Sunday, September 28, 2008

एक शाम बेटी के नाम

शाम का धुंधलका छा रहा था। हम लोग डैक पर बैठकर खाना खा रहे थे। बेटी अपने स्कूल के किस्से सुना रही थी। वह इन किस्सों को डी एंड डी टाक्स (डैड एंड डाटर टाक्स = पिता-पुत्री वार्ता) कहती है। आजकल हमारी पिता-पुत्री वार्ता पहले से काफी कम होती है। पिछले साल तक मैं सुबह दफ्तर जाने से पहले उसे कार से स्कूल छोड़ता था और लंच में जाकर उसे स्कूल से ले आता था। तब हमारी वार्ता खूब होती थी। वह अपने किस्से सुनाती थी और मेरे किस्से सुनने का आग्रह करती थी। यही वह समय होता था जब मुझे उसकी नयी कवितायें सुनने को मिलती थीं। उसने अपनी अंग्रेजी कहानी "मेरे जीवन का एक दिन" भी ऐसी ही एक वार्ता के दौरान सुनाई थी। जब से मेरा दफ्तर दूर चला गया है मैं रोज़ सुबह बस लेकर ऑफिस जाता हूँ। वह भी बस से स्कूल जाती है। हमारी वार्ता की आवृत्ति काफी कम हो गयी है। या कहें कि पहले रोज़ सुबह शाम होने वाली वार्ता सिर्फ़ सप्ताहांत की शामों तक ही सीमित रह गयी है।

उसने अपने क्लास के एक लड़के के बारे में बताया जो सब बच्चों के पेन-पेन्सिल आदि ले लेता है। जब उसने बताया कि एक दिन उस लड़के ने बेटी का कैलकुलेटर भी ले लिया तो मैंने पूछा, "बेटा, कहीं ऐसा तो नहीं कि उसके पास यह सब ज़रूरी समान खरीदने के लिए पैसे न हों?" बेटी ने नकारते हुए कहा कि उस लड़के के कपड़े तो बेशकीमती होते हैं।

आजकल अमेरिका की आर्थिक स्थिति काफी डावांडोल है। बैंक डूब रहे हैं, नौकरियाँ छूट रही हैं। भोजन, आवागमन, बिजली, गैस आदि सभी की कीमतें बढ़ती जा रही हैं. अक्सर ऐसी खबरें पढने में आती हैं जब इस बुरी आर्थिक स्थिति के कारण लोग बेकार या बेघर हो गए। कल तक मर्सिडीज़ चलाने वाले आज पेट्रोल-पम्प पर काम करते हुए भी नज़र आ सकते हैं। बच्ची तो बाहर की दुनिया की सच्चाई से बेखबर है। मेरे दिमाग में आया कि उस लड़के का परिवार कहीं ऐसी किसी स्थिति से न गुज़र रहा हो। मैंने बेटी को समझाने की कोशिश की और बात पूरी होने से पहले ही पाया कि वह कुछ असहज थी। मैंने पूछना चाहा, "आप ठीक तो हो बेटा?" मगर उसने पहले ही रूआंसी आवाज़ में पूछा, "आप ठीक तो हैं न पापा?"

"हाँ बेटा! मुझे क्या हुआ?" मैंने आश्चर्य से पूछा।

"मेरा मतलब है... आपका जॉब..." उसने किसी तरह से अटकते हुए कहा। बात पूरी करने से पहले ही उसकी आंखों से आंसू टप-टप बहने लगे। मैंने उसे गले से लगा लिया। उसकी मनोदशा जानकर मुझे बहुत दुःख हुआ। मैंने समझाने की भरपूर कोशिश की और कहा कि अगर मेरे साथ कभी ऐसा होता तो मैं उसे अपनी बेटी से, अपने परिवार से कभी छुपाता नहीं। मेरे इस वाक्य से उसकी भोली मुस्कान वापस आ गयी। यह जानकर खुशी हुई कि उसे अभी भी अपने पिता के सच बोलने पर पूरा भरोसा है।


32 comments:

  1. भावपूर्ण वार्तालाप -मेरी बेटी भी भी अब दूर है और उससे वार्ता की आवृत्ति कम हो चली है ! डी एंड ई डी टाक्स का सन्दर्भ और फुल फार्म अभी अभी उसे फोन पर बताया तो आनंद ले रही थी -क्योंकि हमने मिलकर ऐसे ही एक जुमले का ईजाद उसकी मम्मी का दरवाजे पर खडे रहकर पडोसन से लम्बी वार्ता के लिए किया था -डी डी एंड टी -मतलब delayed door talking !

