Tuesday, September 13, 2016

ये दुनिया अगर - कविता

(अनुराग शर्मा)

बारूद उगाते हैं बसी थी जहाँ केसर
मैं चुप खड़ा कब्ज़े में है उनके मेरा घर

कैसे भला किससे कहूँ मैं जान न पाऊँ
दे न सकूँ आवाज़ मुझे जान का है डर

नक्सल कहीं माओ कहीं बैठे हैं जेहादी
कंधे बड़े लेकिन नहीं दीखे है कहीं सर

कोई अमल होता नहीं बेबस हुआ हाकिम
दर पे तेरे पटक के ये सर जायेंगे हम मर

बदलाव कभी आ नहीं सकता है वहाँ पे
परचम बगावत का हुआ चोरी जहाँ पर

21 comments:

  1. जान का डर हमें हैं और उन्हें जान का जरा भी डर नहीं जो बारूद उगाते हैं..यही तो विडम्बना है इस सदी की..

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 15 सितम्बर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 15-09-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2466 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  4. इससे बेहतर वर्त्तमान दुर्दशा का कोई चित्रण नहीं हो सकता. बिना शोर शराबे के आपने सब कुछ कह दिया!

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  5. यही तो विवशता है - उपचार कहाँ !

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  6. सुन्दर प्रस्तुति

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  7. आप और हम एक आत्मीय होने के नाते यही उम्मीद करते है
    परिवर्तन की नई सुबह अवश्य होगी अभी कोहरे में ढकी है भोर !
    बेहतरीन रचना !

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  8. क्या बात कही है आपने कि जहाँ बगावत का परचम ही चोरी होजाए वहाँ बदलाव क्होया होगा ..व्यथा को सही शब्द मिले है .

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  9. इस हालात के ही हैं सब शिकार ।

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  10. वर्तमान को केनवास दे दिया शब्दों का ... आज के हालात पे कड़ा तप्सरा ...

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  11. केसर क्यारी बंजर हो उगा रही बारूद क्या कीजे!

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  12. बदलाव कभी आ नहीं सकता है वहाँ पे
    परचम बगावत का हुआ चोरी जहाँ पर
    ..बहुत सटीक। .

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  13. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "भूली-बिसरी सी गलियाँ - 10 “ , मे आप के ब्लॉग को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  14. बहुत सुन्दर....

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  15. स्थिति बड़ी खराब है, जल्दी सुधरे।

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  16. आपके द्वारा लिखी गई हर पंक्तियाँ बेहद खूबसूरत होती हैं..

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