Thursday, February 19, 2015

लोगो नहीं, लोगों - हिन्दी व्याकरण विमर्श


मेरे पास आओ, मेरे दोस्तों - बहुवचन सम्बोधन में अनुस्वार का प्रयोग व्याकरणसम्मत है

हिन्दी बहुवचन सम्बोधन और अनुस्वार
अनुस्वार सम्बोधन, राजभाषा विभाग के एक प्रकाशन से
इन्टरनेट पर कई जगह यह प्रश्न देखने में आता है कि बच्चा का बहुवचन बच्चों होगा या बच्चो। इसी प्रकार कहीं दोस्तों और दोस्तो के अंतर के बारे में भी हिन्दी, हिन्दुस्तानी, उर्दू मंडलों में चर्चा सुनाई देती है। शायद कभी आप का सामना भी इस प्रश्न से हुआ होगा। जब कोई आपको यह बताता है कि जिन शब्दों को आप सदा प्रयोग करते आए हैं, वे व्याकरण के किसी नियम के हिसाब से गलत हैं तो आप तुरंत ही अपनी गलती सुधारने के प्रयास आरंभ कर देते हैं।

सुनने में आया कि आकाशवाणी के कुछ केन्द्रों पर नए आने वाले उद्घोषकों को ऐसा बताया जाता है कि किसी शब्द के बहुवचन में अनुस्वार होने के बावजूद उसी शब्द के संबोधन में बहुवचन में अनुस्वार का प्रयोग नहीं होता है। इन्टरनेट पर ढूंढने पर कई जगह इस नियम का आग्रह पढ़ने को मिला। इस आग्रह के अनुसार "ऐ मेरे वतन के लोगों" तथा "यारों, सब दुआ करो" जैसे प्रयोग तो गलत हुए ही "बहनों और भाइयों" या "देवियों, सज्जनों" आदि जैसे आम सम्बोधन भी गलत कहे जाते हैं।

बरसों से न, न करते हुए भी पिछले दिनों अंततः मुझे भी इसी विषय पर एक चर्चा में भाग लेना पड़ा तो हिन्दी व्याकरण के बारे में बहुत सी नई बातें जानने को मिलीं। आज वही सब अवलोकन आपके सामने प्रस्तुत हैं। मेरा पक्ष स्पष्ट है, आपके पक्ष का निर्णय आपके विवेक पर छोडता हूँ।
1) 19 वीं शताब्दी की हिन्दी और हिन्दुस्तानी व्याकरण की कुछ पुस्तकों में बहुवचन सम्बोधन के अनुस्वाररहित होने की बात कही गई है। मतलब यह कि किसी को सम्बोधित करते समय लोगों की जगह लोगो, माँओं की जगह माँओ, कूपों की जगह कूपो, देवों की जगह देवो के प्रयोग का आग्रह है।    
2) कुछ आधुनिक पुस्तकों और पत्रों में भी यह आग्रह (या नियम) इसके उद्गम, कारण, प्रचलन या परंपरा की पड़ताल किए बिना यथावत दोहरा दिया गया है।
ऐ मेरे वतन के लोगो (logo)

3) हिन्दी व्याकरण की अधिसंख्य पुस्तकों में ऐसे किसी नियम का ज़िक्र नहीं है अर्थात बहुवचन के सामान्य स्वरूप (अनुस्वार सहित) का प्रयोग स्वीकार्य है।

4) जिन पुस्तकों में इस नियम का आग्रह है, वे भी इसके उद्गम, कारण और लाभ के बारे में मूक है।

5) भारत सरकार के राजभाषा विभाग सहित अधिकांश प्रकाशन ऐसे किसी नियम या आग्रह का ज़िक्र नहीं करते हैं।

6) हिन्दी उर्दू के गीतों को आदर्श इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि उनमें गलत उच्चारण सुनाई देने की घटनाएँ किसी सामान्य श्रोता के अनुमान से कहीं अधिक हैं। एक ही गीत में एक ही शब्द दो बार गाये जाने पर अलग-अलग सुनाई देता है। हमें, तुम्हें, उन्होंने आदि जैसे सामान्य शब्दों से भी अक्सर अनुस्वार गायब लगते हैं।

