बनी हुई सामाजिक धरोहर गर्व का विषय है। सर्वे भवंतु सुखिनः, और वसुधैव कुटुम्बकम की स्थितियाँ इस भारत की पारम्परिक विचारधारा की प्रेममय स्थिति में स्वाभाविक हैं।  गीता के अनुसार:
विद्याविनयसपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी, शुनिचैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:

प्रेम में भ्रष्टाचार

जैसे हमारे आस-पास आर्थिक मामलों में भ्रष्ट आचरण या बेईमानी करने वाले दिखते हैं, उसी प्रकार के अनैतिक लोग प्रेम और अन्य भावनात्मक मामलों में भी भ्रष्ट आचरण करते दिख सकते हैं। यह भ्रष्टाचार प्रेम नहीं है, बल्कि अनैतिक रूप से प्रेम या उससे निरूपित भावनात्मक संतोष चुराने का प्रयास है और आर्थिक भ्रष्टाचार की तरह ही ग़लत है। ऐसे आचरण के कई रूप हो सकते हैं। जिस प्रकार किसी वेतनभोगी कर्मी द्वारा अपने कार्य की  ज़िम्मेदारियों का निर्वहन न करना ग़लत है उसी प्रकार जिस सम्बंध में प्रेम की अपेक्षा हो वहाँ प्रेम न रखना भी अपने उत्तरदायित्व को न निभाने के कारण अनैतिक आचरण ही है - रिश्ते में बेईमानी। इसी प्रकार जैसे किसी और का धन अनधिकार उठा लेना अनैतिक है वैसे ही किसी अनिच्छुक या असम्बंधित से प्रेम की अपेक्षा भी ग़लत है। और उसके लिये दवाब डालना वैसा ही ग़लत है जैसे भिक्षा के मुकाबले चोरी, और  चोरी के मुकाबले डकैती। अनैतिकता और अपराध की सीमा कई बार बहुत बारीक होती है इसलिये यह ध्यान रहे कि आर्थिक दुराचार की तरह ही कुछ आचरण आपराधिक रूप में परिभाषित न होते हुए भी अनैतिक हो सकते हैं। 

राग, द्वेष, कड़वाहट, असंतोष

असंतोष प्रेम का बड़ा शत्रु है। साथ ही कड़वाहट या द्वेष भी प्रेम का शत्रु है। प्रेम रहे न रहे, जीवन में द्वेष के लिये कोई स्थान नहीं होना चाहिये। आपका ज़ोर अपने जीवन में प्रेम की भावना की उन्नति की ओर रहे तो बहुत अच्छी बात है। विद्याधन की तरह प्रेमधन भी बाँटने से बढ़ता है। प्रेम का आधिक्य आपको भावनात्मक रूप से शक्तिशाली बनाता है। सबसे प्रेम कीजिये और सही प्रत्युत्तर न मिलने पर न्यूट्रल भले हो जायें, द्वेष को पनपने मत दीजिये।

बहुतेरे अनपढ़ बाबा किस्म के लोग राग, द्वेष को एक ही लाठी से हाँकते दिखते हैं। उनके झांसे में मत आइये और यह ध्यान रखिये कि राग और द्वेष में आकाश-पाताल का अंतर है। सुर, ताल, राग, अनुराग सभी सात्विक हैं जबकि द्वेष, ईर्ष्या, घृणा आदि एक अलग ही वर्ग की विकृतियाँ हैं।

भावनात्मक संतुलन

वित्तीय संतुलन की तरह ही आपके जीवन में भावनात्मक संतुलन बनाने में प्रेम, संतोष, सहनशीलता आदि सद्गुणों का अत्यधिक महत्व है। इन्हें बनाये रखिये। भावनात्मक परिपक्वता की सहायता से शांतचित्त रहते हुए अपना जीवन व्यवहार सम्भालिये और प्रसन्न रहिये।

जो होनी थी वह हो के रही, अब अनहोनी का होना क्या
जब किस्मत थी भरपूर मिला, अब प्यार नहीं तो रोना क्या


शुभकामनाएँ!


