Sunday, December 30, 2012

2013 में आशा की किरण?

हमें खबर है खबीसों के हर ठिकाने की
शरीके जुर्म न होते तो मुखबिरी करते
 (~ हसन निसार?)

विगत सप्ताह कठिनाई भरे कहे जा सकते हैं। पहले एक व्यक्तिगत क्षति हुई। उसके बाद तो बुरी खबरों की जैसे बाढ़ ही आ गई। न्यूटाउन, कनेटीकट निवासी एक 20 वर्षीय असंतुलित युवा ने पहले अपनी माँ की क्रूर हत्या की और फिर उन्हीं की मारक राइफलें लेकर नन्हें बच्चों के "सैंडी हुक एलीमेंट्री" स्कूल पहुँचकर 20 बच्चों और 6 वयस्कों की निर्मम हत्या कर दी।

जब तक सँभल पाते दिल्ली बलात्कार कांड की वहशियत की परतें उघड़नी आरंभ हो गईं। परिवहन प्राधिकरण और दिल्ली पुलिस के भ्रष्टाचारी गँठजोड़ से शायद ही कोई दिल्ली वाला अपरिचित हो। प्राइवेट बसें हों या ऑटो रिक्शा, हाल बुरा ही है क्योंकि देश में अपराधी हर जगह निर्भय होकर घूमते हैं। बची-खुची कसर पूरी होती है हर कोने पर खुली "सरकारी" शराब की दुकान और हर फुटपाथ पर लगे अंडे-चिकन-सिरी-पाये के ठेलों पर जमी अड्डेबाजी से। समझना कठिन नहीं है कि संस्कारहीन परिवारों के बिगड़े नौजवानों के लिए यह माहौल कल्पवृक्ष की तरह काम करता है। क्या कोई भी कभी भी पकड़ा नहीं जाता? इस बात का जवाब काका हाथरसी के शब्दों में - रिश्वत लेते पकड़ा गया तो रिश्वत देकर छूट जा।

दर्द की जो इंतहा इस समय हुई है, इससे पहले उसका अहसास सन 2006 में निठारी कांड के समय हुआ था जब स्थानीय महिला थानेदार को उपहार में एक कार देने वाले एक अरबपति की कोठी में दिन दहाड़े मासूम बच्चों का यौन शोषण, प्रताड़न, करने के बाद हत्या और मांसभक्षण नियमित रूप से होता रहा, और मृतावशेष घर के नजदीकी नाले में फेंके जाते रहे। शीशे की तरह स्पष्ट कांड में भी आरोपियों के मुकदमे आज भी चल रहे हैं। कुछ पीड़ितों के साथ यौन संसर्ग करने वाले धनिक के खिलाफ अभी तक कोई सज़ा सुनाये जाने की खबर मुझे नहीं है बल्कि एक मुकदमे में एक पीड़िता के मजदूर पिता के विरुद्ध समय पर गवाही के लिए अदालत न पहुँच पाने के आरोप में कानूनी कार्यवाही अवश्य हुई है। देश की मौजूदा कानून व्यवस्था और उसके सुधार के लिए किए जा रहे प्रयत्नों की झलक दिखने के लिए वह एक कांड ही काफी है।

हर ज़िम्मेदारी सरकार पर डाल देने की हमारी प्रवृत्ति पर भी काफी कुछ पढ़ने को मिला। व्यक्ति एक दूसरे से मिलकर समाज, समुदाय या सरकार इसीलिए बनाते हैं कि उन्हें हर समय अपना काम छोडकर अपने सर की रक्षा करने के लिए न बैठे रहना पड़े। मैं बार-बार कहता रहा हूं कि कानून-व्यवस्था बनाना सरकार की पहली जिम्मेदारियों में से एक है और सभी उन्नत राष्ट्रों की सरकारें यह काम बखूबी करती रही हैं, तभी वे राष्ट्र उन्नति कर सके। आईपीएस-आईएएस अधिकारियों के सबसे महंगे जाल के बावजूद, भारत में न केवल व्यवस्था का, बल्कि सरकार और प्रशासन का ही पूर्णाभाव दिखाता है। जनता की गाढ़ी कमाई पर ऐश करने वाले नेता (जन-प्रतिनिधि?) तो आने के तीन मिलते हैं लेकिन प्रशासन अलोप है। समय आ गया है जब व्यवस्था बनाने की बात हो। न्याय और प्रशासन होगा तो रिश्वतखोरी, हफ्ता वसूली, पुलिस दमन से लेकर राजनीतिज्ञों की बद-दिमागी और माओवादियों की रंगदारी जैसी समस्याएँ भी भस्मासुर बनाने से पहले ही नियंत्रित की जा सकेंगी।

रही बात सरकार से उम्मीद रखने की, तो यह बात हम सबको, खासकर उन लोगों को समझनी चाहिए जो भूत, भविष्य या वर्तमान में सरकार का भाग हैं - कि सरकार से आशा रखना जायज़ ही नहीं अपेक्षित भी है। सरकारें देश के दुर्लभ संसाधनों से चलती हैं ताकि हर व्यक्ति को हर रोज़ हर जगह की बाधाओं और उनके प्रबंधन के बंधन से मुक्ति मिल सके। सरकार के दो आधारभूत लक्षण भारत में लापता हैं -
1. सरकार दिग्दर्शन के साथ न्याय, प्रशासन, व्यवस्था भी संभालती है|
2. कम से कम लोकतन्त्र में, सरकार अपने काम में जनता को भी साथ लेकर चलती है।

सरकार में बैठे लोग - नेता और नौकरशाह, दोनों - अपने अधकचरे और स्वार्थी निर्णय जनता पर थोपना रोककर यह जानने का प्रयास करें कि जनहित कहां है। व्यवस्था में दैनंदिन प्रशासन के साथ त्वरित न्याय-व्यवस्था भी शामिल है यह याद दिलाने के लिए ही निठारी का ज़िक्र किया था लेकिन कानून के एक भारी-भरकम खंभे के ज़िक्र के बिना शायद यह बात अधूरी रह जाये इसलिए एक सुपर-वकील का ज़िक्र ज़रूरी है।

भगवान राम के जन्मस्थान पर मंदिर बनाने का दावा करने वाले दल में कानून मंत्री रहे जेठमलानी पिछले दिनों मर्यादा पुरुषोत्तम "राम" पर अपनी टिप्पणी के कारण एक बार फिर चर्चा में आए थे। वैसे इसी शख्स ने पाकिस्तान से आए हैवानी आतंकवादियों की २६ नवम्बर की कारगुजारी (मुम्बई ऑपरेशन) के दौरान ही बिना किसी जांच के पकिस्तान को आरोप-मुक्त भी कर दिया था। लेकिन मैं इस आदमी का एक दीगर बयान कभी नहीं भूल पाता जो भारत में चर्चा के लायक नहीं समझा गया था।
आप जानते हैं कि आपके मुवक्किल ने हत्या की है वो अपराधी है लेकिन आपको तो उसे बचाना ही पड़ेगा. फ़र्ज़ करो कि मुझे मालूम है कि मेरे मुवक्किल ने अपराध किया है. मैं अदालत से कहूँगा कि साहब मेरे मुवक्किल को सज़ा देने के लिए ये सबूत काफ़ी नहीं हैं. मैं ऐसा नहीं कहूँगा कि मेरा मुवक्किल कहता है कि उसने ऐसा नहीं किया इसलिए वो निर्दोष है.ये हमारे पेशे की पाबंदी है. अगर मैं ऐसा करूँगा तो बार काउंसिल मेरे ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकता है. मुझे मालूम है कि मेरे मुवक्किल ने ऐसा किया है तो तो उसे बचाने के लिए मैं ऐसा नहीं कहूँगा कि किसी दूसरे ने अपराध किया है. आप झूठ नहीं बोल सकते बल्कि न्यायाधीश के सामने ये सिद्ध करने की कोशिश करेंगे कि सबूत पर्याप्त नहीं हैं. इस पेशे की भी अपनी सीमा है.
(~राम जेठमलानी)
सुपर-वकील साहब, अगर कानून में इतनी बड़ी खामी है तो उसका शोषण करने के बजाय उसे पाटने की दिशा में काम कीजिये। नियमपालक जनता के पक्ष में खड़े होइए। अब, सुपर-वकील की बात आई है तो एक सुपर-कॉप की याद भी स्वाभाविक ही है। जहां अधिकांश केंद्रीय कर्मचारी कश्मीर, पंजाब, असम और नागालैंड के दुष्कर क्षेत्रों में विपरीत परिस्थितियों में चुपचाप जान दे रहे थे, उन दिनों में भी अपने पूरे पुलिस करीयर में अधिकांश समय देश की राजधानी में बसे रहने वाली एक सुपर-कॉप अल्पकाल के लिए पूर्वोत्तर राज्य में गईं तभी "संयोग से" उनकी संतान का दाखिला दिल्ली के एक उच्च शिक्षा संस्थान में पूर्वोत्तर के कोटा में हो गया था। उसके बाद जब अगली बार उनके तबादले की बात चली तो वे अपने को पीड़ित बताकर अपनी "अखिल भारतीय ज़िम्मेदारी" के पद से तुरंत इस्तीफा देकर चली गईं और तब एक बार फिर खबर में आईं जब पता लगा कि उनकी अपनी जनसेवी संस्था उनके हवाई जहाज़ के किरायों के लिए दान में लिए जानेवाले पैसे में "मामूली" हेराफेरी करती रही है। दशकों तक दिल्ली पुलिस में रहते हुए, अपने ऊपर अनेक फिल्में बनवाने और कई पुरस्कार जीतने के बावजूद दिल्ली पुलिस का चरित्र बदलने में अक्षम रहने वाली इस अधिकारी को अचानक शायद कोई जादू का चिराग मिल गया है कि अब वे बाहर रहते हुए भी (अपनी उसी संस्था के द्वारा?) 90 दिनों में पुलिस का चरित्र बदल डालने का दावा कर रही हैं।

उदासी और विषाद के क्षणों में अलग-अलग तरह की बातें सुनने में आईं। कुछ अदरणीय मित्रों ने तो देश के वर्तमान हालात पर व्यथित होते हुए भ्रूण हत्या को भी जायज़ ठहरा दिया। लेकिन ऐसी बातें कहना भी उसी बेबसी (या कायरता) का एक रूप है जिसका दूसरा पक्ष पीड़ित से नज़रें बचाने से लेकर उसी को डांटने, दुतकारने या गलत ठहराने की ओर जाता है। जीवन में जीत ही सब कुछ नहीं है। अच्छे लोग भी चोट खाते हैं, बुद्धिमान भी असफल होते हैं। दुनिया मे अन्याय है, कई बार वह जीतता हुआ भी लगता है। वही एहसास तो बदलना है। गिलास आधा खाली है या आधा भरा हुआ, इस दुविधा से बाहर निकालना है तो गिलास को पूरा भरने का प्रयास होना चाहिए। आगे बढ़ना ही है, ऊपर उठना ही होगा, एक बेहतर समाज की ओर, एक व्यवस्थित प्रशासन की ओर जहां "सर्वे भवन्तु सुखिना" का उद्घोष धरातलीय यथार्थ बन सके। सभ्यता का कोई विकल्प नहीं है।

मित्र ब्लॉगर गिरिजेश राव सर्वोच्च न्यायालय में "त्वरित न्याय" अदालतों के लिए याचिका बना रहे हैं। काजल कुमार जी ने इस बाबत एक ग्राफिक बनाया है जो इस पोस्ट में भी लगा हुआ है। अन्य मित्र भी अपने अपने तरीके से कुछ न कुछ कर ही रहे हैं। आपका श्रम सफल हो, कुछ बदले, कुछ बेहतर हो।

24 दिसंबर को बॉन (जर्मनी) में दो लोगों ने एक भारतीय युवक की ज़ुबान इसलिए काट ली कि वह मुसलमान नहीं था। पिछले गुरुवार को न्यूयॉर्क में एक युवती ने 46 वर्षीय सुनंदों सेन को चलती ट्रेन के आगे इसलिए धक्का दे दिया क्योंकि वह हिन्दू और मुसलमानों से नफरत करने लगी थी। विस्थापित देशभक्ति (मिसप्लेस्ड पैट्रियटिज्म) भी अहंकार जैसी ही एक बड़ी बुराई है। अपने को छोटे-छोटे गुटों में मत बाँटिए। बड़े उद्देश्य पर नज़र रखते हुए भी भले लोगों को छोटे-मोटे कन्सेशन देने में कोई गुरेज न करें, नफरत को मन में न आने दें, हिंसा से बचें। दल, मज़हब, विचारधारा, जाति आदि की स्वामिभक्ति की जगह सत्यनिष्ठा अपनाने का प्रयास चलता रहे तो काम शायद आसान बने और हमारा सम्मिलित दर्द भी कम हो!

निर्भया, दामिनी या (शिल्पा मेहता के शब्दों में) "अभिमन्यु" को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि! उसकी पीड़ा हम मिटा न सके इसकी टीस मरते दम तक रहेगी लेकिन उस टीस को समूचे राष्ट्र ने महसूस किया है, यह भी कोई छोटी बात नहीं है। उस वीर नायिका के दुखद अवसान से इस निर्मम कांड का पटाक्षेप नहीं हुआ है। पूरा देश चिंतित है, शोकाकुल है लेकिन सुखद पक्ष यह है कि राष्ट्र चिंतन में भी लीन है। परिवर्तन अवश्य आयेगा, अपने आदर्श का अवमूल्यन मत कीजिये।

प्रथम विश्व युद्ध की हार से हतोत्साहित जर्मनों ने कम्युनिस्टों की गुंडागर्दी से परेशान होकर हिटलर जैसे दानव को अपना "फ्यूहरर" चुन लिया था। "हिन्दू" लोकतन्त्र से बचने के लिए पूर्वी बंगाल के मुसलमानों ने जिन्ना के पाकिस्तान को चुनने की गलती करके अपनी पीढ़ियाँ तबाह कर डालीं। हम भारतीय भी साँपनाथ से बचने को नागनाथ पालने की गलतियाँ बार-बार करते रहे हैं। वक़्त बुरा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि एक बुराई मिटाने की आशा में हम दूसरी बुराइयों को न्योतते रहें। दुर्भाग्य से इस देश के जयचंदों ने अक्सर ऐसा किया। खुद भी उन्नत होइए और अपने आदर्शों में भी केवल उन्नत और विचारवान लोगों को ही जगह दीजिये। सम्पूर्ण क्रान्ति की आशा उस व्यक्ति से मत बाँधिए जिसे यह भी नहीं पता कि देश का भूखा गरीब शीतलहर के दिन कैसे काटता है या बाढ़ में बांधों का पानी छोड़ने से कितने जान-माल की हानि हर साल होती है। लिखने को बहुत कुछ है, शायद बाद में लिखता भी रहूं, फिलहाल इतना ही क्योंकि पहले ही इतना कुछ कहा जा चुका है कि किसी व्यक्ति विशेष के लिए कहने को कुछ खास बचता नहीं।
अल्लाह करे मीर का जन्नत में मकां हो
मरहूम ने हर बात हमारी ही बयाँ की (~इब्ने इंशा)
यहां लिखी किसी भी बात का उद्देश्य आपका दिल दुखाना नहीं है। यदि भूलवश ऐसा हुआ भी हो तो मुझे अवगत अवश्य कराएं और भूल-सुधार का अवसर दें। नव वर्ष हम सबके लिए नई आशा किरण लेकर आए ...

