Tuesday, April 14, 2009

वाह पुलिस, आह पुलिस - [इस्पात नगरी से - खंड १२]

पिछली कड़ी में हमने बात की थी पिट्सबर्ग पुलिस द्वारा स्थानीय डाउनटाऊन के नशीली दवाओं के एक बड़े रैकेटके भंडाफोड़ की। इसके साथ ही हमने पुलिस के त्वरित सञ्चालन के कारण एक ब्रिटिश लड़के की जान बचाने के बारे में जाना। उस कड़ी में ही मैं पिट्सबर्ग के एक उपनगर की घटना के बारे में लिखने जा ही रहा था की इसी बीच पुलिस से ही सम्बंधित एक और घटना/दुर्घटना हो गयी।

एक महिला ने आपातकालीन सेवा को फोन करके बताया की अपने घर पर ही उसकी अपने बेटे से झड़प हो गयी है और उसे मौके पर पुलिस की सहायता की ज़रूरत है। ओपेरटर द्वारा हथियारों के बारे में पूछने पर महिला ने कहा की उसके पुत्र के पास लाइसेंसी हथियार हो सकते हैं। मिनटों में ही दो नौजवान पुलिस अधिकारी मौके पर पहुँच गए। जब एक वरिष्ठ अधिकारी को ड्यूटी से घर जाते समय यह बात पता चली तो वे वर्दी उतार चुकने के बावजूद उन दोनों की सहायता के लिए घटना स्थल पर पहुँच गए।

तीनों ही अधिकारियों को इस बात का अहसास नहीं था की नौसेना से निकाले गए उस गुस्सैल लड़के के पास तरह-तरह के हथियार मौजूद थे। पुलिस को देखकर उसने ऐ के ४७ से अंधाधुंध गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं। नतीजा यह हुआ की तीनों अधिकारी वहीं धराशायी हो गए।

पीछे से पहुंचे दस्ते ने बाद में उस युवक को काबू में कर लिया मगर इस समाचार के बाद सारा शहर शोकग्रस्त हो गया। शव दर्शन के लिए रखे गए और बाद में उनका पूरे सम्मान के साथ अन्तिम संस्कार किया गया। समारोह में अमेरिका भर से पुलिस के प्रतिनिधि उपस्थित थे। इस घटना पर स्थानीय पुलिस को जनता का सराहनीय सहारा मिला। लोगों ने मृतकों के परिवारों के लिए भी दिल खोलकर दान दिया।

अब रही बात क्रेनबेरी की। इस घटना ने यहाँ काफी लोगों को हिला दिया है। हुआ यूँ कि लगभग पाँच साल पहले एक पेट्रोल पम्प पर काम करने वाली बीस वर्षीया लडकी ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई कि किसी बदमाश ने जबरन अन्दर घुसकर उसका शील भंग किया और फ़िर कुछ नकदी लूटकर भाग गया। पुलिस आयी और अपने तरीके से जांच करती रही। जब काफी समय तक कुछ पता नहीं लगा तो पुलिस वालों ने यह कहानी निकाली कि लडकी ने ख़ुद ही पैसे चुरा लिए हैं और मालिक और पुलिस को गुमराह करने के लिए यह कहानी रची है।

मालिक ने लडकी को नौकरी से निकाल दिया और पुलिस ने उसे चोरी के आरोप में जेल में डाल दिया। दुःख की बात यह है कि उस समय वह गर्भवती थी। सवा साल तक जेल में रहने के बाद उसका मुकदमा शुरू हुआ और उसी समय सच्चाई सामने आयी।

एक दूसरे इलाके की पुलिस ने एक मिलती-जुलती घटना के लिए जब एक आदमी को पकडा तो उसने अपने अपराधों की सूची पुलिस को दी। जिसमें क्रेनबेरी की घटना भी शामिल थी। शर्मिन्दा पुलिस को पीडिता को छोड़ना ही पडा। इसके बाद पीडिता ने पुलिस और प्रशासन पर मुक़द्दमा किया। लगभग ढाई साल तक चले इस मुक़दमे को दो-तीन हफ्ते पहले इस बिना पर खारिज कर दिया गया कि चूंकि पुलिस को कड़े अपराधियों से जूझना पड़ता है इसलिए एकाध बार इस तरह की गलती हो जाना कोई अनहोनी बात नहीं है।

