Thursday, November 10, 2016

मोड़ - लघुकथा

चित्र: अनुराग शर्मा
लाइसेंस भी नहीं मिला और एक दिन की छुट्टी फिर से बेकार हो गई. एक बार पहले भी उसके साथ यही हो चुका है. परिवहन विभाग का दफ़्तर घर से दूर है. आने-जाने में ही इतना समय लग जाता है. उस पर इतनी भीड़ और फिर बाबूजी के नखरे. अभी किसी से बात कर रहे हैं, अब खाने का वक़्त हो गया ...

पिछली बार के टेस्ट में इसलिये फ़ेल कर दिया था कि उसने स्कूटर मोड़ते समय इंडिकेटर दिया था. तब बोले कि हाथ देना चाहिये था. इस बार उसने हाथ दिया तो कहते हैं कि इंडिकेटर देना चाहिये था.

भुनभुनाता हुआ बाहर आ रहा था कि एक आदमी ने उसे रोक लिया, "लाइसेंस चाहिये?"

उसने ध्यान से देखा, आदमी के सर के ठीक ऊपर दीवार पर लिखा था, "दलालों से सावधान."

"नहीं, नहीं, मुझे लाइसेंस नहीं चाहिये ..."

"तो क्या यहाँ सब्ज़ी खरीदने आए थे? अरे यहाँ जो भी आता है उसे लाइसेंस ही चाहिये, चलो मैं दिलाता हूँ."

कुछ ही देर में वह मुस्कुराता हुआ बाहर जा रहा था. उसे भी पता चल गया था कि मुड़ते समय न हाथ देना होता है न इंडिकेटर, सिर्फ़ रिश्वत देना होता है.


(अनुराग शर्मा

12 comments:

  1. किसी मोड पर........

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  2. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति डॉ. सालिम अली और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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    1. धन्यवाद हर्षवर्धन!

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  3. शायद ये सिलसिला कभी ख़त्म हो सके ...

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  4. सटीक लघुकथा !

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  5. मेरे और मेरे परिवार के किसी सदस्य के साथ दिल्ली में पिछले 32 वर्षों में ऐसा कभी नहीं हुआ. न लाइसेंस बनवाने के समय और न ही नवीनीकरण के समय. लिखित और मौखिक परीक्षाएं दीं,ड्राइविंग टेस्ट दिये और लाइसेन्स बनवाये. कभी किसी ने रिश्वत नहीं मांगी, न ही अनावश्यक देरी की. किन्तु बिजली, पानी और हॉउस टैक्स के कार्यालयों में मगरमच्छों से पाला पड़ा. कई बार सड़क पर यातायात पोलिस ने कोई भी गलती न होते हुए भी पैसे ऐंठने की कोशिश की है.

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  6. अब यह सब ज्यादा दिन नहीं चलेगा..

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  7. सच इतना बदसूरत होता है, इसकी बदसूरती का एक और नमूना... आपकी नज़र को सलाम है सर!!

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