Showing posts with label क्रिसमस. Show all posts
Showing posts with label क्रिसमस. Show all posts

Tuesday, December 27, 2011

उत्सव की रोशनी और दिल का अँधेरा

क्रिसमस के अगले दिन हिमांक से नीचे के तापक्रम पर उसे देखा भोजन की जुगाड़ करते हुए। संसार के सबसे समृद्ध देश में वंचितों को देखकर यही ख्याल आता है कि संसार में मानवीय समस्यायें केवल इसीलिये हैं क्योंकि हमने उन्हें हल करने के प्रयास पूरे दिल से किये ही नहीं। नहीं जानता हूँ कि क्या करने से इस समस्या का उन्मूलन हो सकेगा। बस इतना ही जानता हूँ कि जो होना चाहिए वह किया नहीं जा रहा है। भाव अस्पष्ट हैं और इस बार भी रचना शायद काव्य की दृष्टि से ठीक न हो।

तख्ती सब कहती है
समां शाम का कितना प्यारा
डरता उत्सव से अँधियारा

रिश्ते भरकाते तो डर क्या
हो भले शून्य से नीचे पारा

शाम ढली उल्लास भी बढ़ा
ठिठुर रहा पर वह बेचारा

सैंटा मिलता हरिक माल में
ओझल रहा यही दुखियारा

सबको तो उपहार मिले पर
ये क्यों न प्रभु को प्यारा

बर्फ ने काली रात धवल की
चन्दा छिपा छिपा हर तारा

रजत परत सब ढंके हुए थे
कांपते उघड़ा वक़्त गुज़ारा

अगला दिन भी रहा उनींदा
अलसाया था हर घर द्वारा

सूरज की छुट्टी कूड़े में
बीन रहा भोजन भंडारा

Friday, January 2, 2009

आग और पानी [इस्पात नगरी ५]


इस्पात नगरी के धरातल के नीचे छिपकर बहने वाली ऐक्विफर नदी और सतह के ऊपर की त्रिवेणी की चर्चा मैंने इस शृंखला के चौथे खंड में की थी. चार नदियों वाले इस नगर में पानी की बहुतायत है. जैसे कि हम सब जानते हैं, जल के एक अणु में हाइड्रोजन के दो और ऑक्सिजन का एक अणु होता है. एक जलने वाला और दूसरा जलाने वाला, कोई आश्चर्य नहीं कि शायरों ने पानी और आग पर काफी समय लगाया है. पिट्सबर्ग सचमुच में आग और पानी का अनोखा संगम है. यहाँ की नदियों में जितना पानी और बर्फ है, यहाँ की पहाडियों में उतना ही कोयला है. इसीलिये शुरूआत से ही यहाँ खनन एक बहुत बड़ा व्यवसाय है. पिट्सबर्ग को इस्पात नगरी का दर्जा दिलाने में कोयले और पानी की बहुतायत का बहुत बड़ा योगदान रहा है. नदियाँ खनिजों के परिवहन का काम करती थी. और उनके किनारे खनन, परिवहन और भट्टियाँ बनीं.
[पुरानी इस्पात मीलों के उपकरण आजकल माउंट वॉशिंगटन की तलहटी में नदी के किनारे प्रदर्शन के लिए रख दिए गए हैं.]


[तीस-चालीस साल पहले तक माउंट वॉशिंगटन का यह हरा-भरा रमणीक पर्वत सिर्फ़ कोयले का एक बदसूरत और दानवाकार पहाड़ सा था.]

पुराने पिट्सबर्ग के बारे में एक प्रसिद्ध गीत है "पिट्सबर्ग एक पुराना और धुएँ से भरा नगर है..." एक ज़माने में सारा शहर कोयले के धुएँ से इस तरह ढंका रहता था कि नगर की एक ऊंची इमारत पर एक बड़ा सा टॉवर लाल बत्तियों की दूर से दिखने वाली रोशनी में जल-बुझकर मोर्स कोड में "पिट्सबर्ग" कहता रहता था. कारखाने चीन चले जाने के बाद प्रदूषण तो अब नहीं रहा है मगर वह टावर आज भी उसी तरह जल-बुझकर "पिट्सबर्ग" कहता है. बलुआ पत्थरों से बनीं शानदार इमारतें भट्टियों से दिनरात निकलने वाले धुएँ से ऐसी काली हो गयी थीं कि वही उनका असली रंग लगता था. आजकल एक-एक करके बहुत सी इमारतों को सैंड-ब्लास्टिंग कर के फिर से उनके मूल रूप में लाया जा रहा है. .

