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Tuesday, November 10, 2020

* मैत्री *

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)

दुश्मनी जमके हमसे है ठाने
दोस्ती किससे है वही जाने

हमने दरियादिली नहीं देखी
खूब सुनते हैं उसके अ‍फ़साने

अंजुमन में सभी हैं अपने वहाँ
घर से बेदर हमीं हैं अनजाने

कुछ जला न धुआँ ही उट्ठा है
न वो शम्मा न हम हैं परवाने

कुछ तो है खास मैं नहीं जानूँ
यूँ नहीं सब हुए हैं दीवाने

जाने क्या कह दिया है शर्मा ने
हमसे अब वे लगे हैं शर्माने

Sunday, October 11, 2020

* घर के वृद्ध *


कहते कहते हुए रुक जाते हैं
जब न सुनता किसी को पाते हैं।

चलो अब डायरी में लिख लेंगे
मन को कहके यही भरमाते हैं।

बीती बातों को याद कर-कर के 
दिल के घावों को वे सहलाते हैं।

सबकी मजबूरियों को समझा है
अपनी बारी पे चुप हो जाते हैं।

अपनी तनहाइयों को झटका दे
गीत उत्सव के गुनगुनाते हैं॥
***

Sunday, October 4, 2020

हिंदी ग़ज़ल

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)

पछताना क्या क्या यूँ रोना
हुआ नहीं यदि था जो होना

कल न था कल होना है जो 
जीवन है बस पाना-खोना

चना अकेला भाड़ बड़ा है
मन में यह दुविधा न ढोना

टूटी छत बिखरी दीवारें
तन मिट्टी पर मन है सोना

याद खिली मन के कोने में
हुआ सुवासित कोना कोना


Sunday, August 2, 2020

रक्षाबंधन पर्व की बधाई

श्रावणी पूर्णिमा की बधाई
(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)


राखी रोली आ पहुँचे हैं
याद बहन की आई है।

कैसी हैं क्या करती होंगी
हिय में छवि मुस्कायी है।

है प्रेम छलकता चिट्ठी में
इतराती एक कलाई है।

अक्षत का संदेश स्नेहवत
शुभ-शुभ दिया दिखाई है।

अनुराग भरे अक्षर सारे
शब्दों में भरी मिठाई है॥

Sunday, July 26, 2020

भूल रहा हूँ

चित्र: रीतेश सब्र
(शब्द: अनुराग शर्मा)


यादों के साथ खेल मधुर खेल रहा हूँ
इतना ही रहा याद के कुछ भूल रहा हूँ

सब कुछ हमेशा याद भला कैसे रहेगा
यह भी नहीं कि बातें सभी भूल रहा हूँ

हर याद के साथ चुभी टीस सी दिल में
अच्छा है के उस हूक को मैं भूल रहा हूँ

आवाज़ तुम्हारी सदा पहचान लूंगा मैं
बोली थीं क्या, मैं इतना ज़रा भूल रहा हूँ

ये कौन हैं, वे कौन, रहे कैसे मुझे याद
मैं रहता कहाँ, कौन हूँ मैं भूल रहा हूँ॥

Sunday, June 28, 2020

मरेंगे हम किताबों में

(शब्द और चित्र: अनुराग शर्मा)


मरेंगे हम किताबों में, वरक होंगे कफ़न अपना
किसी ने न हमें जाना, न पहचाना सुख़न अपना

बनाया गुट कोई अपना, न कोई वाद अपनाया
आज़ादी सोच में रखी, यहीं हारा है फ़न अपना

कभी बांधा नहीं खुद को, पराये अपने घेरों में
मुहब्बत है ज़ुबाँ अपनी, जहाँ सारा वतन अपना

नहीं घुड़दौड़ से मतलब, हुए नीलाम भी न हम
जो हम होते उन्हीं जैसे, वही होता पतन अपना

भले न नाम लें मेरा,  मेरा लिखा वे जब बोलें
किसी के काम में आये, यही सोचेगा मन अपना

भीगें प्रेम से तन-मन, न हो जीवन कोई सूखा
न कोई प्रेम का भूखा, नहीं टूटे स्वपन अपना

