Saturday, March 21, 2015

सीमित जीवन - कविता

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)
इस जीवन की आपूर्ति सीमित है, कृपया सदुपयोग करें

अवचेतन की
कुछ चेतन की
थोड़ी मन की
बाकी तन की
कुछ यौवन की
कुछ जीवन की
नर्तन की
कीर्तन की
परिवर्तन की
और दमन की
सीमायें हैं
लेकिन
सीमा नहीं
पतन की

15 comments:

  1. आकाश और पाताल की गहराइयो की माप कौन कर पाया आज तक - उत्थान और पतन की सीमा रेखा कहाँ से आए !

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  2. सटीक ... कुछ शब्दों में गहरी बात ... पतन की कोई सीमा नहीं ...बस सबकी अपनी अपनी सीमा है अगर अपना अपना पतन रोकना चाहें तब ...

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  3. भारतीय नववर्ष एवं नवरात्रों की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (23-03-2015) को "नवजीवन का सन्देश नवसंवत्सर" (चर्चा - 1926) पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. धन्यवाद शास्त्री जी

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  4. सही है पतन की कोई सीमा नहीं !

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  5. बहुत ही बढिया

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  6. और ऐसे ही उत्थान की भी...

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  7. बहुत अच्छा लिखा है आपने. एक शेर याद आया कृष्ण बिहारी नूर का -
    सच घटे, या बढे, तो सच ना रहे
    झूठ की कोई इंतेहा ही नहीं.

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  8. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति सर.

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