* संबन्धित कड़ियाँ *
बलात्कार के विरुद्ध त्वरित न्यायपीठों हेतु गिरिजेश राव की जनहित याचिका
लड़कियों को कराते और लड़कों को तमीज
खूब लड़ी मर्दानी...
नव वर्ष का संकल्प

Tuesday, December 25, 2012

दुखी मन से

कवि नहीं हूँ पर आहत तो हूँ। यूं ही कुछ बिखरे से विचार
(अनुराग शर्मा
लिखा परदेस क़िस्मत में वतन को याद क्या करना
जहाँ बेदर्द हो हाकिम वहाँ फ़रियाद क्या करना
(~ अज्ञात)
(चित्र आभार: काजल कुमार)
गाँव छोड़कर क्यों जाते हैं
शहर की हैवानियत झेलने
हँसा मेरे गाँव का साहूकार
खेत हथियाने के बाद

अपनी इज्ज़त अपने हाथ
हमें तो कुछ नहीं हुआ
कपड़े उघड़े रहे होंगे बोले
मुर्दा खाल उघाड़ते क़स्साब

नज़र नीची रखो, पाँव की जूती
हया, नकाब, बुर्का और हिजाब
थोपकर ही खैरख्वाह बनते हैं
चेहरों पर तेज़ाब फेंकने वाले

घर से निकली ही क्यों
कहता है सौदागर हवस का
भारी छूट पर खरीदते हुए
एक नाबालिग को

दुर्योधन और रावण महान
विदेशी प्रथा है नारी अपमान
भाषण देता देसी पव्वा
सुन रहा है तंबाकू का पान

तुम्हें कर मिले तो कर लो
हमें तो देखना है, देख रहे हैं
देखते रहेंगे, कुछ न करेंगे
खाने कमाने आए थे, खाने दो

बसों में क्यों चढ़ते हैं लोग
मासूमियत से पूछते हैं
ज़ैड सिक्योरिटी पर इतराते
बुलेटप्रूफ शीशों के धृतराष्ट्र

अपनी हिफाज़त खुद करें
यही लिखा था उस बस में
जो अव्यवस्था के जंगल में
चलती है हफ्ते के ईंधन से

मानवता की गली लाशों के बीच
अट्टहास कर रहे हैं कुछ लोग
डॉक्टर ने मोटी रकम लेकर
जन्म से पहले ही कर दिया काम
सारे देश की शुभकामनाओं के बाद भी शनिवार 29 दिसंबर प्रातः हमने उसे खो दिया
सोया देश जागा है। आप भी न्यायमूर्ति जे एस वर्मा समिति को यौन-अपराध में त्वरित न्याय के लिए अपने सुझाव निम्न पते पर भेज सकते हैं:
फैक्स: 011 2309 2675
ईमेल: justice.verma@nic.in

Monday, December 10, 2012

बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो

अनुराग शर्मा

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों, विशेषकर सिख और हिंदुओं के प्रति हिंसा और अत्याचार के मामले नए नहीं हैं। लेकिन इस साल तो जैसे इन मामलों की संख्या में बाढ़ सी आ गई है। कराची के हिंदुओं द्वारा अदालत से स्थगनादेश ले आने के बावजूद वहाँ के सोल्जर बाज़ार स्थित एक सौ वर्ष से अधिक पुराना राम पीर मंदिर और उसके परिसर में रहने वाले हिंदुओं के घर एक बिल्डर द्वारा दिन दहाड़े भारी पुलिस की उपस्थिति में गिरा दिये गये है जिसे लेकर वहां का हिंदू समुदाय दुखी है| स्थानीय हिंदुओं ने सरकार से कहा है कि यदि वह उनकी, उनके घरों तथा धार्मिक स्थलों की हिफाजत नहीं कर सकती है, तो वह उन्हें सुरक्षित भारत भिजवाने की व्यवस्था करे। अपने गैर-मुस्लिम नागरिकों के दमन के लिए बदनाम पाकिस्तान के इस कृत्य से वहां अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर एक बार फिर प्रश्न चिह्न लगा है। मंदिर परिसर में रहने वाले लगभग 40 हिन्दू बेघर हो गए हैं और सर्दी की रातें अपने बच्चों के साथ खुले में आसमान के नीचे बिताने को मजबूर हैं। उनका आरोप है कि पुलिस मंदिर में रखी अनेक मूर्तियां तथा उन पर चढ़ाए गए सोने के आभूषण भी उठाकर ले गई|

अपने अस्तित्व में आने के साथ ही पाकिस्तान में मंदिर नष्ट करने के सुनियोजित प्रयास चलते रहे हैं। कराची में ही पिछले दिनों इवेकुई बोर्ड ने एक मंदिर को एक ऑटो वर्कशॉप चलाने के लिए लीज पर दे दिया था। पाकिस्तान हिंदू कांउसिल (PHC) ने इस बारे में पाकिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र भी लिखे थे और कोई कार्यवाही न होने पर मन मसोस कर रह गए थे।

कराची के बाहरी इलाके में स्थित श्री कृष्ण राम मंदिर पर इस एक साल में ही दो बार हमला हुआ है। चेहरा छिपाने की कोई ज़रूरत न समझते हुए इन हमलावरों ने नकाब भी नहीं पहन रखा था। उन्होंने हवा में पिस्तौल लहराई, हिन्दुओं के खिलाफ नारे लगाए और प्रतिमाओं से छेड़छाड़ की। मंदिर में उपस्थित किशोर ने बताया कि पाकिस्तानी मुसलमान उन्हें अपने समान नागरिक नहीं समझते हैं और जब चाहे उन्हें मारते-पीटते हैं और मंदिरों पर हमले करते रहते हैं।

वैसे तो मंदिरों पर हमला करने के लिए पाकिस्तान में किसी बहाने की ज़रूरत नहीं पड़ती, लेकिन जब बहाना मिल जाये तो ऐसी घटनाएँ और भी आसानी से घटती हैं। शरारती तत्वों द्वारा यूट्यूब पर डाली गयी बेहूदा वीडियो क्लिप 'इंनोसेंस ऑफ मुस्लिम्स' के खिलाफ 21 सितंबर को पाकिस्तान भर में हुए विरोध प्रदर्शन ने पाकिस्तान के कई बड़े शहरों में हिंसक रूप ले लिया था जिनमें 19 अल्पसंख्यक मारे गए थे और जमकर तोड़फोड़ हुई थी। उसी दिन कराची के गुशलन-ए-मामार मुहल्ले के 25-30 हिन्दू परिवारों के एक मंदिर में रखी देवी-देवताओं की मूर्तियों को हबीउर्रहमान नाम के एक मौलवी के नेतृत्व में आयी एक भीड़ ने क्षतिग्रस्त किया। डर के कारण हिंदू परिवार इस मामले की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं कराना चाहते थे।

छोटे शहरों या कम प्रसिद्ध मंदिरों की तो कोई खबर पाकिस्तान से बाहर पहुँचती ही नहीं है। इस साल के आरंभ में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित प्रसिद्ध हिंगलाज माता मंदिर की सालाना तीर्थयात्रा शुरू होने से महज दो दिन पहले वहाँ की प्रबंध समिति के अध्यक्ष महाराज गंगा राम मोतियानी का पुलिस की वर्दी में आए लोगों ने अपहरण कर लिया था।

अल्लाहो-अकबर के नारे लगाती एक भीड़ ने मई 2012 में पेशावर में गोर गाथरी इलाके के एक पुरातात्विक परिसर के बीच में स्थित 200 साल पुराने गोरखनाथ मंदिर को क्षतिग्रस्त कर दिया था। हमलावरों ने मंदिर में रखे धर्म ग्रन्थों और चित्रों में आग लगाई, शिवलिंग को खंडित कर दिया और मूर्तियां अपने साथ ले गये। मंदिर के संरक्षक ने बताया कि दो महीने में मंदिर पर यह तीसरा हमला था।

सिंध प्रांत के उमरकोट स्थित 3 एकड़ में फैले आखारो मंदिर की चारदीवारी के पास करीब 50 दुकानें हैं। फरवरी 2012 में वहाँ के एक व्यापारी जुल्फिकार पंजाबी और उसके भाई हाफिज पंजाबी ने अपनी किराए की दुकान बढ़ाने के लिए बिना मंदिर प्रशासन की इजाजत लिए निर्माण कार्य शुरू कर दिया और मंदिर समिति की आपत्ति पर गोलीबारी कर दी जिसमें दो हिन्दू बुरी तरह घायल हो गए थे।

मंदिर ही नहीं हिन्दुओं की शमशान भूमि पर भी पाकिस्तान के भू-माफियाओं की नज़र है। मुसलमानों की शह और सरकार की फिरकापरस्ती के चलते न जाने कितने हिंदुओं को मरने के बाद अग्नि संस्कार भी नसीब नहीं हो पाता है। पाकिस्तान से भागकर आए शरणार्थी अपने साथ न जाने कितनी दर्दनाक कहानियाँ लाये हैं। बीस वर्षीय रुखसाना ने कहा कि पाकिस्तान में कट्टरपंथियों के चलते हिन्दुओं को अपनी पहचान छिपानी पड़ती है और बहुत से लोग इसके लिए वहां मुसलमानों जैसे नाम रख लेते हैं। कभी पाकिस्तान के बलूचिस्तान में एक मंदिर के पुजारी रहे रामश्रवण ने कहा कि उनके यहां तालिबान जैसे धर्मांध संगठनों के डर का आलम यह था कि वह मंदिर जाते समय या घर लौटते समय मुसलमानी टोपी लगाकर चलते थे। 13 वर्षीय लक्ष्मी ने कहा कि उसे भारत में पहली बार एक स्कूल में दाखिला मिला है, जबकि पाकिस्तान में वह कभी स्कूल का मुंह नहीं देख सकी थी। वहां हिन्दू-सिख घरों में घुस कर धर्म परिवर्तन को लेकर मार-पीट करते हुए महिलाओं से बदसलूकी करना सामान्य है। सिन्धी समिति के समक्ष एक व्यक्ति ने बताया कि उन्हें बार-बार अपमानित किया जाता है और जबरदस्ती मांस खिलाया जाता है। 45 वर्षीय शांति देवी ने कहा कि वह कभी पाकिस्तान नहीं लौटेंगी और भारत में ही मरना पसंद करेंगी क्योंकि पाकिस्तान में हिन्दुओं को हिन्दू रीति रिवाज से अंतिम संस्कार तक नहीं करने दिया जाता है। डेरा इस्माइल खान में 1947 से अब तक एक मात्र हिंदू पंडित खडगे लाल के शव को ही हिंदू रीतिरिवाजों के तहत अंतिम संस्कार करने की अनुमति दी गई है। डेरा इस्माइल खान में पहले मेडियन कॉलोनी और टाउन हॉल में एक-एक श्मशान घाट था जिनकी नीलामी हो चुकी हैं।

मंदिरों पर हमलों के अलावा पाकिस्तान में हिंदुओं को लगातार ही महिलाओं के अपहरण और जबरन धर्मांतरण का सामना करना पड़ता है। मुसलमानों के निगरानी गुट अल्पसंख्यक हिंदुओं पर दबाव बनाते रहते हैं। सिंध प्रांत में मीरपुर माथेलो से गायब हुई 17 वर्षीय हिंदू लड़की रिंकल कुमारी बाद में एक स्थानीय दरगाह के एक प्रभावशाली मुस्लिम मिट्ठू मियां के परिवार की देख-रेख में मिली थी और उसका धर्म परिवर्तन कराकर एक स्थानीय मुसलमान युवक से उसकी शादी करा दी गई थी। एक तरफ खुशी मनाने और शक्ति प्रदर्शन के लिए दरगाह के हथियारबंद ज़ायरीन हवा में गोलियां चला रहे थे वहीं दूसरी तरफ सामाजिक कार्यकर्ता मिट्ठू मियां पर हिन्दू लड़कियों के संगठित अपहरण और विक्रय के आरोप लगा रहे थे।

26 मार्च 2012 को रिंकल कुमारी ने पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश इफित्खार मुहम्मद चौधरी को बताया कि नवीद शाह ने उसका अपहरण किया था और अब उसे अपनी मां के घर जाने दिया जाए। रिंकल के इस साहस के बदले में उसके दादा को गोली मार दी गई और अगली पेशी में उसकी अनुपस्थिति में अदालत को उसका एक वीडियो दिखाया गया जिसके आधार पर उसके अपहरण और धर्मपरिवर्तन को स्वेच्छा बताकर अपहरण, बलात्कार और जबरिया धर्म परिवर्तन के आरोप निरस्त कर दिये गए।

