Saturday, November 29, 2014

तल्खी और तकल्लुफ

जो आज दिखी
असहमति नहीं
अभिव्यक्ति मात्र है
आज तक
सारा नियंत्रण
अभिव्यक्ति पर ही रहा
असहमति
विद्यमान तो थी
सदा-सर्वदा ही
पर
रोकी जाती रही
अभिव्यक्त होने से
सभ्यता के नाते

10 comments:

  1. ऐ जौक तकल्लुफ में है तकलीफ सरासर
    आराम से वो हैं जो तकल्लुफ नहीं करते!

    कई बार तकल्लुफ को कमजोरी समझ लेते हैं लोग...
    एक बार की तल्ख़ बयानी ज़िंदगी भर आसानी!!

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  2. असहमति होना असभ्यता नहीं है ... ये सोच विकसित होने में बहुत समय निकल जाता है ...
    सोच खुली होनी चाहिए ...
    प्रभावी रचना ....

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (01-12-2014) को "ना रही बुलबुल, ना उसका तराना" (चर्चा-1814) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. एक कहावत याद आ गई -
    'जिसने करी शरम,उसके फूटे करम .
    जिसने करी बेहयायी उसने खाई दूध -मलाई .'

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  5. अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता तो मानव का मूल अधिकार है, हाँ, हर बात का...समय जरूर होता है

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  6. हम वही तो अभिव्यक्त करते है जो दूसरों को पसंद हो
    सभ्यता के नाते जनहिताय ही सही सहमति,
    लेकिन तकल्लुफ से कई अधिक महत्व तल्खी का है !

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  7. सुन्दर प्रस्तुति

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  8. Pranaam sir ji..aapki jigyaasa ne humaara bhi gyaan badhaaya ..saadar dhanyavaad .

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