Sunday, September 10, 2017

अनुरागी मन

नवीं कक्षा में था तो रसायनशास्त्र के प्रवक्ता मु. यामीन अंसारी ने कहा कि छात्र संघ में कनिष्ठ उपाध्यक्ष के लिये नामांकन भर दो। उन्होंने बताया कि उस पद के लिये पात्रता कक्षा 9 तक की ही है। शायद इसीलिये उस दिन अंतिम तिथि होने के बावजूद, तब तक कोई नामांकन नहीं आया था। मुझे राजनीति में जाने की कोई इच्छा वैसे भी नहीं थी। ऊपर से मेरे जैसा शांत व्यक्ति ज़ोर-जबर के नक्कारखाने के लिये शायद ही उपयुक्त होता। तीसरी बात यह भी थी कि नामांकन के लिये दस रुपये शुल्क था, जो उस समय मेरे पास नहीं था। अंसारी साहब शुल्क अपनी जेब से देने को भी तैयार थे परंतु मैं अनिच्छुक ही रहा।

अंतिम तिथि निकल गई। उस वर्ष का छात्रसंघ कनिष्ठ उपाध्यक्ष के बिना ही बना क्योंकि मैंने उस पद पर निर्विरोध चुने जाने का अवसर छोड़ दिया था। अगले वर्ष से छात्रसंघ के चुनावों पर प्रतिबंध लग गया और सभी तत्कालीन पदाधिकारी जोकि 12वीं के ही छात्र थे, परीक्षा पास करके विद्यालय से बाहर चले गये। मैं तीन और साल वहीं था। अंसारी साहब ने एकाध बार मज़ाक में कहा भी कि यदि उस दिन मैंने पर्चा भर दिया होता तो चार साल मैं छात्रसंघ पर एकछत्र राज्य करता।

नवीं कक्षा में ही जीवविज्ञान की प्रयोगशाला में जब ताज़े कटे हुए मेंढ़कों को धड़कते दिल के साथ क्रूरता से एक गड्ढे में फेंके जाते देखा तो सभ्य-समाज में सर्व-स्वीकृत निर्दयता ने दिल को बहुत चोट पहुँचाई। आज शायद सुनने में अजीब लगे लेकिन यह सच है कि उस समय तक मैं यही समझता था कि प्रयोगशाला में डाइसेक्ट किये हुए प्राणियों को सर्जरी द्वारा पहले जैसा स्वस्थ बनाकर वापस प्रकृति में छोड़ दिया जाता होगा। जीवविज्ञान के साथ मानसिक रूप से उसी समय अपना तलाक़ हो गया लेकिन हाईस्कूल तक जैसे-तैसे साथ निभाया और फिर गणित-विज्ञान समूह की दिशा पकड़ी।

तब से अब तक जीवन में कई ऐसे अवसर आये जब मौके हाथ से छूटे, या कहूँ कि छूटने दिये गये। जब किसी को आत्मविश्वास के साथ यह कहते सुनता हूँ कि उसने परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाया तो अच्छा लगता है क्योंकि मैंने शायद इस दिशा में कभी कोई खास श्रम नहीं किया। हाँ, जीवन में जो कुछ सामने आता गया उसके सदुपयोग पर थोड़ा बहुत विचार अवश्य किया। लेकिन वहाँ भी कोई जल्दबाज़ी कभी नहीं की।

एक दफ़ा एक बस यात्रा में जेब कट गई। दो-चार सौ रुपयों के साथ-साथ परिचय-पत्र भी चला गया, जिसकी सामान्यतः आवश्यकता भी नहीं पड़ती थी। वैसे भी परिचयपत्र में चित्र के साथ अपने और संस्थान के नाम के अलावा काम की कोई जानकारी नहीं थी। न कार्यालय का नाम था और न ही पदनाम। दोबारा बनवाने का शुल्क भी लगता था और उसके लिये एक दूसरे कार्यालय में अर्ज़ी देने भी जाना पड़ता, जिसकी काम ने कभी फ़ुर्सत ही नहीं दी, सो टलता रहा।