अमेरिकी विदेश विभाग की ताज़ा रिपोर्ट में गहरी चिंता जताते हुए कहा गया है कि पाकिस्तान में हिंदुओं को अपहरण और जबरन धर्म-परिवर्तन का डर लगा रहता है। पाकिस्तान मानवाधिकार परिषद के अनुसार वहाँ हर महीने 20-25 हिंदू लड़कियां अपहृत कर ली जाती हैं और उन्हें जबरन इस्लाम स्वीकार करने के लिए कहा जाता है। हिन्दू होने भर से किसी को ईशनिन्दा कानून में फंसाकर मृत्युदंड दिलाना या दिन दहाड़े मारना आसान हो जाता है। नवंबर 2011 में चार हिंदू डॉक्टरों की सिंध प्रांत के शिकारपुर जिले में सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

असहिष्णुता के इस जंगल में जहां तहां एकाध आशा की किरण भी नज़र आ जाती है। मारवी सिरमेद जैसी समाज सेविका जहां अल्पसंख्यकों पर हो रहे अपराधों के विरुद्ध मीडिया और अदालत में अडिग खड़ी दिखती हैं वहीं वकील जावेद इकबाल जाफरी पाकिस्तान सरकार को अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों एवं संपत्ति की रक्षा करने के संवैधानिक कर्तव्य की याद दिलाते हुए पाकिस्तान के मंदिरों को अवैध कब्जों से मुक्त कराने और उनके पुनर्निर्माण की मांग करते हैं। पाकिस्तानी अखबार डॉन ने अपने संपादकीय में सरकार से मांग की है कि राम पीर मंदिर गिराने के लिए हिंदू समुदाय से माफी मांगने की जरूरत है।
[आभार: चित्र व सूचनाएँ विभिन्न समाचार स्रोतों से]

Friday, December 7, 2012

कितना पैसा कितना काम - आलेख

 (अनुराग शर्मा)

वेतन निर्धारण एक जटिल प्रक्रिया है। भारत में एक सरकारी बैंक की नौकरी के समय उच्चाधिकारियों द्वारा जो एक बात बारम्बार याद दिलाई जाती थी, वह यह थी कि हम 24 घंटे के कर्मचारी थे। यह सर्वज्ञात था कि हमारा वेतन हमारे उस अतिरिक्त समय के हिसाब से तय नहीं किया जाता था। मेरे कितने ही अधीनस्थ मुझसे अधिक वेतन भत्ते पाते थे। कम्युनिस्ट देशों में तो वेतन कर्मचारी के काम, अनुभव या शिक्षा आदि पर आधारित न होकर सरकार द्वारा आँकी गई उनकी व्यक्तिगत आवश्यकताओं के आधार पर निर्धारित होता था।

आज समय बदल चुका है। कम्युनिस्ट तंत्र तो अपनी विद्रूपताओं के चलते दुनिया भर से लगभग साफ़ ही हो चुके हैं। नये संचार माध्यम और व्यापक जागरूकता के कारण सैन्य और धार्मिक तानाशाहियाँ भी समाप्ति के कगार पर ही हैं। लोकतंत्र का दायरा बढता जा रहा है। और इसके साथ ही बढ रही है व्यक्तिगत सम्पत्ति, और व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता। भारत, जापान, जर्मनी और अमेरिका जैसे लोकतंत्रीय राष्ट्रों में सिद्धांततः प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मर्ज़ी का काम करने की पूरी स्वतंत्रता है। और उसी तरह कम्पनियों को भी आवश्यकतानुसार सुशिक्षित, कुशल और पद के लिये सटीक व्यक्ति चुनने और उन्हें भरपूर वेतन-भत्ते देने का अधिकार है।

श्रम है तो उसके मूल्य की बात उठना स्वाभाविक ही है। विभिन्न कर्मचारियों के कार्य की परिस्थितियाँ एक दूसरे से अलग होती हैं, और उसी प्रकार उनके वेतन की संरचना भी अलग होती है। कुछ दशक पहले के भारत में व्यक्ति एक बार एक नौकरी में घुसता था तो रिटायर होकर ही निकलता था लेकिन अब हालात दूसरे हैं। सूचना-संचार क्रांति और अंतर्राष्ट्रीय निगमों के आने के बाद से नौकरी के क्षेत्र में गलाकाट प्रतिस्पर्धा चल रही है। कर्मचारियों को ऊँची तनख्वाह देना नियोक्ताओं का नैतिक कर्तव्य ही नहीं उनकी मजबूरी भी बन गया है। “पैकेज” आज के युवा का मूलमंत्र सा है।

विज्ञान की प्रगति के साथ संसार भी सिकुड़ सा गया है। एक-दूसरे देश में आना जाना पहले से कहीं आसान हुआ है। इसके साथ ही अपने घर बैठे-बैठे दूर देश के नियोक्ता के लिये काम कर पाना भी सम्भव है। नियोक्ता और कर्मचारी के देशों के बीच की प्रति-व्यक्ति आय में अंतर होना भी स्वाभाविक है। अमेरिका में रहकर काम करते हुए भारत से अधिक वेतन पाना सामान्य बात है क्योंकि वहाँ का जीवन स्तर और जीवन यापन की लागत दोनों ही अलग हैं। कार्य-संस्कृति भी अलग है लेकिन उस पर बात फिर कभी होगी। भारत में रहते हुए किसी विदेशी संस्थान में काम करना एक अलग ही अनुभव है क्योंकि तब आप भारतीय परिवेश में रहते हुए भी अमेरिकी जीवन-स्तर के निकट होते हैं। इन विदेशी संस्थानों के सामने अपने मानव संसाधनों को न केवल बनाये रखने की चुनौती है बल्कि उसी संस्थान में रहते हुए उनको आगे बढने की प्रेरणा देने का ज़िम्मा भी है। ये संस्थान एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं। बिल्कुल भिन्न वातावरण से आये, बल्कि कई बार दूर देश में ही रहते हुए काम कर रहे कर्मियों को अपनी कार्य संस्कृति से परिचित कराना, उन्हें एक अपरिचित नियमितता में ढालना आसान काम नहीं है। नैतिक, सामाजिक भेदों के अलावा बहुत से वैधानिक अंतर भी हैं जिन्हें समझने के लिये कर्मचारी चयन प्रक्रिया का एक उदाहरण काफ़ी है। भारत से आने वाले बहुत से आवेदनों में आवेदक के शिक्षा-वृत्त में जन्मतिथि, डिग्री पाने की तारीखें और माता-पिता के नाम आदि सामान्य सी बातें है जबकि अमेरिका में किसी आवेदक के जीवनवृत्त में सामान्यतः ऐसा कुछ नहीं होता जिससे उसकी आयु, सामाजिक स्थिति आदि का पता लग सके। बस काम से काम रखना शायद इसी को कहते हैं। भेदभाव से बचने के लिये, साक्षात्कार के जटिल नियमों के अनुसार किसी आवेदक के राष्ट्रीय मूल, आयु आदि के बारे में पूछना ग़ैर-क़ानूनी बनाया गया है। खासकर अमेरिका में पनपी बहुविध संस्कृति ने अपने द्वार दुनिया भर के योग्य कर्मचारियों के खोल रखे हैं।

बुद्धि-श्रम सम्मान के इस भौगोलिक परिदृश्य में आज के इस समय में भारत की स्थिति विशिष्ट है। भारतीय संस्कृति ने अनेक धार्मिक, ऐतिहासिक कारणों से शिक्षा को सदैव ही मूर्धन्य स्थान दिया है। भले ही आज़ादी के दशकों बाद भी देश का निर्धन वर्ग मूलभूत साक्षरता से वंचित हो, भले ही खेलों में हमारी दशा अति-शोचनीय हो, हमारे शिक्षण संस्थानों से आज भी किसी अन्य देश से अधिक चिकित्सक, अभियंता और अनुसन्धानकर्ता निकलते हैं। सूचना क्रांति के आरम्भिक दिनों की बात है जब बैंगळूरु जैसे नगरों में सूचना प्रौद्योगिकी में काम कर रहे कर्मचारी भोजनावकाश के समय भर्ती करनेवालों के दलों द्वारा घेर लिये जाते थे। समय के साथ तरीके बदले हैं लेकिन आधुनिक तकनीक की बढती मांग को न कोई मन्दी, और न कोई युद्ध ही मिटा सका है।

किसी भारतीय को बहुराष्ट्रीय संस्थान द्वारा उच्च पद या अद्वितीय रूप से बड़ा वेतन दिया जाना अक्सर अखबारों की सुर्खी बनता है। पिछले दिनों फ़ेसबुक ने भोपाल के मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (मैनिट) में कैंपस प्लेसमेंट के लिए छात्रों के वृत्तांत मांगे थे जिनमें से चुने गये छात्रों को अस्सी लाख रुपये से लेकर सवा करोड़ तक का वेतन दिये जाने की सम्भावना है। यह वेतन अब तक के सबसे बड़े प्रस्तावों में से एक है। ऐसी खबर पढकर जहाँ प्रसन्नता होती है वहीं कई प्रश्न भी उठते हैं, यथा: ऐसा कौन सा काम है कि जिसके लिये इतना बड़ा पैकेज प्रदान किया जाता है? आखिर बड़े वेतन तय कैसे होते हैं? बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के कामकाज और उनके प्रतिभा खोज अभियान कैसे काम करते हैं? आदि। सरकारी क्षेत्रों के वेतन अक्सर किसी व्यापक अध्ययन या किसी आयोग की सिफ़ारिशों पर आधारित होते हैं। कुछ क्षेत्रों में आज भी मज़दूर संघ हैं जो प्रबन्धन से बातचीत करके एक नियमित अंतराल के लिये वेतन करार करते हैं। कम कर्मचारी, विशिष्ट तकनीक, नवोन्मेषी उत्पाद, और विश्वव्यापी व्यवसाय वाले संस्थान अक्सर अपने वेतन तय करने के लिये पद की अर्हतायें, योग्यता की सुलभता, जन-संसाधन के बारे में उपलब्ध जानकारी व तकनीक आदि के साथ साथ नवागंतुक की व्यक्तिगत विशेषताओं को भी ध्यान में रखते हैं। अधिकांश कार्यस्थलों की संरचना इस प्रकार की होती है कि शारीरिक विकलांगता, लिंगभेद आदि के कारण किसी कर्मचारी के साथ जाने-अनजाने भेदभाव न हो।

बहुत से पदों के वेतनमान कार्य की विशेषता और नियोक्ता की भौगोलिक स्थिति से रूढ होते हैं लेकिन तब भी सक्षम कम्पनियाँ अपनी पहल बनाये रखने के लिये अधिक वेतन व सुविधायें देकर बेहतर कर्मचारी पाने को लालायित रहती हैं। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि पद और वेतन का कार्य निष्पादन से कोई खास संतुलन नहीं बन पाता। कितनी ही बार बड़ी कम्पनियाँ किसी बड़े सौदे की आशा में कर्मचारियों की फ़ौज खड़ी कर लेती हैं ताकि काम मिलने की स्थिति में उसे कुशलता से निबटाया जा सके। काम आया तो ठीक वर्ना ऐसे कर्मचारियों को स्थानांतरण या बर्खास्तगी का सामना भी करना पड़ता है।

रोज़गार के क्षेत्र में नित नई जानकारी का प्रयोग भी धड़ल्ले से हो रहा है। कर्मचारियों का मनोबल ऊँचा कैसे रहे? उनकी अभिप्रेरणा क्या हो? ऐसा क्या किया जाये कि काम से उन्हें उदासी नहीं, प्रसन्नता मिले। भारत में केनरा बैंक में नौकरी के समय से मुझे मनन-कक्ष (मेडिटेशन रूम) का विचार याद है। अमेरिका की अधिकांश कम्पनियाँ अपने कर्मचारियों को मूलभूत से अधिक सुविधायें देने का प्रयास करती हैं। फ़्लेक्सि-ऑवर्स यानि कर्मचारी की सुविधानुसार कार्य-समय का निर्धारण, स्वास्थ्य सुविधा, जीवन बीमा, आवागमन, पार्किंग स्थल आदि से कहीं आगे बढकर कर्मचारियों को उच्च या विशिष्ट शिक्षा की सुविधायें देना, घर से काम करने का सुरक्षित वातावरण प्रदान करना, दूसरे नगर, देश आदि से आने पर आने-जाने, सामान पहुँचाने से लेकर पुराना घर बेचने और नया घर लेने आदि जैसे कार्य भी कई बार नये नियोजक द्वारा निष्पादित किये जाते हैं। भारत से आये कर्मचारियों के लिये विधिक प्रायोजन और ग्रीन कार्ड आदि से सम्बन्धित खर्च करना भी एक आम बात है।

यदि कम्पनी किसी पद के लिये अनुभव के साथ-साथ प्रबन्धन की शिक्षा की आवश्यकता महसूस करती है तो उसके सामने कई विकल्प दिखते हैं। किसी अनुभवी कर्मचारी को शिक्षित करना या पहले से शिक्षित अनुभवी कर्मचारी को लेना। क्या किया जायेगा यह अनेक बातों पर निर्भर करता है, जैसे आवश्यकता की योजना कितने पहले बनाई जा चुकी है, अनुभवी एमबीए कितने सुलभ हैं और बाहर से उन्हें बुलाने में क्या-क्या अड़चनें हैं। कुल मिलाकर आज के बहुराष्ट्रीय संस्थानों का का मूलमंत्र है, सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी पाना जो संख्या में भले ही कम हों मगर काम में किसी से भी कम न हों और इस काम के लिये धन कोई बाधा नहीं है।
प्रस्तुत आलेख गर्भनाल पत्रिका के नवंबर 2012 अंक में प्रकाशित हुआ था जिसकी प्रति यहां उपलब्ध है

