Friday, December 16, 2011

बेहतर हो - कविता

(~ अनुराग शर्मा)

ये दिन जल्दी ढल जाये तो बेहतर हो
रात अभी गर आ जाये तो बेहतर हो
सूरज से चुन्धियाती आंखें बहुत सहीं
घनघोर घटा अब घिर आये तो बेहतर हो

बातों को तुम न पकड़ो तो बेहतर हो
शब्दों में मुझे न जकड़ो तो बेहतर हो
कौन किसे कब परिभाषित कर पाया है
नासमझी पे मत अकड़ो तो बेहतर हो

विषवेल अगर छँट पाये तो बेहतर हो
इक दूजे को सहन करें तो बेहतर हो
नज़दीकी ने थोड़ा सा असहज किया
कुछ दूरी फिर बन जाये तो बेहतर हो

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सम्बन्धित कड़ियाँ
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* यूँ भी तो हो - एक इच्छा
* काश - कविता

35 comments:

  1. ये दिन भी ढल जायेंगे,
    वो याद भी न आयेंगे,
    काँटे सब दफ्न होंगे ,
    फूल ही फूल छाएंगे !


    ये विष अमृत नहीं बनेगा,
    अपने को ही खत्म करेगा !!

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  2. बेहद खुबसूरत..

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  3. विषवेल अगर छँट पाये तो कुछ बेहतर हो
    गर इक दूजे को सहन करें तो बेहतर हो
    नज़दीकी ने सब कुछ असहज कर डाला है
    कुछ दूरी फिर से बन जाये, तो बेहतर हो !


    गज़ब की सौम्यता है आपकी इस रचना में ...आनंद आ गया !
    आभार आपका !

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  4. यह कुछ दूरी ही तो प्रेम की जननी है. सो .....
    कुछ दूरी फिर से बन जाये, तो बेहतर हो !
    घुघूतीबासूती

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  5. जी यह कविता भी बेहतर है :)

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  6. विषवेल अगर छँट पाये तो कुछ बेहतर हो
    गर इक दूजे को सहन करें तो बेहतर हो
    नज़दीकी ने सब कुछ असहज कर डाला है
    कुछ दूरी फिर से बन जाये, तो बेहतर हो !
    बेहतरीन...

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  7. कौन किसे कब परिभाषित कर पाया है
    नासमझी पे मत अकड़ो तो बेहतर हो

    यह तो सही बात कही है ।
    कविता भी बेहतर है ।

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  8. आदरणीय महोदय
    नज़दीकी ने सब कुछ
    असहज कर डाला है
    कुछ दूरी फिर से बन जाये,
    तो बेहतर हो !
    इन पंक्तियों ने उस सदाबहार गीत की याद दिला दी

    चलो इस बार फिर से अजनबी बन जायं हम दोनों...

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  9. काश सरल सब हो जाये,
    सहज गरल तब हो जाये।

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  10. कितने आसान लफ़्ज़ों में आपने कितनी अच्छी-अच्छी बातें कह डालीं!!और हर बात में एक सीख!!

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  11. वो जवानी फिर लौट आए तो बेहतर हो :)

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  12. कौन किसे कब परिभाषित कर पाया है
    खुद को ही कब कौन समझ पाया है
    यह आल-जाल सब लगती माया है
    कहीं पे पसरी धूप कहीं दुबकी छाया है
    सूरज के उत्पात सहेगी धरती कब तक
    बदली से झांके चाँद ज़रा, बेहतर हो

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  13. हर शब्द प्रवाहमान है. बेहतरी की कल्पना और आशा दोनों ही सम्मिलित हैं.

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  14. समाज की बेहतरी की सोच से इस बेहतरीन रचना सबके मन-मस्तिष्क में बस जाए तो बेहतर हो!
    विषवेल अगर छँट पाये तो बेहतर हो
    इक दूजे को सहन करें तो बेहतर हो

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  15. 'बातों को तुम न पकड़ो तो बेहतर हो
    शब्दों में मुझे न जकड़ो तो बेहतर हो
    कौन किसे कब परिभाषित कर पाया है
    नासमझी पे मत अकड़ो तो बेहतर '
    - बेहतरी के लिये ,बहुत उपयुक्त प्वाइंट्स दिये हैं ,
    सुन लें लोग,तो दुनिया याही बेहतर हो जाये !

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  16. काश ऐसा ही हो.... बहुत ही बेहतर कविता भी है ये. बहुत सुंदर प्रस्तुति.

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  17. विषवेल अगर छँट पाये तो बेहतर हो
    इक दूजे को सहन करें तो बेहतर हो
    नज़दीकी ने थोड़ा सा असहज किया
    कुछ दूरी फिर बन जाये तो बेहतर हो

    सरल सहज बहते भाव.....