[क्लिंटन भट्टी पिट्सबर्ग ही नहीं बल्कि विश्व की सबसे पहली बड़ी भट्टी है.]


[क्लिंटन भट्टी सन १९२७ में सेवानिवृत्त हो गयी.]


[पुराने दिनों की यादें आज भी रुचिकर हैं.]



[पेन्सिल्वेनिया का कोयला उद्योग सन १७६० में माउंट वॉशिंगटन से ही शुरू हुआ था. ज्ञातव्य है कि १७५७ में अँगरेज़ हमारी धरती पर प्लासी की लड़ाई लड़ रहे थे.]
==========================================
इस्पात नगरी से - अन्य कड़ियाँ
==========================================
[सभी चित्र अनुराग शर्मा द्वारा. हरेक चित्र पर क्लिक करके उसका बड़ा रूप देखा जा सकता है.]

Saturday, December 27, 2008

संता क्लाज़ और दंत परी [इस्पात नगरी ४]

सेण्टा क्लॉज़, और दन्त परी 
पिट्सबर्ग पर यह शृंखला मेरे वर्तमान निवास स्थल से आपका परिचय कराने का एक प्रयास है। संवेदनशील लोगों के लिए यहाँ रहने का अनुभव भारत के विभिन्न अंचलों में बिताये हुए क्षणों से एकदम अलग हो सकता है। कोशिश करूंगा कि समानताओं और विभिन्नताओं को उनके सही परिप्रेक्ष्य में ईमानदारी से प्रस्तुत कर सकूँ। आपके प्रश्नों के उत्तर देते रहने का हर-सम्भव प्रयत्न करूंगा, यदि कहीं कुछ छूट जाए तो कृपया बेधड़क याद दिला दें, धन्यवाद!
क्रिस्मस के बड़े दिन की हार्दिक शुभकामनाएँ!
सांता निकोलस क्लाज़
पिछली पोस्ट में मैं सेंटा क्लाज़ के बारे में लिखना चाहता था मगर नदियों के बारे में किये गये सवाल ने थोडा सा भटका दिया, सो इस बार वह कमी पूरी कर रहा हूँ. अगले अंक से हम वापस इस्पात नगरी की सैर पर चल पड़ेंगे.

अमेरिका के बच्चों को सेंटा क्लाज़ में बहुत विश्वास है. उन्हें दंत परी (टूथ फेरी = Tooth Fairy) में भी उतना ही विश्वास है. सेंटा क्लाज़ तो फ़िर भी साल में एक बार ही दिखता है. दंत परी तो हर दाँत टूटने पर आ जाती है और बच्चों के टूटे हुए दाँत के बदले में चुपचाप कोई छोटा सा उपहार रख जाती है.

जब मेरी बेटी का पहला दूध का दाँत टूटा, तब भी उसे दंत परी के अस्तित्व पर विश्वास नहीं था और आज भी नहीं है. दंत-परी के उपहारों के लिए भी उसने दंत-परी के बजाय सदैव अपने माता-पिता को ही जिम्मेदार माना. मगर इस क्रिसमस पर उसने अपनी माँ से यह ज़रूर पूछा कि क्या वह (बेटी‌) पहले कभी सेंटा क्लाज़ में विश्वास रखती थी. माँ को याद नहीं था, सो उसने अपने कभी कुछ भी न भूलने वाले पिता से पूछा.

मैंने याद दिलाया कि जब हम उसके प्री-स्कूल के क्रिसमस समारोह में गए थे. सारे बच्चे खुश थे. उन्होंने अपनी अध्यापिकाओं के साथ क्रिसमस-गीत भी गाये. उसके बाद वहाँ सेंटा क्लाज़ भी आ गए. सारे बच्चे उनकी तरफ़ दौड़े. मेरी बेटी शायद उनको देख नहीं सकी है, यह सोचकर उसकी माँ ने बड़े उत्साह के साथ उसे बताया, "देखो बेटा, सेंटा क्लॉज़ आ गए." बेटी ने मुड़कर सेंटा को ध्यान से देखा और मुस्कुराकर कहा, "मुझे पता है, ... वह तो बॉब है." तब हमने ध्यान से देखा और पाया कि संता की वेशभूषा में वे स्कूल के संरक्षक बॉब ही थे.

