Sunday, July 13, 2008

नसीब अपना अपना

पुराना किस्सा है। दरअसल जिंदगी में एक पड़ाव ऐसा भी आता है जब पुराने किस्से नए किस्सों को पीछे छोड़ जाते हैं। तो जनाब (और मोहतरिमा), यह किस्सा है शिरवल का। शिरवल नाम है उस छोटे से कसबे का जहाँ मैंने अपनी ज़िंदगी के हसीन चार महीने गुजारे। अनजान लोग, अनजान भाषा के बीच में भी इतना अपनापन मिल सकता है मुझे शिरवल ने ही सिखाया। शिरवल में रहता था और पास के गाँव में नौकरी करता था. नई नई नौकरी थी। अकेला ही था इसलिए समय की कोई कमी न थी. दफ्तर के साथी शाम को हाइवे पर एक चाय भजिया के ठेले पर बैठ कर अड्डेबाजी करते थे. पहले दिन से ही मुझे वहां लेकर गए. चाय भजिया और हरी मिर्च तो मुझे अच्छी लगी तो मैं भी रोज़ उनके साथ वहां जाने लगा. ठेले पर बहुत भीड़ रहती थी. ठेले वाले ने आस पास बहुत सी बेंच डालकर एक पूरा होटल जैसा ही बना डाला था.

रोज़ जाता था तो आसपास नज़र डालना भी स्वाभाविक ही था, वैसे भी मेरे जानकार कहते हैं कि मुझे वह भी दिखता है जो किसी को नहीं दिख पाता. मैंने देखा कि इस ठेले के सामने ही एक पति-पत्नी भी भजिया बेचते थे. इस ठेले के विपरीत उन्होंने सड़क पर कब्ज़ा भी नहीं किया हुआ था। उनकी पक्की दुकान में बड़ा सा ढाबा था। आंधी पानी से बचाव के लिए एक छत भी थी. मगर मैंने कभी भी किसी ग्राहक को उनकी दुकान पर जाते हुए नहीं देखा. परंपरागत महाराष्ट्री वेशभूषा में दोनों पतिपत्नी रोजाना अपने ढाबे के बाहर ग्राहकों के इन्तेज़ार में खड़े रहते थे. टूरिस्ट बसें रूकती थीं मगर सभी लोग सड़क घेरकर खड़े हुए ठेलों पर ही आ जाते थे और वे दोनों बस ताकते रहते थे. शायद यह उनकी किस्मत थी या शायद उनकी वेशभूषा या फ़िर उनकी बढ़ी हुई उम्र - कुछ कहा नहीं जा सकता।

रोज़ उनकी मायूसी को देखता था मगर कभी ख़ुद भी उठकर सड़क पार नहीं कर सका. शायद उस अल्पवय में मैं कुछ ज़्यादा ही सोचता था. ठेलेवाला जो अब मेरा मित्र था बुरा मानेगा - मैं अकेला उस दुकान पर बैठा अजीब सा दिखूंगा - वे बुजुर्ग महाराष्ट्रियन दंपत्ति मेरे साथ बात ही नहीं कर पायेंगे आदि जैसे अनेकों कारण दिमाग में आते थे. सौ बात की एक बात यह कि न तो मैं ख़ुद कभी उस दुकान पर गया और न ही कभी किसी और को ही जाते देखा।

उस दिन मेरी खुशी का ठिकाना न रहा जब मैंने देखा कि फटे पुराने कपडों वाला एक मजदूर उस दुकान की और बढ़ा। यह ठेलेवाला तो शायद उस तरह के कपड़े वाले व्यक्ति को दूर से ही दुत्कार देता। उन दोनों ने उसे हाथों हाथ लिया और साफ़ सुथरी मेज पर बिठाकर उसकी आवभगत शुरू कर दी। अच्छा लगा कि कोई ग्राहक तो आया. तभी एक बस रूकी और बड़े सारे लोग उतरकर उसी दुकान की तरफ़ जाने लगे। पति पत्नी दौड़कर उन सवारियों को लेने आगे बढे तभी एक सवारी की नज़र फटे कपडों वाले ग्राहक पर पड़ी. उसने नाक भौं सिकोड़ीं और पीछे हटा। उसकी देखा देखी बाकी लोग भी रूक गए. उन्होंने इधर उधर देखा और सीधे सड़क पार कर इस ठेले पर आ गए। दो मिनट पहले जो मजदूर मुझे उनका भाग्यविधाता लग रहा था अब उसके वहाँ जाने का परिणाम देखकर मेरे मुंह से बस इतना ही निकला - नसीब अपना अपना. मेरे वहां प्रवास के चार महीनों में उस एक मजदूर के अलावा मैंने कभी किसी और को उस दुकान पर नहीं देखा।

6 comments:

  1. आपकी भजिया तो बडी जोरदार निकली ! इसमे साहित्य का मसाला आपने बडा शानदार लगाया है ! हमारे मुँह मे तो भजिया के नाम से ही
    पानी आ रहा था ! पर घाटे मे नही रहे ! आपका धन्यवाद कि आपने इस मानवीय घटना को इतने सुंदर रुप मे परोसा ! मैने भी यह देखा है कि किसी की दुकान जोरदार चलती है और पास
    वाले दुकान दार हाथ पर हाथ धरे खाली बैठे रहते हैं ! शायद इसी को भाग्य कहते हो ?
    शुभकामनाएँ !

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  2. क्या सन्योजन है आपका ! लगता है आपको तो हमारे यहां की पूरी जानकारी है ! शहरों में या अन्य जगह खाने के अंत मे मिठाई खायी जाती है पर हमारे हरियाना मे शुरूआत मिठाई से होती है ! और शायद ही नमकीन के लिये जगह बचती हो ! अगर गल्ती से बच गई तो भजिया मुँह का स्वाद ठीक करने के लिये बाद मे खाया जाता है ! यानि पहले मिठाई फिर नमकीन !
    पहले गुलाब जामुन और अब शिरवल की भजिया !
    आनंद आ गया ! वैसे आपकी बात सही है क्युंकी हमारे यहाँ एक कचोरी समोसे वाला है उसके पास शाम को लाईन लगती है और उसके पास वाले मक्खीयां मारते रहते हैं ! क्या पता यही भाग्य
    कहलाता हो ! ये भी अन्वेषण का विषय है और इस काम मे भी आप से ज्यादा कौन ढुंढ सकता है !





    और आपकी बात सही

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  3. kuchh baaten hoti hain jin par aapka bas nahin hota... sahi hai nasib hi hota hai yah...
    aakhir upar wale ko bhi apne hone ka ehsaas dilana hota hai na..

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  4. बहुत सही कहा आपने,नसीब अपना अपना, कई बार इंसान अपने नसीब के आगे मजबूर हो जाता है और उसके हाथों में कुछ भी नही रहता.

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  5. नसीब अपना अपना ...

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