Sunday, August 3, 2014

3 अगस्त मैथिलीशरण गुप्त का जन्मदिन

यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो, समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को, नर हो न निराश करो मन को
संभलो कि सुयोग न जाए चला, कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना, पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलम्बन को, नर हो न निराश करो मन को
काव्यपाठ 1956 (चित्र सौजन्य: आकाशवाणी)
पद्म भूषण मैथिलीशरण गुप्त की "नर हो न निराश करो मन को" का हर शब्द मन में आशा का संचार करता है। हिन्दी की खड़ी बोली कविता के मूर्धन्य कवियों में उनका नाम प्रमुख है। उनका जन्म 3 अगस्त, सन 1885 ईस्वी को झांसी (उत्तर प्रदेश) के चिरगाँव में श्रीमती काशीबाई और सेठ रामचरण गुप्त के घर में हुआ था।  खड़ी-बोली को काव्य-भाषा का रूप देने के प्रयास उन्होने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से किए और अपनी ओजस्वी काव्य-रचनाओं द्वारा अन्य कवियों को भी प्रेरित किया। उनकी रचनाएँ सरस्वती और भारत-भारती में छपीं। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में पंचवटी, जयद्रथ वध, यशोधरा, और साकेत प्रमुख हैं। उन्होने संस्कृत नाटक स्वप्नवासवदत्ता का हिन्दी अनुवाद भी किया। तिलोत्तमा,चंद्रहास, विजयपर्व उनके प्रमुख नाटक हैं।

गुप्त जी का विवाह सन 1895 में 10 वर्ष की अल्पायु में हो गया था। तब बाल-विवाह प्रचलित थे जिनमें विवाह संस्कार बाल्यावस्था में हो जाता था और युवावस्था में गौना करने की परंपरा थी।

परतंत्रता के दिनों में उनकी ओजस्वी लेखनी अनेक भारतीयों की प्रेरणा बनी। स्वतंत्रता संग्राम के समय वे कई बार जेल भी गए।

भारत को स्वतन्त्रता मिलने पर उन्हें पद्म भूषण के अतिरिक्त उन्हे मंगला प्रसाद पारितोषिक भी मिला। स्वतंत्र भारत सरकार ने उन्हें "राष्ट्रकवि" का सम्मान दिया था। 1947 में वे संसद सदस्य बने और 12 दिसंबर 1964 को अपने देहावसान तक सांसद रहे।

गुप्त जी की रचना "आर्य" से कुछ पंक्तियाँ:
हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी, आओ विचारें आज मिल कर, ये समस्याएँ सभी
भू-लोक का गौरव प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ, फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगाजल कहाँ
सम्पूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है, उसका कि जो ऋषि-भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है
यह पुण्य-भूमि प्रसिद्ध है, इसके निवासी आर्य हैं, विद्या, कला, कौशल्य, सबके जो प्रथम आचार्य हैं
सन्तान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े, पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े

16 comments:

  1. नमन महान कवि को. अच्छा किया आपने याद दिला दी. बीबीसी पर एक बार उनकी आवाज़ सुनने को मिला था. आप भी सुनिए अगर यह आपने नहीं सुना होगा पहले -

    http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2012/12/121226_poets_bbc_archive_vv.shtml?s

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    1. धन्यवाद! यह लिंक काम नहीं कर रहा है।

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    2. मैंने यहाँ पोस्ट की हुई लिंक को ही खोला और मेरे लिए यह काम कर रहा है (गूगल क्रोम).

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    3. आश्चर्य की बात है कि मैं भी क्रोम में ही देख रहा हूँ और लगातार निम्न संदेश आ रहा है:
      ऐसा कोई पन्ना उपलब्ध नहीं है
      खेद है!
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      जबकि एक बार IE में कोशिश की तो सही जगह पहुँच गया। धन्यवाद!

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज मंगलवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  3. कविता के महान वाहक को नमन ... नर हो न निराश करो मन को .... कुछ काम करो कुछ काम करो ... इन पक्तियों से शायद ही कोई अनजाना होगा ...

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  4. बहुत ही सुन्‍दर आख्‍यान। श्री मैथिलीशरण गुप्‍त को ह्रदय से नमन। वाकई उनका रचना-संसार गदगद करता है।

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  5. दयानिधिAugust 4, 2014 at 6:29 AM

    बहुत अच्छा लगा। अभी लिंक भी देखते हैं। धन्यवाद।

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  6. राष्ट्रीय कवि की यह पंक्तियाँ सदा ही मन को प्रेरणा से भर देती हैं... उन्हें शत शत नमन !

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  7. आदरणीय दद्दा को शत शत नमन

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  8. सार्थक सहेजने योग्य पोस्ट , महाकवि को नमन

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  9. पूरे युग को अपने अपनी कविता -पुकार से जगा देनेवाले राष्ट्र- कवि का संदेश अब भी उतना ही प्रासंगिक है !

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  10. हिन्दी कविता के इतिहास में उनके इस योगदान को नमन !
    प्रेरक पोस्ट !

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  11. प्रेरक रचना के रचनाकार महाकवि के जीवन परिचय के लिए आभार !

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  12. एक महान कवि का परिचय पाकर धन्य हुए... हमारे लिये ये सच्चे भारत-रत्न हैं! नमन!!

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