उस प्री-स्कूल की कक्षाओं की खिड़कियों में एक तरफ़ से देख सकने वाले शीशे लगे थे ताकि माता-पिता बाहर रहकर भी कक्षा के अन्दर के अपने बच्चों को देख सकें जबकि अन्दर से बच्चे बाहर का कुछ न देख पायें. अक्सर होता यह था कि मेरी पत्नी स्कूल की छुट्टी होने से पहले ही स्कूल चली जाती थी. जब भी वे कक्षा की खिड़की के बाहर खड़ी होती थीं और अगर बेटी की नज़र इत्तेफाक से खिड़की पर पड़ जाए तो वह उंगली से हवा में उनके चेहरे का रेखांकन सा करती हुई अपनी शिक्षिका से "माय मॉम!" कहती हुई बाहर आ जाती थी. यदि शिक्षिका उसकी बात पर अविश्वास करते हुए उसको पकड़कर वापस ले जाने की कोशिश करती तो वह रोना शुरू कर देती थी थी और बाहर आकर ही दम लेती थी. शिक्षिका बाहर आकर देखती तो माँ को सचमुच वहाँ उपस्थित देखकर आश्चर्यचकित रह जाती थी.

================
* सम्बन्धित कड़ियाँ *
================
* एक शाम बेटी के नाम
* इस्पात नगरी से - अन्य शृंखला
* जिंगल बेल - भारतीय संस्करण - कार्टून
* क्रिस्मस के 12 दिन - कार्टून
* तेरी है ज़मीं, तेरा आसमाँ

Thursday, December 25, 2008

पिट्सबर्ग की तीन नदियाँ [इस्पात नगरी ३]

.
पिट्सबर्ग पर यह नई कड़ी मेरे वर्तमान निवास स्थल से आपका परिचय कराने का एक प्रयास है। संवेदनशील लोगों के लिए यहाँ रहने का अनुभव भारत के विभिन्न अंचलों में बिताये हुए क्षणों से एकदम अलग हो सकता है। कोशिश करूंगा कि समानताओं और विभिन्नताओं को उनके सही परिप्रेक्ष्य में ईमानदारी से प्रस्तुत कर सकूं। आपके प्रश्नों के उत्तर देते रहने का हर-सम्भव प्रयत्न करूंगा, यदि कहीं कुछ छूट जाए तो कृपया बेधड़क याद दिला दें, धन्यवाद! अब तक की कड़ियाँ यहाँ उपलब्ध हैं: खंड १; खंड २

इसी शृंखला में एक पिछली पोस्ट में दिनेशराय द्विवेदी जी ने नदी के फोटो पर एक प्रश्न किया था कि क्या नगर के बीच से नदी गुज़र रही है, यदि हाँ तो क्या वह प्रदूषित नहीं होती है। आइये एक नज़र पिट्सबर्ग की नदी व्यवस्था पर डालें। मगर उससे पहले एक बात और। जब मैं भारत में था, गरमी के मौसम में हर साल राज्यों के बीच होने वाली पानी की लड़ाई के बारे में सुनता था। क्योंकि एक तो बाँध रखने वाले राज्य पड़ोसी राज्यों के लियी पानी छोड़ने में कोताही बरतते थे। दूसरे कभी-कभी पीछे से आने वाला जल इतना ज़्यादा प्रदूषित होता था कि संशोधन यंत्र उसे साफ़ करने में असमर्थ ही होता था। बाँध वाले राज्यों का तर्क होता था कि उनके बाँध में अपने राज्य की आपूर्ति के बाद सिर्फ़ कानूनी रूप से आरक्षित रखने लायक पानी ही बचता है और ऐसे में वे इस पानी को दूसरे राज्य को नहीं दे सकते। गर्मियों में पानी की ज़रूरी आपूर्ति भी न कर सकने वाले वही बाँध बरसात के मौसम में बिना चेतावनी के लाखों क्यूसेक पानी छोड़कर अगणित जिंदगियां और संसाधनों का विनाश कर देते हैं। याद है कोसी की हालिया बाढ़?

