Friday, March 27, 2015

पुरानी दोस्ती - लघुकथा

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)

बेमेल दोस्ती की गंध
इस बार उसका फोन कई साल बाद आया। ताबड़तोड़ प्रमोशनों के बाद अब वह बड़ा अफसर हो गया है। किसी जमाने में हम दोनों निगम के स्कूल में एकसाथ काम करते थे। मिडडे मील पकाने से लेकर चुनाव आयोग की ड्यूटी बजाने तक सभी काम हमारे जिम्मे थे। ऊपर से अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ। इन सब से कभी समय बच जाता था तो बच्चों की क्लास ले लेते थे।  

उसे अपने असली दिल्लीवाला (मूलनिवासी) होने का गर्व था। मुझे हमेशा ओए बिहारी कहकर ही बुलाता था। दिलका बुरा नहीं था  लेकिन हज़ार बुराइयाँ भी उसे सामान्य ही लगती थीं। अपनी तो मास्टरी चलती रही लेकिन वह असिस्टेंट ग्रेड पास करके सचिवालय में लग गया। अब तो बहुत आगे पहुँच गया है।

आज मूड ऑफ था उसका। अपने पुराने दोस्त से बात करके मन हल्का करना चाहता था सो फोन किया।

"कैसा है तू?"

"हम ठीक हैं। आप कैसे हैं?"

"गुड ... और तेरी बिहारिन कैसी है?"

इतने साल बाद बात होने पर भी उसका यह लहजा सुनकर बुरा लगा। मुझे लगा था कि उम्र बढ़ाने के साथ उसने कुछ तमीज़ सीखी होगी। सोचा कि उसे उसी के तरीके से समझाया जा सकता है। मैं आरा का सही, उसका इलाका तो दिल्ली देहात ही था।

"हाँ, हम सब ठीक हैं, तू बता, तेरी देहातन कैसी है?"

"ओए बिहारी, ये तू तड़ाक मुझे बिलकुल पसंद नहीं। और ये क्या तरीका है अपनी भाभी के बारे में बात करने का?"

फोन कट गया था। बरसों की दोस्ती चंद मिनटों में खत्म हो गई थी।

[समाप्त]

10 comments:

  1. कुछ बातें ऐसी हैं जो ना उम्र सिखा पाती है और ना ही नसीहतें. यहाँ भी कुछ ऐसा ही लगता है.

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  2. श्री राम नवमी की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (29-03-2015) को "प्रभू पंख दे देना सुन्दर" {चर्चा - 1932} पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. धन्यवाद, शास्त्री जी।

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  3. अच्छा हुआ ऐसी दोस्ती ख़त्म हो गयी, सौ में से निन्यान्नव दोस्त दोस्त नहीं दोस्ती का केवल आभास देते है, सटीक लगी कहानी !

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  4. बेमेल रिश्तों को विराम देना ही बेहतर , बढ़िया कहानी

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  5. ऐसी दोस्ती जल्दी ही ख़त्म हो तो अच्छा है ... अच्छी कहानी है ...

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  6. छोटी सी सुन्दर लघुकथा .जो बडा सन्देश छुपाए है . .

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  7. पर ज्यादातर मामलों का नंगा सच ऐसा ही होता है ।

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