Thursday, February 2, 2012

गन्धहीन - कहानी

शरद ऋतु की अपनी ही सुन्दरता है। इस दुनिया की सारी रंगीनी श्वेत-श्याम हो जाती है। हिम की चान्दनी दिन रात बिखरी रहती है। लेकिन जब बर्फ़ पिघलती है तब तो जैसे जीवन भरक उठता है। ठूंठ से खड़े पेड़ नवपल्लवों द्वारा अपनी जीवंतता का अहसास दिलाते हैं। और साथ ही खिल उठते हैं, किस्म-किस्म के फूल। रातोंरात चहुँ ओर बिखरकर प्रकृति के रंग एक कलाकृति सी बना लेते हैं। और दृष्टिगत सौन्दर्य के साथ-साथ उसमें होती हैं विभिन्न प्रकार की गन्ध। गन्ध के सभी नैसर्गिक रूप; फिर भी कभी वह एकदम जंगली लगती हैं और कभी परिष्कृत। मानव मन के साथ भी तो शायद ऐसा ही होता है। सुन्दर कपड़े, शानदार हेयरकट और विभिन्न प्रकार के शृंगार के नीचे कितना आदिम और क्रूर मन छिपा है, एक नज़र देखने पर पता ही नहीं लगता।

रेस्त्राँ में ठीक सामने बैठी रूपसी ने कितने दिल तोड़े हों, किसे पता। नित्य प्रातः नहा धोकर मन्दिर जाने वाला अपने दफ़्तर में कितनी रिश्वत लेता हो और कितने ग़बन कर चुका हो, किसे मालूम है। मौका मिलते ही दहेज़ मांगने, बहुएं जलाने, लूट, बलात्कार, और ऑनर किलिंग करने वाले लोग क्या आसमान से टपकते हैं? क्या पाँच वक़्त की नमाज़ पढने वाले ग़ाज़ी बाबा ने दंगे के समय धर्मान्ध होकर किसी की जान ली होगी और फिर शव को रातों-रात नदी में बहा दिया होगा? मुझे नहीं पता। मैं तो इतना जानता हूँ कि इंसान, हैवान, शैतान, देवासुर सभी वेश बदलकर हमारे बीच घूमते रहते हैं। हम और आप देख ही नहीं पाते। देख भी लें तो पहचानेंगे कैसे? कभी उस दृष्टि से देखने की ज़रूरत ही नहीं समझते हम।
तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो, जहाँ उम्मीद हो उसकी वहाँ नहीं मिलता।
~ नक़्श लायलपुरी
कथा व चित्र: अनुराग शर्मा 
खैर, हम बात कर रहे थे बहार की, फूलों की, और सुगन्ध की। संत तुलसीदास ने कहा है "सकल पदारथ हैं जग माहीं कर्महीन नर पावत नाहीं। जीवन में सुगन्ध की केवल उपस्थिति काफी नहीं है। उसे अनुभव करने का भाग्य भी होना चाहिये। फूलों की नगरी में रहते हुए लोगों को फूलों के परागकणों या सुगन्धि से परहेज़ हो सकता है। मगर देबू को तो इन दोनों ही से गम्भीर एलर्जी थी। घर खरीदने के बाद पहला काम उसने यही किया कि लॉन के सारे पौधे उखडवा डाले। पत्नी रीटा और बेटे विनय, दोनों ही फूलों और वनस्पतियों के शौकीन हैं, लेकिन अपने प्रियजन की तकलीफ़ किसे देखी जाती है। सो तय हुआ कि ऐसे पौधे लगाये जायें जो रंगीन हों, सुन्दर भी हों, परंतु हों गन्धहीन। सूरजमुखी, गुड़हल, डेहलिया, ऐज़लीया, ट्यूलिप जैसे कितने ही पौधे। इन पौधों में भी लम्बी डंडियों वाले खूबसूरत आइरिस देबू की पहली पसन्द बने।

देबू आज सुबह काफ़ी जल्दी उठ गया था। दिन ही ऐसा खुशी का था। आज की प्रतीक्षा तो उसे कब से थी। रात में कई बार आँख खुल जा रही थी। समय देखता और फिर सोने की कोशिश करता मगर आँखों में नींद ही कहाँ थी। नहा धोकर फ़टाफ़ट तैयार हुआ और बाहर आकर अपनी रंग-बिरंगी बगिया पर एक भरपूर नज़र डाली। कुछ देर तक मन ही मन कुछ हिसाब सा लगाया और फिर आइरिस के एक दर्ज़न सबसे सुन्दर फूल अपनी लम्बी डंडियों के साथ बड़ी सफ़ाई से काट लिये। भीतर आकर बड़े मनोयोग से उनको जोड़कर एक सुन्दर सा गुलदस्ता बनाया। कार में साथ की सीट पर रखकर गुनगुनाते हुए उसने अपनी गाड़ी बाहर निकाली। गराज का स्वचालित दरवाज़ा बन्द हुआ और कार फ़र्राटे से स्कूल की ओर भागने लगी। कार के स्वर-तंत्र से संत कबीर के धीर-गम्भीर शब्द बहने लगे, "दास कबीर जतन ते ओढी, ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया।"
[क्रमशः]


33 comments:

  1. क्या आपकी उत्कृष्ट-प्रस्तुति

    शुक्रवारीय चर्चामंच

    में लिपटी पड़ी है ??

    charchamanch.blogspot.com

    ReplyDelete
  2. अच्छा लिखा है आपने ... आगे की कहानी की प्रतिक्षा में ....धन्यवाद .

