Monday, May 30, 2016

दीवाली का पारितोषिक

गर्मियों के दिनों की शाम को पिट्सबर्ग में लॉन में चमकते जुगनू, जम्मू में बिताये मेरे बचपन की याद दिलाते हैं।  बचपन वाकई बहुत खूबसूरत अनुभव है। लेकिन बचपन की भी अपनी समस्यायें हैं। खासकर उन बच्चों के लिये जिन्हें बचपन में एक अपरिचित भाषा-संस्कृति का सामना करना पडे। बरेली से जम्मू जाते समय कुछ ऐसी ही समस्या मेरे साथ पेश आई।

पूरब-पश्चिम रातोंरात जब मगरिब-मशरिक़ हो जाएँ और गुणा-भाग ज़रब-तकसीम। न कोई सहपाठी आपकी भाषा समझे और न ही आप अपने सहपाठियों, यहाँ तक कि अध्यापकों के निर्देश समझ पाएँ तो ज़रा सोचिए आठ साल के एक मासूम छात्र को कितनी कठिनाई का सामना करना पड़ा होगा। बस मेरा यही हाल था जम्मू के विद्यापीठ में।

कला की शिक्षिका की मुझसे क्या दुश्मनी थी ये तो अब याद नहीं लेकिन इतना अभी भी याद है कि वे क्लास में
आते ही मुझे बाहर निकाल देती थीं। आश्चर्य नहीं कि कला प्रतियोगिता में जब अन्य बच्चे ग्रामीण दृश्यावली से
लेकर साड़ी का किनारा तक बहुत कुछ बना रहे थे, मैंने मनुष्य के पाचनतंत्र का चित्रण किया था।

गणित के अलावा अङ्ग्रेज़ी भी एक भयंकर विषय था। टीचर जी जब अङ्ग्रेज़ी को डोगरी प्रभाव वाली उर्दू में पढ़ाते हुए “पीपल काल्ड हिम फादर ऑफ दी नेशन” बोलते थे तो यकीन मानिए गांधीजी नहीं, बरेली वाले घर के दरवाजे पर लगा पीपल ही याद आता था।

जम्मू का रघुनाथ मंदिर, सन् 1928 में
ऐसे में हिन्दी की अध्यापिका का प्रिय छात्र बन पाना बड़ा सहारा था। उनकी कक्षा में कभी “कन्न फड़” का आदेश नहीं मिला जिसका अर्थ कान पकड़ना नहीं बल्कि मुर्गा बनना होता था। उन्हीं ने विद्यापीठ के वार्षिकोत्सव में “वीर बालक” नाटक करने का अवसर दिया।

घर स्कूल से काफी दूर था। सुबह को सीआरपी की स्कूल बस सब बच्चों को शहर लाकर अंकल जी की दुकान पर छोड़ देती थी। जहां से सब अपने-अपने स्कूल पैदल चले जाते थे। विद्यापीठ के लिए एक पहाड़ी पर स्थित हाईकोर्ट परिसर से होकर जाना पड़ता था जो एक भव्य महल का भाग था।

स्कूल के पीछे पहाड़ी के छोर से सैकड़ों फीट नीचे बहती विराट तवी नदी को देखना एक अद्वितीय अनुभव था। नदी को देखने पर जम्मू के अपने पिछले प्रवास के दौरान रणवीर नहर में बहे लड़कों की कहानियाँ आँखों के सामने ऐसे गुजरती थीं, मानो ताज़ा घटना हो। शरीर में एक सिहरन सी दौड़ जाती थी, लेकिन फिर भी इंटरवल में पहाड़ी के छोर पर आकर तवी दर्शन करना मेरा रोज़ का रूटीन बन गया था।

दशहरा-दीवाली के सम्मिलित समारोह जम्मू में बड़ी धूमधाम से मनाए जाते थे। जैसे आजकल बहुत से विद्यालयों में क्रिसमस की छुट्टियाँ होती हैं, वहाँ लगभग दो सप्ताह का दीपावली अवकाश होता था। छुट्टी से एक दिन पहले प्राइमरी, मिडल और हाई स्कूल के सभी छात्र-छात्राओं की सम्मिलित सभा बुलाई गई। दो शब्द बोलने के बाद प्रधानाचार्या ने छात्रों को दशहरा और दीवाली के पर्वों पर कुछ बोलने के लिए मंच पर आमंत्रित किया। जब काफी देर तक कोई आगे नहीं आया तो मैं उठा और बड़े-बड़े बच्चों की उस भीड़ में से चलकर मंच तक पहुंचा। मैंने बोलना शुरू किया तो राम-वनवास से लेकर अयोध्या वापसी में नगरवासियों द्वारा दीपों की पंक्तियाँ बनाकर उल्लास मनाने तक जितना कुछ पता था, जम्मू के लिए दुर्लभ शुद्ध हिन्दी में सब कुछ सुना दिया।

