Wednesday, December 31, 2008

नव वर्ष का संकल्प

मित्रों,
बातों ही बातों में पुराना साल कब निकल गया, पता ही न चला। देखते-देखते हम नव-वर्ष की पूर्व संध्या पर आ पहुंचे हैं. २००८ में मैंने एक कविता लिखी थी "कितना खोया कितना पाया।" दुहराव के डर से उसे यहाँ फ़िर से पोस्ट नहीं करूंगा। परन्तु उत्सुक जन कविता के शीर्षक पर क्लिक कर के उसे पढ़ सकते हैं।

गत वर्ष में बहुत कुछ हुआ - हमने कोसी की विनाशलीला भी देखी और पाकिस्तान से आए हैवानी आतंकवादियों की २६ नवम्बर की कारगुजारी भी, कश्मीर में आतंकवादियों की धमकियों और बयानबाजी का मुँहतोड़ जवाब देते हुए लोगों का शांतिपूर्ण मतदान भी देखा और चंद्रयान का सफल प्रक्षेपण भी। और भी बहुत कुछ दिया है इस साल ने। मैं बूढा तो भूल जाता हूँ, आप तो युवा हैं सब याद रखते हैं।

नए साल की पूर्व-संध्या पर कुछ संकल्प लेने की परम्परा सी बन गयी है। पहले तो मुझे यह बात समझ में नहीं आती थी लेकिन अब कुछ-कुछ समझने लगा हूँ। यदि संकल्प लेना ही है तो खुश रहने और अपने को बेहतर बनाने का संकल्प लेना पसंद करूंगा। २००८ में हिन्दी ब्लोगिंग शुरू की और बहुत से नए मित्रों से मिला जिनके साथ और कृपा से मेरा विकास ही होना है। क्या पता मेरा २००८ का ब्लॉग लिखना २००९ में पुस्तक लेखन में ही बदल जाए।

जिन लोगों ने कभी नए साल का संकल्प नहीं लिया या फ़िर कोई नई तरह का संकल्प लेना चाहते हैं, उनके लिए अपने अनुभव से निचोड कर कुछ सुझाव रखना चाहता हूँ।

कुछ ऐसा करिए जिससे आप में और समाज में एक सकारात्मक परिवर्तन आए। कोई भी उम्र कम नहीं होती है। झांसी की रानी हों या भगत सिंह, उन्हें जीवन में इतने बड़े काम करने के लिए ३० साल का भी नहीं होना पडा था। जिन तांतिया टोपे के नाम से दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्य काँप रहा था। माना जाता है कि उन्हें दो बार फांसी दी गयी थी। अपने बलिदान के समय वे १८५७ के संग्राम के युवा नायकों में सबसे बड़े थे - ३९ वर्ष के।

कोई भी पद कम नहीं है, कोई भी काम छोटा नहीं है। अंग्रेजी फौज में एक मामूली सिपाही के पद पर काम करने वाले मंगल पांडे ने चर्बी वाले कारतूस को अपने दांत से छूने नहीं दिया। बन्दा शहीद हो गया मगर उसकी फांसी के साथ ही मुगलों, मराठों को हराने वाली "ईस्ट इंडिया कंपनी" का कभी न डूबने वाला सूरज हमेशा के लिए डूब गया।

सतही तौर पर ऐसा लगता है कि लेना आसान है मगर देना उससे भी आसान है। अगर सत्कार्य में देने को पैसा नहीं है तो समय दीजिये। और कोई दान नहीं तो रक्त-दान कीजिये। २००८ में हमारे एक बुजुर्ग का देहांत हुआ, उन्होंने अपनी आँखें दान कीं जिससे दो बच्चों को रोशनी मिली।

हम अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखें। हो सके तो तैराकी या घुड़सवारी सीखें। जिम नहीं जा सकते तो घर में योगासन शुरू करें। इस साल के वृक्षारोपण में लगाए किसी सूख रहे पौधे को थोडा पानी देकर जमने लायक बना दें। बहुत दिनों से खोये हुए किसी पुराने मित्र को अचानक मिलकर आश्चर्यचकित कर दें, किसी चाय वाले छोटू को शतरंज खेलना सिखाये या काम-वाली बाई के बेटे-बेटी की एक साल की कापी-किताबों का इंतजाम कर दें। जिस दिन भी शुरू करेंगे, आपको पता लगेगा कि एक छोटी सी शुरूआत से ही बड़े बड़े काम होते हैं:
बात तो आपकी सही है यह थोड़ा करने से सब नहीं होता
फिर भी इतना तो मैं कहूंगा ही कुछ न करने से कुछ नहीं होता


लिखने को बहुत कुछ है मगर बातें तो होती ही रहेंगी, कहीं भूल न जाऊं इसलिए आज बस इतना ही कहता हूँ:
आपको, आपके परिवारजनों और मित्रों को नव-वर्ष की शुभकामनाएं!

Saturday, December 27, 2008

संता क्लाज़ और दंत परी [इस्पात नगरी ४]

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पिट्सबर्ग पर यह शृंखला मेरे वर्तमान निवास स्थल से आपका परिचय कराने का एक प्रयास है। संवेदनशील लोगों के लिए यहाँ रहने का अनुभव भारत के विभिन्न अंचलों में बिताये हुए क्षणों से एकदम अलग हो सकता है। कोशिश करूंगा कि समानताओं और विभिन्नताओं को उनके सही परिप्रेक्ष्य में ईमानदारी से प्रस्तुत कर सकूं। आपके प्रश्नों के उत्तर देते रहने का हर-सम्भव प्रयत्न करूंगा, यदि कहीं कुछ छूट जाए तो कृपया बेधड़क याद दिला दें, धन्यवाद!
क्रिस्मस के बड़े दिन की हार्दिक शुभकामनायें!
सांता निकोलस क्लाज़
पिछली पोस्ट में मैं संता क्लाज़ के बारे में लिखना चाहता था मगर नदियों के बारे में किये गये सवाल ने थोडा सा भटका दिया, सो इस बार वह कमी पूरी कर रहा हूँ. अगले अंक से हम वापस इस्पात नगरी की सैर पर चल पड़ेंगे.

अमेरिका के बच्चों को संता क्लाज़ में बहुत विश्वास है. उन्हें दंत परी (टूथ फेरी = Tooth Fairy) में भी उतना ही विश्वास है. संता क्लाज़ तो फ़िर भी साल में एक बार ही दिखता है. दंत परी तो हर दांत टूटने पर आ जाती है और बच्चों के टूटे हुए दांत के बदले में चुपचाप कोई छोटा सा उपहार रख जाती है.

जब मेरी बेटी का पहला दूध का दांत टूटा तब उसे दंत परी के अस्तित्व पर विश्वास नहीं था और आज भी नहीं है. दंत-परी के उपहारों के लिए भी उसने दंत-परी के बजाय सदैव अपने माता-पिता को ही जिम्मेदार माना. मगर इस क्रिसमस पर उसने अपनी माँ से यह ज़रूर पूछा कि क्या पहले कभी वह संता क्लाज़ में विश्वास रखती थी. माँ को याद नहीं था सो उसने अपने कभी कुछ भी न भूलने वाले पिता से पूछा.

मैंने याद दिलाया कि जब हम उसके प्री-स्कूल के क्रिसमस समारोह में गए थे. सारे बच्चे खुश थे. उन्होंने अपनी अध्यापिकाओं के साथ क्रिसमस-गीत भी गाये. उसके बाद वहाँ संता क्लाज़ भी आ गए. सारे बच्चे उनकी तरफ़ दौडे. मेरी बेटी शायद उनको देख नहीं सकी. उसकी माँ ने बड़े उत्साह के साथ उसे दिखाया, "देखो बेटा, संता क्लाज़ आ गए." बेटी ने मुड़कर संता को ध्यान से देखा और मुस्कुराकर कहा, "मुझे पता है, वह तो बॉब है." तब हमने ध्यान से देखा और पाया कि संता की वेशभूषा में वे स्कूल के संरक्षक बॉब ही थे.

उस प्री-स्कूल की कक्षाओं की खिड़कियों में एक तरफ़ से देख सकने वाले शीशे लगे थे ताकि माता-पिता बाहर रहकर भी कक्षा के अन्दर के अपने बच्चों को देख सकें जबकि अन्दर से बच्चे बाहर का कुछ न देख पायें. अक्सर होता यह था कि मेरी पत्नी स्कूल की छुट्टी होने से पहले ही स्कूल चली जाती थी. जब भी वे कक्षा की खिड़की के बाहर खड़ी होती थीं और अगर बेटी की नज़र इत्तेफाक से खिड़की पर पड़ जाए तो वह उंगली से हवा में उनके चेहरे का रेखांकन सा करती हुई अपनी शिक्षिका से "माय मॉम!" कहती हुई बाहर आ जाती थी. यदि शिक्षिका उसकी बात पर अविश्वास करते हुए उसको पकड़कर वापस ले जाने की कोशिश करती तो वह रोना शुरू कर देती थी थी और बाहर आकर ही दम लेती थी. शिक्षिका बाहर आकर देखती तो माँ को सचमुच वहाँ खडा देखकर आश्चर्यचकित हो जाती थी.