[इस श्रंखला के सभी चित्र अनुराग शर्मा द्वारा लिए गए हैं. हरेक चित्र पर क्लिक करके उसका बड़ा रूप देखा जा सकता है.]==========================================
इस्पात नगरी से - अन्य कड़ियाँ
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24 comments:

  1. पुलिस के लिये कमोबेश एक जैसी चुनौतियां होती है,नक्सल और आतंकवाद ग्रस्त क्षेत्र मे चुनौतियां थोडी अलग और कड़ी होती है।पुलिस का ड्यूटी पर शहीद होना उसकी कर्तव्यनिष्ठा का सबूत है।इसके बावज़ूद एक निर्दोष महिला के साथ हूई नाईंसाफ़ी को एकाध बार गलती हो जाना अनहोनी नही है कहकर उसके मुकदमे को खारिज कर देना उसके साथ एक और बार अन्याय होना माना जा सकता।

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  2. लगभग ढाई साल तक चले इस मुक़दमे को दो-तीन हफ्ते पहले इस बिना पर खारिज कर दिया गया कि चूंकि पुलिस को कड़े अपराधियों से जूझना पड़ता है इसलिए एकाध बार इस तरह की गलती हो जाना कोई अनहोनी बात नहीं है।

    पर पिडीत व्यक्ति की तो जिंदगी खराब हो गई ना? पर क्या किया जा सकता है.

    रामराम.

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  3. पुलिस को हर जगह बहुत दबाव में काम करना पड़ता है। काम ही ऐसा है कि कभी फूल मिलते हैं, कभी गालियां सुननी होती हैं।

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  4. ओह, दोनों ही घटनाऍं दुखद थीं।

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  5. जी हाँ डिस्कवरी चैनल पर एक प्रोग्राम आता था जिसमे कई बार निरपराध लोग २० -२० साल की जेल काट जाते थे ,दरअसल कुछ महकमे जैसे पुलिस ,मेडिकल ,न्याय ..इसमें एक चूक भी भारी पड़ती है इसलिए कानून कहता है भले ही देर हो पर निर्दोष को सजा न हो...

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  6. बडे बडे शहरों में ऐसी छोटी छोटी घटनाऍं होती रहती हैं।

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    तस्‍लीम
    साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

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  7. वाह पुलिस ! आह पुलिस !

    बिल्कुल उपयुक्त शीर्षक.

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  8. चलिये, किसी बात में तो पिट्सबर्ग कुछ यूपोरियन लगा। यहां तो अखबार गला रेत घटनाओं से सराबोर होते हैं!

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  9. kaash bharat ki pulis bhi oopar ki ghatna se kuchh sabak seekhe.

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  10. हमारे यहाँ आह में कभी कभी वाह:(

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  11. बात तो सही है, पुलिस से गलती हो सकती है। लेकिन पुलिस राज्य की होती है। उस के कारण लड़की को जो नुकसान उठाना पड़ा उस की भरपाई राज्य को मुआवजे के रूप में करनी चाहिए।

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  12. द्विवेदी जी,
    पीडिता के मुकदमा दायर करते समय (२००५ में) काउंटी (जनपद) ने उसे मुक़दमे के बाहर ४५,००० डॉलर का मुआवजा दिया था. मगर वह मुकदमा चलता रहा क्योंकि वह मुआवजा तो शायद उसके नौकरी के नुक्सान की ही भरपाई कर पा रहा था और महिला शायद अपने मानसिक, शारीरिक कष्ट, अपमान और अवसाद की जिम्मेदारी के साथ-साथ शायद गलती करने वाले पुलिस अधिकारियों को सज़ा भी दिलाना चाहती हो - जो कि मुझे भी जायज़ और ज़रूरी लगता है. वैसे नगर/ग्राम की पुलिस यहाँ नगर या ग्राम प्रशासन के अधीन होती है.