Sunday, December 2, 2012

यारी है ईमान - कहानी

ज़माना गुज़र गया भारत गए हुए, फिर भी उनका मन वहाँ की गलियों से बाहर आ ही नहीं पाता। जब भी जाते हैं, दिल किसी गुम हुई सी जगह को फिर-फिर ढूँढता है। कितनी ही बार अपने को शिरवल के बस अड्डे पर अकेले बैठे हुए देखते हैं। कभी मुल्ला जी के रिक्शे पर शांति निकेतन जाता हुआ महसूस करते हैं तो कभी बांस की झोंपड़ी में कविराज के मणिपुरी संगीत की स्वर लहरियाँ सुनते हुये। रामपुर के शरीफे का दैवी स्वाद हो या लखनऊ के आम की मिठास, बरेली में साइकिल से गिरकर घुटने छील लेना भी याद है और बदायूं की रामलीला के संवाद भी। नन्दन से धर्मयुग और चंदामामा से न्यूज़वीक तक के सफर के बाद आज भी बालसभा की पहेलियाँ, इंद्रजाल कोमिक्स की रोमांचकारी दुनिया और दीवाना के गूढ कार्टून मनोरंजन करते से लगते हैं। स्कूल कॉलेज की यादों के साथ ही लखनऊ, दिल्ली और चेन्नई में शुरू की गई पहली तीन नौकरियों का उत्साह भी अब तक वैसा ही बना हुआ है।

पूना हो या पनवेल, कुछ यादें हल्की हैं और कुछ गहरी। लेकिन जो एक शहर अब भी उनके सपनों में लगभग रोज़ ही आता है वह है जम्मू! कितनी ही यादें जुड़ी हैं उस रहस्यमयी दुनिया से जो तब बन ही रही थी। जंगली फूलों की नशीली गंध से सराबोर पथरीली चट्टानों को काटकर बहती तवी नदी, और रणबीर नहर में तैरने जाना हो या पुराने पहाड़ी नगर के इर्दगिर्द बन रहे उपनगरीय क्षेत्रों में तलहटी में जाकर स्वादिष्ट लाल गरने चुनकर लाना। सुबह शाम स्कूल आते जाते समय आकाश को झुककर धरती छूते देखने का अनूठा अनुभव हो या जगमगाते जुगनुओं कों देखकर आश्चर्यचकित होने की बारी हो, जम्मू की यादें छूटती ही नहीं।

भाषाई आधार पर राज्यों के निर्माण के बारे में बहुत बहसें हो चुकी हैं। लेकिन देशभर में रहने के बाद वे अब इस बात को गहराई से मानते हैं कि अलग इकाई बनाने की बात हो या अलग पहचान की, मानव-मात्र के लिए भाषा से बड़ी पहचान शायद मजहब की ही हो सकती है दूसरी कोई नहीं। भाषाएँ तोड़ती भी हैं और जोड़ती भी हैं। वे हमारी पहचान भी हैं और संवाद का साधन भी। वे जहां भी रहे, भाषा की समस्या रही तो लेकिन मामूली सी ही। अधिकांश जगहों पर लोगों को टूटी-फूटी ही सही, हिन्दी आती ही थी, कभी-कभी अङ्ग्रेज़ी भी। जम्मू में यह कठिनाई और भी आसान हो गई थी, लवलीन और रमणीक जैसे सहपाठी जो थे। हमेशा मुस्कराने वाली लवलीन जब किसी को उनकी भाषा या बोलने के अंदाज़ पर टिप्पणी करते देखती तो उसकी भृकुटियाँ तन जातीं और बस्स ... समझो किसी की शामत आयी। लंबा चौड़ा रमणीक उतना दबंग नहीं था। उससे दोस्ती का कारण था, हिन्दी पर उसकी पकड़। पूरी कक्षा में वही एक था जो उनकी बात न केवल पूर्णतः समझता था बल्कि लगभग उन्हीं की भाषा में संवाद भी कर सकता था।

पाठशाला जाने के लिए राजमहल परिसर से होकर निकलना पड़ता था। शाम को बस आने तक साथ के बच्चों के साथ अंकल जी की दुकान पर इंतज़ार। उसी बीच मे कई बार ऐसा भी हुआ जब रमणीक के साथ रघुनाथ मंदिर स्थित उसके घर भी जाना हुआ। वे लोग पक्के हिन्दूवादी साहित्यकार थे। शाखा के बारे मे पहली बार वहीं जाना और जनसंघ के बारे मे भी। गोष्ठी से लेकर बाल भारती तक के शब्द पहली बार रमणीक के मुंह से ही सुने। खासकर अपना नाम बताते हुए जब वह सलीके से रमणीक गुप्त कहता था तो रमनीक गुप्ता पुकारने वाले सभी डोगरे बच्चे शर्मा जाते थे। लवलीन की बात और थी, वह उसे सदा ओए रमनीके कहकर ही बुलाती थी।

वे अक्सर सोचते थे कि उनके बचपन के साथी वे सब लोग अब न जाने कहाँ होंगे। उनकी यादें चेहरे पर मुस्कान लाती थीं। मन में सदा यही रहा कि किसी न किसी दिन जम्मू जाना ज़रूर होगा। तब ढूंढ लेंगे अपने नन्हे दोस्तों को। लवलीन का पूरा नाम, घर, ठिकाना कुछ भी नहीं मालूम, इसलिए कभी उसकी खोज नहीं की लेकिन रमणीक गुप्त से मुलाकात की उम्मीद कभी नहीं छूटी।

उस दिन तो मानो लॉटरी ही खुल गई जब रमणीक के छोटे भाई वीरभद्र का नाम इंटरनेट पर नज़र आया। पता लगा कि वह गुड़गांव की एक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में मुख्य सूचना अधिकारी है। फोन नंबर की खोज शुरू हुई। वीरभद्र गुप्त ने बड़े सलीके से बात की और नाम लेने भर की देर थी कि उन्हें पहचान भी लिया। पता लगा कि रमणीक भी ज़्यादा दूर नहीं है। वह राष्ट्रीय अभिलेखागार में एक महत्वपूर्ण पद पर लगा हुआ था। वीरभद्र से नंबर मिलते ही उन्होने रमणीक को कॉल किया।

हॅलो के जवाब में एक देहाती से स्वर ने जब उनका नाम, पता, वल्दियत आदि पूछना शुरू किया तो उन्होने उतावली से अपना संबंध बताते हुए रमणीक को बुलाने को कहा। "मैं र-म-नी-क ही हूं जी!" अगले ने हर अक्षर चबाते हुए कहा, "... लेकिन मैंने आपको पहचाना नहीं।"

नगर, कक्षा, शाला आदि की जानकारी देने में थोड़ा समय ज़रूर लगा, फिर रमणीक को उनकी पहचान हो आई। कुछ देर तक बात करने के बाद उधर से सवाल आया, "लेकन आज हमारी याद कैसे आ गई, इतने दिन के बाद?"

"याद तो हमेशा ही थी, लेकिन संपर्क का कोई साधन ही नहीं था।"

"फिर भी, कोई वजह तो होगी ही ..." रमणीक ने रूखेपन से कहा, "बिगैर मतलब तो कोई किसी को याद नहीं करता!"

[समाप्त]

Sunday, November 25, 2012

एक शाम गीता के नाम - चिंतन

सुखिया सब संसार है खाए और सोये।
दुखिया दास कबीर है जागे और रोये।

ज्ञानियों की दुनिया भी निराली है। जहाँ एक तरफ सारी दुनिया एक दूसरे की नींद हराम करने में लगी हुई है, वहीं अपने मगहरी बाबा दुनिया को खाते, सोते, सुखी देखकर अपने जागरण को रुलाने वाला बता रहे हैं। जागरण भी कितने दिन का? कभी तो नींद आती ही होगी। या शायद एक ही बार सीधे सारी ज़िंदगी की नींद की कसर पूरी कर लेते हों, कौन जाने! मुझे तो लगता है कि कुछ लोग कभी नहीं सोते, केवल मृत्यु उनकी देह को सुलाती है। सिद्धार्थ को बोध होने के बाद किसका घर, कैसा परिवार। मीरा का जोग जगने के बाद कौन सा राजवंश और कहाँ की रानी? बस "साज सिंगार बांध पग घुंघरू, लोकलाज तज नाची।" जगने-जगाने की स्थिति भी अजीब है। जिसने देखी-भोगी उसके लिए ठीक, बाकियों के लिये संत कबीर के ही शब्दों में:

अकथ कहानी प्रेम की कहे कही न जाय।
गूंगे केरी शर्करा, खाए और मुस्काय।।

पतंजलि के योग सूत्र के अनुसार योग का अर्थ चित्तवृत्तियों का निरोध है। अभ्यास तथा वैराग्य के द्वारा उनका निरोध संभव है। बचपन से अपने आसपास के लोगों को जीवन की सामान्य प्रक्रियाओं के साथ ही योगाभ्यास भी करते पाया। सर पर जितने दिन बाबा का हाथ रहा उन्हें नित्य प्राणायाम और त्रिकाल संध्या करते देखा। त्रिकाल संध्या की हज़ारों साल पुरानी परम्परा तो उनके साथ ही चली गयी, उनका मंत्रोच्चार आज भी मन के किसी कोने में बैठा है और यदा-कदा उन्हीं की आवाज़ में सुनाई देता है।
जैसे आदमी पुराने वस्त्र त्याग कर नये ग्रहण करता है, वैसे ही आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरा शरीर धारण कर लेती है। मगर ऐसी सूक्ष्म आत्मा को क्या चाटें ? ऐसी आत्मा न खा-पी सकती है, न भोग कर सकती है, न फिल्म देख सकती है। ~ हरीशंकर परसाई
पटियाली सराय के वे सात घर एक ही परिवार के थे। पंछी उड़ते गए, घोंसले रह गए समय के साथ खँडहर बनने के लिए। पुराने घरों में से एक तो किसी संतति के अभाव में बहुत पहले ही दान करके मंदिर बना दिया गया था। एक युवा पुत्र की मोहल्ले के गुंडों द्वारा हत्या किया जाना दूसरे घर के कालान्तर में खँडहर बनाने का कारण बना। कोई बुलाये से गये, तो कुछ स्वजन स्वयं निकल गए। घर खाली होते गए। इन्हीं में से छूटे हुए एक लबे-सड़क घर के मलबे को मोहल्ले के छुटभय्ये नेता द्वारा अपने ट्रक खड़े करने के लिए हमसार कराते देखता था। जब गर्मियों की छुट्टियों में सात खण्डों में से एक अकेला घर आबाद होता था तब कभी मन में आया ही नहीं कि एक दिन यह घर क्या, नगर क्या, देश भी छूट जायेगा। हाँ, दुनिया छूटने का दर्द तब भी दिल में था। संयोग है कि भरा पूरा परिवार होते हुए भी उस घर को बेचने हम दो भाइयों को ही जाना पडा। घर के अंतिम चित्र जिस लैपटॉप में रखे उसकी डिस्क इस प्रकार क्रैश हुई कि एक भी चित्र नहीं बचा।

बाबा रिटायर्ड सैनिक थे। अंत समय तक अपना सब काम खुद ही किया। उस दिन आबचक की सफाई करते समय दरकती हुई दीवार से कुछ ईंटें ऊपर गिरीं, अपने आप ही रिक्शा लेकर अस्पताल पहुंचे। हमेशा प्रसन्न रहने वाले बाबा को जब मेरे आगमन के बारे में बताया गया तो दवाओं की बेहोशी में भी उन्होंने आँख-मुँह खोले बिना हुंकार भरी और अगले दिन अस्पताल के उसी कमरे में हमसे विदा ले ली। दादी एक साल पहले जा चुकी थीं। मैं फिर से कछला की गंगा के उसी घाट पर खड़ा कह रहा था, "हमारा साथ इतना ही था।"

धर्म और अध्यात्म से जितना भी परिचय रहा, बाबा और नाना ने ही कराया। संयोग से उनका साथ लम्बे समय तक नहीं रहा। उनकी अनुपस्थिति का खालीपन आज भी बना हुआ है। जीवन में मृत्यु की अटल उपस्थिति की वास्तविकता समझते हुए भी मेरा मन कभी उसे स्वीकार नहीं सका। हमारा जीवन हमारे जीवन के गिर्द घूमता रहता है। शरीर माध्यम खलु धर्म साधनं। सारा संसार, सारी समझ इस शरीर के द्वारा ही है। जान है तो जहान है। इसके अंत का मतलब? मेरा अंत मतलब मेरी दुनिया का अंत। कई शुभचिंतकों ने गीता पढ़ने की सलाह दी ताकि आत्मा के अमरत्व को ठीक से समझ सकूँ। दूसरा अध्याय पढ़ा तो सर्वज्ञानी कृष्ण जी द्वारा आत्मा के अमरत्व और शरीर के परिवर्तनशील वस्त्र होने की लम्बी व्याख्या के बाद स्पष्ट शब्दों में कहते सुना कि यदि तू इस बात पर विश्वास नहीं करता तो भी - और सर्वज्ञानी का कहा यह "तो भी" दिल में किसी शूल की तरह चुभता है - तो भी इस निरुपाय विषय में शोक करने से कुछ बदलना नहीं है।

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ।।

एक बुज़ुर्ग मित्र से बातचीत में कभी मृत्यु का ज़िक्र आया तो उन्होंने इसे ईश्वर की दयालुता बताया जो मृत्यु के द्वारा प्राणियों के कष्ट हर लेता है। गीता में उनकी बात कुछ इस तरह प्रकट हुई दिखती है:

मृत्युः सर्वहरश्चाहम् उद्भवश्च भविष्यताम्।
कीर्तिः श्रीर्वाक च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥

मेरे प्रिय व्यक्तित्वों में से एक विनोबा भावे ने अन्न-जल त्यागकर स्वयं ही इच्छा-मृत्यु का वरण किया था। मेरी दूसरी प्रिय व्यक्ति मेरिलिन वॉन सेवंट से परेड पत्रिका के साप्ताहिक प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम में किसी ने जब यह पूछा कि संभव होता तो क्या वे अमृत्व स्वीकार करतीं तो उन्होंने नकारते हुए कहा कि यदि जीवनत्याग की इच्छा होने पर भी अमृत्व के बंधन के कारण जीवन पर वह अधिकार न रहे तो वह अमरता भी एक प्रकार की बेबसी ही है जिसे वे कभी नहीं चाहेंगी। अपने उच्चतम बुद्धि अंक के आधार पर मेरिलिन विश्व की सबसे बुद्धिमती व्यक्ति हैं। कुशाग्र लोगों के विचार मुझे अक्सर आह्लादित करते हैं, लेकिन नश्वरता पर मेरिलिन का विचार मैं जानना नहीं चाहता।

सिद्धांततः मैं अकाल-मृत्यु का कारण बनने वाले हर कृत्य के विरुद्ध हूँ। जीवन और मृत्यु के बारे में न जाने कितना कुछ कहा, लिखा, पढ़ा, देखा, अनुभव किया जा चुका है। शिकार, युद्ध, जीवहत्या, मृत्युदंड, दैहिक, दैविक ताप आदि की विभीषिकाओं से साहित्य भरा पड़ा है। संसार अनंत काल से है, मृत्यु होते हुए भी जीवन तो है ही। नश्वरता को समझते हुए, उसे रोकने का हरसंभव प्रयास करते हुए भी हम उसे स्वीकार करते ही हैं। लेकिन यह स्वीकृति और समझ हमारे अपने मन की बात है जो हमारे इस क्षणभंगुर शरीर से बंधा हुआ है। मतलब यह कि हमारी हर समझ, हमारा बोध हमारे जीवन तक ही सीमित है। लेकिन क्या यह बोध है भी? हमने सदा दूसरों की मृत्यु देखी है, अपनी कभी नहीं। कैसी उलटबाँसी है कि अपने सम्पूर्ण जीवन में हम सदा जीवित ही पाए गए हैं। जीवन, मृत्यु, पराजीवन, आदि के बारे में हमारी सम्पूर्ण जानकारी या/और कल्पनाएँ भी हमारे इसी जीवन और शरीर के द्वारा अनुभूत हैं। क्या इस जीवन के बाद कोई जीवन है? चाहते तो हैं कि हो लेकिन चाहने भर से क्या होता है?