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* सम्बन्धित कड़ियाँ *
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* एक शाम बेटी के नाम
* इस्पात नगरी से - अन्य शृंखला
* जिंगल बेल - भारतीय संस्करण - कार्टून
* क्रिस्मस के 12 दिन - कार्टून
* तेरी है ज़मीं, तेरा आसमाँ

Thursday, December 25, 2008

पिट्सबर्ग की तीन नदियाँ [इस्पात नगरी ३]

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पिट्सबर्ग पर यह नई कड़ी मेरे वर्तमान निवास स्थल से आपका परिचय कराने का एक प्रयास है। संवेदनशील लोगों के लिए यहाँ रहने का अनुभव भारत के विभिन्न अंचलों में बिताये हुए क्षणों से एकदम अलग हो सकता है। कोशिश करूंगा कि समानताओं और विभिन्नताओं को उनके सही परिप्रेक्ष्य में ईमानदारी से प्रस्तुत कर सकूं। आपके प्रश्नों के उत्तर देते रहने का हर-सम्भव प्रयत्न करूंगा, यदि कहीं कुछ छूट जाए तो कृपया बेधड़क याद दिला दें, धन्यवाद! अब तक की कड़ियाँ यहाँ उपलब्ध हैं: खंड १; खंड २

इसी श्रंखला में एक पिछली पोस्ट में आदरणीय द्विवेदी जी ने नदी के फोटो पर एक प्रश्न किया था कि क्या नगर के बीच से नदी गुज़र रही है, यदि हाँ तो क्या वह प्रदूषित नहीं होती है। आइये एक नज़र पिट्सबर्ग की नदी व्यवस्था पर डालें। मगर उससे पहले एक बात और। जब मैं भारत में था, गरमी के मौसम में हर साल राज्यों के बीच होने वाली पानी की लड़ाई के बारे में सुनता था। क्योंकि एक तो बाँध रखने वाले राज्य पड़ोसी राज्यों के लियी पानी छोड़ने में कोताही बरतते थे। दूसरे कभी-कभी पीछे से आने वाला जल इतना ज़्यादा प्रदूषित होता था कि संशोधन यंत्र उसे साफ़ करने में असमर्थ ही होता था। बाँध वाले राज्यों का तर्क होता था कि उनके बाँध में अपने राज्य की आपूर्ति के बाद सिर्फ़ कानूनी रूप से आरक्षित रखने लायक पानी ही बचता है और ऐसे में वे इस पानी को दूसरे राज्य को नहीं दे सकते। गर्मियों में पानी की ज़रूरी आपूर्ति भी न कर सकने वाले वही बाँध बरसात के मौसम में बिना चेतावनी के लाखों क्यूसेक पानी छोड़कर अगणित जिंदगियां और संसाधनों का विनाश कर देते हैं। याद है कोसी की हालिया बाढ़?

उथली नदियों को देखकर शायद आपके मन में भी विचार आता होगा कि सैकडों गाँवों को डुबाकर उनकी जगह पर ऐसे मंहगे, अक्षम और विनाशकारी बाँध बनाने के बजाय क्यों न नदियों को ही गहरा करके सदानीरा बनाया जाए। गहरी नदियाँ हमारी तंग सड़कों से यातायात का बोझ भी कम कर सकेंगी और जलापूर्ति में भी सहायक होंगी। हिमनदों के सूखते जाने के साथ यह विकल्प भविष्य के लिए और भी ज़रूरी सिद्ध होगा। मैं तो यह कहता हूँ कि देश के जल संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण एक नए सार्वजनिक उपक्रम को दिया जाए जिसके विशेषज्ञ इनके वैज्ञानिक दोहन और आपूर्ति के लिए जिम्मेदार हों। हर राज्य को ज़रूरत भर का पानी मिलने की गारंटी हो और उसके बदले में वह अनुपात रूप से राशि इस उपक्रम को दे।

यहाँ पिट्सबर्ग में अमेरिका के अन्य नगरों की तरह ही चोबीसों घंटे जल-विद्युत् की आपूर्ति है। पिट्सबर्ग तीन नदियों का नगर है। यह नदियाँ शहर के बीच से गुज़रती हैं और इसलिए यह नगर पुलों और सुरंगों से घिरा हुआ है। दो नदियाँ मोनोंगाहेला (Monongahela) व अलेघनी (Allegheny) मिलकर ओहियो नदी बनाती हैं। इस संगम को यहाँ पॉइंट कहते हैं। अब आपको एक राज़ की बात बताऊँ जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। इन दोनों नदियों के अलावा हमारी सरस्वती की ही तरह यहाँ पर एक ज़मींदोज़ नदी भी है जिसका नाम है विस्कोंसिन हिमसंहति प्रवाह (Wisconsin Glacial Flow)। यह ज़मीन के अन्दर एक से डेढ़ मील नीचे बनी एक प्राकृतिक सुरंग में बहती है और इसकी चौडाई १५ से ३५ फ़ुट तक है। ऐसी नदियों के लिए अंग्रेजी शब्द है अक्विफर (aquifer)।

तीनों नदियाँ इतनी गहरी और चौड़ी हैं कि उनमें नियमित यातायात चलता है। जिसमें छोटी नावों, पर्यटन जहाजों से लेकर कोयला और लोहा ले जाने वाले बड़े बजरे भी शामिल हैं। यहाँ तक कि स्थानीय विज्ञान केन्द्र के बाहर नदी के तट पर एक सेवानिवृत्त पनडुब्बी भी खड़ी रहती है।

पिता-पुत्री पनडुब्बी के गर्भगृह में
प्रशासन के लिए नदियों की साफ़-सफाई और सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण है। पानी की गुणवत्ता, उसके स्तर और जलचरों का अध्ययन पूरे साल चलता रहता है। नदी में नाव चलाने या मछली पकड़ने के लिए नगर से परमिट लेना आवश्यक है। नदी की अपनी पुलिस है जो कि मोटर-चालित नावों और जल-स्कूटरों में घूमती रहती है। नदी में मिलने वाले जल को स्वच्छ रखना नगर निगम और उद्योगों की जिम्मेदारी है। जल-स्रोतों को विषैला या प्रदूषित करने वालों के प्रति कड़ी कार्रवाई की जाती है। सबसे बड़ी बात है कि यहाँ के नियम पारदर्शी और सबके लिए एक समान हैं। जल-स्तर के साथ-साथ बारिश का आंकडा भी रखा जाता है और बारिश के स्तर की घाट-बढ़ के आधार पर नदी में जल होते हुए भी नगर-पालिकाएं कड़े निर्देश जारी कर देती हैं जैसे कि लान में घास पर पानी डालने पर अस्थायी प्रतिबन्ध। बारिश होने की वजह से आंकडों में परिवर्तन होते ही वह प्रतिबन्ध हटा लिया जाता है।

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सम्बन्धित कड़ियाँ
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* संता क्लाज़ की हकीकत
* इस्पात नगरी से - शृंखला
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Wednesday, December 24, 2008

क्रिसमस की शुभकामनाएं [इस्पात नगरी २]

पिट्सबर्ग पर यह नई कड़ी मेरे वर्तमान निवास स्थल से आपका परिचय कराने का एक प्रयास है। संवेदनशील लोगों के लिए यहाँ रहने का अनुभव भारत के विभिन्न अंचलों में बिताये हुए क्षणों से एकदम अलग हो सकता है। कोशिश करूंगा कि समानताओं और विभिन्नताओं को उनके सही परिप्रेक्ष्य में ईमानदारी से प्रस्तुत कर सकूं। आपके प्रश्नों के उत्तर देते रहने का हर-सम्भव प्रयत्न करूंगा, यदि कहीं कुछ छूट जाए तो कृपया बेधड़क याद दिला दें, धन्यवाद! अब तक की कड़ियाँ यहाँ उपलब्ध हैं: इस्पात नगरी - खंड १
जब यू एस स्टील ने इस्पात का ढांचा खडा किया तो भला PPG (पिट्सबर्ग प्लास्टिक एंड ग्लास) कैसे पीछे रहती. उन्होंने इमारतों का एक पूरा खंड ही बना डाला शीशे और प्लास्टिक से. हर साल क्रिसमस के मौके पर इन भवनों के बीच में एक विशाल क्रिसमस ट्री के चारों ओर एक स्केटिंग रिंक बनाया जाता है. देखिये उसकी एक झलक.

कुछ समय पहले तक माइक्रोसॉफ्ट का स्थानीय कार्यालय भी इसी खंड में होता था. इसी खंड की एक इमारत के अन्दर भी एक बड़े पेड़ के चारों ओर विश्व के अनेक देशों की क्रिसमस परम्पराओं की झलकियाँ देखने को मिलती है. हर साल, नगर भर के स्कूली बच्चों के बीच जिंजरब्रेड हाउस बनाने की प्रतियोगिता का आयोजन होता है. यह सारे जिंजरब्रेड हाउस दर्शन के लिए रखे जाते हैं और बाद में उनको विक्रय कर के प्राप्त धन जनसेवा और सत्कार्यों में प्रयुक्त होता है.

ऊपर का चित्र बच्चों द्वारा बनाए जिंजरब्रेड घरों का और नीचे के चित्र में यीशु के जन्म की झांकी.