मीठे गीत सब गायें, लबों पर किस्से हों अपने
चले जाने के बरसों बाद, हो पूरा जतन अपना॥

Saturday, February 22, 2020

कुआँ और खाई - कविता

पिट्सबर्ग आजकल
(शब्द और चित्र: अनुराग शर्मा)

जब गले पड़ें
दो मुसीबतें
जिनमें से एक
अनिवार्यतः अपनानी है।

तब एक पल
ठहरकर
सोच-समझकर
तुक भिड़ानी है।

खाई में जान
निश्चित ही जानी है
जबकि
कुएँ में पानी है।

खाई की गर्त
नामालूम
कुएँ की गहराई
तो पहचानी है।

खाई में कौन मिलेगा
किसको सुनाएँ
जबकि कुएँ से पुकार
बस्ती तक पहुँच जानी है।

मौत का तो भी अगर
दिन रहा मुकर्रर
व्यर्थ बिखरने से अच्छी
जल समाधि अपनानी है

Saturday, February 8, 2020

विभाजन - एक ग़ज़ल

कथा तुमने लिखी अपनी मगर किस्सा हमारा था
किताबों पर नहीं दिल में भी मेरे घर तुम्हारा था।

हमारी बात सुनने का कभी न वक्त तुम पर था
सदायें लौटकर आईं तुम्हें जब जब पुकारा था।

आज़ादी तुमने मांगी थी सदा तुमको मिली भी थी
मगर मुझको मिले मुक्ति, नहीं तुमको गवारा था।

हमारा घर बचा रहता जो संग-संग तुम चले होते
जब भी तुमने तोड़ा घर तो मैंने फिर सँवारा था।

भित्तियाँ ढह गईं सारी धरातल भी हुआ अस्थिर
उड़ा जब तिनकों में छप्पर बड़ा बेढब नज़ारा था॥

Sunday, January 12, 2020

मुझे याद है

मुझे याद हैं
लोहड़ी की रातें
जब आग के चारों ओर
सुंदर मुंदरिये हो
के साथ गूंजते थे
खिलखिलाते मधुर स्वर

मुझे याद हैं
नन्ही लड़कियाँ
जो बनतालाब की शामों को
रोशन कर देती थीं
अपनी चुन्नी में लपेटे
जगमगाते जुगनुओं से।

मुझे याद हैं
वे दिन जब
यौवन और बुढ़ापा
नहीं लगा सके थे
सेंध
मेरे शैशव में

मुझे याद हैं
अनमोल उस
बचपन की यादें
जब दौड़ता था मैं
ताकि छू सकूँ नन्ही उंगलियों से
क्षितिज पर डूबते सूरज को

मुझे याद हैं
सुहाने विगत की बातें
सब याद है मुझे

🙏 मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएँ!


Friday, June 7, 2019

कविता: अनुनय

अनुराग शर्मा 

सुबह की ओस में आँखें मुझे भिगोने दो
युगों से सूखी रहीं आँसुओं से धोने दो

कभी उठा तो बिखर जाऊंगा सहर बनकर
बहुत थका हूँ मुझे रात भर को सोने दो

हँसी लबों पे बनाये रखी दिखाने को
अभी अकेला हूँ कुछ देर मुझको रोने दो

सफ़र भला था जहाँ तक तुम्हारा साथ रहा
मधुर हैं यादें उन्हीं में मुझे यूँ खोने दो

कँटीली राह रही आसमान तपता हुआ
खुशी के बीज मुझे भी कभी तो बोने दो

रहो सुखी सदा जहाँ भी रहो जैसे रहो
हुआ बुरा जो मेरे साथ उसको होने दो

Friday, March 29, 2019

दादी माँ कुछ बदलो तुम भी

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)




सदा खिलाया औरों को
खुद खाना सीखो दादी माँ

सबको देते उम्र कटी
अब पाना सीखो दादी माँ

थक जाती हो जल्दी से
अब थोड़ा सा आराम करो

चुस्ती बहुत दिखाई अब
सुस्ताना सीखो दादी माँ

रूठे सभी मनाये तुमने
रोते सभी हँँसाये तुमने

मन की बात रखी मन में
बतलाना सीखो दादी माँ

दिन छोटा पर काम बहुत
खुद करने से कैसे होगा

पहले कर लेती थीं अब
करवाना सीखो दादी माँ

हम बच्चे हैं सभी तुम्हारे
जो चाहोगी वही करेंगे

मानी सदा हमारी अब
मनवाना सीखो दादी माँ



Thursday, March 14, 2019

सत्य - लघु कविता

(अनुराग शर्मा)