7) ध्यान से सुनने पर कुछ अहिंदीभाषी गायक तो अनुस्वार को नियमित रूप से अनदेखा करते पाये गए हैं। यद्यपि कुछ गीतों में में ये माइक्रोफोन द्वारा छूटा या संगीत द्वारा छिपा हुआ भी हो सकता है। पंकज उधास और येसूदास जैसे प्रसिद्ध गायक भीलगभग हर गीत में मैं की जगह मै या मय कहते हैं।  
आकाशवाणी के कार्यक्रम "आओ बच्चों" की आधिकारिक वर्तनी

8) मुहम्मद रफी और मुकेश बहुवचन सम्बोधन में कहीं भी अनुस्वार का प्रयोग करते नहीं सुनाई देते हैं। अन्य गायकों पर असहमतियाँ हैं। मसलन, किशोर "कुछ ना पूछो यारों, दिल का हाल बुरा होता है" गाते हैं तो दूसरी बार में अनुस्वार एकदम स्पष्ट है। अमिताभ बच्चन आम हिंदीभाषियों की तरह बहुवचन सम्बोधन में भी सदा अनुस्वार का प्रयोग करते पाये गए हैं।

9) ऐ मेरे वतन के लोगों गीत की इन्टरनेट उपस्थिति में बहुवचन सम्बोधन शब्द लोगों लगभग 16,000 स्थानों में अनुस्वार के साथ और लगभग 4,000 स्थानों में अनुस्वार के बिना है। सभी प्रतिष्ठित समाचारपत्रों सहित भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट में भी "ऐ मेरे वतन के लोगों" ही छपा है। लता मंगेशकर के गायन में भी अनुस्वार सुनाई देता है।

11) rekhta.org और बीबीसी उर्दू जैसी उर्दू साइटों पर सम्बोधन को अनुस्वार रहित रखने के उदाहरण मिलते हैं।

अनुस्वार हटाने से बने अवांछित परिणामों के कुछ उदाहरण
  1. लोटों, यहाँ मत लोटो (सही) तथा लोटो, यहाँ मत लोटो (लोटो या मत लोटो?) 
  2. भेड़ों, कपाट मत भेड़ो (सही) तथा  भेड़ो, कपाट मत भेड़ो (भेड़ों का कोई ज़िक्र ही नहीं?)
  3. बसों, यहाँ मत बसो (सही) तथा बसो, यहाँ मत बसो (बसो या न बसो?)
  4. ऐ मेरे वतन के लोगों (देशवासी) तथा ऐ मेरे वतन के लोगो (देश का प्रतीकचिन्ह, अशोक की लाट)
उपरोक्त उदाहरणों में 1, 2 व 3 में लोटे, भेड़ और बस को बहुवचन में सम्बोधित करते समय यदि आप अनुस्वार हटा देंगे तो आपके आशय में अवांछित ही आ गए विरोधाभास के कारण वाक्य निरर्थक हो जाएँगे। साथ ही लोटों,भेड़ों और बसों के संदर्भ भी अस्पष्ट (या गायब) हो जाएँगे। इसी प्रकार चौथे उदाहरण में भी अनुस्वार लगाने या हटाने से वाक्य का अर्थ बदल जा रहा है।
10) कवि प्रदीप के प्रसिद्ध गीत "इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्हाल के" गीत के अनुस्वार सहित उदाहरण कवि प्रदीप फाउंडेशन के शिलापट्ट तथा अनेक प्रतिष्ठित समाचार पत्रों पर हैं जबकि अधिकांश अनुस्वाररहित उदाहरण फेसबुक, यूट्यूब या अन्य व्यक्तिगत और अप्रामाणिक पृष्ठों पर हैं।

ऐ मेरे वतन के लोगों - टिकट पर अनुस्वार है

12) इस विषय पर छिटपुट चर्चायें हुई हैं। इस नियम (या आग्रह) के पक्षधर, बहुसंख्यक जनता द्वारा इसके पालन न करने को प्रचलित भूल (ग़लतुल-आम) बताते हैं।

13) इस नियम के औचित्य पर कई सवाल उठाते हैं, यथा, "ऐ दिले नादां ..." और "दिले नादां तुझे हुआ क्या है" जैसी रचनाओं में एकवचन में भी अनुस्वार हटाया नहीं जाता तो फिर जिस बहुवचन में अनुस्वार सदा होता है उससे हटाने का आग्रह क्योंकर हो?