जब मैं यह पोस्ट लिख रहा था तभी एक अमेरिकी सहकर्मी ने फ़ोन करके बताया कि वे और उनकी बेटी सैंटा क्लाज़ का पीछा कर रहे हैं और अभी-अभी उन्होंने सैंटा को भारत में घूमकर उपहार बांटते हुए देखा है. आप भी http://www.noradsanta.org/en/home.html पर जाकर देख सकते हैं कि इस समय संत निकोलस क्लाज़ जी दुनिया के किस कोने में उड़ रहे हैं और कब वे आपके घर के निकट आने वाले हैं।

[विशेष नोट: दिनेश राय द्विवेदी जी ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि सैंटा क्लाज़ का यह लिंक वाइरस बाँट रहा है। मुझे नहीं पता कि उनके इस कथन का आधार क्या है, मगर मैं इतना विश्वास से कह सकता हूँ कि इस वेबसाईट में सांझी दोनों ही कंपनियाँ अति-विश्वसनीय हैं और अगर यह लिंक वाइरस बांटने लगा तो जान लीजिये कि दुनिया की कोई भी साईट सुरक्षित नहीं है। पहली संस्था है गूगल और दूसरी है नोराड गूगल के बारे में तो आप सब जानते हैं, नोराड (North American Aerospace Defense Command) संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा का सांझा सैनिक कार्यक्रम है जो कि १९६८ में शुरू हुआ था। संता क्लाज़ का पीछा करने वाले इस लिंक के बारे में बीबीसी पर ख़बर यहाँ पढी जा सकती है: http://news.bbc.co.uk/1/hi/7792256.stm और अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया का लिंक यहाँ पर है: http://en.wikipedia.org/wiki/NORAD_Tracks_Santa , यहाँ मैं यह याद दिलाना भी ज़रूरी समझता हूँ कि कम्प्युटर और इन्टरनेट न सिर्फ़ मेरे अभ्यास का क्षेत्र हैं यह मेरा व्यवसाय भी है और उससे सम्बंधित विषयों में आप यहाँ भी और आगे भी मुझपर बेधड़क भरोसा कर सकते हैं।]
आप सभी को क्रिसमस की शुभकामनाएं!

Tuesday, December 23, 2008

मेरी खिड़की से [इस्पात नगरी १]


हमारे नीरज गोस्वामी जी को तो आप सब जानते ही हैं और उनकी कविताओं/गज़लों का आनंद उठाते ही होंगे। उन्होंने एक बार पिट्सबर्ग के बारे में लिखने का अनुरोध किया था। मैंने सोचा भी था मगर किसी न किसी बहाने से बात टलती गयी। मगर आज सोचा कि शुरूआत करता चलूँ। नीरज जी पिट्सबर्ग आ चुके हैं ऐसा उनकी एक और टिप्पणी से आभास हुआ था। उनका काम इस्पात से जुडा हुआ है इसलिए इसकी काफी संभावना है।

पिट्सबर्ग तो कोयला, इस्पात और ऐलुमिनम आदि का ही नगर हुआ करता था। एक ज़माने में यू एस स्टील का बड़ा नाम था। शहर की सबसे ऊंची इमारत का स्वामित्व यू एस स्टील का ही था। इस इमारत का स्वामित्व तो अब बदल गया है मगर उसका नाम आज भी यू एस स्टील टावर ही है और आज यू एस स्टील उसका सबसे बड़ा किरायेदार है। दूसरा सबसे बड़ा किरायेदार है यूपीएम्सी (UPMC) जो कि संयोगवश मेरा रोजगारदाता है। पिछले एक साल से मैं इसी इमारत में काम करता हूँ। दूर से यह इमारत एक भूरा-काला सा इस्पात का ढांचा नज़र आती है। मगर यह इस्पात इमारत की सरंचना का हिस्सा नहीं है। कौर-स्टील नाम का यह मिश्रधातु इमारत के चारों ओर सिर्फ़ प्रचार के लिए खडा किया गया था क्योंकि यह बर्फ-पानी से ख़राब न होने वाला यू एस स्टील का एक नया उत्पाद था।

आईये कुछ ताजे चित्रों की सहायता से देखें आजकल यह इमारत कैसी दिखती है और सत्तावनवीं मंजिल पर स्थित मेरे दफ्तर की खिड़की से नगर का दृश्य कैसा लगता है:


बर्फ से ढंका हुआ पिट्सबर्ग नगर दोपहर में एक और खिड़की से


मेरी खिड़की से भोर का दृश्य


मेरी खिड़की से सायंकाल का दृश्य

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इस्पात नगरी से - अन्य कड़ियाँ
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Sunday, December 21, 2008

क्या मतलब - कविता

मैं कौन था मैं कहाँ था, इसका अब क्या मतलब
चला कहाँ कहाँ पहुँचा, इसका अब क्या मतलब

ठिकाना दूर बनाया कि उनसे बच के रहें
कपाट तोड़ के आयें, इसका अब क्या मतलब

ज़हर भरा हो किसी के दिलो-दिमाग में गर
बस दिखावे की मुलाक़ात का अब क्या मतलब

किया क्यों खून से तर, मेरा क़त्ल किसने किया
गुज़र गया हूँ, सवालात का अब क्या मतलब

मुझे सताया मेरी लाश को तो सोने दो
मर गया तब भी खुराफात का अब क्या मतलब।

(अनुराग शर्मा)

Thursday, December 18, 2008

जूताकार की तारीफ़ में...

वैसे जूताकार जैसा कोई शब्द पहले से है या नहीं, मुझे नहीं पता। जिस तरह श्रम करने वाले कामगार होते हैं, (समाचार) पत्र में लिखने वाले पत्रकार होते हैं उसी तरह एक सम्माननीय अतिथि पर जूता फेंककर मारने वाले को जूताकार कहा जा सकता है। आजकल एक वीर-शिरोमणि जूताकार की चर्चा हर तरफ़ धड़ल्ले से हो रही है। आश्चर्य नहीं है कि उसकी तारीफ़ में कसीदे पश्चिमी सरहद के पार ज़्यादा पढ़े जा रहे है। मगर सरहद के इस तरफ़ भी तारीफ़ में कोई कमी नहीं है। तारीफ़ शायद और भी ज़्यादा होती अगर यह जूताकार महोदय जूते की जगह बम आदि फैंकने का साहस जुटा पाते। मगर साहस की कमी सिर्फ़ इराक में ही नहीं बल्कि समस्त अरब जगत में है। सच कहूं तो वहाँ डर और कमजोरी भी उतने ही इफरात में हैं जितना कि बंजर भूमि और तानाशाही। वरना ओसामा-बिन-लादेन के अरब और पाकिस्तानी जल्लादों को सउदी अरब के सुल्तानों का विरोध प्रकट करने के लिए अमेरिका की खुली हवा में रहकर, वहाँ का नमक खाकर वहीं के हजारों निर्दोष नागरिकों की हत्या करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वे लोग अपनी दुश्मनी अपनी ज़मीन पर ही निबटा सकते थे।

सच यह है कि भारत से लेकर इस्राइल तक के दो प्रजातंत्रों के बीच के भूभाग में पनप रहे अरब-ईरान-तालेबान-पाकिस्तान जैसे जनतंत्र विरोधी (और जनविरोधी) क्षेत्रों, समुदायों की जनता में अपने हत्यारे और बलात्कारी तानाशाहों का मुकाबला करने का बिल्कुल भी दम नहीं है। अगर ऐसा नहीं होता तो अपने आप में अनोखे दो जनतंत्रों से घिरा इतना बड़ा क्षेत्र किस्म-किस्म के जल्लादों द्वारा शासित नहीं होता। राजे-सुलतान-जनरल-तालेबान-आतंकवादी-मुल्ले जिसके हाथ में भी बन्दूक हो और मन में मानव जीवन के प्रति घृणा - वह यहाँ आराम से शासन कर सकता है।

उस इलाके में जूताकारों का जूता भी तब ही चल पाता है जब बुश महाशय की कृपा से लाखों निरीह मुसलमानों को गैस-चेंबर और गोलियों का निशाना बनाने वाला पिशाच सद्दाम हुसेन दोजख-नशीं हो चुका है। मेरे मन में सिर्फ़ एक ही सवाल उठता है कि कहाँ थे यह जूताकार महोदय जब सद्दाम ने उनके जैसे ५०० पत्रकारों को क़त्ल किया था? बेहतर होगा कि अपने को पत्रकार कहने वाले मौके का फायदा उठाकर नेता बनने की लालसा में जूतामार शहीद बनने के बजाय वीरगति को प्राप्त होकर (जान देकर) शहीद बनना सीखें और भारत, इस्रायल और अमेरिका जैसे लोकतंत्रों से सबक लेकर अपनी जनता को आज़ादी, इज्ज़त और दूसरे मूलभूत अधिकार देने की दिशा में काम करें। कम से कम इस सस्ती और घटिया जूतामार प्रसिद्धि के लालच से तो बचें।

जो भी हो इतना तय है की यह जूताकार महोदय कुछेक साल पहले के तानाशाह सद्दाम मामू को जूता दिखाने की बात तो सपने में भी नहीं सोच सकते थे गलती से अगर सद्दाम मामू के बुत (अरब देशों में तानाशाहों के बुत और बुत-परस्ती के बारे में विस्तार से फ़िर कभी) को भी जूता दिखा देते तो शायद वह ज़िंदा ही जंगली कुत्तों की खुराक बना दिए जाते।

