Wednesday, August 30, 2017

घोंसले - कविता

(अनुराग शर्मा)

बच्चे सारे कहीं खो गये
देखो कितने बड़े हो गये

घुटनों के बल चले थे कभी 
पैरों पर खुद खड़े हो गये

मेहमाँ जैसे ही आते हैं अब
छोड़के जबसे घर वो गये 

प्यारे माली जो थे बाग में
उनमें से अब कई सो गये

याद से मन खिला जिनकी
यादों में ही नयन रो गये॥

9 comments:

  1. समय चलता नहीं है दौड़ता है जैसे :) सुन्दर।

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 31-08-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2713 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  3. बच्चे सारे कहीं खो गये
    देखो कितने बड़े हो गये

    घुटनों के बल चले थे कभी
    पैरों पर खुद खड़े हो गये

    ग़ैरों जैसे आते हैं अब
    छोड़के जबसे घर वो गये

    प्यारे माली जो बगिया के
    उनमें से अब कई सो गये

    मन जिनकी याद से खिला, उन
    यादों से ही नयन रो गये॥

    सुंदर भाव..

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  4. घोंसले में समाते आखिर कब तक ,एक दिन निकलना ही था उन्हें .

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  5. प्यारे माली जो थे बाग में
    उनमें से अब कई सो गये

    - यह स्थिति सबसे दुखद है ।

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