14) अनुस्वार हटाकर बहुवचन का एक नया रूप बनाने के आग्रह को मैं हिन्दी के अथाह सागर का एक क्षेत्रीय रूपांतर मानता हूँ और अन्य अनेक स्थानीय व क्षेत्रीय रूपांतरों की तरह इसके आधार पर अन्य/भिन्न प्रचलित परम्पराओं को गलत ठहराए जाने का विरोधी हूँ।

15) भारोपीय मूल की अन्य भाषाओं में ऐसा कोई आग्रह नहीं है। उदाहरण के लिए अङ्ग्रेज़ी में boy का बहुवचन boys होता है तो सम्बोधन में भी वह boys ही रहता है। सम्बोधन की स्थिति में boys के अंत से s हटाने या उसका रूपांतर करने जैसा कोई नियम वहाँ नहीं है, उसकी ज़रूरत ही नहीं है।

16) इस नियम (या आग्रह) से अपरिचित जन और इसके विरोधी, इसके औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए एक आपत्ति यह रखते हैं कि इस नियम के कारण एक ही शब्द के दो बहुवचन संस्कारण बन जाएँगे जो अनावश्यक तो हैं ही, कई बार भिन्न अर्थ वाले समान शब्द होने के कारण अर्थ का अनर्थ करने की क्षमता भी रखते हैं। उदाहरणार्थ बिना अनुस्वार के "ऐ मेरे वतन के लोगो" कहने से अशोक की लाट (भारत का लोगो) को संबोधित करना भी समझा जा सकता है जबकि लोगों कहने से लोग का बहुवचन स्पष्ट होता है और किसी भी भ्रांति से भली-भांति बचा जा सकता है।
कुल मिलाकर निष्कर्ष यही निकलता है कि हिन्दी के बहुवचन सम्बोधन से अनुस्वार हटाने का आग्रह एक फिजूल की बंदिश से अधिक कुछ भी नहीं। कुछ पुस्तकों में इसका वर्णन अवश्य है और हिन्दी के प्रयोगकर्ताओं का एक वर्ग इसका पालन भी करता है। साथ ही हिंदीभाषियों और व्याकरणकारों का एक बड़ा वर्ग ऐसे किसी नियम को जानता भी नहीं है, मानने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। इस आग्रह का कारण और उद्गम भी अज्ञात है। इसके प्रायोजक, प्रस्तोता और पालनकर्ता इसके उद्गम के बारे में कुछ नहीं जानते हैं। संभावना है कि हिन्दी की किसी बोली, संभवतः लश्करी उर्दू या क्षेत्र विशेष में इसका प्रचालन रहा होगा और उस बोली या क्षेत्र के लोग इसका प्रयोग और प्रसार एक परिपाटी की तरह करते रहे हैं। स्पष्टतः इस आग्रह के पालन से हिन्दी भाषा या व्याकरण में कोई मूल्य संवर्धन नहीं होता है। इस आग्रह से कोई लाभ नहीं दिखता है, अलबत्ता भ्रांति की संभावना बढ़ जाती है। ऐसी भ्रांतियों के कुछ उदाहरण इस आलेख में पहले दिखाये जा चुके हैं।
बचपन से यह बहस सुनता आया हूँ, कभी लिखा नहीं क्योंकि उसकी ज़रूरत नहीं समझी। लेकिन अब जब इस हानिप्रद आग्रह के पक्ष में लिखे उदाहरण सबूत के तौर पर पेश किए जाते देखता हूँ और इसके बारे में कोई ज़िक्र न करने वाली पुस्तकों को सबूत का अभाव माना जाता देखता हूँ तो लगता है कि शांति के स्थान पर नकार का एक स्वर आवश्यक है ताकि इन्टरनेट पर इस भाषाई दुविधा के बारे में जानकारी खोजने वालों को दूसरा पक्ष भी दिख सके, शांति का स्वर सुनाई दे। इस विषय पर आपके अनुभव, टिप्पणियों और विचारों का स्वागत है। यदि आपको बहुवचन सम्बोधन से अनुस्वार हटाने में कोई लाभ नज़र आता है तो कृपया उससे अवगत अवश्य कराएं। धन्यवाद!