दुखद है कि "संतोष: परमो धर्मः" के देश भारत में भी आजकल जूताकारी की असंतोषधर्मी प्रवृत्ति को बढावा दिया जा रहा है। जनता को इस दिशा में उकसाने वाले नेताओं को यह ध्यान रखना चाहिये कि पाकिस्तान के नाम पर अपना सब कुछ बर्बाद कर देने वालों की अगली पीढियों को कर्मों का फल बांगलादेश या बलूचिस्तान के नाम पर मिलता है। जो जूताकारों को चुनावी टिकट बांटेंगे, उनके खुद के ऊपर भी जूते पडने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। 

Wednesday, December 17, 2008

मर्म - कविता

जीवन का जो मर्म समझते
लम्बी तान सदा सोते न

दुनियादारी अपनाते तो
हम भी ऐसे हम होते न

तत्व एक कोयले हीरे में
रख कोयला हीरा खोते न

फल ज़हरीले दिख पाते तो
बीज कनक के यूँ बोते न

यदि सार्थक कर पाते दिन तो
रातों को उठकर रोते न।
(अनुराग शर्मा)

Sunday, December 14, 2008

काश - कविता

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एकाकीपन के निर्मम मरू में
मैं असहाय खड़ा पछताता
कोई आता

दुःख के सागर में डूबा
मैं ज्यों ही ऊपर उतराता
कोई आता

घोर व्यथा अवसाद में डूबे
पीड़ित हिय को वृथा आस दिखलाता
कोई आता

आंसू की अविरल धारा
बहने से रोक नही पाता*
कोई आता

मेरा जीवन रक्षक बन जाता
कोई आता।

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Saturday, December 13, 2008

बहाना - कविता

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हमसे झगड़ा तो इक बहाना था
आ चुका जितना उसको आना था

वो तो कब से तैयार बैठा था
गोया बेकार सब मनाना था

घर की ईंटें भी ले गया संग में
सिर्फ़ फुटपाथ पर ठिकाना था

जेब सदियों से अपनी खाली थी
मेरा क्या था जो अब गंवाना था

हम थे नाज़ुक मिज़ाज़ पहले से
उसके बस का कहाँ रुलाना था।

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Friday, December 12, 2008

तुम्हारे बगैर - कविता

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ज़िंदा रहे हैं हम
तुम्हारे बगैर भी
गर जिंदगी इक आग के
दरिया का नाम है

ख़्वाबों में मिला करते हैं
तुमसे हमेशा हम
इसके सिवा न हमको तो
कुछ और काम है

तेरी है न मेरी है
दुनिया है यह फानी
हम तो हैं उस जहाँ के
जहाँ तेरा धाम है

पीने की आरजू क्या
हम ख़ाक करेंगे
तेरा जो साथ न हो तो
जीना हराम है।

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Wednesday, December 10, 2008

सौभाग्य - कहानी - अन्तिम कड़ी [भाग ५]

सौभाग्य की अन्तिम कड़ी प्रस्तुत है। अब तक की कथा यहाँ उपलब्ध है:
सौभाग्य - खंड १
सौभाग्य - खंड २
सौभाग्य - खंड ३
सौभाग्य - खंड ४


रणबीर के साथ मेरी शादी पापा के आशीर्वाद से हुई। कोई भी सहेली मेरी शादी में नहीं आयी। सबको यही लगता था कि मैंने आदित्य के साथ अन्याय किया है। किसी को भी मेरे दिल का हाल जानने की फुरसत न थी। मुझे यकीन था कि वह तो आयेगा ही। अरविन्द के द्वारा मेरी ख़बर तो उस तक पहुँचती ही होंगी यह मुझे मालूम था। मगर वह भी न आया। उसकी तरफ़ से बस एक बधाई तार आया। बाद में भी उसकी कोई ख़बर न मिली। और कुछ नहीं तो आकर गुस्सा तो कर सकता था। मगर उसने गुस्सा भी नहीं किया और न ही कोई शिकवा। चुपचाप मेरी ज़िंदगी से चला गया। शादी के दो साल बाद करिश्मा पैदा हुयी। दिन, मास और फ़िर वर्ष बीतते गए। करिश्मा स्कूल भी जाने लगी।

पुराने मित्रों में सिर्फ़ अरविंद से कभी कभार बस स्टॉप पर मुलाक़ात हो जाती थी। बाद में ऐसी ही किसी एक मुलाक़ात में अरविंद ने एक बार बताया कि आदित्य ने निशा से शादी कर ली। आदित्य और निशा - इससे ज्यादा बेमेल रिश्ता मैंने सुना न था। कहाँ आदित्य जैसा देवता आदमी और कहाँ एक नंबर की बदतमीज़ और नकचढी निशा। बदतमीज़ क्यों न होती? चौधरी सुच्चा सिंह की बेटी जो ठहरी। चौधरी सुच्चा सिंह हमारी बिरादरी के सबसे नामी-गिरामी आदमी थे। बड़े-बड़े नेताओं से उठना बैठना था। वजह यह थी कि सारी बिरादरी के वोट उनके इशारे पर ही चलते थे। उनके प्रयासों से ही हम लोगों को आरक्षण मिला था। खानदानी पैसे वाले थे। सारा परिवार पढा-लिखा भी था। कहते हैं कि भगवान् सारे सुख किसी को भी नहीं देता है। बस उनके बच्चे ही ख़राब निकले। बड़ा बेटा गुंडागर्दी में पड़ गया। कॉलेज के दिनों में ही किसी हत्याकाण्ड में भी उसका नाम आया था। उसके दोस्तों को सज़ा भी हुई थी। मगर कहते हैं कि चौधरी ने अपने रसूख के बल पर उसको साफ़ बचा लिया था। मुक़दमे के दौरान ही उसे पढने के बहाने इंग्लैंड भिजवा दिया था। अब तो वापस आने से रहा।

आदित्य के दादाजी चौधरी के परिवार के ज्योतिषी थे। चौधरी उनको बहुत मानते थे और कहते थे कि उनकी वजह से ही यह परिवार हमेशा चमका और कितना भी बुरा वक़्त आने पर भी कभी संकट में नहीं पडा। निशा का बचपन से ही आदित्य के घर आना जाना था। आदित्य को भी उसके घर में सभी पसंद करते थे। और निशा भी हमेशा से किसी फौजी अफसर से ही शादी करना चाहती थी। फ़िर भी इस शादी पर मुझे अचम्भा हुआ। निशा ने वह खजाना पा लिया था जो मेरे हाथ से फिसल चुका था। मुझे निशा से रश्क होने लगा। निशा ने ज़रूर पिछले जन्म में कोई बड़ी तपस्या की होगी। उस रात भी मुझे नींद नहीं आयी। वह रात मेरी ज़िंदगी की सबसे लम्बी रात थी।

-x-X-x-

"आँख से यह मोती क्यों गिरा, इसके बारे में, मुझे कुछ बताना चाहती हो?” उसने बिना किसी दृढ़ता के मुझसे पूछा।

पहले भी उसकी हर बात बिना किसी दृढ़ बन्धन के होती थी। मुझे अच्छा नहीं लगता था। मैं चाहती थी कि वह मुझ पर अपना अधिकार जताए। अगर मैं उसकी बात का जवाब न दूँ तो वह जिद करके मुझसे दोबारा पूछे। अगर कभी वह मुझ पर गुस्सा भी करता तो शायद मुझे अच्छा ही लगता। मगर मेरी यह इच्छा कभी पूरी नहीं हुई। उसने कभी भी किसी बात की जिद नहीं की थी। न तो ज़िद करके अपने किसी सवाल का जवाब माँगा और न ही कभी मुझ पर गुस्सा हुआ।

तब मैंने उसके व्यक्तित्व के इस अंग को कभी नहीं सराहा। आज इतने साल बाद पहली बार मैंने उसके व्यवहार के इस बड़प्पन को समझा। पहली बार अपने आप को उसकी बराबरी का परिपक्व पाया। क्या रणबीर की तानाशाही में रहने के कारण ही मैं ऐसा समझ रही हूँ? या फ़िर मेरी उम्र ने मुझे विकसित किया है। जो भी हो, इतना सच है कि वह आज भी हमेशा जैसा था।

“तुम इतने दिन से मिले क्यों नहीं मुझसे? इतने साल तक मेरी कोई ख़बर नहीं ली? क्या कभी भी दिल्ली आना नहीं होता है?" लाख कोशिश करने पर भी मैं शिकवा किया बिना न रह सकी, "चिट्ठी न सही, फ़ोन तो कर सकते थे कभी?”

वह शांति से सुनता रहा।

“मेरी याद नहीं आयी कभी?” मैं बोलती रही।

“यादें कहाँ छूटती हैं? मिला नहीं तो क्या, तुम्हारी एक-एक बात आज भी याद है मुझे।”

“शादी के बाद अपनी मरजी के अलावा और भी बहुत सी बातें होती हैं जिनका ध्यान रखना पड़ता है। और क्या कहूं, तुम तो ख़ुद ही समझदार हो” उसने सफाई सी दी।

“नहीं, मैं तो बुद्धू हूँ। और यह बात मैं साबित कर चुकी हूँ रणबीर से शादी कर के।”

“मगर तुमने तो अपनी मरजी से शादी की थी?”

