Tuesday, February 14, 2012

... और वे पत्थर हो गए - इस्पात नगरी से [54]

पिछले सप्ताह पार्क में कुछ ऐसे लोगों से मुलाकात हुई जो या तो सर्दी या किसी सदमे के कारण पत्थर के हो गये थे। सोचा आपकी भी मुलाकात करा दूँ।

पति और पत्नी

कुछ देर आराम हो जाये?

जब हम होंगे साठ साल के ...

और हम खड़े-खड़े ...

दिल के टुकड़े टुकड़े कर के ...


और अब दो पंक्तियाँ अपनी भी -
चलना अभी बहुत है गिर कर मैं सो न जाऊँ 
चोटें लगी हैं इतनी पत्थर सा हो न जाऊँ ॥
* सम्बन्धित कड़ियाँ *
* इस्पात नगरी से - श्रृंखला

48 comments:

  1. बहुत बढ़िया..
    पत्थर के सनम...

    आपके कमेन्ट फॉर्म का मेसेज भी बढ़िया है..सोचती हूँ चुरा लूँ...
    :-)
    बस इजाज़त दे दीजिए.

    शुभकामनाएँ

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    1. :) ज़र्रानवाज़ी का शुक्रिया। नॉन-ट्रांसफ़रेबल अनुमति है! :)

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  2. चलना अभी बहुत है गिर कर मैं सो न जाऊँ
    चोटें लगी हैं इतनी पत्थर सा हो न जाऊँ


    बेहतरीन प्रस्तुति ! चलते जाना ही जिन्दगी है !

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  3. जितनी खूबसूरती से इसे सिलसिलेवार सजाया है आपने और जितनी संजीदगी से कैप्शंस दिए हैं आपने.. ऐसा लगता है कि इस्पात नगरी के ये पत्थर के बुत भी बोलने लगे हैं!!

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  4. अरे बाप रे! इतनी सर्दी पड़ती है कि जम कर पत्थर बन जाते हैं लोग! जवाहिरलाल को बुला लेना चाहिये जो रोज अलाव जला कर उन्हे जीवंत कर दे!

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  5. बहुत ही सुन्दर |

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति| धन्यवाद|

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  7. बहुत खूब । हम तो सोचते थे हम ही पत्थरों के शहर में बसते हैं । :)

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  8. बहुत खुब बोलते से बुत!!

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  9. पत्थर के खुदा, पत्थर के सनम, पत्थर के ही इंसा......

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  10. कमल के फोटो और उम्दा आपकी दो पंक्तियाँ

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  11. शब्द और चित्र दोनों बहुत उम्दा ......

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  12. पत्थर में चिन कर भी धड़क रहे हैं ये दिल
    चलते फिरते पत्थर भी देखे बहुत है हमने !
    अच्छी तस्वीरें !

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  13. पत्थर चोटें बनाती हैं,
    चोटें पत्थर बना देती हैं..

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  14. यह अच्छा होता कि चोट खाने से पहले पत्थर के हो जाते !

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  15. इन पत्थरों को देखकर लगता है की
    हम भी पत्थर हो गए है चलते फिरते ...

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  16. ये पत्थर तो बोल रहे हैं !

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  17. दिल को छू गयी ये पोस्ट.

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  18. गज़ब के पत्थर और आखिरी २ पंक्तियाँ...लाजबाब.

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  19. आपका शीर्षक जेंडर बॉयस क्यूँ है जी? :)

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    1. आज 11 महीने बाद शीर्षक ठीक कर दिया गया है और यह भी समझ आ गया कि अंत से आरंभ करने पर नाम खराब हो सकता है। अंतिम चित्र और एक कविता लिखने का प्लान था जो कि पोस्ट पूरी होने तक कविता कम चित्र-लेख अधिक बन गया। हालांकि यह टिप्पणी लिखते समय भी हुआ वही - अंतिम वाकई सबसे पहले लिख गया और अंत मे अंत की ओर भेजा गया इस बड़ी शिक्षा के लिए धन्यवाद!

