Wednesday, December 17, 2008

मर्म - कविता

जीवन का जो मर्म समझते
लम्बी तान सदा सोते न

तत्व एक कोयले हीरे में
रख कोयला हीरा खोते न

फल ज़हरीले दिख पाते तो
बीज कनक के यूँ बोते न

यदि सार्थक कर पाते दिन तो
रातों को उठकर रोते न।
(अनुराग शर्मा)

23 comments:

  1. यदि सार्थक कर पाते दिन तो
    रातों को उठकर रोते न।


    द्वन्द की गहन और मार्मिक अभिव्यक्ति !

    राम राम !

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  2. Wah kya khoob, bahut sundar!

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  3. जीवन का जो मर्म समझते
    लम्बी तान सदा न सोते
    bahut badhiya bhavavyakti.

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  4. सुन्दर रचना है।बधाई।

    यदि सार्थक कर पाते दिन तो
    रातों को उठकर रोते न।

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  5. सार्थक शब्द लिये सार्थक कविता लगी

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  6. फल ज़हरीले दिख पाते तो
    बीज कनक के यूँ बोते न
    बहुत खुब
    धन्यवाद

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  7. 'तत्व एक कोयले हीरे में
    रख कोयला हीरा खोते न'
    bahut khuub likha hai

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  8. यदि सार्थक कर पाते दिन तो
    रातों को उठकर रोते न।
    " भावनात्मक और सार्थक अभिव्यक्ति "

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  9. फल ज़हरीले दिख पाते तो
    बीज कनक के यूँ बोते न

    बहुत सुंदर कविता,
    अच्छे बोल, अच्छे भावः

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  10. शानदार लिखा है आपने !
    तिवारी साहब का सलाम कबूल किजिये !

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  11. फल ज़हरीले दिख पाते तो
    बीज कनक के यूँ बोते न

    बहुत खूब ..सार्थक कविता

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  12. फल ज़हरीले दिख पाते तो
    बीज कनक के यूँ बोते न

    कई लोग तो इसके बाद भी 'बीज कनक के' बोते रहते हैं ।
    आपने अच्‍छी बात कही ।

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  13. बहुत बहुत सही लिखा है आपने...
    सुंदर सार्थक पंक्तियाँ काबिले तारीफ हैं.

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  14. जिस दिन समझ जायोगे जीवन का मर्म उस दिन नींद भी नही आएगी

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  15. सार्थक पंक्तियाँ सुंदर विचार

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  16. yadi saarthak kr paate din to,
    raato ko utth kr rote na...!
    bahot umda aur meaari nazm
    mubarakbaad !!
    ---MUFLIS---

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  17. सुन्दर सार्थक कविता !

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  18. नमस्कार..अभिषेक के बज़ से शिक्षकदिवस पर कार्बन कथा(चला बिहारी ब्लॉगर बनने) पढ़ने निकले वहाँ से यहाँ आ पहुँचे..हमारे लिए तो ब्लॉग़जगत भी शिक्षक-जगत से कम नहीं...आभार

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