“वह मेरा बचपना था। मुझे रणबीर से कभी शादी नहीं करनी चाहिए थी।”

“तो क्या ऋतिक रोशन से?” वह मुस्कुराया, “उसी की फैन थीं न तुम?”

कितने बरस बाद वह निश्छल मुस्कान देखने को मिली थी। मैं अपनी खुशी को शब्दों में बयां नहीं कर सकती।

“नहीं वह तो कुछ भी नहीं है मेरे परफेक्ट मैच के सामने।”

“कौन है वह खुशनसीब, ज़रा हम भी तो सुनें? ” वह शरारत से मुस्कुराया।

“तुम, और कौन?” मैंने झूठमूठ गुस्सा दिखाते हुए कहा, “मेरे मुंह से अपनी तारीफ सुनना चाहते हो?”

“…”

“मैंने तुम्हें नहीं पहचाना। बहुत बड़ी गलती की। उसी की सज़ा आज तक भुगत रही हूँ।”

“ऐसा मत कहो प्रीति” उसकी मुस्कान एकदम से गायब हो गयी। एक गहरा विषाद सा उसके चेहरे पर उतर आया। मैंने कभी भी उसे इतना उदास नहीं देखा था। मैं तो यह जानती भी नहीं थी कि वह कभी उदास भी दिख सकता है। मुझे समझ नहीं आया कि वह मेरी बात से आहत क्यों हुआ। मैंने तो उसकी तारीफ़ ही की थी।

“निशा कितनी खुशनसीब है जो उसे तुम जैसा पति मिला” मैं अपनी ही रौ में बोली।

“प्रीति, प्लीज़ ऐसा बिल्कुल मत कहो। यह सच नहीं है” वह ऐसे बोला मानो बहुत पीडा में हो। मुझे समझ नहीं आया कि वह इतना असहज क्यों हो रहा था।

“काश मैं निशा की जगह होती।” मेरे मुंह से निकल ही गया, “मैं कभी अपनी किस्मत से लड़ने की हिम्मत ही नहीं जुटा सकी। वरना हमारी दुनिया कुछ अलग ही होती।”

“तुम्हें लगता है कि तुम मेरे साथ खुश रहतीं?” वह एक पल को ठिठका फ़िर बोला, “तुम सोचती हो कि निशा मेरे साथ बहुत खुश है?”

मैं समझी नहीं वह क्या कहना चाह रहा था, वह कुछ उलझी उलझी बातें कर रहा था।

“बिल्कुल भी खुश नहीं थी वह मेरे साथ। या तो झगडा करती थी या दिन रात रोती थी। मैंने एकाध बार मनो-चिकित्सक के पास जाने की बात भी उठाई तो वह और सारा चौधरी परिवार मेरे ख़िलाफ़ भड़क गया कि मैं उनकी बेटी को पागल कर देना चाहता हूँ।”

मैं उसके चेहरे की पीडा को स्पष्ट देख पा रही थी मगर नहीं जानती थी कि उसका क्या करूं।

“प्रीति, यह दुनिया बहुत कठिन है। सही-ग़लत, अच्छे-बुरे को पहचानना आसान नहीं है। हमें सिर्फ़ अपने घाव दिखते हैं सुंदर-सुंदर कपडों के नीचे दूसरे लोग कितने घाव लेकर जी रहे हैं उसका हमें कतई एहसास नहीं है। इसलिए हमें दूसरों से ईर्ष्या होती है। सच तो यह है कि अपने सारे घावों के बावजूद हम दूसरों से ज़्यादा खुशनसीब हो सकते हैं मगर हमें इस बात का ज़रा सा भी अंदाज़ नहीं होता है।”

मैं उसकी बात ध्यान से सुन रही थी।

“सुख दुःख दोनों हमारे अन्दर ही हैं।”

मुझे उसकी बात कुछ कुछ समझ आने लगी थी।

“पता है हमारी समस्या क्या है?" उसने बहुत प्यार से कहा, मानो किसी बच्चे को समझा रहा हो, “झूठी उम्मीदों में फंसकर हम सच्ची खुशियों को दरकिनार करते रहते हैं।”

“…”

“अपूर्णता जीवन की कमी नही बल्कि उसका असली मतलब है। जीवन एक खोज है, एक सफर है। जीवन मंजिल नहीं है, यही जीवन की सुन्दरता है। मौत सम्पूर्ण हो सकती है परन्तु जीवन अधूरा ही होता है।”

“…”

“आधा-अधूरा जो भी मिले उसे अपनाना सीखना होगा। छोटी छोटी खुशियाँ ही हमे बड़ा बनती हैं जबकि बड़ी बड़ी उम्मीदें हमें छोटा कर देती हैं।"

“…”

“याद रखना कि अगर तुम्हारी शादी रणबीर से न हुई होती तो तुम्हें करिश्मा नही मिलती। अपने सौभाग्य को पहचानो, तभी खुशी मिलेगी।”

“निशा साथ में आयी है? ” मैंने पूछा, “क्या मैं उससे मिल सकती हूँ?” सोचती थी कि शायद मैं उसे अहसास दिला पाऊँ कि वह किस हीरे की बेक़द्री कर रही है।

उसके चेहरे पर अजब सी उदास मुस्कान कौंधी और वह कुछ शब्द ढूँढता हुआ सा लगा।

“निशा ने यह शादी सिर्फ़ अपने माता-पिता से विद्रोह करने के लिए की थी। उसने कई बार पुलिस बुलाई थी मुझ पर प्रताड़ना का आरोप लगाकर। मैं दहेज़ विरोधी एक्ट में जेल भी गया। कुछ तो पुलिस-रिकार्ड की वजह से और काफी कुछ ससुर जी के प्रभाव की वजह से नौसेना ने डिस-ओनारेब्ल डिस्चार्ज देकर निकालने की कोशिश की मगर बाद में आरोप साबित नहीं हो पाये और आखिरकार मुझे बहाल किया। आज उसी सिलसिले में मुख्यालय आया था।”

“हे भगवान्! कब हुआ था यह सब? ” मुझे निशा पर बेहिसाब गुस्सा आ रहा था।

“कुछ साल पहले” उसने मुस्कुराते हुए कहा मानो कुछ हुआ ही न हो, “अब तो हमारा तलाक़ हुए भी एक साल हो गया।”

हम सोना-रूपा के सामने खड़े थे। मेरी भूख मर चुकी थी।

[समाप्त]

सौभाग्य - कहानी [भाग ४]

सौभाग्य की चौथी कड़ी प्रस्तुत है। पहले सोचा था कि इस कहानी की एक कड़ी प्रतिदिन लिखने का प्रयास करूंगा। उम्मीद थी कि आपको पसंद आयेगी। आपका सुझाव है कि कड़ी थोड़ी और बड़ी हो, सो हाज़िर है एक और बड़ी कड़ी। बाद की टिप्पणियों से पता लगा कि कड़ियों में देरी आखरने लगी है, सो सुबह शाम एक-एक कड़ी लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। अब तक की कथा यहाँ उपलब्ध है:
सौभाग्य - खंड १
सौभाग्य - खंड २
सौभाग्य - खंड ३


वह तो स्वभाव से ही निडर था। कभी भी किसी की परवाह नहीं करता था। मगर मुझे तो घर में सबका ही ख्याल रखना था। दीदी ने माँ-बाप की इच्छा के विरुद्ध घर त्यागकर दूसरी जाति में शादी की थी। एक साल बाद भाई ने भी घर में सबके बहुत मना करने के बाद भी लड़-झगड़ कर एक निम्न कोटि के परिवार में विवाह कर लिया। पापा ने उसी दिन उसको अपनी संपत्ति से बेदखल कर दिया और मुझसे वचन ले लिया कि मैं अपनी मर्जी से शादी नहीं करूंगी। इस बात को बहुत समय हो गया था। पापा ने दीदी और भइया को वापस स्वीकार भी कर लिया था। मुझे लगा कि सब कुछ ठीक हो गया है। ऊपर से आदित्य का प्यार। मैं तो पापा को दिए इस वचन को पूरी तरह भूल भी गयी थी।

एक दिन मैंने पापा को आदित्य के बारे में सब कुछ सच-सच बता दिया। उसी क्षण मेरी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गयी। पापा का वह भयानक रूप मैं कभी भूल नहीं सकती। उस समय रात के ग्यारह बज रहे थे। उन्होंने उसी वक्त मुझे घर से निकल जाने को कहा। मैंने बहुत समझाने की कोशिश की मगर उन पर तो जैसे भूत सा सवार था। अब याद करके भी आश्चर्य होता है कि हमेशा अपनी शर्तों पर जीने वाले दीदी और भय्या भी इस बार पापा की ही तरफदारी कर रहे थे।

दीदी और भय्या ने अपनी बातों से मुझे बार-बार यह यकीन भी दिलाया कि अपने दोनों बड़े बच्चों द्वारा अपनी मर्जी से विवाह कर लेने की वजह से माँ-पापा पहले ही बहुत टूट चुके हैं। अगर मैं भी उनकी इच्छा का ख्याल नहीं करूंगी तो वे लोग गुस्से में न जाने क्या कर बैठें। अगर कुछ उलटा-सीधा हो गया तो घर का कोई भी सदस्य मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा।