उथली नदियों को देखकर शायद आपके मन में भी विचार आता होगा कि सैकडों गाँवों को डुबाकर उनकी जगह पर ऐसे मंहगे, अक्षम और विनाशकारी बाँध बनाने के बजाय क्यों न नदियों को ही गहरा करके सदानीरा बनाया जाए। गहरी नदियाँ हमारी तंग सड़कों से यातायात का बोझ भी कम कर सकेंगी और जलापूर्ति में भी सहायक होंगी। हिमनदों के सूखते जाने के साथ यह विकल्प भविष्य के लिए और भी ज़रूरी सिद्ध होगा। मैं तो यह कहता हूँ कि देश के जल संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण एक नए सार्वजनिक उपक्रम को दिया जाए जिसके विशेषज्ञ इनके वैज्ञानिक दोहन और आपूर्ति के लिए जिम्मेदार हों। हर राज्य को ज़रूरत भर का पानी मिलने की गारंटी हो और उसके बदले में वह अनुपात रूप से राशि इस उपक्रम को दे।

यहाँ पिट्सबर्ग में अमेरिका के अन्य नगरों की तरह ही चोबीसों घंटे जल-विद्युत् की आपूर्ति है। पिट्सबर्ग तीन नदियों का नगर है। यह नदियाँ शहर के बीच से गुज़रती हैं और इसलिए यह नगर पुलों और सुरंगों से घिरा हुआ है। दो नदियाँ मोनोंगाहेला (Monongahela) व अलेघनी (Allegheny) मिलकर ओहियो नदी बनाती हैं। इस संगम को यहाँ पॉइंट कहते हैं। अब आपको एक राज़ की बात बताऊँ जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। इन दोनों नदियों के अलावा हमारी सरस्वती की ही तरह यहाँ पर एक ज़मींदोज़ नदी भी है जिसका नाम है विस्कोंसिन हिमसंहति प्रवाह (Wisconsin Glacial Flow)। यह ज़मीन के अन्दर एक से डेढ़ मील नीचे बनी एक प्राकृतिक सुरंग में बहती है और इसकी चौडाई १५ से ३५ फ़ुट तक है। ऐसी नदियों के लिए अंग्रेजी शब्द है अक्विफर (aquifer)।

तीनों नदियाँ इतनी गहरी और चौड़ी हैं कि उनमें नियमित यातायात चलता है। जिसमें छोटी नावों, पर्यटन जहाजों से लेकर कोयला और लोहा ले जाने वाले बड़े बजरे भी शामिल हैं। यहाँ तक कि स्थानीय विज्ञान केन्द्र के बाहर नदी के तट पर एक सेवानिवृत्त पनडुब्बी भी खड़ी रहती है।

पिता-पुत्री पनडुब्बी के गर्भगृह में
प्रशासन के लिए नदियों की साफ़-सफाई और सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण है। पानी की गुणवत्ता, उसके स्तर और जलचरों का अध्ययन पूरे साल चलता रहता है। नदी में नाव चलाने या मछली पकड़ने के लिए नगर से परमिट लेना आवश्यक है। नदी की अपनी पुलिस है जो कि मोटर-चालित नावों और जल-स्कूटरों में घूमती रहती है। नदी में मिलने वाले जल को स्वच्छ रखना नगर निगम और उद्योगों की जिम्मेदारी है। जल-स्रोतों को विषैला या प्रदूषित करने वालों के प्रति कड़ी कार्रवाई की जाती है। सबसे बड़ी बात है कि यहाँ के नियम पारदर्शी और सबके लिए एक समान हैं। जल-स्तर के साथ-साथ बारिश का आंकडा भी रखा जाता है और बारिश के स्तर की घाट-बढ़ के आधार पर नदी में जल होते हुए भी नगर-पालिकाएं कड़े निर्देश जारी कर देती हैं जैसे कि लान में घास पर पानी डालने पर अस्थायी प्रतिबन्ध। बारिश होने की वजह से आंकडों में परिवर्तन होते ही वह प्रतिबन्ध हटा लिया जाता है।

==========================================
सम्बन्धित कड़ियाँ
==========================================
* संता क्लाज़ की हकीकत
* इस्पात नगरी से - शृंखला
==========================================

Wednesday, December 24, 2008

क्रिसमस की शुभकामनाएं [इस्पात नगरी २]

