Thursday, December 22, 2011

नाम का चमत्कार - भूमिका

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो. न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।
जादूगर के मंच पर बड़े कमाल होते हैं। इसी तरह हिन्दी फ़िल्मों में भी संयोग पर संयोग होते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि ऐसे, जादू, कमाल और संयोग केवल किताबी बातें हैं। उनकी निजी ज़िन्दगी में शायद ऐसा कोई कमाल कभी हुआ ही नहीं। मैं यह नहीं मानता। मुझे तो लगता है कि वे अपने जीवन में नित्यप्रति घट रहे चमत्कार को देख पाने की शक्ति खो चुके हैं। लेकिन श्रीमान सुवाक त्रिगुणायत ऐसे लोगों में से नहीं है। शायद यही एक कारण है कि उनके इतने कठिन नाम, अति-सुरुचिपूर्ण जीवनशैली और विराट भौगोलिक दूरी के बावजूद वे अब तक मेरे मित्र हैं।

ये सुवाक की मैत्री का ही चमत्कार है कि मैंने भी आज उस्तादी उस्ताद से करने का प्रयास किया है। प्रस्तुत है, एक छोटी कहानी जो मेरे एक पसन्दीदा ब्लॉग पर प्रकाशित एक कहानी से प्रभावित तो है मगर है अपने अलग अन्दाज़ में - विडियो किल्ड द रेडियो स्टार बनाम अउआ, अउआ? नहीं! ट्वेल्व ऐंग्री मैन बनाम एक रुका हुआ फैसला? कतई नहीं!

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही
अब तो उसका वापस घर आना इतने-इतने दिन बाद होता है कि हर बार भारत नया लगता है। पिछली बार देखे हुए भारत से एकदम भिन्न। सुवाक की यह विशेषता है कि परिवर्तन अच्छा है या बुरा, इसके बारे में कोई भी उसे कुछ कहने को बाध्य नहीं कर सकता। उसके जीवन में श्वेत-श्याम कुछ भी नहीं है। दुश्मनों से दुआ-सलाम की बात हो या दोस्तों की खिंचाई, जो सुवाक को जानता नहीं, उसके लिये आदमी अजीब है मगर जो उसे जानते भी हैं उनमें भी कई उससे बचते हैं। कुछ-एक लोग उसके तौर-तरीके से सहमे रहते हैं और साज-सलीके से कुछ झिझके से रहते हैं। जो बचे वे उसकी बेबाकी से बचना चाहते हैं। एक सहकर्मिणी ने एक बार उसकी अनुपस्थिति में कहा था कि वह सुवाक से बहुत डरती थी। मेरी हँसी रोके न रुकी। कोई सुवाक से भी डरा हो, इससे बड़ा मज़ाक क्या होगा। लेकिन जीवन में जिस प्रकार चमत्कार होते हैं, उसी प्रकार मज़ाक भी बखूबी होते हैं। बल्कि कई बार तो ज़िन्दगी ऐसा मज़ाक कर जाती है कि हम हँस भी नहीं पाते। तारा और सुवाक का ब्रेकअप भी ऐसा ही एक मज़ाक था।  तारा के अनुसार उसने अपने परिवार का सम्मान बचा लिया और सुवाक? उसने तो शायद कभी कुछ खोया ही नहीं। पहले नौकरी छोड़ी, फिर शहर और फिर देश।

नाते टूटते हैं पर जुड़े रह जाते हैं। या शायद वे कभी टूटते ही नहीं, केवल रूपांतरित हो जाते हैं। हम समझते हैं कि आत्मा मुक्त हो गयी जबकि वह नये वस्त्र पहने अपनी बारी का इंतज़ार कर रही होती है। न जाने कब यह नवीन वस्त्र किसी पुराने कांटे में अटक जाता है, खबर ही नहीं होती। तार-तार हो जाता है पर परिभाषा के अनुसार आत्मा तो घायल नहीं हो सकती। न जल सकती है न आद्र होती है। बारिश की बून्द को छूती तो है पर फिर भी सूखी रह जाती है।
[नाम का चमत्कार - कहानी]