पापा के गुस्से के अलावा मुझे एक और बात का भी डर था। वह था हमारी जातियों का। आदित्य एक सुसंस्कृत ब्राह्मण परिवार से था और मुझे कोंलेज में प्रवेश भी आरक्षित कोटा में मिला था। दीदी हमेशा कहती थी, "यह पण्डे-पुजारी बड़े ही दोगले होते हैं। जिस दिन भी उसे तेरी जाति का पता लगेगा, दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंक देगा।” हालांकि मुझे यकीन था कि आदित्य ऐसा लड़का नहीं था मगर वक्त की धार किसने देखी है। अगर वह कभी भी दुनिया के बहकावे में आ जाता तो मैं तो कहीं की भी न रहती।

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मैंने उसे फ़ोन करके सारी बात बताई और कहा कि मैं पापा का दिल नहीं तोड़ सकती हूँ।

"तुम मुझे भूल जाओ हमेशा के लिए। समझो मैं मर गयी।”

मुझे लगा कि वह कहेगा, "तुम्हारे लिए मैं सारी उम्र कुंवारा रहूँगा।” मगर उसने ऐसा कुछ नहीं कहा।

"ऐसा कैसे हो सकता है? तुम उनकी बेटी हो प्रोपर्टी नही। नहीं मानते तो न मानें। हम उनके बिना ही शादी करेंगे।"

"उनके बिना? अभी तो शादी हुई भी नहीं है, तुम पहले ही मुझे अपने परिवार से अलग करना चाहते हो?" मुझे उसकी बात बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगी।

"नहीं, मैं उनकी और इन्सल्ट नहीं कर सकती” शायद मैं बहुत कमज़ोर थी - या शायद मैं दीदी-भैय्या की तरह स्वार्थी नहीं होना चाहती थी। कारण जो भी हो, मैं उसी समय यह समझ गयी थी कि मैं अपने परिवारजनों को नाराज़ नहीं कर पाऊँगी।

“शायद हमारा साथ बस यहाँ तक ही था। आज से हमारा रिश्ता ख़त्म।” मैंने जैसे तैसे कहा।

मुझे लगा वह झगड़ा करेगा, मुझे बुरा भला कहेगा। मगर उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया। उसने चुपचाप फ़ोन रख दिया। उस दिन के बाद मैंने जब भी उसका नम्बर मिलाने की कोशिश की उसने फ़ोन कभी उठाया ही नहीं।

-x-X-x-

दो हफ्ते बाद हम सुनीता के घर में मिले। उसने बताया कि उसने नौसेना की नौकरी स्वीकार कर ली थी और वह उस दिन ही मुम्बई जा रहा था।

“चिट्ठी लिखोगे न?”

“नहीं।”

“क्यों?”

“इतनी तो लिखीं, कभी किसी का जवाब तक नहीं आया। और फ़िर अब चिट्ठी लिखने की कोई वजह भी तो नहीं बची है।”

वह सच ही तो कह रहा था। मैंने कभी भी उसके पत्र का जवाब नहीं दिया था। सोचती थी कि वह कभी भी बुरा नहीं मानेगा। उस दिन मैं सारी रात रोती रही। दीदी मुझे दिलासा दिलाते हुए हमेशा कहती थी, “अच्छा ही हुआ उसका यह पलायनवादी रूप शादी से पहले ही दिख गया, शादी के बाद तुझे अकेला छोड़कर चल देता तो क्या करती?”

भाभी ने भी समझाया, “सच्चा प्यार करने वाले इस तरह मझधार में छोड़कर नहीं चल देते हैं।”

किताबों में, किस्से-कहानियों में भी हमेशा जन्म-जन्मान्तर के साथ के बारे में ही पढा था। मैं उसके जाने पर यकीन नहीं कर पा रही थी। मुझे उस पर अपने से भी ज्यादा विश्वास था। मुझे लगता था कि मैं चाहे कुछ भी करूं, वह कभी भी मुझे छोड़कर नहीं जायेगा।

वह दिन और आज का दिन। वह मेरी ज़िंदगी से ऐसा गया कि फ़िर बहुत कोशिश करने पर भी पता ही न चला कि कहाँ है, कैसा है और किस हाल में है। मैंने भी धीरे धीरे ज़िंदगी की सच्चाई को स्वीकार कर लिया। कभी किसी को यह अहसास नहीं होने दिया कि मेरे दिल के किसी कोने में वह आज भी रहता है, हंसता है और कविता भी करता है।

[क्रमशः]

Tuesday, December 9, 2008

सौभाग्य - कहानी [भाग ३]

प्रतिदिन इस कहानी की एक कड़ी लिखने का प्रयास करूंगा। आशा है आपको पसंद आयेगी। आपका सुझाव है कि कड़ी थोड़ी और बड़ी हो, सो हाज़िर है एक बड़ी कड़ी। अब तक की कथा यहाँ उपलब्ध है:
सौभाग्य - खंड १
सौभाग्य - खंड 2


फोन पर उसकी आवाज़ क्या सुनी, मानो मैं किसी टाइम मशीन में चली गयी। अपने जीवन में से कितनी भूली-बिसरी पुरानी यादें जैसे अब तक जबरन बंद रखी गयी खिड़कियों से उड़कर मेरे मन-मन्दिर में मंडराने लगीं। याद आए वो दिन जब हर पल आशा से बंधा था। मुझे हर रोज़ सुबह होने का इंतज़ार रहता था - ताकि उससे मिल सकूं। उसके संग की खुशबू को बरसों बाद फ़िर से महसूस किया तो चेहरे पर स्वतः ही मुस्कान आ गयी।

कॉलेज में वह सब का चहेता था। मैं भी किसी से कम नहीं थी। वह खिलाड़ी था तो मैं पढाकू थी। मैं बहुत हाज़िर-जवाब थी जबकि वह चुप सा था। और भी बहुत से अन्तर थे हमारे बीच में। मसलन हम लोग खाते-पीते घर से थे जबकि उसका परिवार बड़ी मुश्किल से ही निम्न-मध्य वर्ग में गिना जाने लायक था। उसके पास अपनी साइकिल भी नहीं थी जबकि मुझे कॉलेज छोड़ने ड्राइवर आता था। हालांकि, बाद में मैंने जिद करके बस से आना-जाना शुरू कर दिया था। अब सोचती हूँ तो यह सपने जैसा लगता है कि इतने भेद के बावजूद हम दोनों धीरे-धीरे एक-दूसरे के रंग में रंग गए। जान-पहचान कब नज़दीकी में बदली, पता ही न लगा। मेरी सहेलियां शाम होते ही मुझे अकेला छोड़ देती थीं ताकि मैं उसके साथ समय बिता सकूं। सुनयना तो हमेशा ही उसका नाम मेरे साथ जोड़कर कुछ न कुछ चुहल करती रहती। कॉलेज में सबको यकीन था कि हम शादी करेंगे ही।

-x-X-x-

हम दोनों करोल बाग में एक छोटे से होटल में बैठे थे। मैं अपने परिवार की एल्बम ले गयी थी। वह एक-एक फोटो को बड़े ध्यान से देख रहा था। टेढ़े मेढ़े फोटो को एल्बम से निकालकर फिर वापस व्यवस्था से लगा देता। पापा के फोटो को उसने बिना बताये ही पहचान लिया।

"यह तो एक प्यारी से बच्ची के पापा ही हैं? ..."

“दिल कर रहा है कि अभी चरण छूकर आशीर्वाद ले लो, है न?”

हम दोनों ही खुलकर इतना हँसे कि आसपास की टेबल पर बैठे लोग मुड़कर हमें देखने लगे।
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मुझसे विदा लेना उसे कभी अच्छा नहीं लगता था। पर उस दिन वह कुछ ज़्यादा ही भावुक हो रहा था।

"थोडी देर और रुक जाओ न" उसने विनती की।

"आखरी बस निकल गयी तो फ़िर घर कैसे जाऊंगी?"

"काश हम लोग हमेशा साथ रह पाते" उसने एक ठंडी आह भरते हुए कहा।

"भूल जाओ, पापा इस शादी के लिए कभी भी तैयार नहीं होंगे", मैंने चुटकी ली। मुझे क्या पता था कि मेरा यह मजाक ही एक दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे कड़वा सच बन जायेगा।
-x-X-x-

हम दोनों पार्क में बैठे थे। वह मेरे बालों से खेल रहा था। पता ही न चला कब अँधेरा हो चला था। अचानक ही मुझे पापा का रौद्र रूप याद आया। "क्या समय है?" मैंने पूछा।

"मुझे क्या पता, मैं तो घड़ी नहीं बांधता हूँ।”

"हाँ वह तो दहेज़ में मिलेगी ही" मैंने छींटा कसा।

"मेरा दहेज़ में विश्वास नहीं है" उसे मेरी बात अच्छी नहीं लगी।

"रहने दो, पण्डितों को तो बस लेना ही लेना आता है।"

कहने के बाद मुझे अहसास हुआ कि मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था। मैं यह सोच ही रही थी कि उसकी आवाज़ से मेरी तंद्रा भंग हुई।

"क्या चल रहा है प्रीति जी? सब ठीक तो है? करिश्मा का क्या हाल है? पढाई में तो अपनी माँ की तरह ही होशियार होगी? राइट?"