हम ना मरे मरै संसारा। हमको मिला जियावनहारा।। (संत कबीर)

ब्रह्म सत्यम् जगत मिथ्या। मेरी दुनिया शायद मेरा सपना भर नहीं। मेरे जीवन से पहले भी यह थी, और मेरे बाद भी रहेगी। हाँ, जिस भी मिट्टी से बना मैं आज अपने अस्तित्व के प्रति चैतन्य हूँ वह चेतना और वह अस्तित्व दोनों ही मरणशील हैं। यदि मैं दूसरा पक्ष मानकर यह स्वीकार कर भी लूं कि कोई एक आत्मा वस्त्रों की तरह मेरा शरीर त्यागकर किसी नए व्यक्ति का नया शरीर पहन लेगी तो भी वह अस्तित्व मेरा कभी नहीं हो सकता। क्या वस्त्र कभी किसी शरीर पर आधिपत्य जमा सकते हैं? ईंट किसी घर की मालकिन हो सकती है? कुछ महीने में मरने वाली रक्त-कणिका क्या अपने धारक शरीर की स्वामिनी हो सकती है? वह तो शरीर के सम्पूर्ण स्वरुप को समझ भी नहीं सकती। मेरा अस्तित्व मेरे शरीर के साथ, बस। उसके बाद, ब्रह्म सत्यम् ...

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावक:।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धामम् परमं मम ॥

(उस परमपद को न सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा और न अग्नि। जिस लोक को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में कभी वापस नहीं आता, ऐसा मेरा परमधाम है। (श्रीमद्भागवद्गीता)

जीवन की नश्वरता और कर्मयोग की अमरता की समझ देने के लिए गीता का आभार और आभार उन पूर्वजों का जिन्होंने जान देकर भी, कई बार पीढ़ियों तक भूखे, बेघरबार, खानाबदोश रहकर देस-परदेस भागते-दौड़ते हुए, कई बार अक्षरज्ञानरहित होकर भी अद्वितीय ज्ञान, समझ और विचारों को, इन ग्रंथों को भविष्य की पीढियों की अमानत समझकर संजोकर रखा।

ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय। ॐ शान्ति शान्ति शान्ति।।


स्वामी विवेकानंद के शब्द, येसुदास का स्वर, संगीत सलिल चौधरी का

Friday, November 16, 2012

दूर देश के काक, श्मशान और यमराज

आप सभी को यम द्वितीया (भैया दूज के पर्व) की हार्दिक शुभकामनायें!

कुछ दिन पहले गिरिजेश राव ने तेज़ी से लापता होते कौवों के बारे में पोस्ट लिखी थी। यहाँ पिट्सबर्ग में इतने कौवे हैं कि मुझे कभी यह ख्याल ही नहीं आया कि वहाँ लखनऊ में इनकी कमी महसूस की जा रही है। इसी बीच जापान जाने का मौका मिला। तोक्यो नगर में पदयात्रा पर था कि फुटपाथ के निकट ही मयूर और कौवे की मिली-जुली सी आवाज़ सुनाई दी। काँ काँ ही थी मगर इतनी तेज़ और गहरी मानो मयूर के गले से आ रही हो। शायद सामने के भवन की छत पर बैठे मित्र को पुकारा जा रहा था।

तोक्यो नगर के भारत सरीखे (परंतु अत्यधिक स्वच्छ और करीने वाले) मार्ग में भारत की ही तरह जगह जगह मन्दिर और मठियाँ दिख रही थीं। मैं उन्हें देखता चल रहा था कि एक मन्दिर में एक विकराल मूर्ति को देखकर देवता को जानने की गहरी उत्सुकता हुई। जैसे ही एक जापानी भक्त आता दिखा, मैंने पूछ लिया और उसने जापानी विनम्रता के साथ बताया, "एन्मा दाई ओ" अर्थात मृत्यु के देवता।

भैया दूज यानी यम द्वितीया के पावन पर्व के अवसर पर यमराज की याद स्वाभाविक है। आप सभी को भाई दूज की बधाई!

जापान के धरतीपकड काक

प्रकृतिप्रेमी काक

गगनचुम्बी काक

ज़ोजोजी परिसर में एक समाधि स्थल

मृतकों की शांति की प्रार्थनायें!

जापान के यमराज

एन्मा दाई ओ (यमदेव)
Saturday, November 6, 2010 अनुराग शर्मा (मूल आलेख: नवम्बर ६, २०१०)

Monday, November 12, 2012

भारतीय संस्कृति के रखवाले

दीवाली के मौके पर यहाँ पिट्सबर्ग में एक भारतीय समारोह में जाना पड़ा। मेरी आशा के विपरीत दिए और मिठाई कहीं नज़र नहीं आयी। अलबत्ता शराब व कबाब काफ़ी था। कहने को शबाब भी था मगर मेकअप के नीचे छटपटा सा रहा था।

बहुत से लोगों से मुलाक़ात हुई। नवीन जी भी उन्हीं में से थे। दारु का गिलास उठाये कुछ चलते और कुछ झूमते, उड़ते और छलकते हुए से वे मेरे साथ की सीट पर संवर गए। अब साथ बैठे हैं तो बात भी करेंगे ही। पहले औपचारिकताएं हुईं। मौसम, खेल, व्यवसाय, परिवार से गुज़रते हुए हम बड़ी बड़ी बातों तक पहुंचे। विदेश में बसे कुछ भारतीयों के लिए बड़ी बात का मतलब है उस मातृभूमि की फ़िक्र का ज़िक्र जिसके लिए हमने कभी अपनी जिंदगी से न एक पल दिया और न एक धेला ही।

वे पूछने लगे कि अगर मैं इसी शहर में रहता हूँ तो फ़िर कभी उन्हें मन्दिर में क्यों नहीं दिखता। मैंने अंदाज़ लगाकर बताया कि शायद हमारे मन्दिर जाने के दिन और समय अलग अलग रहे हों। वैसे भी भक्ति और पूजा मेरे लिए एक व्यक्तिगत विषय है और मेरी मन्दिर यात्रायें नियमित भी नहीं हैं। मेरी बात उनको अच्छी नहीं लगी।

"तो अपने बच्चों को हिन्दी नहीं सिखायेंगे क्या?" झूमते हुए उन्होंने अपना गिलास मुझपर लगभग उडेल ही दिया।

"मेरे बच्चे हिन्दी, ही नहीं बल्कि और भी भारतीय भाषायें काफ़ी तरह जानते हैं। वे तो हिन्दी सिखा भी सकते है" मैंने खुश होकर उन्हें बताया।

"सवाल केवल भाषा का नहीं है।" उन्होंने मेरी मूर्खता पर हँसते हुए कहा, "अमेरिका में भारतीय संस्कृति को भी तो ज़िंदा रखना है ..."

अपने इस कथन को वे शायद ही सुन पाए होंगे क्योंकि इसे पूरा करने से पहले ही वे टुन्न हो गए। वे सोफा पर और भरा हुआ गिलास कालीन पर लोटने लगा। मैं समझ गया कि अमेरिका में उनकी भारतीय संस्कृति को कोई ख़तरा नहीं है।

आप सभी को, मित्रों और परिजनों के साथ दीपावली की हार्दिक मंगलकामनाएं! 
पिट्सबर्ग का एक दृश्य

 [मूल आलेख: अनुराग शर्मा; शनिवार २१ जून २००८]

Saturday, November 3, 2012

तूफ़ान, बर्फ और उत्सव - इस्पात नगरी से [61]

भारतीय पर्व पितृपक्ष की याद दिलाने वाला हैलोवीन पर्व गुज़ारे हुए कुछ समय हुआ लेकिन हाल में आये भयंकर तूफ़ान सैंडी के कारण अधिकाँश बस्तियों ने उत्सव का दिन टाल दिया था। हमारे यहाँ यह उत्सव आज मनाया गया। खूबसूरत परिधानों में सजे नन्हे-नन्हे बच्चे घर घर जाकर "ट्रिक और ट्रीट" कहते हुए कैंडी मांग रहे थे। विभिन्न स्कूलों व कार्यालयों में यह उत्सव कल या परसों बनाया गया था जब सभी बड़े और बच्चे तरह तरह के भेस बनाए हुए टॉफियों के लेनदेन में व्यस्त थे। आसपास से कुछ चित्रों के साथ आपको हैलोवीन की शुभकामनाएं!



 सैंडी तूफ़ान ने अमेरिका के न्यूयॉर्क और न्यूजर्सी समेत कुछ क्षेत्रों में काफ़ी तबाही मचाई और अमेरिका के सबसे बड़े नगर का कामकाज बिलकुल रोक दिया। इसका असर हमारे यहाँ भी हुआ। हफ्ते भर चलने वाली बरसात के साथ-साथ आसपास के कुछ क्षेत्रों में समयपूर्व हिमपात देखने को मिला। आपके लिए एक हिमाद्री क्लिप एक नज़दीकी राजमार्ग से:

सम्बंधित कड़ियाँ
* हैलोवीन - प्रेतों की रात्रि [२०११]
* प्रेतों का उत्सव [२००९]
* इस्पात नगरी से - श्रृंखला

[वीडियो व चित्र अनुराग शर्मा द्वारा]

Tuesday, October 23, 2012

दशहरे के बहाने दशानन की याद

नवरात्रि के नौ दिन भले ही देवी और श्रीराम के नाम हों, दशहरा तो महर्षि विश्रवा पौलस्त्य और कैकसी के पुत्र महापंडित रावण ने मानो हर ही लिया है। और हो भी क्यों न? इसी दिन तो अपने अंतिम क्षणों में श्रीराम के अनुरोध पर गुरू बनकर रावण ने दशरथ पुत्रों को आदर्श राज्य की शिक्षा दी थी। दैवी धन के संरक्षक और उत्तर दिशा के दिक्पाल कुबेर रावण महाराज के अर्ध-भ्राता थे। कुछ कथाओं के अनुसार सोने की लंका और पुष्पक विमान कुबेर के ही थे परंतु बाद में पिता की आज्ञा से वे इन्हें रावण को देकर उत्तर की ओर चले गये और अल्कापुरी में अपनी नयी राजधानी बनायी।

भारतीय ग्रंथों में रावण जैसे गुरु चरित्र बहुत कम हैं। वीणावादन का उस्ताद माना जाने वाला रावण सुरुचि सम्पन्न सम्राट था। वह षड्दर्शन और वेदत्रयी का ज्ञाता है। जैन विश्वास है कि वह अलवर के रावण पार्श्वनाथ मन्दिर में नित्य पूजा करता था। कैलाश-मानसरोवर क्षेत्र का राक्षस-ताल उसके भार से बना माना जाता है। कैलाश पर्वत पर पडी क्षैतिज रेखायें रावण द्वारा इस पर्वत को शिव सहित लंका ले जाने के असफल प्रयास के चिह्न हैं। ब्रह्मज्ञान उसके जनेऊ की फांस में बन्धा है। फिर वह राक्षस कैसे हुआ? उसके नारे "वयम रक्षामः" को भारतीय तट रक्षकों ने अपने नारे के रूप में अपनाया है। यह नारा ही राक्षस वंश की विशेषताओं को दर्शाने के लिये काफी है। ध्यान से देखने पर इस नारे में दो बातें नज़र आती हैं - एक तो यह कि राक्षस अपनी रक्षा स्वयम कर सकने का गौरव रखते हैं और दूसरी अंतर्निहित बात यह भी हो सकती है कि राक्षसों को अपनी शक्ति, सम्पन्नता और पराक्रम का इतना दम्भ है कि वे अपने को ही सब कुछ समझते हैं। याद रहे कि राक्षस, दानवों और दैत्यों से अलग हैं।

ऐसा कहा जाता है कि रावण ने काव्य के अतिरिक्त ज्योतिष और संगीत पर ग्रंथ लिखे हैं। रावण की कृतियों में आज "शिव तांडव स्तोत्र" सबसे प्रचलित है। मुझे छन्द का कोई ज्ञान नहीं है फिर भी केवल अवलोकन मात्र से ही आदि शंकराचार्य की कई रचनायें इसी छन्द का पालन करती हुई दिखती हैं। रावण के वयम रक्षामः में ईश्वर की सहायता के बिना अपनी रक्षा स्वयम करने का दम्भ उसके सांख्य-धर्मी होने की ओर भी इशारा करती है। हमारे परनाना के परिवार के सांख्यधर होने के कारण "रावण के खानदानी" होने का मज़ाकिया आक्षेप मुझे अभी भी याद है। सांख्यधर शब्द ही बाद में संखधर, शंखधार और शकधर आदि रूपों में परिवर्तित हुआ। वयम रक्षामः से पहले, कुवेर के शासन में लंका का नारा वयम यक्षामः था जिसमें यक्षों की पूजा-पाठ की प्रवृत्ति का दर्शन होता है जोकि राक्षस जीवन शैली के उलट है।

