Tuesday, November 22, 2016

स्वप्न - एक कविता

ये स्वप्न कहाँ ले जाते हैं
ये स्वप्न कहाँ ले जाते हैं

सच्चे से लगते कभी कभी
ये पुलाव खयाली पकाते है

सपने मनमौजी होते हैं
कोई नियम समझ न पाते हैं

ज्ञानी का ज्ञान धरा रहता
अपने मन की कर जाते हैं

सब कुछ कभी लुटा देते
सर्वस्व कभी दे जाते हैं

ये स्वप्न कहाँ से आते हैं
ये स्वप्न कहाँ से आते हैं

पिट्सबर्ग की एक सपनीली सुबह



5 comments:

  1. बहुत सुन्दर

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  2. Sapne to sapne hote hain ... in par bas kahan hota hai ...

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  3. बहुत सुन्दर,कैसा संयोग है मेरे पास भी एक ऐसी ही कविता है !
    जीवन की तरह सपने भी हमारे लिए रहस्य बने हुए है !
    मन को विस्मय विमुग्ध कर देने वाले इन सपनों के पीछे प्रकृति का
    ही कोई रहस्यमय आयोजन लगता है मुझे तो !

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