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    2. संदर्भ के लिए:
      पुराना शीर्षक: ... और वह पत्थर हो गया
      नया शीर्षक: ... और वे पत्थर हो गए

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    3. अब झेलिये नये इल्ज़ाम -
      १. शीर्षक में बदलाव एकवचन से बहुवचन वाला बदलाव है सिर्फ़ जेंडर बायस दूर करने वाला नहीं।

      २. पहला इल्ज़ाम कमजोर लगे तो ये दूसरे वाला एकदम सोलिड स्टेट - ग्यारह महीने पहले आपने ऐसा शीर्षक दिया था। :)

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    4. संजय जी के कमेन्ट का शीर्षक होना चाहिए 'बाल से उतारो खाल' :)

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  20. सर्दी और सदमे से पत्थर बन गए.
    मुझे लगता है साठ और पचपन वाले तो खुशी
    में ही पत्थर हुए हैं.

    सुन्दर मनमोहक प्रस्तुति.
    आभार.

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  21. और हम खडे खडे
    पत्त्यर हो गये
    लोग पूजने लगे
    ईश्वत हो गये :)

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  22. रोज़गार सृजन का ऐसा ही प्रयास तोक्यो में भी कई जगह दिखा ।

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  23. चलना अभी बहुत है गिर कर मैं सो न जाऊँ
    चोटें लगी हैं इतनी पत्थर सा हो न जाऊँ
    बहुत ही सुन्दर |

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  24. मूर्तियाँ भी बोलती हैं ...

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  25. ये तो आपने असम की जादूगरनियों की याद दिला दी जो पूर्वांचल के कामगारों को पत्थर का बना देती हैं -अगर वे उनसे पीछा छुडाते हैं तो -ऐसी मान्यता रही है :) पश्चिम में भी ऐसा ही कुछ है क्या ? सावधान रहिएगा !

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    1. जी, कम से कम इस पर्वतीय क्षेत्र की भूमि तो असम ही है (हाँ अहोम साम्राज्य वाला असम देखे हुए कई दशक हो गए।)

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  26. वाकई ...बेहद उम्दा हैं।

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  27. कई महत्त्वपूर्ण 'तकनिकी जानकारियों' सहेजे आज के ब्लॉग बुलेटिन पर आपकी इस पोस्ट को भी लिंक किया गया है, आपसे अनुरोध है कि आप ब्लॉग बुलेटिन पर आए और ब्लॉग जगत पर हमारे प्रयास का विश्लेषण करें...

    आज के दौर में जानकारी ही बचाव है - ब्लॉग बुलेटिन

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    1. आभार! आपका प्रयास है तो खूबसूरत ही होगा!

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    2. ये तो एड्स वाला स्लोगन है भाई ! हमारे डिपार्टमेंट से चुराया है न !

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    3. कौशलेन्द्र जी, अहिंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचय्यार्परिग्रहा यमाः
      अहिंसा, सत्य, अस्तेय ...

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  28. अरे....मुझे लगा कि लोग घूमकर घर तो पहुंच गए पर अपना दिल और अक्स यहीं छोड़ गए हैं ..शायद इसलिए कि वो व्यस्त होने की वजह से समय न निकाल पाएं तो उनका ये घूमने वाला अक्श ही घुम कर उनकी कमी पूरी कर दे.हीहीहीहीही

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  29. ...और हम खड़े-खड़े गुबार देखते रहे ...

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  30. बहुत ही अच्छा लगा इस पोस्ट को पढ़ और देख कर....बेहद उम्दा

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  31. nice statue it looks like real people. :)

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  32. जिंदगी तो चलने का नाम ही है ... ये पत्थर हुवे लोग भी कभी जरूर चलते होंगे ...

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  33. वाह बहुत सुन्दर चित्र ..

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  34. बोलते पत्‍थर। खास कर 'जब हम होंगे साठ बरस के' वाला।

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  35. waah...amazing..:) :)
    aur antim ki pankityan to behtreen hain
    "चलना अभी बहुत है गिर कर मैं सो न जाऊँ
    चोटें लगी हैं इतनी पत्थर सा हो न जाऊँ "

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