Friday, September 26, 2008

पतझड़



निष्ठुर ठंडी काली रातें
रिसते घाव रुलाती रातें।

फूल पात सब बीती बातें
सूने दिन और रीती रातें।

मुरझाया कुम्हलाया तन-मन
उजड़ी सेज कंटीली रातें।

मिलन बिछोहा सब झूठा था
सच हैं यही डराती रातें।

फटी पुरानी यादें लाकर
पैबन्दों को बिछाती रातें।

सूखे पत्ते सूनी शाखें
पतझड़ में सताती रातें।।


(रेखाचित्र: अनुराग शर्मा)

25 comments:

  1. फटी पुरानी यादें लाकर
    पैबन्दों को बिछाती रातें।

    सूखे पत्ते नंगी शाखें
    पतझड़ में सताती रातें।।

    बहुत सुंदर ..एक कविता कभी इसी तरह की मैंने भी लिखी थी ..भाव बहुत अच्छे हैं आपक इस कविता के

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  2. निष्ठुर ठंडी काली रातें
    रिसते घाव रुलाती रातें।
    " bhut bhavnatmek kaveeta, bhut acche lgee"
    "jeevan mey kya khoya or kya paya humne,
    ab ek ek pal ka humse tkaja kertee rateyn"

    Regards

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  3. मिलन बिछोहा सब झूठा था
    सच्चाई हैं डराती रातें।

    कविता के लिहाज से उत्कृष्ट भाव हैं ! नायक
    की मनोदशा बयान करने में ये रचना सौ प्रतिशत
    सफल रही है ! शुभकामनाएं !

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  4. सूखे पत्ते नंगी शाखें
    पतझड़ में सताती रातें।।

    रचना के लिए शत शत प्रणाम !
    पतझड़ के बाद बसंत भी है दोस्त !
    शुभकामनाएं !

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  5. कटु यथार्थवादी रचना ! अनंत शुभकामनाएं !

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  6. सुंदर.......भाव

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  7. मुरझाया कुम्हलाया तन-मन
    उजड़ी सेज कंटीली रातें।

    मिलन बिछोहा सब झूठा था
    सच्चाई हैं डराती रातें।

    फटी पुरानी यादें लाकर
    पैबन्दों को बिछाती रातें।
    बहुत सुंदर सस्नेह.

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  8. निष्ठुर ठंडी काली रातें
    रिसते घाव रुलाती रातें।


    फटी पुरानी यादें लाकर
    पैबन्दों को बिछाती रातें।

    सुन्दर पंक्तियाँ, सार्थक विचार। बधाई।

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  9. आपकी कविता पाठक को अपने साथ, चीखते सन्‍नाटे में लिए जाती है । अच्‍छे भाव । अच्‍छी पंक्तियां ।
    आपका यह ब्‍लाग मुझे मेरे ई-मेल पर उपलब्‍ध कराने में मेरी सहायता कीजिए ।

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  10. sundar vishleshan hai raat ki tanhai ka

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  11. सुँदर कविता है ..और मौसम के अनुरुप भी !

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  12. सुँदर कविता है ..और मौसम के अनुरुप भी !

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  13. bahut bhavpurn dil ko chhu jane wali kavita.

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  14. सुन्दर कविता। और मैने घर में खिड़की से झांका - रमबगिया में सामने एक ठूंठ ही दिखा। लगा कि पतझड़ आ गया।

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  15. सहज वैराग-
    मिलन बिछोहा सब झूठा था
    सच्चाई हैं डराती रातें।

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  16. शीत ऋतु की शर्वरी है हिंस्र पशुओं से भरी !
    आपकी कविता पढ़ कर याद हो आयी यह कविता

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  17. नए वसंत के आने का
    धीमा संगीत सुनाती रातें।

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  18. मुरझाया कुम्हलाया तन-मन
    उजड़ी सेज कंटीली रातें।
    बहुत ही बढ़िया...शब्दों का अद्भुत प्रयोग किया है आपने, भाई मेरी दिली दाद कबूल फरमाएं और अपनी ऐसी कमाल की रचनाएँ बार बार सुनाएँ ...बधाई...बार बार बधाई ...
    नीरज

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  19. सूखे पत्ते नंगी शाखें
    पतझड़ में सताती रातें।।

    KYA BAAT HAI. BADHIYA
    DEEPAK BHARATDEP

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  20. जीवन का सही चित्रण किया हे आप ने इस कविता मे,
    धन्यवाद

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  21. अच्‍छी लगी भावों से भरी यह कविता। आभार।

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  22. अनुराग जी यह कविता जब मेने हिंद युग्म के पॉडकास्ट पर सूनी थी तभी से मन था इसको पढने का और आज पढ़ पाया सच बहुत माम्र्मिक कविता है .. मेरी नई रचना हैण्ड वाश डे पढने आप आमंत्रित हैं

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