ऐ मेरे वतन के लोगों - लता मंगेशकर का स्वर, कवि प्रदीप की रचना

* हिन्दी, देवनागरी भाषा, उच्चारण, लिपि, व्याकरण विमर्श *
अ से ज्ञ तक
लिपियाँ और कमियाँ
उच्चारण ऋ का
लोगो नहीं, लोगों
श और ष का अंतर

21 comments:

  1. इन छोटी और बहुत ही बारीकी की जानकारी से तो अनभिज्ञ थे ... आज इन्टरनेट पर हिंदी लिखने के लिए हम सभी गूगल आई.एम. आई हिंदी इनपुट का प्रयोग कर रहे है. जो इसमें लिखा जाता है उसे ही हम टांक देते है . . . . . इस बेहतरीन और हिंदी की शुद्धता को 100% सही लिखने के लिए आपके द्वारा लिखा हुआ लेख बहुत ही काम आएगा. . . आपको बहुत-बहुत धन्यवाद...
    मेरे ब्लॉग पर आप सभी लोगो का हार्दिक स्वागत है.

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  2. 19 वीं शताब्दी की हिन्दी और हिन्दुस्तानी व्याकरण की कुछ पुस्तकों में बहुवचन सम्बोधन के अनुस्वाररहित होने की बात कही गई है। मतलब यह कि किसी को सम्बोधित करते समय लोगों की जगह लोगो, माँओं की जगह माँओ, कूपों की जगह कूपो, देवों की जगह देवो के प्रयोग का आग्रह है।.................यह शताब्‍दी हिन्‍दी के प्रमाणीकरण और सदृढ़ीरण के लिए नहीं, उसके विद्रूपीकरण, विघटन के लिए ज्‍यादा जानी जाती है। क्‍यों न अनुस्‍वार के साथ बहुवचन सम्‍बोधन (लोगो का लोगों) के प्रमाणीकरण के लिए हम-आप मुगलकाल से पूर्व के संस्‍कृत-हिन्‍दी प्रलेखों का सहारा लेते हैं?

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  3. सुनने, पढने और लिखने में ये अखरता तो है ।

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  4. मैं व्याकरण की बात नहीं कह रहा हूँ । हमें अनुस्वार बहुत प्रिय है । छत्तीसगढ़ में "कंउंआँ" "केंचुंआँ" "इस तरंह" बोलने की परम्परा है । यह लोकवाणी है ... लोक जो व्याकरण नहीं जानता अपने तरीके से शब्दों का प्रयोग करता है ....और यदि जानता भी है तो परम्परा से विद्रोह नहीं करता । सभी हिंदीभाषी क्षेत्रों में शब्दों के उच्चारण और लिखने में किंचित भिन्नता मिलती है ...शायद यही भाषा की विविधता और भाषा पर क्षेत्रीय प्रभाव है । यूँ मेरा अभ्यास भाइयो और बच्चो कहने का है ....हो सकता है कि व्याकरण की दृष्टि से यह त्रुटिपूर्ण हो ।

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  5. Bahut sunder prastuti...
    Welcome to my blog..

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  6. इस बारे में अधिक नहीं जानती। :(

    ऊपर के वाक्य में - में(मे) और नहीं(नही) - इन दोनों (दोनो) पर अनुस्वार होंगे (होगे) या नहीं?

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  7. अनुराग जी , यह बेहद जरुरी विमर्श बन गया है क्योंकि अक्सर लोग इस बात का ध्यान ही नहीं रखते कि कहाँ अनुस्वार लगाना है और कहाँ नहीं . वास्तव में जहाँ सम्बोधन कारक होता है वहां अनुस्वार का प्रयोग नहीं किया जाता जैसे --वीरो , पहचानो दुश्मन को . देवियो और सज्जनो ! , छात्राओ , बाहर आओ . बच्चो , शोर मत करो . आदि . अन्य कारकों --कर्त्ता , कर्म ,करण सम्प्रदान आदि सभी कारकों में अनुस्वर का प्रयोग आवश्यक है--- वीरों का वसंत . वीरों ने प्राण निछावर किये .बच्चों का मन कोमल होता है आदि . हिंदी के लेखन में गलतियाँ प्रायः श्रुतिलेखन न करवाने के कारण होतीं हैं . अब तो पत्रिकाओं ,अखबारों और पाठ्य-पुस्तकों में भी इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है .यह एक सोचनीय विषय है .