पिट्सबर्ग पर यह नई कड़ी मेरे वर्तमान निवास स्थल से आपका परिचय कराने का एक प्रयास है। संवेदनशील लोगों के लिए यहाँ रहने का अनुभव भारत के विभिन्न अंचलों में बिताये हुए क्षणों से एकदम अलग हो सकता है। कोशिश करूंगा कि समानताओं और विभिन्नताओं को उनके सही परिप्रेक्ष्य में ईमानदारी से प्रस्तुत कर सकूं। आपके प्रश्नों के उत्तर देते रहने का हर-सम्भव प्रयत्न करूंगा, यदि कहीं कुछ छूट जाए तो कृपया बेधड़क याद दिला दें, धन्यवाद! अब तक की कड़ियाँ यहाँ उपलब्ध हैं: इस्पात नगरी - खंड १
जब यू एस स्टील ने इस्पात का ढांचा खडा किया तो भला PPG (पिट्सबर्ग प्लास्टिक एंड ग्लास) कैसे पीछे रहती. उन्होंने इमारतों का एक पूरा खंड ही बना डाला शीशे और प्लास्टिक से. हर साल क्रिसमस के मौके पर इन भवनों के बीच में एक विशाल क्रिसमस ट्री के चारों ओर एक स्केटिंग रिंक बनाया जाता है. देखिये उसकी एक झलक.

कुछ समय पहले तक माइक्रोसॉफ्ट का स्थानीय कार्यालय भी इसी खंड में होता था. इसी खंड की एक इमारत के अन्दर भी एक बड़े पेड़ के चारों ओर विश्व के अनेक देशों की क्रिसमस परम्पराओं की झलकियाँ देखने को मिलती है. हर साल, नगर भर के स्कूली बच्चों के बीच जिंजरब्रेड हाउस बनाने की प्रतियोगिता का आयोजन होता है. यह सारे जिंजरब्रेड हाउस दर्शन के लिए रखे जाते हैं और बाद में उनको विक्रय कर के प्राप्त धन जनसेवा और सत्कार्यों में प्रयुक्त होता है.

ऊपर का चित्र बच्चों द्वारा बनाए जिंजरब्रेड घरों का और नीचे के चित्र में यीशु के जन्म की झांकी.

जब मैं यह पोस्ट लिख रहा था तभी एक अमेरिकी सहकर्मी ने फ़ोन करके बताया कि वे और उनकी बेटी सैंटा क्लाज़ का पीछा कर रहे हैं और अभी-अभी उन्होंने सैंटा को भारत में घूमकर उपहार बांटते हुए देखा है. आप भी http://www.noradsanta.org/en/home.html पर जाकर देख सकते हैं कि इस समय संत निकोलस क्लाज़ जी दुनिया के किस कोने में उड़ रहे हैं और कब वे आपके घर के निकट आने वाले हैं।

[विशेष नोट: दिनेश राय द्विवेदी जी ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि सैंटा क्लाज़ का यह लिंक वाइरस बाँट रहा है। मुझे नहीं पता कि उनके इस कथन का आधार क्या है, मगर मैं इतना विश्वास से कह सकता हूँ कि इस वेबसाईट में सांझी दोनों ही कंपनियाँ अति-विश्वसनीय हैं और अगर यह लिंक वाइरस बांटने लगा तो जान लीजिये कि दुनिया की कोई भी साईट सुरक्षित नहीं है। पहली संस्था है गूगल और दूसरी है नोराड गूगल के बारे में तो आप सब जानते हैं, नोराड (North American Aerospace Defense Command) संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा का सांझा सैनिक कार्यक्रम है जो कि १९६८ में शुरू हुआ था। संता क्लाज़ का पीछा करने वाले इस लिंक के बारे में बीबीसी पर ख़बर यहाँ पढी जा सकती है: http://news.bbc.co.uk/1/hi/7792256.stm और अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया का लिंक यहाँ पर है: http://en.wikipedia.org/wiki/NORAD_Tracks_Santa , यहाँ मैं यह याद दिलाना भी ज़रूरी समझता हूँ कि कम्प्युटर और इन्टरनेट न सिर्फ़ मेरे अभ्यास का क्षेत्र हैं यह मेरा व्यवसाय भी है और उससे सम्बंधित विषयों में आप यहाँ भी और आगे भी मुझपर बेधड़क भरोसा कर सकते हैं।]
आप सभी को क्रिसमस की शुभकामनाएं!

