Saturday, February 11, 2012

कच्ची दीवार - कविता

(अनुराग शर्मा)
होनी थी वह हो के रही, अनहोनी का होना क्या?

 उनके धक्के से गिरा ऐसा नहीं है यारों
कच्ची दीवार को इक रोज़ तो गिरना ही था

 दिल मुझपे लुटाया है तो कुछ खास नहीं
आज या कल में तो उनको भी समझना ही था

 कितनी मुद्दत से जलाता रहा दिल को अपने
ऐसे गुलज़ार को दिलदार तो बनना ही था

 लाख समझाया मगर इश्क़ से मैं बच न सका
मैं भी फ़ानी हूँ क़यामत पे तो मरना ही था

 हाथ रंगे वो मेरी लाश के सर बैठे हैं
उनके हाथों मेरी क़िस्मत को संवरना ही था।

42 comments:

  1. उनकी हर अदा कैसी भी हो,
    उनकी हर बात में मुझे हंसना ही था !!

    वाह महाराज,जियो !

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  2. लाख समझाया मगर इश्क़ से मैं बच न सका
    मैं भी फ़ानी हूँ क़यामत पे तो मरना ही था

    समझदार लोग ही शायद प्रेम से बचते है
    यह तो नासमझों का रोग है !
    हर पंक्ति सुंदर लगी !

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  3. बहुत खूब...

    मैंने इसे पढ़कर बाथरूम सिंगर बनने की कोशिश भी की और हर पंक्ति के अंत में ’यारों’ का प्रयोग और प्रभावी लगा।

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  4. उनके धक्के से गिरा ऐसा नहीं है यारों
    कच्ची दीवार हूँ इक रोज़ तो गिरना ही था-

    मार्मिक व संवेदनशील सृजन बहुत सुन्दर , बधाईयाँ जी /

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  5. बुड्ढा होगा तेरा बाप का अमिताभ बच्चन का डायलोग याद आ गया " हार्ट अटैक से सिर्फ मर्द मरते हैं, क्योंकि उनके पास दिल होता है ! :) :)

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  6. हर पंक्ति दमदार,
    कत्ल उलके हाथों लिखा हो, हमारे नसीब ऐसे कहाँ...

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  7. लाख समझाया मगर इश्क़ से मैं बच न सका
    मैं भी फ़ानी हूँ क़यामत पे तो मरना ही था
    it happens in love.
    BEST LINES NARRATED BY YOU.THANKS

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  8. उनके धक्के से गिरा ऐसा नहीं है यारों
    कच्ची दीवार हूँ इक रोज़ तो गिरना ही था

    ..जब गिर गये तब 'हूँ' कैसा! था न?

    कच्ची दीवार को इक रोज तो गिरना ही था

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    1. देवेन्द्र जी ,
      'हूं' पे आपत्ति ना कीजिये ! कवि की भावनाओं के साथ तालमेल बैठाइये , ज़रा देखिये तो सही पहले कच्ची दीवार 'खड़ी' है सो 'हूं' और बाद में 'पड़ी' तो भी 'हूं' ही हुआ ना :)

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    2. लो जी कल्लो बात! तालमेल ही तो बिठा रहा हूँ। जो खड़ी ना हो वो दीवार कैसी?
      गिर कर बिखर गई हर एक ईंट चीख-चीख कर कहती है..हम भी कभी दीवार थे।:)

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    3. दीवार अभी गिरी है, ईंटों में बिखरी नहीं, वैसे भी कच्ची ईंटों की कच्ची दीवार थी, बिखरने पर ईंटें नहीं धूल के ज़र्रे ही दिखेंगे।
      हर ज़र्रा चमकता है अनवारे इलाही से
      हर सांस ये कहती है हम हैं तो खुदा भी है

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    4. वाह,बिना अली साब के आये कोई ईंट भी दिवार नहीं बनती !

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    5. देवेन्द्र जी,
      आपके सुझाव पर परिवर्तित पंक्ति इस प्रकार है -
      उनके धक्के से गिरा ऐसा नहीं है यारों
      कच्ची दीवार को इक रोज़ तो गिरना ही था

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    6. देवेन्द्र जी,
      दीवार का 'गिरना' मतलब उसे 'दिवंगत' ही बताने पे ही क्यों तुले हुए हैं :)

      मसलन गिरे से गिरा हुआ आदमी भी हमेशा दिवंगत कहां होता है :)