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    1. गिरिजा जी, आपकी बहुमूल्य टिप्पणी के लिए आभार। प्रश्न सम्बोधन कारक में अनुस्वार का प्रयोग नहीं करने के उस आग्रह के उद्गम और औचित्य पर ही है। कोई भी निर्णय लेते समय भावनाओं से ऊपर उठकर निम्न बातों पर ध्यान देना आवश्यक है:
      1) यह नियम कहाँ से आया? - (किसी को नहीं पता)
      2) क्या बहुसंख्या जनता इसे जानती/मानती है? (नहीं, सांख्यकी गवाह है)
      3) क्या हिन्दी साहित्यकार इसके साथ हैं (उर्दू साहित्य में प्रचलित है, हिन्दी में नहीं)
      4) क्या इसके होने से कोई लाभ है? - (अब तक कोई नहीं दिखा, उल्टे इस नियम की हानियाँ स्पष्ट दिख रही हैं। इस आलेख में दिये गए उदाहरण देखिये)
      5) क्या यह राजभाषा विभाग द्वारा स्वीकृत है (ऐसा कोई सबूत मुझे तो नहीं दिखा)

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    2. आदरणीय अनुराग जी ,
      आपने मेरी टिप्पणी को स्थान दिया इसके लिये आभार . आपके द्वारा उठाए गए सवाल सचमुच विचारणीय हैं . जितना मैं जानती हूँ कहने का विनम्र प्रयास कर रही हूँ .
      (1) अहिन्दी भाषी लोगों के उच्चारण को उदाहरण नहीं बनाया जाना चाहिए क्योंकि हिन्दी उनके अभ्यास में नहीं होती . इसी तरह अज्ञानतावश किये उच्चारण को भी . जैसे अब बहुत सारे लोग विद्यालय को विध्यालय बोलते सुने जाते हैं तो क्या उसे हम सही मान लेंगे ? क्योंकि भाषा सही तरीके से पढ़ाई लिखाई नहीं जाती ,लोग इसलिए गलत पढ़ते व लिखते हैं पर बहुसंख्यक के आधार पर उसे मानक तो नहीं मान सकते न.
      (२) क्षमा करें ,’लोगो’ का अर्थ प्रतीक अंग्रेजी में है . हिन्दी में नहीं . मेरे वतन के लोगो ही सही है . बसों लोटो या भेड़ो जैसे उदाहरण भी उपयुक्त प्रतीत नहीं होते .
      (३) भाषा-व्याकरण के नियम भाषा के विद्वानों ने ही तय किये हैं . हर भाषा का अपना स्वरूप होता है . उसे बनाए रखने के लिए व्याकरण के कुछ नियम तो मानने ही होते हैं इसमें लाभ या हानि की जानकारी तो मुझे नहीं है .
      आप बाहर रहते हुए भी हिन्दी के बारे में इतना कुछ सोचते व लिखते हैं यह हमारे लिए बहुत प्रेरणादायक है .आभार आपका .

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  8. जानकारी के लिहाज से बहुत ही अच्छा लगा आपका आलेख ... जानता नहीं इसलिए कहना संभव नहीं क्या सही क्या गलत ... पर इस विषय पर कुछ खोज हो तो कुछ तथ्य जरूर सामने आयेंगे ...

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  9. हमने यह स्नातक के समय इस गूढ़ पक्ष को समझा था, हाँ अब धीरे धीरे जैसे जैसे अंग्रेजी की पकड़ बाजार में बड़ती जा रही है, वैसे वैसे मात्राओं की समझ भी नई पीढ़ी में कम होती जा रही है

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  10. डॉ. कौशलेन्द्रम की तरह ही "मेरा अभ्यास भाइयो और बच्चो कहने का है" और गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी की बात से भी सहमत हूँ कि "भाषा-व्याकरण के नियम भाषा के विद्वानों ने ही तय किये हैं . हर भाषा का अपना स्वरूप होता है . उसे बनाए रखने के लिए व्याकरण के कुछ नियम तो मानने ही होते हैं"। इस पर और विस्तार से मैं ने अपने विचार अपने ब्लॉग पर रखे हैं।
    http://kaulonline.com/chittha/2015/02/sambodhan-me-anuswar/