सत्य नहीं कड़वा होता
कड़वी होती है कड़वाहट

पराजय की आशंका और
अनिष्ट की अकुलाहट

सत्यासत्य नहीं देखती
मन पर हावी घबराहट

कड़वाहट तो दूर भागती
सुनते ही सत्य की आहट

Friday, January 11, 2019

दोस्त - द्विपदी

- अनुराग शर्मा


अपने नसीब में नहीं क्यों दोस्ती का नूर।
मिलते नहीं क्यों रहते हो इतने दूर-दूर॥

समझा था मुझे कोई न पहचान सकेगा।
यह होता कैसे दोस्त मेरे हैं बड़े मशहूर

सोचा था मुलाक़ात होगी दोस्तों के साथ।
मसरूफ़ रहे वर्ना मिलने आते वे ज़रूर॥

हम चाहते थे चार पल दोस्तों के साथ।
वह भी न हुआ दोस्त मेरे हो गये मगरूर॥

सोचा था बचपने के फिर साथी मिलेंगे।
ये हो न सका दोस्त मेरे हैं खट्टे अंगूर॥

दो पल न बिताये न जिलायी पुरानी याद।
तिनका था मैं,  दोस्त मेरे थे सभी खजूर॥

Tuesday, January 1, 2019

काव्य: संवाद रहे

अनुराग शर्मा 

नश्वरता की याद रहे
जारी अनहदनाद रहे

मन भर जाये दुनिया से
कोई न फ़रियाद रहे

पिंजरा टूटे पिञ्जर का
पक्षी यह आज़ाद रहे

न हिचके झुकने में, उनके
जीवन में आह्लाद रहे

कभी सीखने में न चूके
वे सबके उस्ताद रहे

जितनों की सेवा संभव हो
बस उतनी तादाद रहे

भूखे पेट न जाये कोई
और भोजन में स्वाद रहे

अहं कभी न जकड़ सके
कोई उन्माद रहे

कड़वी तीखी बातें भूलें
खट्टी मीठी याद रहे

कभी रूठ जायें वे
चलता सब संवाद रहे

घर से छूटे जिनकी खातिर
घर उनका आबाद रहे॥

नव वर्ष 2019 की मंगलकामनाएँ

Wednesday, August 22, 2018

रोशनाई - कविता

(शब्द और चित्र: अनुराग शर्मा)

रात अपनी सुबह परायी हुई
धुल के स्याही भी रोशनाई हुई

उनके आगे नहीं खुले ये लब
रात-दिन बात थी दोहराई हुई

आज भी बात उनसे हो न सकी
चिट्ठी भेजी हैं,  पाती आई हुई  

कवि होना सरल नहीं समझो
कहा दोहा,  सुना चौपाई हुई

खुद न होते न तुमसे मिलते हम
ऐसी हमसे न आशनाई हुई॥



Friday, July 27, 2018

आदमी (ग़ज़ल)

(शब्द और चित्र: अनुराग शर्मा)

आदमी यह आम है बस इसलिये नाकाम है
कामना मिटती नहीं, कहने को निष्काम है।

ज़िंदगी है जब तलक उम्मीद भी कैसे मिटे
चार कंधों के लिये तो भारी तामझाम है।

काली घटा छाई हुई उस पे अंधेरा पाख है
रात ही बाकी है इसकी सुबह है न शाम है।

तारे हैं गर्दिश में और चाँद पे छाया गहन
धूप से चुंधियाते दीदों को मिला आराम है।

अश्व हो आरोही या, तृष्णा कभी जाती नहीं
घास भी मिलती नहीं पर चाहता बादाम है।

सात पीढ़ी को सँवारे दौड़ाभागी में जुटा
दो घड़ी का हो बसेरा, इतना इंतज़ाम है।

वीतरागी होने का, उपदेश डाकू दे रहे
बोलबाला झूठ का, सच अभी गुमनाम है।

बेईमानी का सफ़र, पूरा नहीं जिसका हुआ
वह डकैती का सभी पर थोपता इल्जाम है।

अपराध अपना हो भले पर दोष दूजे को ही दें
बच्चे बगल में छिप गये, नगर में कोहराम है।

हाशिये पर कर दिये निर्देश जिनसे लेना था
रहनुमा कारा गये जब पातकी हुक्काम है।

पाप पहले भी हुए अफ़सोस उनका लाज़मी
पर आगे भी होते रहेंगे क्यों नहीं विश्राम है?

