(चित्र व शब्द: अनुराग शर्मा)
चीड़ की इन ऊँची शाखों पर
शाम ने टांग दी है, अपनी अंतिम साँस
जैसे कोई ख़त,
जिसे लिखकर डाक में डाल दिया हो,
पर मंज़िल तक पहुँचना अभी बाक़ी हो।
चांद आज
कुछ ज़्यादा ही नीचे झुक आया है,
शायद चीड़ की सुइयों में
अपनी ही कोई पुरानी ख़ुशबू ढूँढने।
कुछ ज़्यादा ही नीचे झुक आया है,
शायद चीड़ की सुइयों में
अपनी ही कोई पुरानी ख़ुशबू ढूँढने।
हवा ने
दोनों के बीच
एक धीमी‑सी सरगोशी छेड़ दी है।
पता नहीं किसकी बात है,
पर सारी रात
पत्ते उसे दोहराते रहे हैं।
दोनों के बीच
एक धीमी‑सी सरगोशी छेड़ दी है।
पता नहीं किसकी बात है,
पर सारी रात
पत्ते उसे दोहराते रहे हैं।
कभी‑कभी लगता है
चीड़ और चांद
दो पुराने दोस्त हैं।
एक ज़मीन पर टिक कर ऊँचा उठता है,
दूसरा गगन में रहकर
थोड़ा‑थोड़ा नीचे उतरता है।
... और इन दोनों के बीच
की ख़ामोशी ही
असल कहानी है।
की ख़ामोशी ही
असल कहानी है।

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