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Wednesday, September 11, 2013

त्सुकूबा पर्वत - एक तीर्थयात्रा जापान में

(आलेख व चित्र: अनुराग शर्मा)

कुछ समय पहले की एक पोस्ट "अई अई आ त्सुकू-त्सुकू" में हम मिले थे त्सुकूबा नगर के कुछ विशिष्ट पक्षियों से। आइये आज चलते हैं त्सुकूबा पर्वत की एक तीर्थ यात्रा पर।  

रास्ते से त्सुकूबा पर्वत का दृश्य
जापानी दंतकथाओं के अनुसार, हज़ारों वर्ष पहले एक देवी ने जापान के दो प्रमुख पर्वतों से धरा पर अवतरित होने की अपनी इच्छा प्रकट की । सर्वोच्च शिखर वाले फूजी पर्वत ने देवी के आशीर्वाद की कोई ज़रूरत न समझते हुए अहंकार पूर्वक न कर दी जबकि स्कूबा पर्वत ने विनम्रता से देवी का स्वागत भोजन व जल के साथ किया। समय बीतने पर माऊंट फूजी अपने गर्व और ठंडे स्वभाव के कारण बर्फीला और बंजर हो गया जबकि स्कूबा पर्वत हरियाली और रंगों की बहार से आच्छादित बना रहा ।

जापानी ग्रंथों के अनुसार उनके प्रथम पूर्वज दंपत्ति श्रीमती इजानामी और श्री इजानागी नो मिकोतो इसी पर्वत के नन्ताई और न्योताई शिखरों पर रहते थे। मिथकों के अनुसार जापान राष्ट्र इन्हीं दोनों की संतति है। दोनों चोटियों पर इनके भव्य स्वर्णजटित काष्ठ मंदिर आज भी हैं।

त्सुकूबा सान पर्वत परिसर का तोरणद्वार
अपनी संक्षिप्त जापान यात्रा में स्कूबा पर्वत का दर्शन मेरी एक ऐसी उपलब्धि रही जिसे आपके साथ बाँटना चाहूँगा। इसके शिखर-युग्म नन्ताई सान तथा न्योताई सान क्रमशः 871 व 877 मीटर ऊँचे हैं। स्कूबा पर्वत को जापानी भाषा में त्सुकुबासान (Tsukubasan) कहते हैं। स्कूबा पर्वत की बहुत सी विशेषताएँ हैं। उदाहरण के लिए जापान के अधिकांश पर्वतों के विपरीत यह ज्वालामुखी नहीं है। मुख्यतः गैब्रो और ग्रेनाईट से बना हुआ यह हरा-भरा पर्वत जापान के मुख्य पर्वतों में से एक है। दूर से नीलगिरी जैसे दिखने वाले इस पर्वत को स्थानीय भाषा में "बैंगनी" पर्वत भी कहते हैं।

सुबह अपने कमरे से निकलकर होटल की लॉबी में पहुँचा तो वहाँ उत्सव का सा माहौल था। एक किनारे पर साज सज्जा के साथ एक विकराल सी मूर्ति भी लगी थी। पूछने पर पता लगा कि जापानी योद्धा (समुराई) की यह मूर्ति बालक दिवस के प्रतीक के रूप में लगाई गयी है।

त्सुकूबा के टोड देवता
बाहर आकर टैक्सी ली। स्कूबा सान कहते ही ड्राइवर ने जोर से "हई" कहा और चल पडा। पथ भारत के किसी उपनगर जैसा ही था मगर बहुत साफ़ और स्पष्ट। भीड़-भाड़ और शोर भी नहीं था। नगर से बाहर का परिदृश्य भारत के किसी ग्रामीण इलाक़े जैसा ही था। दूर-दूर तक फैले खेतों के बीच में खपरैल पड़े एक या दोमंजिला घरों के समूह। कई घरों के आगे भारत की तरह ही स्कूटर या छोटी-बड़ी कारें दिख रही थीं मगर कुत्ता, बिल्ली, गाय, घोड़ा आदि नज़र नहीं आया। अब समझ में आया कि जापानी ऑटोमोबाइल उद्योग को इतनी तरक्की क्यों करनी पडी? थोड़ी देर बाद टैक्सी पहाड़ पर चढ़ने लगी। सड़क सँकरी हो गयी और नैनीताल के रास्तों की याद दिलाने लगी। लगभग एक घंटे में हम त्सुकुबायामा पहुँचे जहाँ इजानामी देवी के मठ पर एक विशालकाय टोड की मूर्ति ने हमारा स्वागत किया। आठ हज़ार येन लेकर ड्राइवर ने जोर से "हई" कहा और चलता बना।

यहाँ से ऊपर जाने के लिए मैंने रोपवे लिया। बादलों से घिरे रोपवे से जिधर भी देखो अलौकिक दृश्य था। रोपवे से उतरने पर देखा कि पहाडी पर हर तरफ बर्फ छिटकी हुई थी। रोपवे से न्योताई सान मठ तक जाने के लिए पत्थरों को काटकर बनाई गयी सीढ़ियों की कठिन खड़ी चढ़ाई चढ़कर ऊपर पहुंचा तो देखा कि छोटे बड़े लोगों के अनेक समूह वहाँ पहले से उपस्थित थे और पर्वत शिखर पर खड़े प्राकृतिक दृश्यों का आनंद ले रहे थे।

