Saturday, September 1, 2012

दिल यूँ ही पिघलते हैं - कविता

(अनुराग शर्मा)

बर्ग वार्ता - पिट्सबर्ग की एक खिड़की
जो आग पे चलते हैं
वे पाँव तो जलते हैं

कितना भी रोको पर
अरमान मचलते हैं

युग बीते हैं पर लोग
न तनिक बदलते हैं

श्वान दूध पर लाल
गुदड़ी में पलते हैं

हालात पे दुनिया के
दिल यूँ ही पिघलते हैं

इंसाँ का भाग्य बली
अपने ही छलते हैं

पत्थर मारो फिर भी
ये वृक्ष तो फलते हैं

शिखरों के आगे तो
पर्वत भी ढलते हैं

मेरे कर्म मेरे साथी
टाले से न टलते हैं

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40 comments:

  1. जो आग पे चलते हैं
    वे पाँव तो जलते हैं

    क्या खूब लिखते हो, बड़े प्यारे लगते हो ( वाकई )
    नज़र ना लग जाए :))

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  2. पत्थर मारो फिर भी
    ये वृक्ष तो फलते हैं

    ये हुई ना काम की बात .
    bahut badhiya ghazal .

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  3. वैलकम है जी, पिट्सबर्गीय खिड़की बहुत दिनों के बाद खुली :)

    जो आग पे चलते हैं
    वे पाँव तो जलते हैं
    हमेशा की तरह नपे तुले शब्दों में जानदार जज़्बात, वाह-वाह!!

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  4. "Apne hi chhalte hain"Jaisi anubhootiyan aapke dil me bhi agar aane lageen,to suraksha ki avdharna hi duniya se mit jayegi- "ye baat kahen fir se, ham kanon ko malte hain "

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    1. प्रबोध जी,
      :) बात वही है, अब ज़रा उसी बात को कवि के कबीरी/फ़क़ीरी अंदाज़ में एक बार फिर देखिये
      उस आँख में बस मेरे सपने ही पलते हैं
      सब अपने हैं उसके, वे भी जो छलते हैं

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    2. vaah - क्या कविता है, क्या प्रश्न है और क्या समाधान है | प्रणाम स्मार्ट जी आपको ....

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  5. ब्लॉगजगत की सैर को आजकल
    हम कुछ कम ही निकलते हैं

    इस आलस को लानत है जो
    ऐसे नगीने हाथ से फिसलते हैं

    तबीयत खुश हुई आज यहाँ आकर
    वर्ना इधर से उधर हाथ ही मलते हैं

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  6. जो आग पे चलते हैं
    वे पाँव तो जलते हैं

    ..बेहतरीन!

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  7. क्या खूब लिखा है..वाह..

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  8. @युग बीते हैं ये लोग
    न तनिक बदलते हैं


    जी सही बात है .... ये तनिक भी नहीं बदले...


    साधुवाद... सुंदर कविता के लिए.

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  9. बिलकुल सही कहा आपने .........मेरे कर्म मेरे साथी
    टाले से न टलते हैं

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  10. कम शब्दों में बहुत कहा,
    लय में मन इस बार बहा।

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  11. वाह...
    बहुत बढ़िया....बड़े इन्तेज़ार के बाद...

    अबके वादा करिये
    बिना ब्रेक के मिलते हैं :-)

    अनु

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  12. लफ़्ज़ों की किफायत और मानी की गहराई, बस आपकी कविता में ही दिखाई देती है!!

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  13. पत्थर मारो फिर भी
    ये वृक्ष तो फलते हैं

    इंसाँ का भाग्य बली
    अपने ही छलते हैं

    बेहतरीन पंक्तियाँ.....

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  14. इन्सान का भाग्य बली , अपने ही छलते हैं !
    तुक और सुर सब में धनी !

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  15. बहुत सुंदर !
    पर
    पाँव को अपने कभी समझाया भी करें
    फायर प्रूफ जूते दे कर के जाया करें !

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  16. 'शिखरों के आगे तो
    पर्वत भी ढलते हैं '
    - शिखर के आगे ढलान का क्रम है ,पर ऐसे शिखर कहाँ मिलते हैं !

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  17. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज रविवार (02-09-2012) के चर्चा मंच पर भी की गयी है!
    सूचनार्थ!

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  18. छोटी बहर की ये ग़ज़ल काबिले तारीफ है बहुत पसंद आई

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  19. इंसाँ का भाग्य बली
    अपने ही छलते हैं ..

    छोटी बहर में आपसे
    कमाल के शेर निकलते हैं ... मज़ा आ गया ...

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  20. गागर में सागर । सुन्दर

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  21. पत्थर मारो फिर भी
    ये वृक्ष तो फलते हैं

    इंसाँ का भाग्य बली
    अपने ही छलते हैं

    शिखरों के आगे तो
    पर्वत भी ढलते हैं

    मेरे कर्म मेरे साथी
    टाले से न टलते हैं
    सभी लाइन मन के भाव को पूर्णतः व्यक्त करते हैं . कम शब्दों में अपनी पूरी बात कहने में समर्थ

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  22. हालात पे दुनिया के
    दिल यूँ ही पिघलते हैं



    नीरज भैया क्या बताऊ ये आपके सेर नहीं |

    ये नन्हे शावक बड़े भले लगते है

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  23. बहुत खूब ! अंत की सकारात्मकता अच्छी लगी...

    शिखरों के आगे तो
    पर्वत भी ढलते हैं

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  24. हमने देखी दुनिया
    अपने कम मिलते हैं !


    ...बढ़िया रचना !

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  25. एक कदम तो चलो
    भगवान मिलते है !
    एकसे एक पंक्ति सुंदर ....

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  26. उचित शब्द, उचित बात।

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  27. प्यारी,छोटी सी सुन्दर रचना बधाई

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  28. पत्थर मारो फिर भी
    ये वृक्ष तो फलते हैं
    SAHI KAHA AAPNE sunder bhav
    rachana

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  29. यथार्थ का चित्रण!!
    इंसाँ का भाग्य बली
    अपने ही छलते हैं

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  30. शिखरों के आगे तो
    पर्वत भी ढलते हैं

    मेरे कर्म मेरे साथी
    टाले से न टलते हैं

    बहुत सुंदर ...

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  31. अनुराग जी, बहुत ही शानदार कविता.. खासकर शुरुवाती पंक्तियाँ तो दिल बाग़ बाग़ कर गईं...
    जो आग पे चलते हैं
    वे पाँव तो जलते हैं

    कितना भी रोको पर
    अरमान मचलते हैं

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  32. किफायती कविता करते हैं आप.. लाजवाब से छोटा कोई शब्द?

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  33. भोग के रस्ते पर गुजर कर ही हम निखरते हैं..

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  34. मेरे कर्म मेरे साथी
    टाले से न टलते हैं

    वाह जी.
    बहुत पते की बातें
    सरलता से कह दी हैं आपने.

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