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  11. एक बहुत अच्छी पुस्तक मिली है गूगल बुक्स में जिसका नाम है "हिंदी में अशुद्धियाँ"। इसके पृष्ठ 286 पर जो बात लिखी है, वह शायद इस समस्या पर निर्णयात्मक प्रकाश डालती है। पहला पैरा पढ़ें। उद्धृत करता हूँ।
    "बहुवचन संबोधनार्थक '-ओ' के बदले '-ओं' का व्यवहार पूर्णतः सादृश्यजन्य है। विभिन्न कारकीय विभक्तियों के पूर्व बहुवचन में '-ओं' व्यवहृत होता है, इसलिए प्रयोक्ता संबोधन में भी वही प्रयुक्त कर देता है, जैसे भाइयो के बदले भाइयों। नियम चल रहा है, इसलिए 'कवियो', 'बहुओ', 'माताओ', 'राजाओ' (किशोरीदास बाजपेयी 1959 : 200-201), 'लड़को', 'लड़कियो' (आर्येंद्र शर्मा 1972 : 45) को सही माना जा रहा है, जबकि एकरूपता संबोधन के इन रूपों को 'मुनियों', 'डाकुओं', 'राजाओं', 'शालाओं', 'बालकों' (कामताप्रसाद गुरु 1976 : 157-60) के अनुसार ढालती जा रही है।"

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  12. बहुत सार्थक जानकारी दी है इस लेख में लेकिन मै बिलकुल अनपढ़ हूँ व्याकरण के मामले में !
    बस जैसे तैसे काम चलाऊ लिख लेती हूँ :) !

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  13. सवाल ,' क्या चल रहा है ' का नहीं ' क्या चलना चाहिए ' --का होना चाहिए . डा भोलानाथ तिवारी की पुस्तक 'भाषा-विज्ञान तथा 'हिन्दी-भाषा 'में स्पष्ट कहा गया है कि बहुवचन के लिए निर्धारित छः प्रत्ययों में सर्वाधिक प्रयुक्त 'ओं ' है ( इसलिए उसे बहुवचन का रूपिम मन जाता है ) जो सम्बोधन में अनुस्वार-रहित ( ओ )हो जाता है .

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  14. उर्दू वाले भी यही कर रहे हैं। यह कड़ी देखें।

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  15. एक और उर्दू ग्रामर की पुस्तक का पृष्ठ। पहली तालिका में अन्य बहुवचन रूपों के लिए मर्द या मर्दों (men) का प्रयोग हुआ है, पर संबोधन के लिए मर्दो (बिना नून-गुनह, यानी अनुस्वार, के)। अंत में नोट भी दिया गया है - Notice the form of the vocative plural.
    यह बात पक्की है कि यह नियम व्याकरण में है। इसके औचित्य पर भी विवाद नहीं है। विवाद केवल इस बात का है कि आजकल के हिंदी भाषियों की majority इस नियम का पालन करती है या नहीं।

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  16. हिंदी भाषा पर क्षेत्रीय प्रभाव के असर को अलग नहीं किया जा सकता. लेकिन मेरा मत है कि जो शुद्ध नहीं है, वो शुद्ध नहीं है. सवाल यह नहीं है कि अनुस्वार रहित या सहित ठीक है, या दोनों ठीक है लेकिन जो भी है , एक नियम से बंधा होना चाहिए. सिर्फ सुगमता के लिए जो मन हो हो, उसका प्रयोग हो, वह ठीक नहीं. मसलन, आजकल चन्द्रबिन्दु का प्रयोग अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. अब चाँद हो या चांद हो? नए युग के लोगों को चांद ही ठीक लगेगा. अब इसके उद्गम से अपभ्रंश तक की कहानी में कई कारण सामने आयेंगे लेकिन चाँद का सही रूप क्या है यह तो उसका मौलिक रूप ही तय करेगा. खेद इस बात का है कि स्कूलों में हिंदी शिक्षकों का स्तर ही इतना कम हो चुका है कि बच्चों का क्या दोष है. योगदान इन्टरनेट पर त्रुटिपूर्ण हिंदी लेखन से भी मिल रहा है.

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    1. निहार, तुम्हारी बात से सहमत हूँ। नियमों की उदारता अलग बात है और उनका अज्ञान और उल्लंघन अलग।

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