Wednesday, April 17, 2013

किसी की जान जाये, शर्म हमको मगर नहीं आती

घर दिल्ली की पश्चिमी सीमा पर  बहादुरगढ़ के पास और दफ्तर यमुना के पूर्व में उत्तर प्रदेश के अंदर। जीवन की पहली नौकरी, सीखने के लिए रोज़ एक नई बात। सुबह सात बजे घर से निकलने पर भी यह तय नहीं होता था कि दस बजे अपनी सीट पर पहुंचूंगा कि नहीं। मो सम जी वाली किस्मत भी नहीं कि सफर ताश खेलते हुए कट जाये। अव्वल तो किसी भी बस में सीट नहीं मिलती थी। कुछ बसें तो ऐसी भी थीं जिनमें से ज़िंदा बाहर आना भी भाग्य की बात थी। तय किया कि घर से सुबह छः बजे निकल लिया जाये।

दक्षिण भारतीय बैंक था सो कर्मचारी वर्ग उत्तर का और अधिकारी वर्ग दक्षिण का होता था। संस्कृति का अंतर भी स्पष्ट दिखता था। अधिकारी वर्ग के लोग झिझकते हुए हल्की आवाज़ में बात करने वाले, विनम्र, कामकाजी और धार्मिक से लगते थे। कर्मचारी  वर्ग के अधिकांश लोग - सब नहीं - वैसे थे जिन्हें हिन्दी में "लाउड" कहा जा सकता है। शाखा के वरिष्ठ प्रबन्धक एक अपवाद थे। दूध सा गोरा रंग, छोटा कद, हल्के बाल, पंजाबी भाषी। पहले दिन ही लंबा-चौड़ा इंटरव्यू कर डाला। छिपे शब्दों में नई नौकरी के खतरों से आगाह भी कर दिया। उसके बाद तो सुबह को रोजाना ही कुछ देर बात करने का नियम सा हो गया क्योंकि हम दो लोग ही सबसे पहले आते थे। पौने दस बजे अपनी घड़ी सामने रखकर हर आने वाले कर्मचारी को देखकर फिर अपनी घड़ी देखने वाले व्यक्ति ने जब मुझे यह सुझाया कि इतना जल्दी आने की ज़रूरत नहीं है तो कइयों को  झटका लगा।

तय यह हुआ कि मैं घर से यदि सात बजे निकलूँ तो नोएडा मोड़ पर लगभग उसी  समय पहुंचूंगा जब बड़े साहब की कार पहुँचती है। वहाँ से आगे बस और रिक्शे के झंझट से बचने भर से ही मेरी 40-45 मिनट की बचत हो जाएगी। फिर तो यह रोज़ का नियम हो गया। बड़े साहब के साथ छोटे साहब यानी शाखा प्रबन्धक जी भी आते थे। बैंक की अधिकारी परंपरा के वाहक, विनम्र, नफीस, टाल, डार्क, हैंडसम। शाखा में बड़ी इज्ज़त थी उनकी। कर्मचारी ही नहीं, ग्राहक भी सम्मान करते थे।  

बड़े साहब से पहचान बढ़ती गई मगर प्रबन्धक जी ने  "बेबी ऑफ द ब्रांच" की उपाधि देकर भी पद की गरिमा का सम्मान रखते हुए संवाद सीमित ही रखा। मेरे जॉइन करने के कुछ ही हफ्तों में दो-चार रिलीविंग पार्टियां हो गईं। बड़े साहब ने जहां हिन्दी और पंजाबी गीत सुनाये, प्रबन्धक जी ने मातृभाषा न होते हुए भी नफासत से भरी गज़लें सुनाकर शाखा भर को प्रभावित कर लिया। 