उसके मुंह से "जी" सुनकर थोडा अजीब सा लगा। शायद मुझे सहज करना चाहता था। मैंने भी संयत दिखने का पूरा प्रयास किया लेकिन अपनी सारी शक्ति लगाकर भी मैं उसके किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकी। गला और आँख दोनों ही भर आए।

उसने भी दोबारा नहीं पूछा। उसने अपनी नज़रें भी नीची कर लीं ताकि मैं चुपचाप छलक आया एक आंसू पोंछ सकूं। मुझे अच्छा लगा। वह आज भी वैसा ही कोमल ह्रदय है। हमेशा ही दूसरों को पूरा मौका देता है सर्वश्रेष्ठ दिखने का।

मेरे उत्तर का इंतज़ार किए बिना उसने अपने आप ही कहा, "लंच टाइम हो रहा है, सोना रूपा में चलते हैं। तुम्हें पसंद भी है।”

हम दोनों जल्दी से बाहर निकले। लंच में मूड ख़राब हो जाने की वजह से मैं भूखी तो थी ही। मगर उसके साथ होने की बात ही और थी। मेरे कदम कुछ अधिक ही तेज़ चल रहे थे। आज बहुत सालों के बाद वह मेरे साथ चल रहा था। बिल्कुल वैसे ही जैसे शादी से पहले हम लोग घूमा करते थे।

[क्रमशः]

सौभाग्य - कहानी [भाग २]

काफी दिनों से इस कहानी का प्लाट दिमाग में घुमड़ रहा था। पर किसी न किसी कारणवश लिखना शुरू न कर सका। अब प्रतिदिन इस कहानी की एक कड़ी लिखने का प्रयास करूंगा। आशा है आपको पसंद आयेगी। आपका सुझाव है कि कड़ी थोड़ी और बड़ी हो, सो हाज़िर है एक बड़ी कड़ी। अब तक की कथा यहाँ उपलब्ध है: सौभाग्य - खंड १
दफ्तर पहुँचते-पहुँचते साढ़े दस बज ही गए थे। चीफ मैनेजर दरवाज़े पर ही खड़ा था। बुड्ढे को कोई और काम तो है नहीं। बीच में खड़ा होकर सुकुमार कन्याओं को ताकता रहता है। मुझे देखते ही अजब सी मुस्कराहट उसके चेहरे पर नाचने लगी। घिन आती है मुझे उसकी मुस्कराहट से। न मुंह में दांत न पेट में आँत। खिजाब लगाकर कामदेव बनने की कोशिश करता है। सींग कटाने से बैल बछड़ा थोड़े ही हो जाएगा।

"तो आ गयीं आप, मुझे लगा छुट्टी पर हैं आज भी।” बुड्ढे ने हमेशा की तरह ताना मारा। बदतमीज़ कहीं का!

फ्यूचरटेक वाला जैन मेरे पहुँचने से पहले ही मेरी सीट पर पहुँच गया, "मैडम मेरी बिल पहले डिसकाउंट कर दीजिये, नहीं तो पार्टी कानूनी कार्रवाई शुरू कर देगी।” यह आदमी हमेशा कानूनी कार्रवाई की ही धमकी देता रहता है। इतना ही डर है तो अकाउंट में पहले से पैसा रखा करो ना। सबने सर पर चढा रखा है। मंत्री जी का साला जो ठहरा। सारे अकाउंट ऊपर से ही तैयार होकर आते हैं हमारे पास तो साइन करने के अलावा कोई चारा ही नहीं होता है। जल्दी जल्दी उसका काम किया। दोपहर तक फ्यूचरटेक का खाता फ़िर से ओवर हो गया।

लंच करने बैठी तो पहले ही कौर में दांत के नीचे कंकर आ गया। खाने का सारा मज़ा किरकिरा हो गया। तब तक राम बाबू आ गया। यह हमारा चपरासी है। चीफ मेनेजर से कम बदतमीज़ नही है। उससे कम समझता भी नहीं है अपने को। पढ़ा लिखा नहीं है। पढ़ाई की क़सर फैशनेबिल कपडों से पूरी करने की कोशिश में लगा रहता है। है तो चपरासी ही और शायद सारी उम्र चपरासी ही रहे लेकिन खूबसूरती में अपने को ऋतिक रोशन से ज़्यादा सुंदर समझता है। हमेशा कुछ न कुछ कमेंट करता रहेगा। मेरी तरफ़ बढ़ा तभी मैं समझ गई कुछ बकवास करने वाला है। और ठीक वही हुआ।

उसने अपना बड़ा सा मुंह खोला, "मैडम आप न जींस में बहुत अच्छी लगती हैं, रोजाना ही जींस पहनकर आया करिये। एकदम टिप-टॉप लगेंगी।”

मुझे इतना गुस्सा आया कि उसी वक्त खाने की प्लेट छोड़कर उठ गयी।

वापस अपनी सीट पर आयी ही थी कि फ़ोन घनघनाया। "क्या प्रीति मैडम से बात कर सकता हूँ?" पूरे दिन में पहली बार किसी ने इतनी सभ्यता से बात की थी। अच्छा लगा। आवाज़ भी अच्छी लगी, कुछ हद तक जानी पहचानी भी।

"मैडम आपसे एक जानकारी चाहिए थी।”

"हाँ, पूछिए", पूरे दिन में अब मैं पहली बार सामान्य होने लगी थी।

"क्या आप किसी आदित्य रंजन को जानती हैं?"

उस सभ्य आवाज़ ने आदित्य कहा तो मेरा सारा शरीर एकबारगी पुलकित सा हो गया। यह नाम सुनने को मेरे कान तरस रहे थे। और मेरे होंठ भी पिछले दस सालों में कितनी बार अस्फुट स्वरों में यह नाम बोलते रहते थे। वही गंभीर स्वर, वही मिठास और वही शालीनता, मुझे यह पहचानने में एक पल भी नहीं लगा कि यह आदित्य ही है।

"बदमाश, कहाँ हो तुम?" बस यही वाक्य ठीक से निकला। गला काँपने लगा था।

"कहाँ खो गए थे तुम? पता भी है मैं किस हाल में हूँ? कितनी अकेली और उदास हूँ?" कहते कहते मेरी रुलाई फ़ूट पड़ी।

"मैं काम से नौसेना मुख्यालय आया था। पुरानी यादें ढूँढने कनोट प्लेस आया तो अरविंद मिल गया। उस से तुम्हारा सब हाल मिला। उसी ने तुम्हारा नंबर दिया और बताया कि तुम्हारी ब्रांच नजदीक ही है। सुनो… प्लीज़ रो मत। मैं पाँच मिनट में आ रहा हूँ।”

उसे आज भी मेरा इतना ख्याल है, यह जानकर अच्छा लगा। वह आज भी उतना ही भला था, उसकी आवाज़ में आज भी वही शान्ति थी जिसे मैं अब तक मिस करती रही थी।

[क्रमशः]

Monday, December 8, 2008

सौभाग्य - कहानी [भाग १]

कब से बिस्तर पर लेते हुए मैं सिर्फ़ करवटें बदल रही थी। नींद तो मानो कोसों दूर थी। करिश्मा को सोते हुए देखा। कितनी प्यारी लग रही थी। इतने जालिम बाप की इतनी प्यारी बच्ची। सचमुच कुदरत का करिश्मा है। इसीलिए मैंने इसका यह नाम रखा। इसके बाप का बस चलता तो कोई पुराने ज़माने का बहनजी जैसा नाम ही रख देते। सारी उम्र जिल्लत सहनी पड़ती मेरी बच्ची को। ख़ुद मैं भी तो रोज़ एक नरक से गुज़रती हूँ। कितना भी भुलाना चाहूँ, हर रात को दिन भर की तल्ख़ बातें याद आती रहती हैं। आज की ही बात लो, कितनी छोटी सी बात पर कितना उखड गए थे।

"टिकेट बुक कराया?"

"हाँ!"

"तुमने तो 8500 कहा था। अब ये 12000 कहाँ से हो गए?"

चुप्पी।

"और ये सप्ताह के बीच में, इतवार का टिकेट क्यों नहीं लिया?"

चुप्पी।

"चार दिन का नुकसान करा दिया? चार दिन की कीमत पता है तुम्हें?"