जब नौकरी छोड़ने की नौबत आई तो नियमानुसार इस्तीफ़े के साथ परिचयपत्र भी जमा कराना था। नया परिचयपत्र बनवाने के लिये अगले सप्ताह का मुहूर्त निकालकर प्रबंधक जी को बता दिया गया। अगले हफ़्ते जब निकलने ही वाले थे तब उस दिन की अंतर-विभागीय डाक आ गई। और डाक में पत्रों के ऊपर ही मेरा परिचयपत्र भी पड़ा हुआ था जिसे कुछ साल पहले किसी जेबकतरे ने कहीं फेंका होगा और किसी भलेमानस ने शायद किसी मेलबॉक्स में डाल दिया होगा जोकि बरसों बाद किसी डाकिये को नज़र आया होगा और एक दफ़्तर से दूसरे में पहुँचते हुए आखिर मेरे पास आ गया।

यह तो एक सरल सा उदाहरण था लेकिन कई उदाहरण तो इतने जटिल संयोग के उदाहरण हैं कि लगता है मानो एक लम्बी परियोजना बनाकर उन्हें गढ़ा गया हो। सौ बात की एक बात यह कि ज़िंदगी अपने साथ बहाकर ले जाती रही लेकिन फिर भी रही अपने प्रति दयालु ही। तरबूज सौ बार छुरों पर गिरा लेकिन हर बार हाथ-पाँव झाड़कर उठ खड़ा हुआ।

पाँच साल की उम्र में एक नहर के तेज़ बहाव में बहकर मर ही जाता लेकिन बचा लिया गया। उसी समय तैरना सीखने का प्रण लिया। सीखने का कोई साधन ही नहीं था। न प्रशिक्षक, न तरण ताल। सो कुछ साल यूँ ही बीतने के बाद, अंततः, बिना पानी के ही तैराकी सीखने का निश्चय किया। जब पहली बार तरण-ताल देखने को मिला तब तक बिना पानी और बिना प्रशिक्षक के कामचलाऊ तैराकी सीख चुका था।

मरने के भी कई मौके आये और सीखने के भी। आलसी जीव, मृत्यु से भी बचकर निकलते रहे और सीखना भी अपने हिसाब से करते गये। हर काम सदा तसल्ली बख्श तो किया मगर किया भरपूर तसल्ली के साथ, बिना किसी जल्दबाज़ी के। बारहवीं के बाद जब सारे मित्र अभियांत्रिकी में जा रहे थे तब मैं उस उम्र में मिल सकने वाली एकमात्र नौकरी के लिये अर्ज़ियाँ भरकर जीवन की शुरुआत करने को तैयार था। अलबत्ता साथ में बेमन से ही सही बीएससी में प्रवेश भी ले लिया था।

बीएससी की फ़ाइनल परीक्षा के दौरान ही जीवन में पहली बार सीरियसली पढ़ाई करने का प्रण ले लिया। तय किया कि एमएससी गणित में की जायेगी। ज़िंदगी में पहली बार ऐसा हुआ कि कक्षा में प्रवेश लेने से पहले ही सारी किताबें खरीदी हों। लेकिन एमएससी में आवेदन से पहले ही नौकरी शुरू करनी पड़ी।

बिल्कुल एक जैसी तीन नौकरियों के लिये एप्लाई किया था। एक का ऑफ़र बहुत बाद में आया। लेकिन जिन दो में पहले बुलाया गया उनमें से दिल्ली वाली का साक्षात्कार देने नहीं गया क्योंकि परिवार की राय घर के पास, यानी रुहेलखण्ड में रहने की थी। परीक्षा परिणाम में प्रदेश के पहले पाँच में नाम था। किसे खबर थी कि उत्तरप्रदेश का बोर्ड ही मुझे दिल्ली पोस्टिंग दे देगा। दिल्ली तो दे नहीं सकते थे मगर उन्होंने नोएडा भेज दिया। केवल एक उस निर्णय के बहाने घर-गाँव, रुहेलखण्ड ऐसा छूटा कि दोबारा वहाँ रहने का सुयोग बना ही नहीं।

