Wednesday, September 7, 2016

शाब्दिक हिंसा - मत करो (कविता)

लोग अक्सर शाब्दिक हिंसा की बात करते हुए उसे वास्तविक हिंसा के समान ठहराते हैं. फ़ेसबुक पर एक ऐसी ही पोस्ट देखकर निम्न उद्गार सामने आये. शब्दों को ठोकपीट कर कविता का स्वरूप देने के लिये सलिल वर्मा जी का आभार. (अनुराग शर्मा)

मत करो
मत करो तुलना
कलम-तलवार में
और समता
शब्द और हथियार में
ताण्डव करते हुये हथियार हैं
शब्द पीड़ा शमन को तैयार हैं

कुछ बुराई कर सके
अपशब्द माना
वह भी तभी जब
मैं समझ पाऊं
गिरी भाषा तुम्हारी
और कमज़ोरी मेरी
आहत मुझे कर दे ज़रा
जो कुछ भी कहो
सामान्यतः
इस शब्द ने है
दर्द अक्सर ही हरा

लेकिन तुम्हारी
आईईडी, बम, और बरसती गोलियाँ
इनसे भला किसका हुआ
हर कोई बस इससे मरा
नारी-पुरुष, आबाल-वृद्ध
कोई नहीं है बच सका
जो सामने आया
वही जाँ से गया

शब्द और हथियार की तुलना
तो केवल बचपने की बात है
कुछ ग़ौर से सोचें तनिक तो
ये किन्हीं हिंसक दलों की
इक गुरिल्ला घात है

इनके कहे पर मत चलो तुम
वाद या मज़हब,
किसी भी बात पर
इनका हुकुम मानो नहीं तुम
छोड़कर हिंसा को ही
संसार यह आगे बढ़ा है
नर्क तल में और हिम ऊपर चढ़ा है
बस चेष्टा इतनी करो
हिंसा से तुम बचकर रहो
जब भी कहो, जैसा कहो, बस सच कहो
और धैर्य धर सच को सहो

शब्द से उपचार भी सम्भव है जग में
प्रेम तो नि:शब्द भी करता है अक्सर
फिर भला नि:शस्त्र होना
हो नहीं सकता है क्यों
पहला कदम इंसानियत के नाम पर
कर जोड कर
कर लो नमन, हथियार छोड़ो
अग्नि हिंसा की बुझाने के लिये तुम
आज इस पर बस ज़रा सा प्रेम छोड़ो!

15 comments:

  1. जो कुछ भी हो, जो कुछ भी हो
    इस शब्द ने है दर्द अक्सर ही हरा...... निःशब्द है प्रेम ....प्रेम किसी शब्द में होता तो ज़रूर लिखा जाता ..अनुभूति में है प्रेम ...बहुत गहन और सुंदर रचना !!

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  2. आपका आदेश था, किन्तु विस्मृत हो गया था! आज अचानक देखा तो सोचा पूरा करूँ! इस कविता के भाव कई बार मेरे मन में भी उभरे हैं. एक अत्यंत सामयिक रचना जो कई विचारों को जन्म देती है और सोचने पर विवश करती है!
    मुझे जो मान दिया, उसके लिए आभार!

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  3. एक शब्द होता है
    जो भूले को याद दिला दे,
    एक शब्द होता है
    जो भटके को राह दिखा दे।
    एक शब्द होता है
    जो आँखों से मोती बरसा दे,
    एक शब्द होता है
    जो दिन में तारे दिखला दे।
    एक शब्द होता है
    जो रोते को मीठी नींद सुला दे,
    एक शब्द होता है
    जो उड़ते को मिटटी में मिला दे।
    एक शब्द होता है
    जो लंगड़े को पर्वत लाँघवा दे,
    एक शब्द होता है
    जो मूर्ख को विद्वान बना दे।
    एक शब्द होता है
    जो तलवारें खिंचवा दे,
    एक शब्द होता है
    जो प्रेम का दरिया बहा दे।
    एक शब्द होता है
    जो पर्वतों को हिला दे,
    एक शब्द होता है
    जो टूटे दिलों को मिला दे।
    शब्दों में बड़ी शक्ति है मित्रों,
    इनका प्रयोग करो जरा संभल के।
    कमान से निकला तीर तो,
    घायल कर सकता बस एक बार।
    मगर मुख से निकला शब्द तो,
    प्रतिक्षण करता हज़ारों वार।

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    1. सत्य वचन, शब्द शब्द का हेर ...

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  4. अहिंसा के महत्व को समझाने के लिए सलिल भाई को शब्दों को भी ठोंकना पीटना पड़ा :)
    बस मजाक कर रही थी, देखा जाय तो हिंसा अहिंसा इतनी घुली मिली है कि दोनों को अलग कर के देख पाना बड़ा ही मुश्किल काम है शाब्दिक हिंसा फिर भी स्थूल हिंसा है बहुत सारी बारीक़ हिंसा हम लोग करते है अच्छा है जितना हो सके बचा जाये ! सच कहूँ तो मेरे लिए साहित्य का मतलब ही है स-हित मतलब लिखने वाले का हित पढने वाले का हित ! कलम के धनि जब शब्दों को हथियार बनाते है तब हित कहाँ अहित ही अहित है ! बहुत सार्थक रचना बधाई आप दोनों को !

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  5. कर लो नमन, हथियार छोड़ो
    अग्नि हिंसा की बुझाने के लिये तुम
    आज इस पर करो बस जरा सी प्रेम की
    बौछार !

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  6. बेहतरीन रचना

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  7. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (10-09-2016) को "शाब्दिक हिंसा मत करो " (चर्चा अंक-2461) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  8. वाह! यहाँ तो खूब सक्रीय दिख रहे सभी!!! जय जो...

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  9. बातें अच्छी हैं, सही हैं.

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  10. सुन्दर रचना

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  11. शब्द कुछ का कुछ कर सकते हैं ... अर्थ का अमर्थ पर दिर भी
    शस्त्र केवल विनाश ही लाते हैं और उनको छोड़ना तो बहुत ही ज़रूरी है ...
    गहरी रचना सोचने को विवश करती है ...

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  12. तभी तो बुजुर्ग लोग कह गए है की भैया तोल मोल के बोल, शानदार प्रस्तुति साहब

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  13. आपकी कविता मैं कभी कविता के लिए नहीं पढता हूँ , वो तो बहुत लोग करते हैं | आपकी कविता पढ़ने का असली मकसद वो एहसास महसूस करना होता है जो शायद रोजमर्रा की जिंदगी में होकर भी अनछुआ रह जाता है |
    इस बार भी वो एहसास भरपूर मिला है |

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