"रेडियो प्लेबैक इंडिया" पर गिरिजेश राव की कहानी "राजू के नाम एक पत्र" का ऑडियो सुनने के लिये यहाँ क्लिक कीजिये

23 comments:

  1. प्रारम्भ ही बड़ा रूचक लग रहा है।

    "हम समझते हैं कि आत्मा मुक्त हो गयी जबकि वह नये वस्त्र पहने अपनी बारी का इंतज़ार कर रही होती है। न जाने कब यह नवीन वस्त्र किसी पुराने कांटे में अटक जाता है, खबर ही नहीं होती।"

    सटीक निराकरण!!

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  2. चलिए ,देखते हैं आगे क्या होता है ?

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  3. म हन्यते हन्यमाने शरीरे..

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  4. अनुराग जी , कहानी है या हकीकत --यह समझ नहीं आया ।
    लेकिन उत्सुकता बढ़ गई है ।

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  5. क्रमशः का इंतज़ार !

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  6. `हम समझते हैं कि आत्मा मुक्त हो गयी जबकि वह नये वस्त्र पहने अपनी बारी का इंतज़ार कर रही होती है। '

    अब तो गीता पर भी आक्षेप लगने लगे हैं!!!!!

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  7. `हम समझते हैं कि आत्मा मुक्त हो गयी जबकि वह नये वस्त्र पहने अपनी बारी का इंतज़ार कर रही होती है। '

    अब तो गीता पर भी आक्षेप लगने लगे हैं!!!!!

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  8. न जाने कब यह नवीन वस्त्र किसी पुराने कांटे में अटक जाता है, खबर ही नहीं होती। तार-तार हो जाता है

    अद्भुत पंक्ति...वाह...क्या बात कही है...

    नीरज

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  9. याने आप एक बार फिर अपने पाठकों की दशा, फिल्‍म मुगल-ए-आजम की अनारकली जैसी करने पर आमादा हो गए हैं जिसे अकबर जीने नहीं देता और सलीम मरने नहीं देता।
    अब तो भगवान का ही आसरा और भरोसा है।

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  10. मेरी लाचारी का नाजायाज़फायदा उठा रहे हैं आप "क्रमशः" चिपकाकर!!

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  11. rochak lagi, aage ki kadi ka intjar hai..

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  12. क्रमशः!
    मतलब इंतजार और यही मुझे बड़ी तकलीफ देता है, लेकिन फिर भी जो वस्ल-ए-यार से ज्यादा मजा है तो फिर ठीक ही है...
    करते हैं अगली कड़ी की प्रतीक्षा.

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  13. नाते टूटते हैं पर जुड़े रह जाते हैं। या शायद वे कभी टूटते ही नहीं, केवल रूपांतरित हो जाते हैं....
    क्रमशः के बाद का इन्तजार रहेगा

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  14. ओह...फिर क्रमशः...

    बड़ा दुखदायी होता है यह...

    रेडियो प्लेबैक का तो मुझे पता ही न था...बड़ा ही लाजवाब लगा...

    आभार...

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  15. अगर ये छोटी कहानी है तो 'क्रमशः' नहीं आनी चाहिए थी..खैर, अब अगले भाग में ही पढ़ सकते हैं...

    वैसे मुझे ये काफी पसंद आई -
    'नाते टूटते हैं पर जुड़े रह जाते हैं। या शायद वे कभी टूटते ही नहीं, केवल रूपांतरित हो जाते हैं'

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  16. kuch accha hone ki ummid...ek aur behatreen shuruaat...

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  17. @ नाते टूटते हैं पर जुड़े रह जाते हैं। या शायद वे कभी टूटते ही नहीं, केवल रूपांतरित हो जाते हैं।
    जीवन सत्य !................... इस रूपांतरण के मर्म को समझने पर कई रिश्ते बचे रह सकते हैं ....
    ****************************
    आगाज शानदार है ....... आगे का इन्तजार है !

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  18. आगे का इंतज़ार है....

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  19. आगे का इंतज़ार है....

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