दूसरी ओर भगवान राम द्वारा लंकेश के विरुद्ध किये जा रहे युद्ध में अपनी विजय के लिये सेतुबंध रामेश्वर में महादेव शिव की स्तुति के समय का यज्ञ व प्राण-प्रतिष्ठा में वेदमर्मज्ञ पंडित रावण को बुलाना और अपने ही विरुद्ध विजय का आशीर्वाद रामचन्द्र जी को देने के लिये रामेश्वरम् आना निःशंक रावण की नियमपरायणता और धार्मिक निष्पक्षता का प्रमाण है।

मथुरा (मधुरा, मधुवन, मधुपुरी) के राजा मधु (मधु-कैटभ वाला) से रावण की बहिन कुम्भिनी का विवाह हुआ था। इसी कुम्भिनी और भाई कुम्भकर्ण के नाम पर दक्षिण के नगर कुम्भाकोणम का नमकरण हुआ माना जाता है। मध्य प्रदेश के मन्दसौर नाम का सम्बन्ध मन्दोदरी से समझा जाता है। यहाँ शहर से बाहर रावण की मूर्ति बनी है और रावण दहन नहीं होता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बिसरख ग्राम रावण के पिता ऋषि विश्रवा से सम्बन्धित समझा जाता है। खरगोन (Khargone) नगर भी खर (खर दूषण वाला खर) का क्षेत्र है। खरगोन से 55 किलोमीटर दूर सिरवेल महादेव मन्दिर की प्रसिद्धि इसलिये है कि यहाँ पर रावण ने अपने दशानन महादेव को अर्पित किये थे। जोधपुर/मंडोर क्षेत्र के कुछ ब्राह्मण (दवे कुल/श्रीमाली समाज) अपने को रावण का वंशज मानते हैं। जोधपुर के अमरनाथ महादेव मन्दिर में रावण की प्राण प्रतिष्ठा का विश्व हिन्दू परिषद द्वारा विरोध एक खबर बना था। पता नहीं चला कि बाद में प्रशासन ने क्या किया। यदि किसी को इस बारे में वर्तमान स्थिति की जानकारी है तो कृपया बताइये। मौरावा के लंकेश्वर महादेव का रावण दशहरे पर भी नहीं मरता है। सिंहासन पर बैठे राजा रावण की यह सात मीटर ऊंची प्रस्तर मूर्ति अब तक 200 से अधिक दशहरे देख चुकी है और इसकी नियमित पूजा-अर्चना होती है। विदिशा के रावणग्राम में भी नियमित रावण-पूजा होती है। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित प्राचीन धार्मिक तीर्थ बैजनाथ में भी विजया दशमी को रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है। कानपुर निवासी तो शायद दशहरे पर शिवाला के दशानन मन्दिर में रावण के दर्शन कर रहे होंगे।

कभी कभी, एक प्रश्न मन में उठता है - श्रीराम ने एक रावण का वध करने पर उस हिंसा का प्रायश्चित भी किया था। हम हर साल रावण मारकर कौन सा तीर मार रहे हैं?

आप सभी को दुर्गापूजा और दशहरे की शुभकामनायें। पाप का नाश हो धर्म का कल्याण हो और हम समाज और संसार को काले सफेद में बांटने के बजाये उसे समग्र रूप में समझने की चेष्टा करें।

शुभमस्तु!



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(17 अक्टूबर 2010)

Sunday, October 14, 2012

शब्दों के टुकड़े - भाग 4

(आलेख व चित्र: अनुराग शर्मा)
विभिन्न परिस्थितियों में कुछ बातें मन में आयीं और वहीं ठहर गयीं। जब ज़्यादा घुमडीं तो डायरी में लिख लीं। कई बार कोई प्रचलित वाक्य इतना खला कि उसका दूसरा पक्ष सामने रखने का मन किया। ऐसे अधिकांश वाक्य अंग्रेज़ी में थे और भाषा क्रिस्प थी। हिन्दी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है। अनुवाद करने में भाषा की चटख शायद वैसी नहीं रही, परंतु भाव लगभग वही हैं। कुछ वाक्य पहले तीन आलेखों में लिख चुका हूँ, कुछ यहाँ प्रस्तुत हैं।
1. स्वतंत्रता कभी थोपी नहीं जा सकती। थोपते ही वह दासत्व में बदल जाती है।
2. इतिहास अब मिटाया नहीं जा सकता और भविष्य अभी पाया नहीं जा सकता।
3. आज के लोभ को कल का लाभ देखने की फ़ुर्सत कहाँ।
4. भविष्य किसने देखा है? बहुतेरे तो भूत भी नहीं देख पाते।
5. अफ़वाहों की समय सीमा (एक्सपायरी डेट) निर्धारित होनी चाहिये।
6. गिलास आधा खाली है या आधा भरा यह शंका समाप्त करनी है तो उसे पूरा भरना होगा।
7. रिश्ते अक्सर वनवे ट्रैफ़िक की तरह होते हैं। कोई देने के भार से दुखी है कोई लेने के।
8. इस ब्रह्माण्ड में सब कुछ अस्थाई है, हम भी। (सर्वम् क्षणिकम्)
9. कुछ लेख संग्रहणीय होते हैं, पढे तो बाकी भी जाते हैं।
10. पूँजीवाद का सबसे अमानवीय रूप साम्यवाद कहलाता है।

पिछले अंक में अंग्रेज़ी में लिखे दो कथन जिनका हिन्दी अनुवाद निशांत मिश्र के सहयोग से हुआ
11. गर्भधारण का झंझट न हो तो माँ-बाप बनना सहज है।
12. कला कोई मेज़-कुर्सी तो है नहीं जो अपने बूते पर टिक सके।

आज आपके लिये कुछ कथन जिसका अनुवाद मुझसे नहीं हो सका। कृपया अच्छे से हिन्दी अनुवाद सुझायें:

  • I have so many friends that I can't count. Can I count on them?
  • Every outsider is a potential insider from the "other" side!
  • What finish line? Nice guys never cared about rat race.

पिट्सबर्ग का एक विहंगम दृश्य

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सम्बंधित कड़ियाँ
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* शब्दों के टुकड़े - भाग 1भाग 2भाग 3भाग 4भाग 5भाग 6
मैं हूँ ना! - विष्णु बैरागी
* कच्ची धूप, भोला बछड़ा और सयाने कौव्वे
* सत्य के टुकड़े - कविता
* खिली-कम-ग़मगीन तबियत (भाग २) - अभिषेक ओझा
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Sunday, October 7, 2012

भारत बोध - कविता

(चित्र, भाव व शब्द: अनुराग शर्मा)

असम धरातल, मरु है विषम ...

इतना ज़्यादा
होकर भी कम

असम धरातल
मरु है विषम

कैसे साथ
निभायेंगे हम

कहीं मिला न
कोई मो सम

कहाँ रहे तुम
कहाँ गये हम

मन हारा और
जीत रहे ग़म

पत्थर आँख न
होती है नम

साँस बची पर
निकला है दम

ज्योतिपुंज न
बने महातम

सर्वम दुःखम
सर्वम क्षणिकम

Saturday, September 29, 2012

ये सुबह सुहानी हो - इस्पात नगरी से [60]


शामे-अवध और सुबहे बनारस की खूबसूरती के बारे में आपने सुना ही होगा लेकिन पिट्सबर्ग की सुबह का सौन्दर्य भी अपने आप में अनूठा ही है। किसी अभेद्य किले की ऊँची प्राचीर सरीखे ऊँचे पर्वतों से अठखेलियाँ करती काली घटायें मानो आकाश में कविता कर रही होती हैं। भोर के चान्द तारों के सौन्दर्य दर्शन के बाद सुबह के बादलों को देखना किसी दैवी अनुभूति से कम नहीं होता है।  
मोनोंगैहेला नदी की धारा के ऊपर वाष्पित जल की एक धारा सी बहती दिखती है। लेकिन पुल के ठीक सामने की पहाड़ी को बादलों की चिलमन ने जैसे छिपा सा लिया है। चिड़ियाघर के लिये बायें और बड़े बाज़ार के लिये दायें, जहाँ जाकर मोनोंगैहेला का संगम ऐलेगनी नदी से होगा और फिर वे दोनों ही अपना अस्तित्व समाप्त करके आगे से ओहायो नदी बनकर बह जायेंगी।

लीजिये हम नगर की ओर जाने के बजाय चिड़ियाघर की ओर मुड़ गये। सामने की सड़क का नाम तो एकदम सटीक ही लग रहा है। भाँति-भाँति के वन्य प्राणी जब नगर के भीतर एक ही जगह पर चौपाल सजा रहे हों तो उसे "वन वाइल्ड प्लेस" से बेहतर भला क्या नाम दिया जा सकता है।
अरुणोदय की आहट सुनते ही बादलों की चादर झीनी पड़ने लगती है और अब तक सोयी पड़ी लाल सुनहरी किरणों से शस्य श्यामला धरती प्रकाशित होकर नृत्य सा करने लगती है।  हरी भरी वादी के किनारे की इस सड़क पर सुबह की सैर का आनन्द ही कुछ और है।

सूर्यदेव के दस्तक देने के बाद भी जहाँ कुछ बादल छँट रहे हैं वहीं कुछ ने मानो डटे रहने का प्रण लिया है। इसी जुगलबन्दी से आकाश में बना है यह खूबसूरत चित्र। नीचे नदी और पुल दोनों ही नज़र आ रहे हैं। आकाश में भले ही कालिमा अभी दिख रही है, नदी का जल पूरा स्वर्णिम हो गया है। इस्पात नगरी है तो जलधारा की जगह लावा बहने में कोई आश्चर्य की बात नहीं है। क्लिक करके सभी चित्रों को बड़ा किया जा सकता है। 
आपका दिन शुभ हो!
  

सम्बन्धित कड़ियाँ
इस्पात नगरी से - श्रृंखला

Saturday, September 8, 2012

जल सत्याग्रह - मध्य प्रदेश का घोगल ग्राम

ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठ्यं राज्यं
महाराज्यमपित्यमयं समन्तपर्यायी स्यात्‌ सार्वभौमः सार्वायुषान्तादापरार्धात्‌
आदमखोर जंगली समुदायों ने जब-तब विरोधी कबीलों द्वारा मारकर खा लिये जाने से बचने के लिये मार्ग खोजना आरम्भ किया होगा तब ज़रूर ऐसे नियमों की बात उठी होगी जो मानवता को निर्भय करें। ऐसी खुली हवा जिसमें हमारी भावी पीढियाँ खुलकर सांस ले सकें। कभी विश्वव्यापी रहे हिंसक आसुरी बलप्रयोग की जगह यम, नियम, संयम, नैतिकता, अहिंसा, प्रेम, विश्व-बन्धुत्व जैसे माध्यम अपनाये जाते रहे हैं। लेकिन पापी मन कहाँ मानते हैं। बल का बोलबाला हो तो हिंसा के दम पे और जब स्वतंत्रता की बात हो तो अपनी उन्मुक्ति के नाम पर अपना उल्लू सीधा करना उनकी फ़ितरत रही है। ऐसी दुष्प्रवृत्तियों की पहचान और उपचार होता रहे। तसल्ली इस बात की है कि छिटपुट अपवादों के बावजूद आज का जनमानस समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व को समझता है। उसे अपने विचारों पर ताले स्वीकार्य नहीं हैं और न ही अपनी ज़मीन पर नाजायज़ कब्ज़ा।

इंसान को स्वतंत्रता चाहिये अराजकता नहीं। विधि, प्रशासन और न्याय चाहिये तानाशाही नहीं। नियंत्रणवाद चाहे राजवंशों के नाम पर आये चाहे मज़हब के नाम पर और चाहे माओवाद और कम्युनिज़्म जैसी संकीर्ण राजनीतिक विचारधाराओं के नाम पर, चाहे सैन्यबल से आये चाहे तालिबानी क्रूरता से, लम्बे समय तक टिक नहीं सकता। यही कारण है कि आज के समय में लोकतंत्र का केवल एक ही विकल्प है, और वह है - बेहतर लोकतंत्र।
ज़ुबाँ पे मुहर लगी है तो क्या के रख दी है
हर एक हल्क़ा-ए-ज़ंज़ीर में ज़ुबाँ मैंने ~ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
लेकिन दुःख की बात है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता, विश्व-बन्धुत्व, अहिंसा, प्राणिमात्र में समभाव की भावना की जन्मदात्री भारत की धरती पर भी ये सद्विचार "एलियन थॉट्स" जैसे पराये होते जा रहे हैं। किस्म-किस्म के गिरोह हमारी-आपकी छोटी-छोटी शिकायतों को अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिये असंतोष का बम बनाने के काम में ला रहे हैं। यदि आपके पास असंतोष का कोई कारण नहीं भी है तो वे ढूंढकर ला देंगे।

इस दुर्भावना का एक दूसरा पक्ष भी है। लगता है जैसे देश की प्रशासन व्यवस्था ने आत्महत्या कर ली है। सरकारों, राजनीतिक दलों, प्रशासनिक सेवा, और सम्बन्धित संगठनों में लालची, चाटुकार और मक्कार किस्म के लोगों की बहुतायत है। सत्ता पर काबिज़ ये परजीवी अपने निहित स्वार्थ के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। असम हो या कश्मीर, बोड़ो हों या पण्डित, राज्यों के मूलनिवासी खुद शरणार्थी बन रहे हैं। महाराष्ट्र में किसी टुच्चे क्षेत्रीयतावादी का बचकाना बयान हो या कर्नाटक में अपनी पहचान छिपाये चूहों के भेजे टेक्स्ट सन्देश, ये गीदड़ भभकियाँ लाखों देशवासियों को पलायन करने को बाध्य कर देती हैं। सब जानते हैं कि लाखों निहत्थे निर्धनों के हत्यारे माओवाद जैसी देशव्यापी गहन समस्या को बहुत हल्के में लेकर गरीबों को सशस्त्र गिरोहों से दया की भीख मांगने के लिये छोड़ देना किसी भी सरकार के लिये अति निन्दनीय कृत्य है। लेकिन फिर भी सरकार में बैठे नेताओं, विपक्षियों, नौकरशाहों का समय जटिल समस्याओं के निराकरण के बदले अपनी जेबें भरी जाने में लगा दिखता है। भारत के इतिहास में यह कालखण्ड शायद बेशर्म घोटालों का समय कहकर पहचाना जायेगा।