निस्सार है संसार इसमें अर्थ सारा व्यर्थ है
एक बेघर* ही यहाँ हर गाँव का खैयाम है।

प्रात से हर रात तक भागना है बदहवास
ज़िंदगी के द्वीप की यह यात्रा अविराम है।

यात्रा लम्बी रही और फिर स्थानक आ गया 
बस गये जो भस्म में उनको मिला आराम है।

* अनिकेत

Tuesday, February 13, 2018

कविता: चले गये ...

(अनुराग शर्मा)

अनजानी राह में
जीवन प्रवाह में
बहते चले गये

आपके प्रताप से
दूर अपने आप से
रहते चले गये

आप पे था वक़्त कम
किस्से खुद ही से हम
कहते चले गये

सहर की रही उम्मीद
बनते रहे शहीद
सहते चले गये

माया है यह संसार
न कोई सहारा यार
ढहते चले गये ...

Monday, October 9, 2017

एक नज़र - कविता

(अनुराग शर्मा)

हर खुशी ऐसे बच निकलती है
रेत मुट्ठी से ज्यूँ फिसलती है

ये जहाँ आईना मेरे मन का
अपनी हस्ती यूँ ही सिमटती है

बात किस्मत की न करो यारों
उसकी मेरी कभी न पटती है

दिल तेरे आगे खोलता हूँ जब
दूरी बढ़ती हुई सी लगती है

धर्म खतरे में हो नहीं सकता
चोट तो मजहबों पे पड़ती है

सर्वव्यापी में सब हैं सिमटे हुए
छाँव पर रोशनी से डरती है।



साक्षात्कार: अनुराग शर्मा और डॉ. विनय गुदारी - मॉरिशस टीवी - 13 सितम्बर 2017

Wednesday, August 30, 2017

घोंसले - कविता

(अनुराग शर्मा)

बच्चे सारे कहीं खो गये
देखो कितने बड़े हो गये

घुटनों के बल चले थे कभी 
पैरों पर खुद खड़े हो गये

मेहमाँ जैसे ही आते हैं अब
छोड़ के जबसे घर वो गये 

प्यारे माली जो थे बाग में
उनमें से अब कई सो गये

याद से मन खिला जिनकी
यादों में ही नयन रो गये॥


گھوںسلا


بچچے سارے کہیں کھو گئے

دیکھو کتنے بعد_ا ہو گئے

گھٹنوں کے بل چلے تھے کبھی
پیروں پر خود کھڈے ہو گئے

مہمان جیسے ہی آتے ہیں اب
چھوڈ کے جب سے گھر وو گئے

پیارے ملے جو تھے باگ میں
انمیں سے اب کے سو گئے

یاد سے من کھلا جنکی
یاد میں ہی نہیں رو گئے

Monday, June 26, 2017

ग़ज़ल?

मात्रा के गणित का शऊर नहीं, न फ़ुर्सत। अगर, बात और लय होना काफ़ी हो, तो ग़ज़ल कहिये वर्ना हज़ल या टसल, जो भी कहें, स्वीकार्य है।  
(अनुराग शर्मा)

काम अपना भी हो ही जाता मगर
कुछ करने का हमको सलीका न था

भाग इस बिल्ली के थे बिल्कुल खरे
फ़ूटने को मगर कोई छींका न था

ज़हर पीने में कुछ भी बड़प्पन नहीं
जो प्याला था पीना वो पी का न था

जिसको ताउम्र अपना सब कहते रहे
बेमुरव्वत सनम वह किसी का न था

तोड़ा है दिल मेरा कोई शिकवा नहीं
तोड़ने का यह जानम तरीका न था।