Thursday, November 20, 2008

लिखने को बहुत कुछ है

कभी-कभी यूँ भी होता है कि कहने को बहुत कुछ होता है मगर इतनी सारी बातों में यह समझ नहीं आता कि क्या कह दिया जाए और क्या रह दिया जाए. कुछ ऐसा ही आजकल मेरे आसपास हो रहा है. मौसम तेज़ी से बदल रहा है. कल तक तरह-तरह के रंगों से सुशोभित पेड़ ठूँठ से नज़र आने लगे हैं. सुबह घर से जल्दी निकलो तो बर्फ की चादर से ढँकी घास का रंग सफ़ेद दिखता है. आज रात में तीन इंच बर्फ जमने की संभावना है.

पिछले हफ्ते की बेरोजगारी की दर पिछले सोलह साल में सर्वाधिक थी. लोग मंदी की मार के मारे हुए हैं. शेयर बाज़ार तो कलाबाजियां खाता जा रहा है. सिटीबैंक का शेयर आज पाँच डॉलर से नीचे चला गया. बहुत पैसा डूब गया. मगर ऐसा भी नहीं कि सब कुछ ख़राब ही हो रहा हो. हर स्टोर में सेल लगी हुई है. सेल तो वैसे हर साल ही लगती है मगर इस साल तो हर कोई किसी तरह करके भी अपना माल बेचने का भरसक प्रयत्न कर रहा है. और उसके लिए वे ग्राहक को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. बहुत सी दुकानों को डर है कि अगर इस सीज़न में पैसा नहीं बना सके तो शायद अगले सीज़न तक धंधे से बाहर ही न हों. पेट्रोल की कीमतों में गिरावट भी जारी है. कुछ स्थानों में प्रति-गैलन पेट्रोल भी दो डॉलर से कम आ गया.

दफ्तर के बाहर के बड़े से सजावटी फव्वारे को जब लकडी के फट्टों से ढंका जाने लगा तो यही सोचा कि शायद बर्फ से बचने के लिए ऐसा किया जा रहा हो. मगर जब उस पर बाकायदा सेट तैयार होने लगा तो ध्यान आया कि यहाँ भी त्योहारों का मौसम आ चुका है. बाज़ार में सड़क-किनारे लगे पेड़ों को बिजली की झालरों से सजाया जाने लगा है. जगह-जगह ईसा मसीह के जन्म के दृश्य की झाँकियाँ बननी शुरू हो गयी हैं. दफ्तर के बाहर के फव्वारे के ऊपर हर साल एक बहुत बड़ी झांकी लगती है.शुक्रवार को शहर की सालाना "लाईट अप नाईट" है जो कि आधिकारिक रूप से त्यौहार के मौसम का आरम्भ मानी जा सकती है.

ऐसा भी नहीं है कि सब लोग त्यौहार की खुशी में शरीक ही हों. कुछ लोग तो गिरती बर्फ में शून्य से नीचे के तापक्रम में खड़े होकर काम मांगते दिख जाते हैं ताकि अपने बच्चों के लिए क्रिसमस के उपहार खरीद सकें. मगर कुछ लोग अकारण भी नाखुश रहने की कला जानते हैं. पिछली बार कुछ दलों ने इस बात पर हल्ला मचाया था कि कुछ दुकानों ने "शुभ क्रिसमस" के चिह्न क्यों लगाए थे. यह दल चाहते थे कि दुकानें सिर्फ़ एक "सीजंस ग्रीटिंग" जैसा धर्म-निरपेक्ष नारा ही लिखें.

समाज सेवी संस्थायें भी काम पर निकल पडी हैं ताकि बालगृह और अनाथालय आदि में रह रहे बच्चों तक उपहार और बेघरबार लोगों तक ऊनी कपड़े आदि पहुँचाए जा सकें. कुल मिलाकर यह समय विरोधाभास का भी है और संतुष्टि का भी. कोई उपहार पाकर संतुष्ट है और कोई उपहार देकर!

चित्र सौजन्य: अनुराग शर्मा
ओमनी विलियम पेन होटल में लाईट अप नाईट का दृश्य

चित्र सौजन्य: अनुराग शर्मा
मेरे कार्यालय के बाहर यीशु के जन्म का दृश्य

दोनों चित्र: अनुराग शर्मा द्वारा ::  Photos by Anurag Sharma
.