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  18. मुझे लगा आप किसी को संबोधित कर रहे हैं बस उसी के लिए... वीभत्स रस के लिए खेद सहित !


    सगरे दिन चेहरे पे बसते भाव तुम्हारे तारकोल से
    दिवस मूंदकर तिमिर घना छा जाये यही बेहतर हो !

    तुम निशीचारी और उलूक की मातुश्री सब गंदघोल है
    गुहाकन्दरा सीलसड़न तुम्हे मिल जाये यही बेहतर है !

    थूथन अपना कीचड़ में रखो भले ही धड़ ऊपर हो
    विष्ठा क्षेत्र तुम्हें रहने मिल जाये यही बेहतर हो

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  19. बातों को तुम न पकड़ो तो बेहतर हो
    शब्दों में मुझे न जकड़ो तो बेहतर हो
    कौन किसे कब परिभाषित कर पाया है
    नासमझी पे मत अकड़ो तो बेहतर हो

    कुछ सूत्रवाक्य जिन्हें ध्येयवाक्य बनाया जा सकें, खोजता रहता हूँ, यह अमर सिद्धांत है अधिकाधिक इसे अपनाने का प्रयत्न करूंगा.
    आभार !

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  20. आपके अनुग्रह से आज एक ब्लॉग पर की गयी महान ऐतिहासिक भूल को लेकर, अपने ब्लॉग पर एक पोस्ट प्रकाशित करने से खुद को रोक लिया ................ एक ब्लॉग पर स्वामी विवेकानंद को विवाहित बताते हुए कहा गया है की प्रथम दर्शन वेला में उन्होंने अपनी पत्नी को "माँ" और पत्नी ने उन्हें "वत्स" कहा था ........................ लेकिन अब मैंने यह इस लिए टाल दिया क्योंकि यह शब्द पकड़ना हो जाएगा ................... लेकिन एक कसमसाहट है की इस विकृत जानकारी को कैसे दुरुस्त करवाया जाये जो शायद उन्होंने जल्दबाजी में स्वामी विवेकानंद के गुरु परमहंस जी के बारे में लिखना चाहा था, पर जल्द बाजी में लेखकीय भूल हो जाने से यह सब लिख गया है. कमेन्ट करने से डरता हूँ क्योंकि वे मुझसे कुपित है और मेरे निवेदन को धृष्टता भी मान सकतें है.

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  21. बातों को तुम न पकड़ो तो बेहतर हो
    शब्दों में मुझे न जकड़ो तो बेहतर हो....

    Lajawab panktiyan ... Pravaah mein ... Nadi ki tarah kal kal karti .... Sundar rachna hai ...

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  22. विषवेल अगर छँट पाये तो बेहतर हो
    जैसा शीर्षक वैसी ही कविता....

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  23. अमित,
    सत्य सदा स्वीकारा जाता है। आपकी बात का असर अवश्य होगा और यदि बात भले लोगों की हो रही है तो आपको क्रेडिट भी दिया जायेगा।

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  24. @ अली साब

    काबिल-ए-गौर है आपका नजरिया !

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  25. बेहतर की कामना है तो
    लाजिम है कि जो भी हो,
    जहाँ भी हो, जैसे भी हो
    बेहतर हो, बेहतर हो।

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  26. है रात यहां पे दिन से ही
    जब जैसा है,वह बेहतर है

    समझ और नासमझी की
    ये बातें हैं नादानों की
    विषबेल बना है यही भूत,
    जिएं वर्तमान में,बेहतर हो

    है सहन यदि,तो फूटेगा
    लावा बनकर वह अब या तब
    नज़दीकी में ही जीवन है
    सम्यक स्वीकार हो,बेहतर हो

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  27. अनुराग शर्मा जी आप के मुक्तक शानदार हैं।

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  28. नज़दीकी ने थोड़ा सा असहज किया
    कुछ दूरी फिर बन जाये तो बेहतर हो!


    बहुत अधिक नजदीकियां कभी दूरियां भी मांगती है ...बेहतरीन कविता !

    @हैरान हूँ अली जी यह सब भी लिख सकते हैं !!

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  29. आपकी कवितायेँ कितनी छोटी, सरल और खूबसूरत होती हैं और सबमें कितनी बड़ी बात होती है!!

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  30. बहुत ख़ूबसूरत...कई बार दूरी डराती है, नज़दीकी दिक्कतें पैदा करती है, पर सच्चाई यही है, दूरी में ही प्रेम पनपता है।

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  31. संकेत समझना मुश्किल है,
    खुलकर बात कहो तो बेहतर हो।
    आसान बहुत है चुप रहना,
    मुखर हो गर मौन तो बेहतर हो।

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  32. जीवन के हर क्षण समझ आ जाए तो बेहतर हो !!

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