5 अक्टूबर 1963 में पारित 16वें संविधान संशोधन के बाद से चुने हुए सांसदों और विधायकों की शपथ में जोड़ा गया एक वाक्य उन्हें याद दिलाता है कि वे देश की एकता और संप्रभुता बनाये रखने के लिये उत्तरदायी हैं। आज कितने जनप्रतिनिधि अपनी इस शपथ के प्रति निष्ठावान हैं? बल्कि बड़ा सवाल यह होना चाहिये कि सांसद, मंत्री या अन्य उच्च पदों के कितने अभिलाषी राष्ट्र की एकता और संप्रभुता के महत्व को समझते हैं? कुछ लोग मानते हैं कि राजनीति के गिरते स्तर के लिये स्वार्थी नेताओं के साथ-साथ जनचेतना की कमी भी बराबर की ज़िम्मेदार है। लेकिन जनचेतना के लिये प्रशासन की ओर से क्या किया जा रहा है? सर्वशिक्षा अभियानों की क्या प्रगति है, सभी जानते हैं। यह समय "कोउ नृप होय हमें का हानी" का नहीं, जगने, उठने और जगाने का है।

ऐसे कठिन समय में, जब हिंसक हो उठना बहुत आसान, बल्कि स्वाभाविक सा दिखने लगता है, सरकार द्वारा ग्रामवासियों का समुचित पुनर्वास किये बिना ओंकारेश्वर बांध की ऊँचाई बढाने के लिये गाँव डुबोने की योजना के विरोध में घोगल के ग्रामवासियों का शांत अहिंसक विरोध विश्वास जगाता है कि देशवासियों की आत्मा पूरी तरह मरी नहीं है। बांधो के आर्थिक लाभ-हानि तो हम सब देख ही चुके हैं। लेकिन हम उसका मानवीय पक्ष कैसे भूल सकते हैं? अपनी कुर्सियों से चिपके सत्ताधीश ग़रीबों के विस्थापन की समस्या को कैसे समझेंगे? और फिर क्या मुआवजे का सही आँकलन और ईमानदार वितरण होगा? कब? क्या बांध से मिलने वाले लाभ, सिंचाई, बिजली, रोज़गार आदि पर इन विस्थापितों का कोई हक़ है? इन सबसे ऊपर की बात यह कि जिनके गाँव, घर-बार डुबोये जाते हैं क्या उन्हें लोकतंत्र में किसी निर्णय, सहमति, असहमति का अधिकार नहीं है? बड़े नगरों के वातानुकूलित भवनों में बैठे किसी भाग्य-विधाता ने उनसे कभी पूछा कि बड़े नगरों के बड़े व्यवसाइयों के लाभ के लिये उनकी जीवनशैली और पैतृक भूमि का बलिदान जायज़ है या नहीं? मैंने अपनी कहानी "बांधों को तोड़ दो" में जन-दमन के इसी पक्ष को प्रस्तुत करने का प्रयास किया था। अफ़सोस कि वे सवाल आज भी सर उठाये वैसे ही खड़े हैं।
मैं ग्राम घोघल आँवा, खंडवा, मध्यप्रदेश और जल आन्दोलन के आसपास के क्षेत्रों के डॉक्टरों से अपील करता हूँ कि ग्रुप बना कर वहाँ पहुँचें और आन्दोलनकारियों की चिकित्सा करने के साथ ही उन्हें समझायें कि वे देह की हानि करने की सीमा तक न जायें। आन्दोलन क्रमिक करें। दैहिक क्षति के बाद तो अपना भी सहारा नहीं रहेगा। - गिरिजेश राव
कई दिनों से पानी में आकंठ डूबे घोघलवासियों की इन तस्वीरों से आप व्यथित हुए हैं तो क्षमाप्रार्थी हूँ पर सभी पढने वालों से अनुरोध है कि इस समस्या का मानवीय हल निकालने के लिये जो कुछ भी आपके बस में हो करने का प्रयास कीजिये। जीवन बहुमूल्य है, वह व्यर्थ नहीं जाना चाहिये।


[आभार: इस पोस्ट के सभी चित्र विभिन्न समाचार स्रोतों से लिये गये हैं।]

10 सितम्बर 2012 अपडेट:
17-18 दिन से जल सत्याग्रह कर रहे लोगों के आगे झुकते हुए राज्य सरकार ने नर्मदा नदी पर बने ओंकारेश्वर बांध के जलस्तर को पहले की तरह 189 मीटर ही बनाये रखने की मांग मान ली है और जल-प्लावन प्रभावित लोगों की समस्याओं के निराकरण के लिये एक पाच सदस्यीय समिति बनाई है।
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* सम्बन्धित कड़ियाँ *
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मैजस्टिक मूंछें
नायकत्व ११ सितम्बर के बहाने
बांधों को तोड़ दो
जल सत्याग्रहियों के आगे झुकी सरकार

Saturday, September 1, 2012

दिल यूँ ही पिघलते हैं - कविता

(अनुराग शर्मा)

बर्ग वार्ता - पिट्सबर्ग की एक खिड़की
जो आग पे चलते हैं
वे पाँव तो जलते हैं

कितना भी रोको पर
अरमान मचलते हैं

युग बीते हैं पर लोग
न तनिक बदलते हैं

श्वान दूध पर लाल
गुदड़ी में पलते हैं

हालात पे दुनिया के
दिल यूँ ही पिघलते हैं

इंसाँ का भाग्य बली
अपने ही छलते हैं

पत्थर मारो फिर भी
ये वृक्ष तो फलते हैं

शिखरों के आगे तो
पर्वत भी ढलते हैं

मेरे कर्म मेरे साथी
टाले से न टलते हैं

* सम्बन्धित कड़ियाँ *
हिन्दी कवितायें

Saturday, August 11, 2012

वैजयंती, मेरे आंगन की - हरे कृष्णा!

वैजयंती की मुस्कान
* गवेधुक - वैजयन्ती माला *
(चित्र व परिचय: अनुराग शर्मा)

प्रसिद्ध अभिनेत्री और नृत्यांगना वैजयंतीमाला बाली लोक सभा सांसद रह चुकी हैं| वैजयंती माला का जन्म 13 अगस्त 1936 को मैसूर के एक आयंगर परिवार में हुआ। वे गॉल्फ़ की खिलाड़ी हैं और आज भी भरतनाट्यम का नियमित अभ्यास करती हैं| उनका विवाह डॉ. चमन लाल बाली के साथ हुआ। उन्हें जन्मदिन की अग्रिम शुभकामनायें!

प्राकृतिक मोती - वैजयंती के बीज
जन्माष्टमी आकर गई ही है। पूरा देश कृष्णमय हो रहा है। भगवान श्रीकृष्ण का वर्णन आने पर मयूरपंख और वैजयंती माला का ज़िक्र आना भी स्वाभाविक है। आज की इस पोस्ट का विषय भी यही दूसरी वाली वैजयंती माला है। भारतीय ग्रंथों के अनुसार यह वैजयंतीमाला श्रीकृष्ण के सीने पर सुशोभित होती है। शुभ्र श्वेत से लेकर श्यामल तक लगभग पाँच रंगों में उपलब्ध इसके मोती जैसे बीज प्राकृतिक रूप से ही छिदे हुए होते हैं और बिना सुई के ही माला में पिरोये जा सकते हैं। इसकी राखी और ब्रेसलैट आदि भी आसानी से बनाये जा सकते हैं। वैजयंती के पौधे का वैज्ञानिक नाम Coix lacryma-jobi है। संस्कृत में इसका एक नाम गवेधुक भी है। इसे अंग्रेज़ी में जॉब्स टीयर्स (job's tears) भी कहते हैं। चीनी में चुआंगू और जापानी में हातोमूगी के नाम से जाना जाता है। इसके मोती/बीज/दाने अमेरिका में चीनी किराने की दुकानों के साथ-साथ ऐमेज़ोन डॉट कॉम पर सरलता से उपलब्ध है जबकि भारत में भोज्य पदार्थ, सौन्दर्यबोध या पूजा सामग्री सभी प्रकार से हमारी परम्परा के अनेक अंगों की भांति यह पौधा भी उपेक्षित रह गया है।

गवेधुक के मोती जैसे फल वाला जंगली पौधा
ऐसा माना जाता है कि चावल के स्थान पर वैजयंती खाने से शरीर के कॉलेस्टरॉल में - विशेषकर बुरे कॉलेस्टरॉल में -कमी आती है। परंतु यह धारणा भी है कि यह दवाओं के साथ - विशेषकर डायबिटीज़ में - विचित्र व्यवहार कर सकता है। वैसे भी किसी भी दवा के सेवन के समय भोज्य पदार्थों के बारे में विशिष्ट सावधानी रखने की सलाह दी जाती है। वैजयंती एक जिजीविषा भरा पौधा है जो भारत के समस्त मैदानी क्षेत्रों में आराम से उग आता है। कीड़े-बीमारियों आदि से नैसर्गिक रूप से सुरक्षित वैजयंती के बीज हिन्द-चीन क्षेत्र के अनेक देशों में भोजन के लिये आटे के रूप में या चावल के विकल्प के रूप में खाये जाते हैं। कोरिया और चीन में इसके पेय और मदिरा भी बनाई जाती है। जापान में इसका सिरका और थाइलैंड में चाय भी बनती है। आश्चर्य नहीं कि यह पौधा भारतीय खेतों में अपने आप उग आता हो और अज्ञानवश खरपतवार समझकर उखाड़ दिया जाता हो। वैजयंती के बीज आरम्भ में धवल और नर्म होते हैं। कच्चे बीज को आसानी से छीला जा सकता है। पकने के साथ ही यह कड़े और स्निग्ध होते जाते है।

यह खर-पतवार वैजयंती नहीं है
वैसे पूजा सामग्री आदि बेचने वाले कुछ उद्यमी पहले से ही वैजयंती माला बेचते रहे हैं। लेकिन पिछले दिनों से वास्तु और ज्योतिष के फ़ैशन में आने के बाद से जहाँ रत्न आदि के व्यापार में उछाल आया है वहाँ वैजयंती माला के चित्र भी इंटरनैट पर दिखने लगे हैं। (वैजयंती माला का एक चित्र यहाँ देखा जा सकता है।) इन आधुनिक घटनाओं से इतर बहुत से भारतीय घरों में वैजयंती के पौधे लम्बे समय से लगे हैं। मेरे परिवार के कुछ घरों में भी ये पौधे हैं और उसके बीज (मोती या दाने) मेरे पास पिट्सबर्ग में भी रहे हैं। लेकिन सामान्यजन में इसकी जानकारी कम है। कई वर्ष पहले अंतर्जाल पर शायद किसी वैज्ञानिक पहेली में भी केलि के पौधे को वैजयंती बताया जा रहा था।

केलि (कैना लिली) भी वैजयंती नहीं है - यह चित्र गिरिजेश राव द्वारा
लेकिन इस बार जब एक आत्मीय की फ़ेसबुक वाल पर केलि के लिये वैजयंती नाम देखा तो पहचान के इस भ्रम पर रोशनी डालने के लिये वैजयंती पर लिखने का मन किया। लगता है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ क्षेत्रों में केलि के पौधे (कैना लिली) को किसी भ्रमवश वैजयंती समझा जा रहा है। इसके फूलों के तो हार भी बनते नहीं देखे, माला - वह भी वैजयंती - बनने की तो सम्भावना ही नहीं दिखती। पेड़-पौधों व पशु-पक्षियों के नामों के विषय में आलस अवाँछनीय होते हुए भी भारत में सामान्य है। ऐसे अज्ञान को बढावा देकर हम अन्जाने ही अपनी विरासत से दूर होते जा रहे हैं। सोमवल्ली जैसे पौधों की पहचान तो आज असम्भव सी दिखती है। ऐसे में ज़रूरत है कि भ्रम को बढावा देने से बचा जाये और जहाँ कहीं, जितनी बहुत पहचान बाकी रह गयी है उसे बचाया जाये।

गवेधुक, वैजयंती, जॉब्स टीयर्स - कितने नाम!
जब वैजयंती (या गवेधुक) पर लिखने की सोची तो यूँ ही मन में आया कि एक पौधा पिट्सबर्ग में उगाकर भी देखा जाये। कई गमलों में बीज लगाने के बाद उनमें से एक में घास-फूस जैसा जो कुछ भी उगा उसे उगने दिया। एक महीने में ही वैजयंती का पौधा अपनी अलग पहचान बताने लायक बड़ा हो गया है। यहाँ प्रस्तुत चित्र उसी पौधे का है। यह पौधा कुश घास जैसा दिखता है और मोती आने से पहले इसे ठीक से पहचान पाना या सामान्य घास से अलग कर पाना कठिन है। घास जैसे पौधों पर गिरिजेश ने पिछले वर्ष एक बहुत बढिया आलेख लिखा था, यदि आप फिर से पढना चाहें तो उसका लिंक इस आलेख के नीचे दिया गया है। आभार!

वैजयंती घास का सौन्दर्य
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"नहीं! वह सपना नहीं हो सकता।" देवकी ने कहा, "वह यहीं था, मेरे पास। मेरी नासिका में अभी तक उसकी वैजयंती माला के पुष्पों की गंध है। मेरे कानों में उसकी बाँसुरी के स्वर हैं। उसने छुआ भी था मुझे ..."