 मित्रों से पिछड़ने की बात तो मन में क्या आनी थी, अपने पैरों पर खड़े होने का संतोष अवश्य था। इत्तेफ़ाक़ से उसी समय पिताजी देश भर के दुर्गमतम क्षेत्रों की अपनी ड्यूटी से छुटकारा पाकर सीआरपीएफ़ के दिल्ली स्थित केंद्र झाड़ौदा कलाँ में आये, सो हम भी उनके सरकारी निवास में फ़िट हो लिये। दफ्तर से घर खासा दूर था तो रोज़ाना 6-7 घंटे का कम्यूट होता था। रूट ऐसा था कि बसों में बैठना तो दूर, चढ़ना और उतरना भी आसान न था। एक दिन बहन की सहेलियों ने उसे बताया कि हमारे घर कोई मेहमान आया हुआ है। वह मेहमान मैं ही था क्योंकि मैं घर से इतना बाहर रहता था कि आस-पड़ोस के बहुत से लोगों को घर में मेरे अस्तित्व के बारे में जानकारी ही नहीं थी।

मेरे दिल्ली आने पर एमएससी की गणित की किताबें बदायूँ के तालाबंद घर में रखी रह गईं क्योंकि नौकरी के साथ पढ़ाई जारी रखने के प्रयास में निराशा हाथ लगी। विश्वविद्यालय वालों ने स्नातकोत्तर में प्रवेश इस आधार पर नहीं दिया कि एमएससी न तो प्राइवेट ही हो सकती है और न ही उसके लिये सायंकालीन या सप्ताहांत कक्षा की कोई व्यवस्था है। इस बाधा का कारण पूछने पर विज्ञान के कोर्स में प्रयोगशाला की अनिवार्यता का तर्क दिया गया। गणित में प्रयोगशाला नहीं थी लेकिन अधिकार के आगे तर्क की क्या बिसात। सो जिस ज़माने में तथागत अवतार तुलसी बिना प्रयोगशाला देखे, बिना अनिवार्यता पूरी किये हुए बीएससी और एमएससी की परीक्षा देकर सरकारी खर्चे पर नोबल पुरस्कार विजेताओं से मिलवाने ले जाये जा रहे थे, हमारे रोहिलखण्ड (अब ज्योतिबा फुले) विश्वविद्यालय ने हमें नौकरी के साथ गणित में स्नातकोत्तर करने से मना कर दिया। 6-7 घण्टे के दैनिक कम्यूट, पूरे दिन की नौकरी के अलावा डोमिसाइल सर्टिफ़िकेट आदि के सरकारी जंजालों के कारण हम भी चुप लगाकर बैठ गये। भला हो विदेश-प्रवास का कि यह स्नातकोत्तर भी बाद में पूरा हुआ, यद्यपि हुआ गणित के बिना।

उस बीच में उपेक्षा के कारण टूटते-फ़ूटते पुश्तैनी घर की छत गिरने के बाद जब उसे बेचने के लिये गये तो एमएससी गणित की सभी किताबें बिना छत के कमरे की बिना दरवाज़ों की अलमारी में तला ऊपर रखी थीं। लगभग गली हुई हालत में भी सबसे ऊपर की किताब का मुखपृष्ठ पठनीय था। मानो हँस रहा हो, "ज़िंदगी प्लैन करने चले थे? अब मत करना"

नौएडा से झाड़ौदा तक की उस दैनिक भागदौड़ में बैंक के परिवीक्षाधीन अधिकारी की परीक्षा दी, एक बार फिर पहले पाँच में चुनाव हुआ। देश भर से चुने गये 135 से अधिक अधिकारियों में मैं सबसे कमउम्र था। कुछ वर्ष बाद बैंक ने कम्प्यूटरीकरण की इन-हाउस टीम के लिये युवा अधिकारियों को चुनना शुरू किया तो बैंकिंग में रहते हुए सूचना प्रौद्योगिकी, परियोजना प्रबंधन आदि की शिक्षा और अनुभव का अवसर मिला जो अब तक साथ चल रहा है।