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  13. दो धारी तलवार वाले सरकारी महकमे ..!

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  14. पुलिस भी इन्सान ही है इसलिए गलती होना तो स्वाभाविक है,किन्तु अदालत द्वारा उसके मुकद्दमे को खारिज करना भी किसी प्रकार से न्याय नहीं कहा जा सकता.......

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  15. मैं भी पीडित महिला के पक्ष में हूं। पुलिस पर काम के दबाव को अस्‍वीकार नहीं किया जा सकता किन्‍तु महिला तो अकारण ही दण्डित हो गई। उसे अधिकतम क्षतिपूर्ति होनी ही चाहिए।

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  16. डॉ. अनुराग जी,

    उस बेचारी के लिये हम हमदर्दी ही जता सकते हैं. फिर भी किसी भी फैसले का एक मानवीय दृष्टीकोण भी होना चाहिये यह किसी भी न्याय व्यवस्था के लिये गर्व की बात हो सकती है. एक ओर जहाँ अपराधी कड़े दंड का तो निरापराध यदि सजा पाया है तो वह उचित सम्मान का अधिकारी तो हो ही सकता है.

    बहरहाल, हमें तो अपने ही हालातों से जूझना है.

    धन्यवाद

    मुकेश कुमार तिवारी

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  17. मानव गलतियो का पुलिन्दा है जी

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  18. अमरीका व्यवस्था और खास तो इस केस के बारे मेँ विस्तार से और अच्छी तरह समझाया है आपने
    - लावण्या

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  19. स्मार्ट इण्डियन जी!
    आपने पुलिस के दो चित्र प्रस्तुत किये हैं। पहला चित्र सन्देश देता है, काश्! हमारे देश की पुलिस भी इतनी कर्मठ होती!
    जाँबाज तीनों पुलिस कर्मियों को
    मैं भी श्रद्धा के सुमन अर्पित करता हूँ।
    दूसरा चित्र तो अपने देश की पुलिस के जैसा ही लगता है।
    लड़की के जेल में बिताये दिन
    दुखद इतिहास के काले पन्नों जैसे हैं।
    इन घटनाओं का दिग्दर्शन कराने के लिए आभार।

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  20. बहुत दिलचस्प। पुलिस पुलिस का फर्क वहां भी है....

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  21. आपने दोनो पहलू दिखा दिये. हमारे भारत में तो ऐसी कई घटनायें आम बात है,जिसमें पुलिस से गलती से लाखों लोग सिर्फ़ मुकदमा ही लढ रहे है,जेल में सडते हुए.

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  22. प्रिय अनुराग /बहुत दिन बाद आपको पढ़ रहा हूँ ( मतलब आपका लिखा हुआ पढ़ रहा हूँ ) आपके लेख से यह तो लगा कि यह दुनिया एक जैसी ही है / पुलिस ,प्रसासन ,न्याय सबको कमोवेश एक सी परिस्थियों से गुजरना होता है /आपके लेख के साथ मैंने विद्वानों की टिप्पणियाँ पढी और बीच में आपकी भी (मतलब द्विवेदी जी के बाद और रियलिटी बाइट्स के पूर्व )टिप्पणी या स्पष्टीकरण जो भी हो पढ़ा /इस दुनिया में ऐसे न जाने कितनी घटनाये प्रतिदिन होती रहती होंगी किसी और हमारा ध्यान चला जाता है हम भलेही कुछ न कर पायें परन्तु कहाँ कहाँ क्या क्या हो रहा है यह तो जानकारी होनी चाहिए /आपकी हिन्दी में दिलचस्पी हमारे लिए आनंद का विषय है /

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  23. बड़ी ही दुखद घटनायें हैं.

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  24. विश्व भर में कमोबेश यही स्थितियां हैं. बस थोड़ी बहुत भिन्नता के साथ. खैर.... अच्छा आलेख.

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