Sunday, July 15, 2012

सावन का महीना - कविता

(शब्द और चित्र: अनुराग शर्मा)

पवन करे सोर ...
वृष्टि यहाँ
वृष्टि वहाँ

हँसता हुआ
भीगे जहाँ

खोजूँ जिसे
छिपता कहाँ

बढता रहे
दर्द ए निहाँ

मंज़िल मेरी
वो है जहाँ

-=<>=-
चार पंक्तियाँ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर" के "पावस गीत" से
दूर देश के अतिथि व्योम में
छाए घन काले सजनी,
अंग-अंग पुलकित वसुधा के
शीतल, हरियाले सजनी!

27 comments:

  1. इतने खुबसूरत सधे शब्दों से सजे सावन का स्वागत करता हूँ .अद्भुत अदभुत अनिर्वचनीय

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  2. वाह!! मनोरम!!
    वृष्टि से तन मन आद्र

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  3. दयानिधि वत्सJuly 15, 2012 at 12:38 PM

    छोटे छोटे वाक्यों का जादू, अभी वृष्टि भरपूर नहीं हुई है.

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  4. realy small is beautiful.size and difficult words does not matter most of the time.irealy liked.

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  5. खोजूँ जिसे
    छिपता कहाँ

    बहुत सुंदर ....

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  6. मंजिल मेरी वो है जहाँ.... वो कहाँ है

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  7. sundar abhivyakti ....
    shubhkamnayen.

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  8. बहुत सुन्दर............
    शोर्ट एंड स्वीट...

    अनु

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  9. हँसता हुआ
    भीगे जहाँ

    बहुत सुन्दर..

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  10. हँसता हुआ
    भीगे जहाँ

    बहुत खूब अनुराग भाई !

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  11. छोटे तीर,
    हरते पीर,
    राँझा को
    ढूंढें हीर ||

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  12. वृष्टि यहाँ
    वृष्टि वहाँ

    short and sweet....!

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  13. हँसता हुआ
    भीगे जहाँ
    इन शब्‍दों ने जादू जगा दिया .. पूरी रचना में आभार

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  14. सूक्षम रचना में सावन -- बहुत मनभावन .

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  15. बहुत ही खूबसूरत रचना, मन हर्षित हो गया.

    रामराम.

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  16. इतने कम शब्दों में इतनी सुंदरता...

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  17. बहुत - बहुत सुन्दर रचना:-)

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  18. इससे छोटी बहर में गज़ल कहना तो शायद मुश्किल ही होगा ... बहुत खूब ... सावन के महीने का कमाल ...

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  19. आपकी भी नज़र किसी मजिल पर है -यह सावन आपकी हसरतों को पूरा करे!

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    1. गगन की ओर निसाना है (~ बाबा कबीर मगहरी)

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  20. वृष्टि यहाँ , वृष्टि वहां !
    ये बता तू कहाँ ...
    छोटी- सी प्यारी -सी कविता !

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  21. पथरायी हुई आँखों से बादलों को निहारते हुए किसानो को देखकर लगता है-
    बदल अभी
    बरसे कहाँ......?
    बढता रहे
    दर्द ए निहाँ,
    संक्षिप्त किन्तु सरगर्भित रचना !

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  22. वृष्टि हँसी
    सृष्टि हँसी..

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