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    7. हर ज़र्रा चमकता है अनवारे इलाही से
      हर सांस ये कहती है हम हैं तो खुदा भी है
      ..वाह! यह ज़ज्बा इस गज़ल के अगले शेर में आ पाता तो क्या बात हो जाती। वैसे ग़ज़ल बहुत बढ़िया लगी। मक्ता लाज़वाब लगा। मतले पर अटक गया था। गज़ल की यही समस्या है किसी मिसरे की हल्की सी चूक भी पूरी गज़ल का बेड़ागर्क कर देती है। यही कारण है कि मैं खुद बढ़िया ग़ज़ल नहीं लिख पाता।..आभार।

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    8. @हर ज़र्रा चमकता है ...
      यह तो एक बड़े शायर के शब्द हैं, अपने बस की बात कहाँ! :(

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  9. आज इन्हें पढ़कर दिन सफल है गया.

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  10. दिल को छूती रचना।

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  11. अपनी टिप्पणी से पहले एक सवाल.. साथ में जो चित्र लगाया है जिसमें यही कविता किसी पत्रिका में छपी दिखाई गयी है, उसके विषय में कुछ बताएं तो कुछ कहूँ.. दोनों कवितायें एक ही हैं मगर शब्दों का हेर-फेर या फेर बदल है.. इसका क्या कारण है?

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    1. नोटिस करने का आभार। परिवर्तन की गुंजाइश अक्सर वहाँ होती है जहाँ यथास्थिति संतोषजनक नही होती। उद्देश्य तो सुधार है, मगर वह क्षमता पर निर्भर करता है। मैं तो मत्ला और मक़्ता जोड़कर इसे ग़ज़ल ही बनाने की सोच रहा था लेकिन फिर वही यायावर का मन और पाँव - टिकता कहाँ है जो एक रचना भी इत्मीनान से पूरी है। बता दिया - अब कहिये जो कहना है।

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  12. अज़ब ये विधा है गज़ल भी यारों!

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  13. मार्मिक व संवेदनशील सृजन|

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  14. वाह!!!
    बहुत खूब....

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  15. लाख समझाया मगर इश्क़ से मैं बच न सका
    मैं भी फ़ानी हूँ क़यामत पे तो मरना ही था

    क्या बात है,..सुन्दर रचना

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  16. सुन्दर रचना

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  17. बेहद उम्दा , कमाल की पक्तियां हैं.....

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  18. बहुत ख़ूब कहा स्मार्ट भाई ‘उनके धक्के से गिरा ऐसा नहीं है यारों’।
    बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर आना हो पा रहा है क्या बतलाएँ ? ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत की कमी बहुत खलती है। समीर जी से कहता हूँ कि क्या वापसी नहीं हो सकती ? क्या कहें वे भी।
    ख़ैर।
    इस शेर ने दिल को छू लिया के ‘ हाथ रंगे वो मेरी लाश के सर बैठे हैं, उनके हाथों मेरी क़िस्मत को संवरना ही था।’ आपका आभार जो हमारे साथ पंडितजी को आपने भी याद किया।

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  19. अपन इसीलिए कभी पड़े नहीं इन चक्करों में।

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  20. वेलेंटाइन डे स्पेशल !
    बहुत खूब ।

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  21. कच्ची दिवार हो या पक्का फल... गिरना तो है ही :)

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  22. उनके धक्के से गिरा ऐसा नहीं है यारों
    कच्ची दीवार को इक रोज़ तो गिरना ही था
    बहुत ही गहरे जज्बात के साथ लिखी गयी बेहतरीन पंक्तियाँ ..

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  23. कच्ची दिवार की मानिंद गिरे भी तो क्या ....
    " गिरती हुई दीवारों हम तुमको थाम लेंगे
    बेबस हुए जो कभी तो तुम्हरा ही सहारा लेंगे "

    @लाख समझाया मगर इश्क़ से मैं बच न सका
    मैं भी फ़ानी हूँ क़यामत पे तो मरना ही था

    इश्क वह आतिश है ग़ालिब जो लगाये ना लगे !
    अच्छी लगी ग़ज़ल !

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  24. साहब इश्क से बचना बड़ा मुश्किल होता है...

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  25. लाख समझाया मगर इश्क़ से मैं बच न सका
    मैं भी फ़ानी हूँ क़यामत पे तो मरना ही था ...

    तो क्या ये इश्क क़यामत है ... शायद नहीं ये तो जीने की संजीवनी है ...

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  26. अन्तिम शेर बहुत ही सुन्‍दर है।

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  27. सलिल चचा के कमेन्ट को पढ़ने के बाद मैंने भी वो चित्र बड़ा कर के देखा :P

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