    ReplyDelete
  2. मार्मिक और ह्रदयस्पर्शी।

    ReplyDelete
  3. यह जानकर खुशी हुई कि उसे अपने पापा के सच बोलने पर अभी भी पूरा भरोसा है।
    "beautiful story with emotional touch"

    Regards

    ReplyDelete
  4. Bhavnatmak bhi aur ek achha sandesh dene wali excellent story. Dusari khaas baat, real story hai.

    ReplyDelete
  5. ओह, यह पता नहीं था - अर्थव्यवस्था का मानव सम्बन्धों और संवेदनाओं पर बहुत असर हो रहा है।
    आपकी इस पोस्ट से अन्दाज हुआ।

    ReplyDelete
  6. बेहद दिल को छू लेने वाली पोस्ट लगी यह ..शुक्रिया

    ReplyDelete
  7. इसलिए तो रोज के दिन के कुछ हिस्से ...बच्चो के नाम

    ReplyDelete
  8. दिल को छू गई बाप बेटी के बीच हुए संवाद की यह प्रस्तुति..किस किस तरह से संवेदित करती है बिगड़ती अर्थव्यवस्था या डगमगाई कोई सी भी व्यवस्था. एक बेहतरीन पोस्ट.

    ReplyDelete
  9. बेटियाँ जितना समझ लेती हैं माँ-बाप को शायद और कोई नहीं।

    ReplyDelete
  10. "एक शाम बेटी के नाम" पढ़ कर ऐसा लग रहा है जैसे मैं अपनी बेटी के साथ बिताया समय याद कर रहा होवुं !
    असंख्य यादे जेहन में आ गई ! आप बहुत सुंदर ढंग से मानवीय संबंधो को जैसे का तैसा उतार कर रख देते हैं !
    प्रणाम मित्र आपको ! और बेटी को बहुत प्यार और आशीष !

    ReplyDelete
  11. अनुराग जी
    ऐसी ही होती हैं बेटियाँ. माता -पिता का दर्द बहुत जल्दी समझ जाती हैं. उनको संवेदन शीलता भगवान की तरफ़ से ही मिलती है. बेटी के पिता हैं इस्वर का धन्यवाद करिए की उसने आपको इतनी प्यारी बेटी दी है.

    ReplyDelete
  12. बहुत संवेदन शील यादें हैं ! बच्चो का बचपन हमको भी बच्चा बना देता है !
    बेटियों को कितनी फिकर रहती है अपने पापा की !

    "मेरा मतलब है... आपका जॉब..." उसने किसी तरह से अटकते हुए कहा। बात पूरी करने से पहले ही उसकी आंखों से आंसू टप-टप बहने लगे।

    इसीलिए तो बेटियाँ इतनी लाडली होती हैं अपने पापा की ! बहुत शुभकामनाएं !

    ReplyDelete
  13. दिल को छूती हुई है यह पोस्ट। भावुक कर गई।

    ReplyDelete
  14. दिल को छु गयी आपकी बात!!