उस दिन जब हम तीनों कार में बातें करते आ रहे थे बड़े साहब बिना किसी संदर्भ के बोले, "लोग यह कैसे भूल जाते हैं कि उनके साथ भी यह हो सकता है।" जब तक मैं कुछ समझ पाता, बैंक की सफ़ेद अंबेसडर कार सड़क के बीच डिवाइडर के पास वहाँ खड़ी थी जहां एक स्कूटर पड़ा हुआ था। उसका चालक डिवाइडर पर चित्त बेहोश पड़ा था। सर फटा हुआ था पर खून जम चुका था। सर पर आर्टिफेक्ट की तरह रखा हुआ बिना फीतों का हैलमेट कुछ दूर पड़ा था। कोई बेहया वाहन उसे टक्कर मारकर मरने के लिए छोड़ गया था। दिल्ली-नोएडा मार्ग, थोक में आते जाते वाहन। किसी ने भी उसे न देखा हो, यह सोचना तुच्छ कोटि की मासूमियत होती। मैंने और बड़े साहब ने मिलकर उसका त्वरित निरीक्षण किया और जैसा कि स्वाभाविक था उसे कार की पिछली सीट पर बिठा दिया। 

इस सारी प्रक्रिया में ऐसे बहुत से व्यवसायियों की गाडियाँ वहाँ से गुज़रीं जो बैंक में रोजाना आते तो थे ही, हमारी एक नज़र पर अपनी दुनिया कुर्बान कर देने की बात करते थे। फिलहाल वे सभी हमारी नज़र से बचने की पूरी कोशिश में थे। दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को कार में सुरक्षित करने के बाद जब मैंने इधर-उधर देखा तो पाया कि हमारे रुकते ही सड़क पार करके फुटपाथ पर चले जाने वाले नफीस प्रबन्धक जी शाखा के समय से खुलने की ज़िम्मेदारी के चलते एक पार्टी के वाहन में शाखा की ओर चले गए थे। हमारे वहाँ से चलने से पहले ही एक पुलिस कार आकर उस व्यक्ति को अस्पताल ले गई। एक अन्य पुलिस वाहन ने रुककर हमसे कुछ सवाल-जवाब किए और नाम-पता लेकर वे भी चले गए। भला हो मोटरसाइकिल से गुजरने वाले उस लड़के का जो हमें देखकर पास के बीट-बॉक्स में पुलिस को सूचना देने चला गया था।     

हम तो जी उन बड़े साहब के वो मुरीद हुए कि आज तक हैं। रास्ते में बड़े साहब ने यह आशंका भी व्यक्त की कि दुर्घटनाग्रस्त को बचाने में खतरा तभी है जब उसकी जान बच न पाये। तब से अब तक काफी कुछ बदला है। दूसरों को बचाने वालों पर छाया संशय का खतरा टला है। क़ानूनों में ज़रूरी परिवर्तन हुए हैं ताकि लोग सड़क पर मरतों को बचाने में न डरें। फिर भी जयपुर की हाल की घटना यही बता रही है कि इंसान बनने में अभी भी काफी दिक्कतें हैं। एक माँ बेटी की जान सिर्फ इसलिए चली गई कि सड़क से गुजरे अनेक लोगों में से किसी के सीने में भी दिल नहीं धड़का। 27 साल पहले कही उनकी बात आज भी वैसी ही कानों में गूंज रही है,  "लोग यह कैसे भूल जाते हैं कि उनके साथ भी यह हो सकता है।"       
   

40 comments:

  1. यह एक घटना खबर में आ गयी मगर जाने ऐसे कितने रोज हैं बड़े शहरों में ,लोग चुपचाप निकल जाते हैं ! कई खट्टे मीठे अनुभवों को याद करते भी इस घटना ने क्षुब्ध किया :(

    ReplyDelete
  2. सिर्फ़ अपने काम से मतलब रखने वाले मानवी संवेदनाओं से रहित लोग कभी सोच नहीं पाते कि उनके साथ भी ऐसा ही कुछ हो सकता है.

    ReplyDelete
  3. यही तो होता नहीं, यदि लोग स्वयं को उस जगह रखकर सोचने लगें तो कम से कम पिचानवे प्रतिशत दुसवारियाँ खत्म हो जाएँ।

    ReplyDelete
  4. दरअसल हमारे सिस्टम में बड़ी खराबियां हैं...कई बार इंसान चाह कर भी मदद नहीं करता....
    हाँ फिर भी इंसानियत को अपनी जगह बनाये रखनी चाहिए...

    सादर
    अनु

    ReplyDelete
  5. अपनी अपनी सोच ओर अपने अपने अनुभव रहते हैं हर किसी की ऐसी दुर्घटनाओं को लेकर ..