    ReplyDelete
  3. क्रमश:.... आह!!!! कहानी के अगले भाग की प्रतीक्षा में

    ReplyDelete
  4. जहाँ नजर दौडाओ वहाँ आज ऐसे ही उजली पोशाको में छुपे नाम बड़े और दर्शन छोटे वाले भद्र लोग ही नजर आते है ! अगली कड़ी का इन्तजार, वैसे कहानी की कड़ी आपने बहुत छोटी रखी है , वर्तमान कड़ी में २-३ पैराग्राफ और जोड़े जा सकते थे !

    ReplyDelete
  5. कहानी की भूमिका तो जोरदार बन पड़ी है . आगे का इंतजार रहेगा .

    ReplyDelete
  6. अच्छा लिखा है आपने, आगे की कहानी की प्रतिक्षा में

    ReplyDelete
  7. इस बार कहानी देखकर नीचे देखा.. क्रमशः लिखा था. सोचा, पढ़ ही लूँ. शुरुआत बहुत ही खूबसूरत है. मौसम और फूलों के सजीव चित्रण के बाद जैसे ही कहानी आई, बाँध लिया!! एक सस्पेंस के नोट पर समाप्त! आगे की कहानी की तो गंध भी मिलनी मुश्किल हो रही है!!

    ReplyDelete
  8. कहानी उत्सुकता जगाने में सफल हुई है.. आभार!

    ReplyDelete
  9. सरस, रोचक और एक सांस में पठनीय रचना के लिए बधाई।

    ReplyDelete
  10. आगे पढेंगे ..
    kalamdaan.blogspot.com

    ReplyDelete
  11. आगे की कहानी की प्रतीक्षा...

    ReplyDelete
  12. beautiful story narrated through the nature.
    GANDHHIN FUL OF FRAGERENCE.
    LOVELY STORY

    ReplyDelete
  13. दर्शन की, रोमांच की, शिल्प की सुगंध आने लगी है। लेंग्थ के मामले में थोड़ा लिबरल होना चाहिये वैसे आपको:)

    ReplyDelete
  14. आखिर कौन है वह गुलदस्ते का हक़दार?
    रहेगा बस उस अगली कडी का इन्तज़ार!!

    ReplyDelete
  15. आगे की कहानी की प्रतीक्षा...

    ReplyDelete
  16. गंधहीन फूलों का गुलदस्ता किसे देने जा रहे है महाशय ?
    प्रतीक्षा है ....

    ReplyDelete
  17. 'कहन' के मामले में तो आप जबर्दस्‍त हैं ही, यह तो कई बार कह चुका हूँ। किन्‍तु, कथा की पूर्व पीठिका के रूप में, इस पोस्‍ट का दूसरा अनुच्‍छेद (पैराग्राफ) अपने आप में एक सारगर्भित पोस्‍ट बनता है।

    ReplyDelete
  18. गंधहीन की रसभरी कहानी..रोचकता निश्चय है..

    ReplyDelete
  19. जीवन में सुगन्ध की केवल उपस्थिति काफी नहीं है। उसे अनुभव करने का भाग्य भी होना चाहिये।

    सच में , अगली कड़ी की प्रतीक्षा

    ReplyDelete
  20. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज charchamanch.blogspot.com par है |

    ReplyDelete
  21. "गंधहीन" शीर्षक लिए कहानी भी जब इतनी सुगन्धित हो सकती है , तब क्या आश्चर्य है कि आपके कहे विरोधाभास ( रूपसी : दिल तोड़े हों, मन्दिर जाने वाला :रिश्वत और ग़बन , .... ) इस दुनिया में देखने मिलते हैं ?
    :)

    ReplyDelete
  22. गंध बिखेरती कहानी कल्पना में खींच रही है .

    ReplyDelete
  23. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति को 'चर्चा मंच' में लिपटा
    देख उसकी सुगंध से यहाँ खींचा चला आया.
    'गंधहीन' रचना की सुगंध से मन प्रसन्न हो गया है.
    अगली कड़ी का इन्तजार है.
    आभार

    ReplyDelete
  24. जीवन में सुगन्ध की केवल उपस्थिति काफी नहीं है। उसे अनुभव करने का भाग्य भी होना चाहिये।

    अगली कड़ी का इन्तजार है...

    jai baba banaras....

    ReplyDelete
  25. उत्कृष्ट प्रस्तुति....

    ReplyDelete
  26. रोचक एवं प्रवाहमयी- आगे इन्तजार है.

    ReplyDelete
  27. उत्सुकता जगाती हुई, प्रवाहमयी.........

    ReplyDelete

मॉडरेशन की छन्नी में केवल बुरा इरादा अटकेगा। बाकी सब जस का तस! अपवाद की स्थिति में प्रकाशन से पहले टिप्पणीकार से मंत्रणा करने का यथासम्भव प्रयास अवश्य किया जाएगा।