    ReplyDelete
  15. यह हाल युरोप का भी हो रहा हे,यहां भी बेरोजगारी बढती जा रही हे, लेकिन एक बात मुझे आप की समझ नही आई**कल तक मर्सिडीज़ चलाने वाले पेट्रोल-पम्प पर काम करते हुए भी नज़र आ सकते हैं। ** अरे भाई यहां तो मजदुर भी मर्सिडीज़ चलाते हे, हां यहां कुछ लोगो को बिमारी हे चोरी करने की वह चाहे कितने भी अमीर क्यो ना हो.... मेरे गार्डन से कोई फ़ुल चोरी करता था, जब मेने पकडा तो हेरान रह गया..
    धन्यवाद

    ReplyDelete
  16. बहुद सुँदर -
    बिटिया अपराजिता का आलेख भी पढा
    और बहुत अच्छा लगा :)
    - लावण्या

    ReplyDelete
  17. बस दि‍ल को छू गया। बेटि‍यॉं जि‍तना घर परि‍वार से लगाव रखती हैं, वह बेटों में कम ही मि‍लती हैं। आप खुशनसीब हैं जो आपकी इतनी प्‍यारी बेटी है।

    ReplyDelete
  18. वाह...भावनात्मक प्रेम हम भारतीयों की पहचान है...मैंने देखा है अमेरिका में रिश्तों के खोखले पन को...बहुत से बड़े बूढे और युवक हलके से कुरेदने पर अपने रिसते घाव छुपा नहीं पाते थे...बहुत अच्छा लिखा है आपने और आप की बिटिया, इश्वर उसे हमेशा खुश रखे, जैसे बिटिया इश्वर हर किसी को दे.
    नीरज

    ReplyDelete
  19. Aapki beti ko dher sara pyaar aur aashirwaad.Kismatwale ko hi bhagwaan putri sukh dete hain.

    ReplyDelete
  20. aapki beti ka panna padha.Nischal baaten vibhor kar gayin.Usme aapke sanskaar koot koot kar bhare hain.Ishwar use sada sukhi rakhen.Betiyan yun bhi ishwariya kripa ka saakshat roop hai.

    mujhe bhi ek wakaya yaad aa gaya.mera beta lagbhag paanch varshon tak mera doodh peeta raha tha.Iske alawe wah aur koi bahri doodh nahi peeta tha.Jo koi bhi use gaay ka doodh peene ko kahte to ekdam se lad jata ki main Jaanvar ka doodh kyon peeun ? Jaanwar ka doodh uske bachche ke liye hai.Main aadmi ka bachcha hun aadmi/apni maa ka doodh hi punga.....Yah baat use kisine nahi batayi thi,yah wah apne man se hi kahta tha.Mujhe bhi kahin na kahin yah baat bahut sahi lagti hai.

    ReplyDelete
  21. सचमुच बेटियां ऐसी ही होती हैं। मन को छू गयी यह पोस्‍ट। बिटिया को सस्‍नेह आशीष।

    ReplyDelete
  22. सचमुच बे‍टियां ऐसी ही होती हैं..मन को छू गयी यह पोस्‍ट। बिटिया को सस्‍नेह आशीष।

    ReplyDelete
  23. बहुत खूब। दिल को छू गयी यह घटना। सचमुच बेटियाँ ऐसी ही होती हैं।

    ReplyDelete
  24. betiyan swbhav se hi komal hoti hain. apne janak ke liye uske bhav aise hi hoten hai. use sneh den

    ReplyDelete
  25. बेटियां इतनी संवेदनशील,प्यारी और मोहनी होती हैं। क्यों? यह सवाल आज तक समझ में नहीं आया। खैर। हमारी ही तरह आपको भगवान ने दोनों दिए हैं। इसके लिए उनको शुक्रिया।

    ReplyDelete
  26. आप जितनी सुंदर कविता लिखते उतना ही सुंदर आलेख सच ही है प्रतिभा प्रतिभा होती है बधाई

    मेरी नई पोस्ट कांग्रेसी दोहे पढने हेतु आप मेरे ब्लॉग पर सादर आमंत्रित हैं

    ReplyDelete
  27. मुख्तसर सी बात है, दिल को छू गई.

    इन बच्चों के आंसू अनमोल है.

    ReplyDelete
  28. बच्ची में गहराई से चिंतन का सामर्थ्य गज़ब है।

    ReplyDelete

मॉडरेशन की छन्नी में केवल बुरा इरादा अटकेगा। बाकी सब जस का तस! अपवाद की स्थिति में प्रकाशन से पहले टिप्पणीकार से मंत्रणा करने का यथासम्भव प्रयास अवश्य किया जाएगा।