चुप्पी।

इतना ही ख्याल है तो ख़ुद क्यों नहीं कर लिया। माना मैं पूरे हफ्ते से छुट्टी पर हूँ। इसका मतलब यह तो नहीं कि एक नौकरानी की तरह इस आदमी का हर काम करती रहूँ। अपने मायके में तो मैंने कभी खाना भी नहीं बनाया। हर काम के लिए नौकर-चाकर थे। इनको तो यह भी पसंद नहीं। कितनी बार ताना देकर कहते हैं कि रिश्वत की शान-शौकत के सामने तो मैं भूखा रहना ही पसंद करूँगा। तो रहो भूखे, मुझे और मेरे बच्चे को तो हमारा पूरा हक दो। उसके बाद जो चाहे करो। मैंने क्या-क्या कहना चाहा मगर पिछले कड़वे अनुभवों के कारण मन मारकर चुप ही रही।

सोचते सोचते पता नहीं कब नींद आ गई। सुबह उठी तो सर दर्द के मारे फटा जा रहा था। आखिरी छुट्टी भी आज खत्म हो गई। पैर पटक कर दफ्तर के लिए निकलना ही पड़ा। हमेशा ऐसा ही होता है। ज़बरदस्ती कर के अपने को उठाती हूँ तब भी बस छूट जाती है। आखिरकार टैक्सी करनी पड़ी। और ये दिल्ली के टैक्सी वाले। ये तो लगता है माँ के पेट से ही गुंडे बनकर पैदा हुए थे। कोई लाज-लिहाज़ नही। अकेली औरत देखकर तो कुछ ज़्यादा ही इतराने लगते हैं।

[क्रमशः]

Saturday, December 6, 2008

आग मिले - कविता

टूटे हैं तार सब सितारों के
गीत बनता नहीं न राग मिले

दिल तो सूना है फ़िर भी जिंदा हैं
ज़िंदगी का कोई सुराग मिले

खुशियाँ रूठी हैं जबसे तुम रूठे
वापसी हो तो फ़िर बहार मिले

दिल में वैराग सा उफनता रहा
तुम जो आओ तो अनुराग मिले

लाश मेरी ये जल नहीं सकती
बर्फ पिघले तो थोडी आग मिले।

(~अनुराग शर्मा)

Tuesday, December 2, 2008

मुम्बई - आतंक के बाद

मुम्बई की घटना से हमें अपने ही अनेकों ऐसे पक्ष साफ़ दिखाई दिए जो अन्यथा दिखते हुए भी अनदेखे रह जाते हैं। हमें, प्रशासन, नेता, पत्रकार, जनता, पुलिस, एन एस जी और वहशी आतंकवादी हत्यारों के बारे में ऐसी बहुत सी बातों से दो चार होना पडा जिनके बारे में चर्चा ज़रूरी सी ही है। मैं आप सब से काफी दूर बैठा हूँ और भौतिक रूप से इस आतंक का भुक्तभोगी नहीं हूँ परन्तु समाचार और अन्य माध्यमों से जितनी जानकारी मिलती रही है उससे ऐसा लगता है जैसे मैं वहीं हूँ और यह सब मेरे चारों ओर ही घटित होता रहा है।

पहले तो देश की जनता को नमन जिसने इतना बड़ा सदमा भी बहुत बहादुरी से झेला। छोटी-छोटी असुविधाओं पर भी असंतोष से भड़क उठने वाले लोग भी गंभीरता से यह सोचने में लगे रहे कि आतंकवाद की समस्या को कैसे समूल नष्ट किया जाए। जो खतरनाक आतंकवादी ऐ टी एस के उच्चाधिकारियों से गाडी और हथियार आराम से छीनकर ले गए, उन्हीं में से एक को ज़िंदा पकड़ने में पुलिस के साथ जनता के जिन लोगों ने बहादुरी दिखाई वे तारीफ़ के काबिल हैं। इसी के साथ, नरीमन हाउस के पास आइसक्रीम बेचने वाले हनीफ ने जिस तरह पहले पुलिस और फ़िर कमांडोज़ को इमारत के नक्शे और आवाजाही के रास्तों से परिचित कराया उससे इस अभियान में सुरक्षा बलों का नुकसान कम से कम हुआ। बाद में भी जनता ने एकजुट होकर इस तरह की घटनाओं की पहले से जानकारी, बचाव, रोक और सामना करने की तयारी में नेताओं और प्रशासन की घोर असफलता को कड़े स्वर में मगर सकारात्मक रूप में सामने रखकर एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया।

जहाँ जनता और कमांडोज़ जीते वहीं नेताओं की हार के साथ यह घटना एक और बात दिखा गयी। वह यह कि महाराष्ट्र पुलिस में ऐ टी एस जैसे संगठनों का क्या औचित्य है और उसके अधिकारी कितने सक्षम हैं। आतंकवाद निरोध के नाम पर बना यह संगठन इस घटना के होने की खुफिया जानकारी जुटाने, आतंकवादियों की संख्या और ठिकाने की जानकारी, विस्फोटकों व हथियारों की तस्करी और उनका ताज होटल आदि में जमाव पर रोक लगाने और अंततः गोलीबारी का सामना, इन सभी स्तरों पर लगातार फेल हुआ। सच है कि ऐ टी एस के उच्चाधिकारियों की जान आतंकवादियों के हाथों गयी मगर अफ़सोस कि यह जानें उनसे लड़कर नहीं गयीं। सच है कि उनकी असफलता की वजह से आतंकवादी पुलिस की गाडी से जनता पर गोलियाँ चला सके। हमें यह तय करना होगा कि हमारे सीमित संसाधन ऐसे संगठनों में न झोंके जाएँ जिनका एकमात्र उद्देश्य चहेते अफसरों को बड़े शहरों में आराम की पोस्टिंग देना हो। और यदि नेताओं को ऐसी कोई शक्ति दी भी जाती है तो ऐसे संगठनों का नाम "आतंकवाद निरोध" जैसा भारीभरकम न होकर "अधिकारी आरामगाह" जैसा हल्का-फुल्का हो।

टी-वी पत्रकारों ने जिस तरह बीसियों घंटों तक आतंक से त्रस्त रहने के बाद वापस आते मेहमानों को अपने बेतुके और संवेदनहीन सवालों से त्रस्त किया उससे यह स्पष्ट है कि पत्रकारिता के कोर्स में उनके लिए इंसानियत और कॉमन सेंस की कक्षाएं भी हों जिन्हें पास किए बिना उन्हें माइक पकड़ने का लाइसेंस न दिया जाए। जिन उर्दू अखबारों ने आतंकवादियों के निर्दोष जानें लेने से ज़्यादा तवज्जो उनकी कलाई में दिख रहे लाल बंद को दी, उनसे मेरा व्यक्तिगत अनुरोध है की अब वे अकेले ज़िंदा पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकवादी मोहम्मद अजमल मोहम्मद आमिर कसब से पूछताछ कर के अपने उस सवाल (मुसलमान हाथ में लाल धागा क्यों बांधेगा भला?) का उत्तर पूछें और हमें भी बताएं।

इस सारी घटना में सबसे ज़्यादा कलई खुली नेताओं और अभिनेताओं की। एक बड़े-बूढे अभिनेता को रिवोल्वर रखकर सोना पडा। आश्चर्य है कि वे सो ही कैसे पाये? और अगर सोये तो नींद में रिवोल्वर चलाते कैसे? शायद उनका उद्देश्य सिर्फ़ अपने ब्लॉग पर ज़्यादा टिप्पणियाँ पाना हो। भाजपा के मुख्तार अब्बास नक़वी कहते हैं कि केवल लिपस्टिक वाली महिलाएँ आक्रोश में हैं। शायद उन्हें घूंघट और हिजाब वाली वीरांगना भारतीय महिलाओं से ज़ुबान लड़ाने का मौका नहीं मिला वरना ऐसा बयान देने की हालत में ही नहीं रहे होते। महाराष्ट्र के कांग्रेसी मुख्यमंत्री जी की रूचि अपनी जनता की सुरक्षा से ज़्यादा अपने बेटे की अगली फ़िल्म के प्लाट में थी जभी वह ताज के मुक्त होते ही अपने बेटे और रामगोपाल वर्मा को शूटिंग साईट का वी आई पी टूर कराने निकल पड़े। ऐसा भी सुनने में आया है कि समाजवादी पार्टी के बड़बोले नेता अबू आज़मी एन एस जी की कार्रवाई के दौरान अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों पर कोई ध्यान दिए बिना अपने विदेशी धनाढ्य मित्र को निकालने के लिए सब कायदा क़ानून तोड़कर ताज में घुस गए। मगर कंम्युनिस्ट पार्टी के एक नेता ने अपनी नेताई अकड़ और बदतमीजी से इन सभी को पीछे छोड़ दिया। इस आदमी ने अपने शब्दों से एक शहीद का ऐसा अपमान किया है कि इसे आदमी कहने में भी शर्म आ रही है। मार्क्सवादी कंम्युनिस्ट पार्टी के नेता और केरल के मुख्यमंत्री वी एस अछूतानंद ने देश के नेताओं के प्रति एन एस जी के शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता के रोष पर प्रतिक्रया व्यक्त करते हुए पत्रकारों से कहा, "अगर वह शहीद का घर न होता तो एक कुत्ता भी उस तरफ़ नहीं देखता।" यह बेशर्म मुख्यमंत्री ख़ुद तो इस्तीफा देने से रहा - इसे चुनाव में जनता ही लातियायेगी शायद!



Monday, December 1, 2008

वसन्त - कविता

मन की उमंग
ज्यों जल तरंग

कोयल की तान
दैवी रसपान

टेसू के रंग
यारों के संग

बालू पे शंख
तितली के पंख

इतराते बच्चे
फूलों के गुच्छे

बादल के लच्छे
फल अधकच्चे

रक्ताभ गाल
और बिखरे बाल

सर्दी का अंत
मधुरिम वसंत।

(अनुराग शर्मा)