"तो तुम्हारा कृष्ण वंशी बजाता है?'' वसुदेव हँस पड़े, ''तुम्हें किसने बताया कि वह वंशी बजाता है? यादवों का राजकुमार वंशी बजाता है। वह ग्वाला है या चरवाहा कि वंशी बजाता है। तुमने कब देखा कि वह वैजयंती माला धारण करता है?"
[डॉ नरेंद्र कोहली के उपन्यास वसुदेव से एक अंश - लगता है नरेंद्र कोहली भी वैजयंती-माला को किसी खुशबूदार फूल का हार ही मान रहे हैं]
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आप सभी को कृष्ण जन्माष्टमी पर्व की हार्दिक बधाई!
सम्बन्धित कड़ियाँ *
* वैजयंती - विकीपीडिया
* कास, कुश, खस, दर्भ, दूब, बाँस के फूल और कुछ मनबढ़

Wednesday, August 8, 2012

दिल है सोने का, सोने की आशा

एमसी मेरीकॉम
अपनी श्रेणी में कई बार विश्वविजेता रहीं मणिपुर की मैरीकॉम से भारत को बड़ी उम्मीदें थीं। काँस्य लाकर भी उन्होंने देश को गर्व का एक अवसर तो दिया ही है साथ ही एक बार यह सोचने को बाध्य किया है कि ओलिम्पिक स्वर्ण पाने के लिये विश्वविजेता होना भर काफ़ी नहीं है। कुछ और भी चाहिये। वह क्या है? आम भारतीयों के बीच आपसी सहयोग और सहनशीलता का रिकॉर्ड देखते हुए दल के रूप में खेले जाने वाले खेलों में तो भारत को अधिक उम्मीद लगाना शायद बचपना ही होगा। लेकिन कम से कम अपनी खुद की ज़िम्मेदारी ले सकने वाली व्यक्तिगत स्पर्धाओं में भारतीयों के चमकने के अवसर बनाये जा सकते हैं। तैराकी जैसे खेलों में तो तकनीक की भूमिका इतनी अधिक है कि भारत जैसे अव्यवस्थित देश को अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचने के लिये यात्रा बहुत लम्बी है। हाँ, तीरन्दाज़ी, निशानेबाज़ी, भारोत्तोलन, कुश्ती, मुक्केबाज़ी आदि खेलों के लिये हमारे पास सक्षम खिलाड़ियों की कमी होनी नहीं चाहिये। फिर कमी कहाँ है? शायद हर जगह। खिलाड़ियों के चुनाव, प्रशिक्षण, सुविधायें, पोषण, चिकित्सा, प्रतिस्पर्धाओं से लेकर धन, आत्मविश्वास, राजनीति, और नीति-क्रियान्वयन तक हर जगह सुधार की बड़ी गुंजाइश है।

मैरीकॉम एक-दो बार नहीं पाँच बार (2002, 2005, 2006, 2008 और 2010) विश्व चैम्पियन रह चुकी हैं। लेकिन उन्होंने ये सभी स्वर्ण पदक 46 और 48 किलो की श्रेणियों में जीते है। वर्तमान ओलंपिक स्पर्धाओं में यह भार वर्ग है ही नहीं। यदि उन्हें खेलना होता तो अर्हता के लिये अपना भार बढाकर 51 किलो करना पड़ता जिससे वे फ्लाईवेट श्रेणी में भाग लेने की पात्र बनतीं। उन्होंने यही किया। मुझे नहीं पता कि उन्हें यह जानकारी कब मिली और अपना भार 10% बढाने के लिये उन्हें कितना समय और सहायता मिली। लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह निर्णय लेने का मतलब है कि इस बार उनका सामना अपनी नियत श्रेणी से अगली श्रेणी के और अधिक भारी वर्ग के प्रतियोगियों से था जो कि उनकी स्पर्धा को और कठिन करता है। भविष्य में ऐसी चुनौतियों को देख पाने और बेहतर हैंडल करने की सुनियोजित रणनीति आवश्यक है।

दीपिका कुमारी
तीरंदाजी प्रतिस्पर्धा में झारखंड की 18 वर्षीय दीपिका कुमारी की कहानी इतनी मधुर नहीं रही। धनुर्विद्या में प्रथम सीडेड दीपिका को लंदन ओलम्पिक से खाली हाथ आना पड़ा यह खबर शायद उतनी खास नहीं है जितनी यह कि झारखंड के उप मुख्यमंत्री उनका प्रदर्शन देखने के लिये पाँच अन्य व्यक्तियों के साथ आठ दिन तक ब्रिटेन की यात्रा पर थे। एक ऑटो रिक्शा चालक शिव नारायण महतो की बेटी पेड़ों से आम तोड़ने के लिये घर पर बनाये तीर कमान से अपनी यात्रा आरम्भ करके प्रथम सीड तक पहुँच पाती है लेकिन उसका खेल "देखने" के लिये मंत्री जी की विदेश यात्रा से देश की खेल प्राथमिकतायें तो ज़ाहिर होती ही हैं।

एक अन्य स्पर्धा में अमेरिकी टीम द्वारा अपील करने पर पहले विजयी घोषित किये गये भारतीय खिलाड़ी को फ़ाउल्स के आधार पर हारा घोषित किया गया। भारतीय स्रोतों से कहा जा रहा है कि प्रतिद्वन्द्वी अमेरिकी खिलाड़ी ने भी बिल्कुल वही ग़लतियाँ की थीं। यदि यह बात सच है तब हमारे अधिकारी शायद अपना पक्ष सामने रखने में पीछे रह गये। स्पष्ट है कि खिलाड़ियों को खेल सिखाने के साथ अधिकारियों को अपील आदि के नियम सिखाना भी ओलम्पिक की तैयारी का ज़रूरी भाग होना चाहिये।

मिन क्षिया
खेलों में चीन की प्रगति के बारे में काफ़ी चर्चा होती है। 2004 में एथेंस और 2008 में बीजिंग में स्वर्ण जीतने के बाद 26 वर्षीया मिनक्षिया जब लंडन में गोताखोरी का स्वर्ण जीत चुकी तब उसके परिवार ने उसे खबर दी कि उसके दादा और दादी गुज़र चुके हैं तथा उसकी माँ पिछले आठ वर्षों से कैंसर का इलाज करा रही है। चीन के कड़े नियमों में जहाँ किसी परिवार को दूसरा बच्चा पैदा करने की आज्ञा भी नहीं है, किसी खिलाड़ी को ओलम्पिक स्पर्धा से पहले पारिवारिक हानि के समाचार सुनाना शायद खतरे से खाली नहीं होगा। यह घटना कितनी भी अमानवीय लगे यहाँ उल्लेख करने का अभिप्राय केवल यही दर्शाना है कि कुछ देशों के लिये अपने राष्ट्रीय गौरव के सामने नागरिकों के मानवीय अधिकारों को कुचलना सामान्य सी बात है। हमें चीन के स्तर तक गिरने की ज़रूरत नहीं लेकिन उससे पहले भी इतना कुछ है करने के लिये कि यदि हो जाये तो अनेक स्पर्धाओं - विशेषकर व्यक्तिगत - के पदक हमारी झोली में आ सकते हैं। वह दिन जल्दी ही आये, इंतज़ार है। शुभकामनायें!

[The images in this post have been taken from various news sources on Internet.]

Sunday, August 5, 2012

बलवानों को दे दे ज्ञान - इस्पात नगरी से [59]

हर रविवार की तरह जब आज सुबह भारतीय समुदाय के लोग ओक क्रीक, विस्कॉंसिन के गुरुद्वारे में इकट्ठे हुए तब उन्होंने सोचा भी नहीं था कि वहाँ कैसी मार्मिक घटना होने वाली थी। अभी तक जितनी जानकारी है उसके अनुसार गोरे रंग और लम्बे-चौडे शरीर वाले एक चालीस वर्षीय व्यक्ति ने गोलियाँ चलाकर गुरुद्वारे के बाहर चार और भीतर तीन लोगों की हत्या कर दी। इस घटना में कई अन्य लोग घायल हुए हैं। सहायता सेवा पर आये फ़ोन कॉल के बाद गुरुद्वारे पहुँचने वाले पहले पुलिस अधिकारी को दस गोलियाँ लगीं और वह अभी भी शल्य कक्ष में है। बाद में हत्यारा भी पुलिस अधिकारियों की गोली से मारा गया।

सरकार ने इस घृणा अपराध घटना को आंतरिक आतंकवाद माना है और इस कारण से इस मामले की जाँच स्थानीय पुलिस के साथ-साथ आतंकवाद निरोधी बल (ATF) और केन्द्रीय जाँच ब्यूरो (FBI) भी कर रहे हैं। हत्यारे के बारे में आधिकारिक जानकारी अभी तक जारी नहीं की गई है मगर पुलिस ने जिस अपार्टमेंट को सील कर जाँच की है उसके आधार पर एक महिला ने हत्यारे को वर्तमान निवास से पहले अपने बेटे के घर में किराये पर रहा हुआ बताया है। इस महिला के अनुसार हाल ही में इस व्यक्ति का अपनी महिला मित्र से सम्बन्ध-विच्छेद भी हुआ था।

यह घटना सचमुच दर्दनाक है। मेरी सम्वेदनायें मृतकों और घायलों के साथ हैं। दुख इस बात का है कि अमेरिका में हिंसा बढती दिख रही है। कुछ ही दिन पहले एक नई फ़िल्म के रिलीज़ के पहले दिन ही एक व्यक्ति ने सिनेमा हॉल में घुसकर सामूहिक हत्यायें की थीं। कुछ समय और पहले ठीक यहीं पिट्सबर्ग के मनोरोग चिकित्सालय में घुसकर एक व्यक्ति ने वैसा ही कुकृत्य किया था। हिंसा बढने के कारणों की खोज हो तो शायद हर घटना के बाद कुछ नई जानकारी सामने आये लेकिन एक बात तो पक्की है। वह है अमेरिका का हथियार कानून।

अधिकांश अमेरिकी आज भी बन्दूक खरीदने के अधिकार को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़कर देखते हैं। सामान्य पिस्तौल या रिवॉल्वर ही नहीं बल्कि अत्यधिक मारक क्षमता वाले अति शक्तिशाली हथियार भी आसानी से उपलब्ध हैं और अधिकांश राज्यों में कोई भी उन्हें खरीद सकता है। दुःख की बात यह है कि हथियार लॉबी कुछ इस प्रकार का प्रचार करती है मानो इस प्रकार की घटनाओं का कारण समाज में अधिक हथियार न होना हो। वर्जीनिया टेक विद्यालय की गोलीबारी की घटना के बाद हुई लम्बी वार्ता में एक सहकर्मी इस बात पर डटा रहा कि यदि उस घटना के समय अन्य लोगों के पास हथियार होते तो कम लोग मरते। वह यह बात समझ ही नहीं सका कि यदि हत्यारे को बन्दूक सुलभ न होती तो घटना घटती ही नहीं, घात की कमी-बेशी तो बाद की बात है।

आज की इस घटना ने मुझे डॉ. गोर्डन हडसन (Dr. Gordon Hodson) के नेतृत्व में हुए उस अध्ययन की याद दिलाई जिसमें रंगभेद, जातिवाद, कट्टरपन और पूर्वाग्रह आदि का सम्बन्ध बुद्धि सूचकांक (IQ) से जोड़ा गया था। यह अध्ययन साइकॉलॉजिकल साइंस में छपा है और इसका सार निःशुल्क उपलब्ध है। ब्रिटेन भर से इकट्ठे किये गये आँकड़ों में से 15,874 बच्चों के बुद्धि सूचकांक का अध्ययन करने के बाद मनोवैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि कम बुद्धि सूचकांक वाले बच्चे बड़े होकर भेदभाव और कट्टरता अपनाने में अपने अधिक बुद्धिमान साथियों से आगे रहते हैं। अमेरिकी आँकड़ों पर आधारित एक अध्ययन में कम बुद्धि सूचकांक और पूर्वाग्रहों का निकट सम्बन्ध पाया गया है। इसी प्रकार निम्न बुद्धि सूचकांक वाले बच्चे बड़े होकर नियंत्रणवाद, कठोर अनुशासन और तानाशाही आदि में अधिक विश्वास करते हुए पाये गये।

तमसो मा ज्योतिर्गमय ...
इस अध्ययन का निष्कर्ष है कि बेहतर समझ पूर्वाग्रहों का बेहतर इलाज कर सकती है। वर्जीनिया विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक डॉ. ब्रायन नोसेक (Dr. Brian Nosek) का कहना है कि अधिक बुद्धिमता तर्कों की असंगतता को स्वीकार कर सकती है जबकि कम बुद्धि के लिये यह कठिन है, उसके लिये तो कोई एक वाद या विचारधारा जैसे सरल साधन को अपना लेना ही आसान साधन है।

बुद्धि के विस्तार और व्यक्ति, वाद, मज़हब, क्षेत्र आदि की सीमाओं से मुक्ति के सम्बन्ध के बारे में मेरा अपना नज़रिया भी लगभग यही है। बुद्धि हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर सतत निर्देशित करती रहती है। पूर्वाग्रहों से बचने के लिये अपने अंतर का प्रकाशस्रोत लगातार प्रज्ज्वलित रखना होगा। सवाल यह है कि ऐसा हो कैसे? बहुजन में बेहतर समझ कैसे पैदा की जाय? सब लोग नैसर्गिक रूप से एक से कुशाग्रबुद्धि तो हो नहीं सकते। तब अनेकता में एकता कैसे लाई जाये, संज्ञानात्मक मतभेद (Cognitive dissonance) के साथ रहना कैसे हो? मुझे तो यही लगता है कि स्वतंत्र वातावरण में पले बढे बच्चे नैसर्गिक रूप से स्वतंत्र विचारधारा की ओर उन्मुख होते हैं जबकि नियंत्रण और भय से जकड़े वातावरण में परवरिश पाये बच्चों को बड़े होने के बाद भी मतैक्य, कट्टरता, तानाशाही ही स्वाभाविक आचरण लगते हैं। इसलिये हमारा कर्तव्य बनता है कि बच्चों को वैविध्य की खूबसूरती और सुखी मानवता के लिये सहिष्णुता की आवश्यकता के बारे में विशेष रूप से अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करें। इस विषय पर आपके विचार और अनुभव जानने की इच्छा है।
सम्बन्धित कड़ियाँ
* गुरुद्वारा गोलीबारी में सात मृत
* अमेरिका में आग्नेयास्त्र हिंसा
* प्रकाशित मन और तामसिक अभिरुचि
* इस्पात नगरी से - श्रृंखला
अहिसा परमो धर्मः
संगच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्‌।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥ (ऋग्वेद 12.191.4)