    ReplyDelete
  6. vyaktigat rup sae mae jo kar saktii hun hameshaa karti hun aur niswaarth bhav sae nahin balki is liyae karti hun ki kabhie maere kisi apnae ko jarurat ho to uskae liyae bhi koi kar dae

    ReplyDelete
  7. लोग भूल ही जाते हैं...कैसे, यह तो वे ही जानें, कुछ वर्ष पहले मेरी एक परिचिता की छोटी बहन दक्षिण भारत के एक बड़े शहर में इसी तरह सड़क पर ही दम तोड़ गयी थी, आपके बड़े साहब को हमारा नमन.

    ReplyDelete
  8. समस्याएं तो है, लेकिन लोगों में साहस विवेक और समझ को निरंतर विकसित करना होगा। विश्वास के योग्य वातावरण का निर्माण आवश्यक है। अच्छे विचारों के प्रसार से मानसिकता में सुधार अब भी सम्भव है। सर्वे भवन्तु सुखिनः……

    ReplyDelete
  9. जीवन तो वैसे भी खत्‍म हो गया है। लोग तो जीने-मरने पर बात करने, इस बाबत लेख लिखने पर सलाह देते हैं कि मस्‍त रहो बस।

    ReplyDelete
  10. कानून बदला है पर सोच नहीं. :(.

    ReplyDelete
  11. जीवन तो सबका मिट ही गया है। हां दुर्घटना में किसी का निधन होना दिल पर चोट पहुंचाता है।

    ReplyDelete
  12. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

    ReplyDelete
  13. संवेदनाएं तो कब की मर चुकीं। संवेदनशीलता अब सिर्फ एक शब्द मात्र है जिसका प्रयोग लेखन तथा वाचन में बहुतायत से किया जाता है। तटस्थता अब एक फैशन है, और संवेदनहीनता युगधर्म।

    ReplyDelete
  14. बड़े बड़े शहरों में रहने वाले बेशक निष्ठुर बन चुके हैं, किन्तु छोटे शेहरो और कस्बों में आज भी इंसानियत और सवेंदनशीलता है....

    ReplyDelete
  15. बेशक हमारी तत्परता से किसी की जान बचाई जा सकती है। लेकिन सडकों पर तमाशबीन ज्यादा नज़र आते हैं , मेहरबान कम।
    कानून में बदलाव हुआ है। अब ज़रूरी नहीं कि आप पुलिस को अपना नाम पता बताएं। कोई अस्पताल भी घायल को लेने से मना नहीं कर सकता। फिर भी पब्लिक एपेथी कायम है।

    ReplyDelete
  16. आज की ब्लॉग बुलेटिन गुड ईवनिंग लीजिये पेश है आज शाम की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  17. बेशक हम लोग सारा विश्व एक परिवार है की बात करें या फिर प्यार प्रेम कर्त्तव्य दया करुन पर वेद ग्रन्थ लिख मारें पर असल में हम लोग भीतर से निहायत ही आत्मकेंद्रित,स्वार्थी और जाने क्या क्या हैं। इस मुद्दे पर लम्बी नहीं फैकुंगा पूरी पोस्ट पढने के बाद जो समझ में आया है वही कहूँगा। अब मुझे पता चल पाया है की अच्छा लेखक होने के लिए बैंक से आपका जुडाव जरुरी है।

    ReplyDelete
  18. बेशक हम लोग सारा विश्व एक परिवार है की बात करें या फिर प्यार प्रेम कर्त्तव्य दया करुन पर वेद ग्रन्थ लिख मारें पर असल में हम लोग भीतर से निहायत ही आत्मकेंद्रित,स्वार्थी और जाने क्या क्या हैं। इस मुद्दे पर लम्बी नहीं फैकुंगा पूरी पोस्ट पढने के बाद जो समझ में आया है वही कहूँगा। अब मुझे पता चल पाया है की अच्छा लेखक होने के लिए बैंक से आपका जुडाव जरुरी है।

    ReplyDelete
    Replies
    1. दाँत में बम है,
      आई मीन ...
      बात में दम है!