त्सुकूबा पर्वत पर स्थित एक मठ का दृश्य
लकड़ी के बने हुए छोटे से मठ पर सुनहरी धातु (शायद सोना) का काम था। मठ के अधिष्ठाता देव इजानागी नो मिकोतो शायद अपने काष्ठ-कोष्ठक में विश्राम कर रहे थे इसलिए उनके दर्शन नहीं हुए। शिखर से घाटी का दृश्य मनोरम था परन्तु वहाँ ग्रेनाईट के चिकने प्रस्तरों से बने शिखर पर खड़े होने से सैकड़ों फीट गहरी सीधी ढलान में गिरने का भय सताने लगा सो हमने नन्ताई सान के केबिल कार स्टेशन तक पद-यात्रा का मन बनाया और बर्फ से ढँकी सँकरी पथरीली ऊबड़-खाबड़ पगडंडी पर चल पड़े। रास्ते में आते-जाते समूहों ने जब सर झुकाकर “कुन्निचिवा” कहा तो हमने भी मुस्कराकर उन्हें "नमस्ते" कह कर अचम्भे में ड़ाल दिया। रास्ते में एक छोटी सी मठिया ऐसी भी मिली जो मृत-जन्मा (stillborn) बच्चों को समर्पित थी। नन्ताई सान पहुँचकर हमने स्कूबा सान के मुख्य मठ तक जाने के लिए केबिल कार (incline) ली। चीड, ओक, चैरी, आलूबुखारे और अन्य हरे-भरे वृक्षों के बीच से गुज़रते हुए हम एक सुरंग से भी निकले और तेंतीस अंश के झुकाव पर लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी छः-सात मिनट में पूर्ण कर मुख्य मठ तक पहुँच गए।

स्कूबा सान का मुख्य मठ काफ़ी नीचाई पर ज़्यादा समतल जगह पर बना हुआ है और शिखरों पर बने मठों के मुकाबले काफ़ी बड़ा और भव्य है। इसके काष्ठ भवनों में जोड़ने के लिए धातु की कीलों के स्थान पर लकड़ी और रस्सी का ही प्रयोग हुआ है। मठ के आसपास की पगडंडियों के इर्द-गिर्द छोटे फेरी वाले खिलौने, कागज़ और लकड़ी की सज्जा वस्तुएँ बाँसुरी, घुँघरू, छड़ियाँ, के साथ-साथ मेंढक, उल्लू आदि की मूर्तियाँ भी बेच रहे थे। त्वचा को आकर्षक बनाने के लिए टोड का तेल भी मिल रहा था अलबत्ता ख़रीदते हुए कोई नहीं दिखा। पूछने पर पता लगा कि यह तेल टोड की त्वचा से निकलता है और इसकी प्राप्ति के लिए उसे मारा नहीं जाता है।

मुख्य मंदिर का परिसर द्वार
कुछ जोड़े पारंपरिक वेशभूषा में देवी का आशीर्वाद लेने आये हुए थे। दिखने में सब कुछ किसी पुराने भारतीय मंदिर जैसा लग रहा था मगर उस तरह की भीड़भाड़, शोरगुल और रौनक का सर्वदा अभाव था। मंदिर के बाहर ही प्रसाद में चढ़ाए जाने वाली मदिरा के काष्ठ-गंगालों के ढेर लगे हुए थे। एक बूढ़ी माँ अपनी पोती को मंदिर के आसपास की हर छोटी-बड़ी चीज़ से परिचित करा रही थीं।

मंदिर के जापानी देवदार से बने भव्य द्वार के दोनों और अस्त्र-शस्त्र लिए दो रक्षक खड़े थे। द्वार के ऊपर लकड़ी के और अन्दर पत्थर के हिम तेंदुए या शार्दूल जैसे कुछ प्राणी बने हुए थे। मंदिरों के इस प्रकार के पारंपरिक द्वार को जापानी भाषा में तोरी कहते हैं जोकि तोरण का अपभ्रंश हो सकता है। ज़िक्र आया है तो बता दूं कि भगवान् बुद्ध को जापानी में बुत्सु (या बडको) कहते हैं। कमाकुरा के अमिताभ बुद्ध (दाई-बुतसू = विशाल बुद्ध) तथा जापान की अन्य झलकियाँ भी आप बर्गवार्ता पर अन्यत्र देख सकते हैं।

यद्यपि मूल मंदिर काफ़ी प्राचीन बताया जाता है परन्तु मंदिर का वर्तमान भवन 1633 में तोकुगावा शोगुनाते साम्राज्य के काल में बनवाया गया था। इस मंदिर का काष्ठ शिल्प जापान के मंदिर स्थापत्य का एक सुन्दर नमूना है। मुख्य भवन के द्वार पर रस्सी के बंदनवार के बीच में जापानी शैली का घंटा टँगा हुआ था। मूलतः शिन्तो मंदिर होने के बावजूद पिछले पाँच सौ वर्षों से यह स्थल बौद्धों और सामान्य पर्यटकों का भी प्रिय है।
मेरे शब्दों में इस मंदिर की तारीफ़ शायद गूँगे के गुड जैसी हो इसलिए चित्र देखिये और स्कूबा पर्वत की वसंत-काल यात्रा का आनंद उठाइये। इस जापान यात्रा में काष्ठ-स्थापत्य और प्राकृतिक सौंदर्य के अतिरिक्त जिस एक बात ने मुझे मोहित किया वह है जापानियों की अद्वितीय विनम्रता।

(यह यात्रावृत्तान्त सृजनगाथा पर जनवरी 5, 2010 को प्रकाशित हो चुका है।)
अब देखें स्कूबासान की तीर्थयात्रा के कुछ नए चित्र

रोपवे स्टेशन

रोपवे स्टेशन कुछ और दूर जाने पर

एक और मठ

केबल कार

मार्ग की एक सुरंग

मुख्य मंदिर का काष्ठद्वार

एक छोटा मठ

एक काष्ठद्वार

काष्ठद्वार की सज्जा की एक झलक

जापानी अखबार में भारतीय मॉडल