बात पूरी करके जब मैं चुपा तो महसूस किया कि हॉल में पूर्ण निस्तब्धता थी। कुछ क्षणों तक किसी को विश्वास ही नहीं हुआ कि वह छोटा सा लड़का इतना कुछ बोल गया था। अचानक शुरू हुई तालियों की गड़गड़ाहट के बीच प्रधानाचार्य ने मुझे गोद में उठाकर पाँच रुपये का नोट पुरस्कार में दिया। मैंने देखा कि कला की शिक्षिका के साथ-साथ गणित और अंग्रेज़ी के आध्यापकगण भी मुझे स्नेह से देख रहे थे।

तब से अब तक कितनी दीवाली मना चुका हूँ, कितने भाषण दिये हैं, कितने ही पुरस्कार मिले हैं लेकिन आज तक उतना बड़ा पारितोषिक नहीं मिला जितना वह पाँच रुपये का नोट था।

9 comments:

  1. पुरानी बातें जो दिल में गहरे उतर जाती हैं उनके सामने कोई बात उम्र भर नही टिक पाती ... फिर बचपन की बात की तो बात भी कुछ और ही होती है ...

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  2. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति विश्व तंबाकू निषेध दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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  3. बचपन की मधुर स्मृतियाँ जीवन भर संबल बनकर साथ चलती हैं...और जब स्मृति इतनी सुखद हो तो कहना ही क्या..जब मैं छठी कक्षा में थी कृष्ण जन्माष्टमी की छुट्टी से पूर्व इसी तरह कृष्ण के बारे में बोलने को कहा गया, एक छोटी सी छात्रा ने उनके जन्म की पूरी कहानी सुना दी थी, और उसी दिन से मुझे भी वह कहानी याद हो गयी थी.

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  4. कुछ बातें कभी नहीं भूली जा सकती ..

    बहुत सुन्दर

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  5. वाह वाह ! अनुराग जी, मुझे लगा जैसे अपनी कहानी पढ़ रहा हूँ. तीसरी कक्षा में मेरा साथ भी ऐसा ही हुआ था. बाल दिवस पर, मैं भी ऐसे ही बड़े-बड़े बच्चों की भीड़ में से चलकर मंच तक पहुंचा था. मंच नहीं एक मेज थी. और PTI सर ने मुझे उठा कर मेज पर खड़ा कर दिया था. और मैं चाचा नेहरु पर हिंदी की पुस्तक का पाठ धारा प्रवाह बोलता चला गया था. मुझे भी जीवन का पहला पुरस्कार उसी दिन मिला था. एक अध्यापक जी से एक रूपये का नोट और प्रधानाध्यापक जी से दो रुपये का नोट! भारत-चीन युद्ध हो कर चुका था. दोनों नोट मैंने वहीँ रखी, राष्ट्रीय सुरक्षा कोष की गुल्लक में डाल दिए थे. वहीँ इससे भी बड़ा एक और पुरस्कार मिला. मुझ तीसरी कक्षा के छात्र को उस माध्यमिक विद्यालय में हर शानिवार को होने वाली बालसभा का संयोजक-सचिव और कार्यक्रम-उद्घोषक बना दिया गया. तीसरी से आठवीं के बाद, स्कूल छोड़ने तक, मैंने यह दायित्व निभाया. इस घटना और नए दायित्व ने मेरे व्यक्तित्व के विकास में सबसे बड़ा योगदान दिया. आपके स्कूल, मेरे स्कूल, और सभी स्कूलों के उन अनाम, अगणित अध्यापकों को, जिन्होंने अनेक प्रतिभाओं को पहचाना और विकसित किया, मेरा सादर-सप्रेम नमन. सच कहा कविता जी, कुछ बातें कभी नहीं भूली जा सकती.

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    1. अरे वाह गुप्ताजी. आपने सही कहा, ऐसे अध्यापकों ने न जाने कितने छात्रों को सफलता की राह दिखाई है. वे सभी आदर के पात्र हैं.

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  6. उन विषम स्थितियों के हीच कितनी शानदार शुरुआत - मन कितना उत्साहित हुआ होगा. उस नन्हें-से छात्र का विकास आज की विविधतामय गतिविधियों मुखर हो रहा है .

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