      Delete
  19. भैया आजकल इंसानी ह्रदय में संवेदनाएं ख़त्म हो गई है | कलयुग है ये कोई जिये या मरे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता | सब की अपनी ढपली और अपना राग है और सब अपने में मस्त हैं | यहाँ पडोसी को पडोसी का पता नहीं होता और न ही भाई को भाई की फ़िक्र होती है फिर सड़क पर पड़े किसी अनजान की तो आप बात की छोड़ दो |

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

    ReplyDelete
  20. स्वप्न मञ्जूषा जी अउर दीपक बाबा की टिप्पणियों से सहमत. हाँ ये बैंक वाले बडे वो होते हैं.

    ReplyDelete
  21. स्वप्न मञ्जूषा जी और दीपक बाबा की टिप्पणियों से सहमत. हाँ ये बैंक वाले बडे वो होते हैं.

    ReplyDelete
  22. कानून मे बदलाव तो हुये है पर कानूनगो कहाँ बदले ... वो लोग आज भी सब से पहले बचाने वाले की क्लास लगाने की सोच रखते है ... ऐसे मे आम आदमी यही सोच अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निबाहता कि बैठे ठाले कौन आफत मोल ले ! पूरे सिस्टम को बदलना होगा तब जा कर इस तरह सड़क पर किसी की जान नहीं जाएगी !

    ReplyDelete
  23. इंसान संवेदना रहित तो नहीं है पर स्वार्थी ज़रूर है जब खुद पर पड़ती है तभी बात समझ आती है ।

    ReplyDelete
  24. बहुत सारी कानूनी और व्यक्तिगत पेचीदगी के कारण हम ऐसे हालात में बचाकर निकल जाते हैं क्या सही क्या गलत का विचार किये

    ReplyDelete
  25. दुखद है ....विपत्ति के समय एक दूजे का साथ देना हम सबकी साझी जिम्मेदारी है .... यकीनन संवेदनाओं का लोप हुआ है ....

    ReplyDelete
  26. निज दुख रज सम गिरि कर माना..

    ReplyDelete
    Replies
    1. देत लेत मन संक न धरई।
      बल अनुमान सदा हित करई॥

      Delete
  27. दुख होता है जब ऐसी घटनाओ के वीडियो बनाकर पोस्ट होते है ,, पहले मदद तो हो .... :-(

    ReplyDelete
  28. संवेदनशीलता की बातें करने वालों को अपना दिल टटोलना चाहिए ...
    लोगों के पास अक्सर समय का अभाव होता है :(

    ReplyDelete
  29. समाज का ख़ास आदमी तो समाज से खुद को अलग समझता ही है जिसे दीं दुनिया से कोई वास्ता नहीं.. आम आदमी बेचारा इस कदर दूध का जला है कि छाछ से भी जलने से डरता है.. समस्या उन आम आदमियों की जो इन दोनों के बीच में हैं और उन्होंने ही आदमीयत को ज़िंदा रखा है.. हाँ इसी में कुछ ऐसे भी हैं जो आम होते हुए भी ख़ास का मुखौटा लगाए घूमते हैं.. शर्म उनको मगर नहीं आती!!
    अपने बैंक से जुडी कहानी सुनकर दिल खुश गया अनुराग जी!!

    ReplyDelete
  30. खुद पर बीतती है तभी पता चलता है, दूसरों की पीडा तो पीडा ही नहीं लगती. पता नही ये हमको क्या होता जा रहा है?

    रामराम.

    ReplyDelete
  31. shayad samvedanayen marane lagi hain .....

    ReplyDelete
  32. लोग अपनी उलझनों में इतने उलझ गए हैं तो लगता है संवेदनाएं मर गई हैं
    पर कई बार कोई सहायता करते हुए खुद ऐसा फंसता है तो वो क्या दोबारा हिम्मत करेगा संवेदनशील होने की
    तेरे मन में राम [श्री अनूप जलोटा ]

    ReplyDelete
  33. सच कहा आपने, अपने को उस स्थान पर कल्पना कर लेने से संभवतः संवेदना जाग जाये।

    ReplyDelete
  34. Jo sabka mitra hota hai,darsal vah kisi ka mitra nahi hota
    (arstu)

    ReplyDelete

मॉडरेशन की छन्नी में केवल बुरा इरादा अटकेगा। बाकी सब जस का तस! अपवाद की स्थिति में प्रकाशन से पहले टिप्पणीकार से मंत्रणा करने का यथासम्भव प्रयास अवश्य किया जाएगा।