पढ़ने लिखने का शौक पुराना था। सम्वाद-वाद-विवाद में पुरस्कार पाना स्कूल में ही शुरू हो गया था। 13-14 साल की आयु में सोचा था कि बड़े होने पर बरेली-बदायूँ मार्ग पर हरियाली के बीच बनाये आधुनिक फ़ार्महाउस से प्रकाशन का व्यवसाय चलाया जायेगा। अनुराग प्रकाशन का उन्हीं दिनों का डिज़ाइन किया लोगो और एकाध नमूना पुस्तकें भी शायद अल्मारी में अभी भी पड़ी हों। माचिस की डिब्बी के आकार की 'मैचबुक्स' का विचार भी तभी-कभी दिमाग़ में कौंधा था। खैर बरेली के दर्शन तो फिर भी हो जाते हैं, बदायूँ तो एकदम से ही पराया हो गया। नसीब अपना-अपना ...  

लेखन-प्रकाशन के सपने देखते हुए, लगभग उन्हीं दिनों में कई कहानियाँ लिख डाली थीं। 1983-84 में एक कहानी का प्लॉट मन में था। 3-4 पन्नों की कहानी बोल-बोलकर कई बार टाइप करवाई लेकिन छपाई में हर बार अनेक ग़लतियाँ रह जाती थीं। दशकों बाद जब ब्लॉग पर उसे अनुरागी मन के नाम से धारावाहिक लिखना शुरू किया तो इस बीच के अनेक अनुभवों और उपलब्ध समय ने कथानक को पहले से कुछ अधिक ही रोचक बना दिया था। ब्लॉग नियमित पढ़ने वाले मित्रों को कहानी पसंद आई लेकिन अंतिम कड़ी पर कुछ मित्रों ने उसके दुखांत होने पर शिकायत भी की। कविहृदय मित्र देवेंद्र पाण्डेय ने तो कथा के दुखांत को मेरे पश्चिम में रहने का प्रभाव ही बता दिया। जबकि सच यह है कि कहानी का अंत 1984 में भी यही था। इसमें पूर्व-पश्चिम का कोई चक्कर नहीं था, यूँ ही सोचा कि आज यह बात स्पष्ट कर ही दी जाय।

देवेन्द्र पाण्डेय October 27, 2011 at 4:18 AM
मूड खराब कर दिया आपने तो। ऐसे अंत की उम्मीद नहीं थी। छुट्ठी निकालकर इतमिनान से पढ़ने बैठा था। शेख चिल्ली के मजार से जो उम्मीद बंधी थी यहां आकर तहस-नहस हो गई। ऐसे भी भला कोई अंत करता है! इतनी जल्दी क्या थी? अंततः समाप्त। यह भी कोई बात हुई। ... ... ... पश्चिम में रहकर यही अंत करने की भावना जगी? 
मेरे जीवन की लम्बी यात्रा के अनुरागी मन से ही सम्बंधित एक अल्पांश, इस विडियो को देखकर बताइये तो सही कि फ़्रांसीसी भाषा में कहा क्या गया है:



पितृपक्ष चल रहे हैं। सालभर के कामधंधे और उलझनों के कारण बिसर गये पितरों से वापस जुड़ने का समय है। उन्हीं यादों के बीच ये कुछेक यादें मानो याद दिलाने आईं कि मेरे अपने जीवन पर मेरा कितना कम नियंत्रण रहा है। पितरों के संघर्षों द्वारा संवरी अपनी ज़िंदगी के पुनरावलोकन का समय यह भी विचार करने का है कि हम आने वाली संतति द्वारा कैसे पितरों के रूप में याद किये जायेंगे। उनके लिये हम धरा पर कौन सी विरासत, कैसी धरोहर छोड़कर जायेंगे।

फिर मिलेंगे ब्रेक के बाद